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Wednesday 22 Nov 2017

\'अक्षर पर्व; जुलाई-2015 पढ़ा। इस अंक में पाठक मंच की सार्थक गतिविधियों से अवगत होना सुखद लगा।

मंजुला उपाध्याय 'मंजुल'
सम्राट चौक, पूर्णिया-854301
मो. 09431865979

'अक्षर पर्व; जुलाई-2015 पढ़ा। इस अंक में पाठक मंच की सार्थक गतिविधियों से अवगत होना सुखद लगा। इस संदर्भ में जनता कवि का घर पहचानने लगे, गांव-गांव में कविता, कहानी यानी साहित्य के प्रति मानसिक भूख जगे, जिनके दायित्व आयोजकों के ऊपर होता है, ये तमाम कथानक रचनात्मक और स्वस्थ मानसिकता को गढऩे में सक्षम हैं।
इस छोटे से अंचल में भी सक्रिय पाठक मंच है, जिसकी भूमिका बिल्कुल प्रस्तावना जैसी है। इसकी कुछ रपट 'अक्षर पर्वÓ में भी प्रकाशित हुई है। राजेन्द्र उपाध्याय के विचार 'मानवाधिकार और प्रेमचंदÓ स्त्री-पुरुष संबंधों पर 'स्वछंदÓ भोग की मानसिकता वालों को विवाद में आत्मीय संबंध कहां दिखता है। एक स्त्री-देह पर स्वामित्व की स्वेच्छा से मिलना सर्टिफिकेट ही तो होता है।
इस अंक की जबरदस्त कहानी 'मुर्गा लड़ाईÓ उद्वेलित करती है। यह कहानी कथानक के शब्द सौंदर्य को बिखेरते हुए, कथ्य के बिम्बों-प्रतीकों का ऐसा अनोखा-सलोना सा विन्यास और उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्तियों को, प्यार के संवादहीन संप्रेषण की अक्षम ऊर्जा को विस्तारता में ले जाती हंै, जहां पाठक अभिभूत होते हैं। पाठक इन दृष्टांत पर गौर कर सकते हैं, जो कथा की केन्द्रीय सोच है- 'जंगल तुम्हारे पदचाप की प्रतीक्षा कर रहा होगा नि:शब्द... चुपचाप...।Ó
इस अंक की कविताएं एवं गल अच्छी लगी। खासकर देववंश दुबे की गक़ाल की इन पंक्तियों ने 'लौटना है ये सोचकर उडऩा / आसमां में मकां नहीं होते।Ó यकीनन जमीन से जुड़े यह ख्यालात, आदमी को जमीन से जुड़कर महत्वाकांक्षा बनाने को प्रेरित करती है।