Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

आँख का नाम रोटी : सभ्यता की पराजय का त्रास

पल्लव
393 डी.डी.ए., कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी,
शालीमार बाग़,
दिल्ली-110088
कुछ कहानियाँ इतनी सरल और सादी दिखाई पड़ती हैं कि वे शिल्पहीन होने का भ्रम देती हैं। उन्हें अक्सर सपाट समझ लिया जाता है। और सपाट लेखन के लिए आलोचना का क्या काम ? स्वयं प्रकाश की कहानी अविनाश मोटू उफऱ् एक आम आदमी के साथ ऐसा ही हुआ था। बाद में सुधीश पचौरी जैसे गुणी आलोचक ने कहानी को खोलकर दिखाया तब कहानी की असल अर्थवत्ता सामने आई। लेकिन अभी हम जिस कहानी की बात कर रहे हैं वह हरि भटनागर की कहानी है - आँख का नाम रोटी यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि भटनागर अस्सी के दशक के बाद आए कथाकारों में अलहदा हैं क्योंकि वे अपनी कहानियों को जिस ढंग से गढ़ते हैं वह चौंकाने का भ्रम देते हुए भी इतना सरल और सादा है कि पाठक भले उसे प्रसन्नता से स्वीकार कर लें -आलोचक के लिए उलझन पैदा हो जाती है। कहानी कहने का यह ढंग चेखव की याद दिलाता है -छोटे छोटे वाक्य, निर्धन पात्र, संवादों -वर्णनों के बीच से निकलती कोई गंभीर बात और अचानक कहानी ख़त्म। हरि भटनागर के पाठकों को उनकी ऐसे अनेक कहानियाँ स्मरण होगीं -नशा हिरन और सेवड़ी, जली रोटियाँ और आलू इत्यादि।
आँख का नाम रोटी, इंदौर से छपने वाली एक लघु पत्रिका आवेग में कोई पंद्रह साल पहले प्रकाशित हुई थी। कहानी ऐसी बुनावट में है कि आप पहला वाक्य पढ़ लें तो पूरी कहानी एक सांस में पढ़े बिना चैन न आए। देखिए -बाहर कोई बच्चा रो रहा है। रोने की आवाज़ ऐसी की लगता, बच्चा किसी तकलीफ में है - चोट लगी है या कोई दूसरी पीड़ा है। पीड़ा और पीडि़त की तलाश कथा वाचक को घर के बाहर जाने पर मजबूर करती है। वह जाता है तो देखता है कि एक मजूर परिवार उसके घर के बाएँ हाथ की खाली जगह पर डेरा डाले है - मजूर, उसकी घरवाली और चार-पाँच साल की एक बच्ची। वह मजूर से बार बार बच्ची के रोने का कारण पूछता है लेकिन मजूर कथावाचक की लगातार अनदेखी करता है। तब वह बात बदलकर पूछता है -कहाँ से आए हो? जवाब मिलता है -बिलासपुर से।, क्यों? तब उसका जवाब देखिए -पानी नहीं है साहब, मजूरी के लिए आना पड़ा। फिर कुरेदने पर कि बच्ची क्यों रो रही है तो वह लगभग निरपेक्ष ढंग से बताता है कि आँख पिरा रही है। अर्थात आँख आ गई है। कथावाचक इन लोगों को सरकारी अस्पताल का रास्ता बताता है और समझाता है कि आँख का मामला है। यह कहते हुए वह लौट जाता है और ऑफिस के लिए तैयार होने लगता है। जब तैयार होकर बाहर आता है तो पाता है कि स्थिति पूर्ववत ही है। वह समझ गया कि इसके पास अस्पताल जाने और दवा के लिए पैसे नहीं हैं,इसलिए यह अस्पताल नहीं जा रहा। कथावाचक पचास रुपये का नोट निकालता है और मजदूर को इस हिदायत के साथ देता है - ढील न करना। शाम को ऑफिस से लौटकर प्रसन्न मन से कथावाचक मजूर परिवार के पास जाकर पूछता है तो जवाब में मजूर मुस्कुरा देता है और बोलता कुछ नहीं। बच्ची की आँखें पहले से ज्यादा लाल, सूजी और कीचड़ से चिपचिपाई हुई थीं, दवा का नामोनिशान न था। कथावाचक के बिगडऩे