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Wednesday 22 Nov 2017

यौन शोषण का शिकार बच्चे


सर्वमित्रा सुरजन
पाकिस्तान की बच्ची मलाला युसूफजेई ने चरमपंथी ताकतों के खिलाफ आïवाज़ उठाई, उनके हमले का शिकार हुई, लेकिन बच्चियों की पढ़ाई के लिए संघर्ष करती रही। उसके इस जज्बे को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली और नोबेल शांति पुरस्कार भी। पाकिस्तान की ही एक और बच्ची है 11 साल की नायब बीबी, जो बचपन से लकवे का शिकार है। नायब बीबी ने अमरीका में हुए स्पेशल ओलंपिक खेलों में कांस्य पदक जीता है। नायब उसी पेशावर के एक गांव की है, जहां कुछ समय पहले स्कूल पर हमला कर आतंकियों ने बच्चों को गोलियोंंसे भून दिया था। नायब पेशावर के मशाल नामक संस्थान में पढ़ती है, व खेल का प्रशिक्षण लेती है। इस संस्थान में शारीरिक विकलांगता के शिकार बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इस साल नायब के अलावा तीन और बच्चे विशेष ओलंपिक में गए थे और इन बच्चों ने दो रजत व दो कांस्य पदक जीते हैं। मलाला की खबर दुनिया को बहुत जल्दी लग गई, क्योंकि मामला आतंकवाद से जुड़ा था। नायब बीबी के बारे में अभी ज्यादा जानकारी लोगों को नहींहै। एक ओर पाकिस्तान में इन बच्चों की उपलब्धियां हैं और दूसरी ओर दिल दहलाने वाली खबरें भी हैं। भारत की सीमा से लगभग 60 किमी दूर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कसूर जिले में एक-दो नहींबल्कि सैकड़ों बच्चों का यौन शोषण कर उनके वीडियो बनाकर, ब्लैकमेलिंग का गंभीर अपराध लंबे समय से चल रहा था, जिसका खुलासा पिछले दिनों हुआ। गांवों, कस्बों के बच्चों का अपहरण कर, उन्हें नशीले पदार्थ जबरदस्ती खिलाकर उनका यौन शोषण किया जाता, फिर वीडियो बनाकर मां-बाप को दिखला कर उन्हें ब्लैकमेल किया जाता। ये वीडियो बाजार में आसानी से मिल भी जाते हैं। इन अपराधों को अंजाम देने वाले अक्सर घर-परिवार के करीबी रिश्तेदार और मित्र ही होते थे। पीडि़त बच्चों के परिजन बदनामी के डर से चुप लगा जाते थे। पिछले दिनों जब बच्चों के साथ होने वाले इस घृणित अपराध का पर्दाफाश हुआ तो उसकी सच्चाई जानकार रूह कांप गई। मासूम बच्चों का बचपन छीनने वाला यह कार्य क्या किसी आतंकवाद से कम है? पाकिस्तान में अपहरण की सजा मौत है, बावजूद इसके हर रोज़ अमूमन पांच बच्चों का अपहरण होता है और पांच से 15 वर्ष तक की आयु के 10 बच्चे रोजाना यौन हिंसा का शिकार होते हैं। शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में ऐसे अपराध अधिक होते हैं। समाज का दबाव, बदनामी के डर से इन अपराधों के खिलाफ आवाज़ अक्सर नहींउठाई जाती है। अपराध पर इज्जत का परदा डालने की ऐसी नाकाम कोशिशें जब सामने आती हैं तो उनका चेहरा बेहद खौफनाक होता है। जैसा इस वक्त कसूर जिले में हुआ है। पंजाब के बाल रक्षा ब्यूरो की प्रमुख सबा सादिक ने इसे पाकिस्तान के इतिहास का सबसे बड़ा बाल यौन शोषण कांड करार दिया है। फिलहाल पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ के आदेश पर न्यायिक जांच प्रारंभ हो चुकी है, कुछ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। अपराधियों को कब और कितनी सजा मिलती है और क्या इसके बाद बच्चों के यौन शोषण के अपराध को रोका जा सकेगा, इस बारे में कुछ नहींकहा जा सकता। यह मामला भले पाकिस्तान का हो, लेकिन इसे कोई भी सभ्य समाज या देश तटस्थ भाव से नहींदेख सकता, क्योंकि यह दुनिया के भविष्य से जुड़ा है। भारत में भी बच्चे कई तरह के शोषण, उत्पीडऩ का शिकार हैं। तमाम कानूनों के बावजूद न बालमजदूरी रुकी, न बच्चों की खरीद-फरोख्त और वेश्यावृत्ति खत्म हुई है। मलाला युसूफजेई के साथ भारत के कैलाश सत्यार्थी को भी शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था। उन्होंने भारत में बच्चों के लिए बहुत काम किया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद वैश्विक स्तर पर बच्चों के कल्याण के लिए कार्य करने की स्वाभाविक अपेक्षा उनसे बंध गई है। क्या वे और मलाला मिलकर पाकिस्तान के बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए कोई पहल करते हैं, यह देखने की उत्सुकता है। चरमपंथी संगठन आईएस बच्चों को आतंकी वारदात के लिए इस्तेमाल कर रहा है। नाइजीरिया आदि कई अफ्रीकी देशों में भी बच्चों को आतंकी बनाया जा रहा है। यूनीसेफ द्वारा घोषित किए गए बालअधिकारों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। संरा को इस दिशा में कठोर कदम उठाने की जरूरत है। पाकिस्तान के ताजा मामले में यूनीसेफ को स्वत:स्फूर्त दखल देना चाहिए। विश्वशांति का ढोल समय-समय पर बजाकर समृद्ध और शक्तिशाली देश यह मानते हैं कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभा दी। लेकिन जब तक दुनिया के किसी भी हिस्से में बच्चों के साथ अपराध होगा, तब तक विश्वशांति का लक्ष्य अधूरा रहेगा।