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Thursday 23 Nov 2017

श्याम कश्यप से पहली बार 1973 में जनयुग के कार्यालय में मुलाकात हुई। वह जो थे उसे छिपाते थे और जो नहींथे,उसे दिखाते थे।

केवल गोस्वामी
जे. 363, सरिता विहार, मथुरा रोड, नई दिल्ली-110076

श्याम कश्यप से पहली बार 1973 में जनयुग के कार्यालय में मुलाकात हुई। वह जो थे उसे छिपाते थे और जो नहींथे,उसे दिखाते थे। उनकी यह आदत आज तक बनी हुई है। इसलिए भीष्मजी पर लिखा अक्षरपर्व में प्रकाशित उनका लेख सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति को ध्यान से पढऩे पर कुछ काल्पनिक प्रसंग-विवरण बराबर आंखों के सामने घूमते रहे, वह लिखते हैं- बुजुर्गों की दाढ़ी खींचने(जो क्लीनशेव थे, उनकी टांग खींचने) और छेड़छाड़ से मैं बाज नहींआता था। यह पूरे लेख का सारतत्व है। भीष्मजी जैसे शालीन व्यक्ति के साथ कामेडी वाले संबंध स्थापित करना वह भी जब वे उनकी पिता की आयु के थे और लेखकीय कद-काठी में भी जमीन-आसमान का अंतर था। भले ही वास्तव में ऐसा कभी घटित न भी हुआ हो पर कह देने में क्या हर्ज है। भीष्मजी और शीलाजी के परस्पर संबंधों को हल्के ढंग से बयान करना हर किसी के बस की बात नहींहो सकती। कल्पना को यथार्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कला भी हर किसी के पास नहींहो सकती। बन्ने भाई को सुपुर्देखाक करने के बाद लौटते हुए रास्ते में भीष्मजी के साथ पंजाबी में गुटरगूं करने की उनकी घोषणा मृत्यु की त्रासदी का खुला मजाक है इसमें कितनी सच्चाई है खुदा जाने। जिसको नामवर सिंह यार कह कर संबोधित करें, उसकी कद काठी का आप अंदाजा लगा सकते हैं। अब नामवरजी से इसकी सच्चाई के बारे में कौन पूछे और क्यों पूछे?
स्वयं को बार-बार शरारती कहना और उस पर गर्व करना हर किसी के बूते का काम नहीं। फिर उसकी शरारतों को हर बड़े-छोटे को सिर माथे पर लेना अजूबे से कम नहीं। ताबां साहब जैसे बुजुर्ग और शालीन शायर के संबंध में फूहड़ चुटकुला गढ़ कर उसमें मुझे भी घसीटना-जबकि वास्तव में ऐसा कभी हुआ ही नहीं, यह भी उनकी कल्पना की उड़ान है। कलम हाथ में हो तो स्वयं को शेर लिख देने में क्या हर्ज है। इसी प्रकार हीन भावनाओं पर काबू पाया जा सकता है। भीष्मजी की मिमिक्री करने लोगों का खुश होना और इनाम में आइसक्रीम खिलाना क्या बढिय़ा कल्पना है। मुंह मीठा हो जाता है। आप मान सकते हैं ऐसा हुआ होगा और कोई सभ्य व्यक्ति इससे आनंदित हुआ होगा, पर इस संस्मरण के लेखक को पूरा यकीन है कि इस विवरण को पढ़कर पाठक अभिभूत हो जाएगा। अभिव्यक्ति की आजादी का यह नया आयाम है।
भीष्मजी और शीलाजी के कार एक्सीडेंट पर इन्होंने जो फूहड़ और मनगढं़त किस्सा पेश किया है, वह मेरे संस्मरण जो आजकल पत्रिका के 2004 में प्रकाशित हुआ था, का श्याम कश्यपीय संस्करण है। मैं और राजकुमार सैनी शीलाजी की मिजाजपुर्सी के लिए गए थे। इन्होंने फुर्ती से राजकुमार सैनी को स्थानांतरित करके स्वयं को स्थापित कर दिया और उस गंभीर वातावरण में मुझ को लेकर शर्मनाक और फूहड़ टिप्पणी की। ईसा के शब्दों में भगवान उसे क्षमा करना वह नहीं जानता वह क्या कर रहा है।
गया सम्मेलन की तैयारियों में भीष्मजी, श्याम कश्यप, एच.के.व्यास कभी-कभी तबी हैदर का नाम भी, इसके अतिरिक्त और कोई नहीं, यह सच नहींहै। जबकि हर भाषा के लेखकों को लेकर एक बड़ी तैयारी कमेटी थी, जिसकी बैठकेें कनाट प्लेस के थियेटर कम्यूनिकेशन बिल्डिंग में होती थी। शीलाजी को लेकर जो पंजाबी संवाद प्रस्तुत किए गए हैं, शीला जी प्राय: ऐसी भाषा का इस प्रकार प्रयोग नहींकरती थीं, पर लेखक की कल्पना की दाद तो देनी ही चाहिए। दिवंगत के बारे में संस्मरण लिखने में एक सुविधा होती है, आप बिना झिझक दिल खोलकर झूठ बोल सकते हैं, कोई सत्यापित करने नहींजा रहा, पर लेखक भूल जाता है कि उस घटना के अन्य गवाह कहींन कहींमौजूद होंगे ही, झूठ के पांव नहींहोते।
लेख का अधिकांश हिस्सा प्रलेसं के किसी राज्य सम्मेलन की झूठी-सच्ची रिपोर्ट जान पड़ता है। इन विवरणों से आभास होता है प्रलेसं के महासचिव की उंगली पकड़कर श्याम कश्यप ही चलाते थे, और कोई तो वहां था नहीं। हमने यह किया, हमने वह किया, हर चौथी पंक्ति में पढऩे मिलता है। शेष साथियों का जिक्र न करना गैर जिम्मेदाराना तो है ही साहित्यिक बेईमानी भी है। आत्मश्लाघा के अतिरिक्त श्याम कश्यप ने भीष्म समेत त्रिलोचन शास्त्री, खगेन्द्र ठाकुर, कमला प्रसाद सबका चीरहरण करने की धृष्टता की है। प्रलेसं के सम्मेलनों में रसरंजन(शराबनोशी) भी होती थी, इसका ढिंढोरा न पीटा जाता तो काम चल सकता था। जहां वह शारीरिक रूप से उपस्थित नहींथे वहां का भौंडा और काल्पनिक वर्णन इस लेख की विशेषता है। मसलन प्रलेसं की स्वर्ण जयंती के अवसर पर वह उपस्थित नहींथे, जो विवाद हुआ भी वह पार्टी लेखकों की सभा में हुआ। फिर इन्हें किसने बता दिया कि मंच पर भीष्मजी और कमर रईस में तू तू मैं मैं हुई थी। कुल मिलाकर भीष्मजी की जन्मशताब्दी के अवसर पर यह लेख भीष्मजी की छवि को धूमिल करता है और श्याम कश्यप की छवि को सातवें आसमान पर ले जाता है।