पर मजूर की सफाई है- साहब, रोटी खा ली है, आँख ठीक हो जाएगी। कथावाचक को इतना क्रोध है कि वह हथेली पर मुक्का मारकर कर्री निगाह से छेदता हुआ बोलता है -रोटी खाने से कहीं आँख ठीक होती है ! मजूर अपनी बात में अत्यंत सहज है - हाँ, साहब, ठीक हो जाएगी आँख ! रोटी जो खा ली है ! ! कल से भूखी थी ! कथावाचक गुस्से से अलफ है - रोटी का आंख से क्या ताल्लुक? फिर जवाब देखिए - साहब,रोटी खा ली है, आँख ठीक हो जाएगी ! पक्का जानें !!! अब अवाक् होने के अतिरिक्त कथा वाचक के पास कोई उपाय न था।
क्या यह जादुई यथार्थवाद है जहाँ रोटी खाने से आँखें ठीक हो सकती हैं? क्या यह बिज्जी द्वारा सुनाई कोई लोककथा है जिसमें बरसों बंद घर में इंतज़ार करते बच्चे बिना रोटी-पानी के जि़ंदा मिलें ? क्या यह माक्र्सवादियों का निर्धनता को महिमामंडित करने का पुराना शगल है ? इसे क्या समझें? यह सही है कि कहानी में संवाद बहुत थोड़े हैं और घटनाएं लगभग नहीं हैं। लेकिन कथाकार बहुत सजग है वह अपने वर्णन में इतना चौकस है कि मजूर परिवार की एक-एक मुद्रा को ध्यान से देख रहा है और दर्ज कर रहा है। जब वह पहली बार मजूर से बच्ची के रोने का कारण पूछने गया था तब कथाकार ने जो इन्द्राज किया है वह देखना चाहिए - मजूर बीड़ी का धुँआ नाक से छोड़ता बीड़ी के टोंटे को तलुवे पर रगड़कर बुझा रहा था। बुझा टोंटा उसने कान में खोंस लिया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। गर्दन झिटककर, गोया गुस्से में हो ज़मीन की ओर देखने लगा एकटक। दुबारा पूछने पर - मजूर के चेहरे पर वही गुस्सा। आँखों में भी उसी का असर है। मेरे पूछने पर वह काठ बना रहा। तब मजबूर होकर वह मजूरन से मुखातिब हुआ और तीखी आवाज़ में उससे पूछा - क्यों रो रही है छोरी? उत्तर यह है -औरत ने गहरी सांस छोड़ी और मेरी और एक नजर डालकर दोनों हाथों से सर थाम लिया जैसे कह रही हो पूछकर क्यों परेशान करते हो साहब! इससे पहले भी इस दम्पति का चित्र आया है -मजूर मुँह बाँधे बैठा है। आँखों में उसके सख्ती है जैसे कह रहा हो, तकलीफ है बच्ची को, आपको क्या? आप जाइए यहाँ से। मुझसे मत पूछिए कुछ ! उसकी घरवाली दीवार से टिकी है, निढाल सी जैसे बच्ची के रंज में हो। वाचक अनुमान करता है कि ये लोग भूखे होंगे क्योंकि न चूल्हा दिखाई दे रहा है और न राख। फिर पूछता है - आप लोगों ने कल कुछ खाया या नहीं? तब देखिए -दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों का जवाब न देना मेरे लिए असह्य होने लगा। कैसे हैं दोनों कि कुछ बोलते नहीं! अब वाचक के पास सीधे बच्ची से जूझने के अलावा कोई रास्ता नहीं था - यकायक मैं बच्ची के सामने बैठ गया उकड़ूँ। पुचकारते हुए उससे पूछा- क्यों रो रही हो बेटा?- मैंने आँखों पर से उसकी हथेलियाँ हटानी चाहीं लेकिन उसकी जकड़ इतनी मजबूत थी कि हटा न पाया - वह रोती रही।
कहानी के अंत में वाचक का अवाक् रह जाना क्या मध्य वर्ग या हम खाते-पीते लोगों को मजूरों के सामने अवाक् करना है ? क्या लेखक उनके जीवन संघर्ष के समक्ष हमें बौना करना चाहता है? शायद नहीं। अगर ऐसा होता तो मजूर कथावाचक से पचास रुपये न लेता। कहानी दवाई और रोटी को आमने सामने कर रही है। मानो दवाई एक लग्जरी है और रोटी से बड़ी कोई दवाई नहीं। या कहीं कथाकार यही तो नहीं कह रहा कि सारी बीमारियों के इलाज से पहले भूख का इलाज जरूरी है। महान संन्यासी विवेकानंद का वह कथन याद आता है - ऐसे धर्म या ईश्वर को नहीं मानता जो विधवाओं के आँसू न पोंछ सके या किसी अनाथ को रोटी भी न दे सके। वेद, कुरआन तथा सभी ग्रंथों को अब कुछ समय के लिए विश्राम करने दें। यहाँ इस मजूर परिवार की दुर्दशा का कारण छिपा नहीं है। वह कहता है पानी नहीं है साहब, मजूरी के लिए आना पड़ा। यह प्रकृति की मार हो या व्यवस्था की पराजय इसका दंड मजूर परिवार को इतना निर्मम बना रहा है कि वह बच्ची की पीड़ा के समक्ष मौन है। निरुपाय है। सही है कि कला यथार्थ नहीं होती, वह यथार्थ से कुछ कम या ज्यादा हो सकती है बशर्ते वह करुणा उत्पन्न करती हो, संवेदनशील बनाती हो। हरि भटनागर करुणा जगाने का नुस्खा नहीं आजमाते। वे अवाक् कर रहे हैं। अवाक् भी गुस्से से, जहां वाचक अलफ हो गया है यानी घोड़े की वह स्थिति जिसमें वह अपने दोनों पिछले पैरों पर खड़ा हो जाता है, इतने क्रोध के बावजूद अवाक्। कहानी में मौन की स्थिति दो बार है। पहले कथावाचक के समक्ष मजूर परिवार मौन है। बहुत कुरेदने पर बच्ची के रोने का कारण बता रहा है और दूसरी बार खुद कथावाचक मौन हो गया है, अवाक् हो गया है। दोनों की चुप्पियाँ मानीखेज हैं और इनके गहरे आशय हैं। जिन दिनों राजनेता चुनकर चुप्पियाँ ओढऩे में अपनी होशियारी समझते हों वहाँ एक मजूर और एक संवेदनशील नागरिक का मौन त्रास को जगाता है। यह त्रास इस सभ्यता की पराजय का त्रास है और हरि भटनागर की कला इस त्रास को निराडम्बर से प्रस्तुत कर रही है कि कहानी कलाहीन होने का भ्रम दे रही है। और कला का यह जादू यथार्थवादी रास्ते से आया है जिसे विचारधारा ने रोशन किया है न कि उस रास्ते से जो कला का ढिंढोरा पीटता है, साहित्य की स्वायत्तता की बात कहता है और जिसे विचारधारा से अधिक किसी से शत्रुता नहीं। वर्णन को कहानी की कमजोरी कहने वाले यह वर्णन पढ़ें तो सही - सामान के नाम पर इनके पास एक बड़ी सी पोटली थी और मजबूत ल_ जिसमें लम्बी डोरी के साथ पीतल का चमचमाता लोटा कसा था। मजूर तीस-एक साल का होगा। काला, पतला और काफी लंबा। टंट्या भील जैसा। मुँह चपटा और माथा छोटा। चहरे पर फ्रेंच स्टाइल जैसी दाढ़ी-मूँछे जो काफी गझिन थीं। आँखों के गटे सफ़ेद थे और उनके सिरों पर लालिमा थी जो सम्भवत: थकान या लम्बी धूपैली यात्रा के कारण थी। वह बहुत ही गंदा, चीकट होता बड़ा सा साफा बांधे था। बदन पर लंबा बिना बटनों का कुर्ता था और उसके नीचे घुटनों तक खुटियाई धोती। पैरों में प्लास्टिक के काले, घिसे जूते थे। कुर्ता-धोती काफी मैले और तेल के धब्बों से भरे थे। कुर्ते की आगे की जेब में वह एक लाल रंग के रुमाल जैसे कपड़े में बीड़ी-माचिस लपेटे था जिन्हें इस वक्त कपड़े से निकाल रहा था। बीड़ी उसने मुंह के कोर में दबाई और माचिस हथेली पर रगडऩे लगा। जिस बारीक निगाह से हरि भटनागर सब अंकित कर रहे हैं वह नए कहानीकारों के लिए भी प्रेरक हो सकता है। यह गद्य का वह सौंदर्य है जो परिश्रम के कारण उपजा है और इसकी चिंताएं गहरी हैं -मनुष्यता के प्रति हैं।