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Saturday 18 Nov 2017

आंख का नाम रोटी


अनिल जनविजय के लिए
हरि भटनागर
बाहर कोई बच्चा रो रहा है। रोने की आवाज ऐसी कि लगता, बच्चा किसी तकली$फ में है- चोट लगी है या कोई दूसरी पीड़ा है।
मैं अपने काम में लगा हूं। आम काटने में। पिछले साल किसी झंझट की वजह से अचार नहीं डल पाया था। पत्नी कहती रह गई थीं लेकिन बात टलती चली गई थी। लेकिन इस बार मैं दस किलो आम ले आया था और अचार डालने का मसाला और तेल। पक न जाएं इस लिहाज से काटने भी बैठ गया था।
लेकिन रोने की आवाज  काम करने से रोक रही है। मैं टालता हूं, दस-बीस आम और काट डाले, मगर इसके आगे $खतरा है। $खतरा यही कि ध्यान रोने की आवाज  की तरफ है। ऐसे में यदि चूक हो जाए तो, अमकटना कोई रिश्तेदार तो है नहीं, वह तो अपना काम करेगा, इस लिहाज से मैं उठा और लुंगी से कुसली झड़ाता, दरवाजा  ठेलता बाहर आ खड़ा हुआ।
दरवाजे के सामने कोई न था। बाएं हाथ की $खाली जगह की ओर बढ़ा। मजूर परिवार दिखा- मजूर, उसकी घरवाली और चार-पांच साल की एक बच्ची। कल शाम को ऑफिस से लौटते वक़्त मैंने इस परिवार को देखा था। तीनों $खाली पड़ी जगह में सहमे-से बैठे थे। शायद यह डर हो कि कोई टोक न दे कि यहां डेरा क्यों डाला, आगे जाओ। मुझे देखकर उनका डर बढ़ गया हो लेकिन जब मैं कुछ न बोला तो उन्हें लगा होगा कि घबराने की जरूरत नहीं, बने रहो।
सामान के नाम पर इनके पास एक बड़ी-सी पोटली थी और मजबूत लट्ठ जिसमें लम्बी डोरी के साथ पीतल का चमचमाता लोटा कसा था। मजूर तीस-एक साल का होगा। काला, पतला और का$फी लम्बा। टंट्या भील जैसा! मुंह चपटा और माथा छोटा। चेहरे पर फ्रेंच स्टाइल जैसी दाढ़ी-मूंछें जो का$फी गझिन थीं। आंखों के गटे स$फेद थे और उनके सिरों पर लालिमा थी जो संभवत थकान या लंबी धुपैली यात्रा के कारण थी। वह बहुत ही गंदा, चीकट होता बड़ा-सा साफा बांधे था। बदन पर लम्बा बिना बटनों का कुर्ता था और उसके नीचे घुटनों तक खुटियाई धोती। पैरों में प्लास्टिक के काले, घिसे जूते थे। कुर्ता-धोती का$फी मैले और तेल के धब्बों से भरे थे। कुर्ते की आगे की जेब में वह एक लाल रंग के रुमाल जैसे कपड़े में बीड़ी-माचिस लपेटे था जिन्हें इस वक़्त कपड़े से निकाल रहा था। बीड़ी उसने मुंह के कोर में दबाई और माचिस हथेली पर रगडऩे लगा।
उसकी घरवाली चटख लाल रंग के काले किनार की धोती पहने थी। सिर से पल्लू सरका हुआ था। पैर घुटनों के नीचे खुले थे जिनमें मोटे-मोटे वजनी कड़े थे और लच्छे जिनसे पैरों में घिट्टे पड़ गए थे। उंगलियों में अंगूठों को छोड़कर सभी में छल्लेदार बिछुए थे। सिर के बाल उलझे हुए लटों में बदल गए थे जिन्हें वह बेतरतीबी से बांधे हुए थी। घुटने पर ठोढ़ी टिकाए बैठी वह बच्ची को देख रही थी, कातर-सी।
बच्ची पोटली पर औंधी पड़ी रो रही थी। हथेलियां आंखों पर रखे। उसके बदन पर कसी-सी बनियान थी जो धूल और पसीने से बदरंग थी। बनियान छेदों से भरी थी। बनियान के नीचे ढीली-ढाली जांघिया थी जिसका नाड़ा बाहर को लटका था। बाल उसके बेतरह लटियाए- तार के गुच्छे जैसे लग रहे थे। लगता था कभी उनमें न तेल पड़ा है और न पानी के छींटे। वह गोल मुंह की थी- खुश्की से भरी। रो रही थी और हथेलियों से बुरी तरह आंखें मले जा रही थी। रह-रह वह ची$ख पड़ती जैसे आंखों में दर्द हो रहा हो।
ऑफिस की थकान की वजह उस वक़्त मैं पल भर को ठहरा था और फिर अंदर आ गया था और भूल भी गया था कि कोई मजूर परिवार भी ब$गल में थका-हारा है। शाम को उसने खाना खाया, पानी पिया या नहीं- मैंने ध्यान न दिया और खा-पीकर पड़ गया था।
लेकिन इस व$क्त मैं मजूर परिवार के सामने काफी देर से खड़ा हूं और इस टोह में हूं कि बच्ची क्यों रो रही है। कल भी वह रो रही थी लेकिन आज कुछ ज्य़ादा ही। हथेलियों से वह बुरी तरह आंखें मले जा रही थी, कहीं आंखों में तकली$फ तो नहीं। कुछ पता नहीं चल पा रहा था। बस वह रोए जा रही थी।
मजूर मुंह बांधे बैठा है। आंखों में उसके सख़्ती है जैसे कह रहा हो, तकलीफ है बच्ची को, आपको क्या? आप जाइए यहां से। मुझसे मत पूछिए कुछ ! उसकी घरवाली दीवार से टिकी है, निढाल-सी जैसे बच्ची के रंज में हो।
मुझसे रहा न गया। आगे बढ़कर मजूर से पूछा कि बच्ची क्यों रही है?
मजूर बीड़ी का धुंआ नाक से छोड़ता बीड़ी के टोंटे को तलुवे पर रगड़कर बुझा रहा था। बुझा टोंटा उसने कान में खोंस लिया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। गर्दन झिटककर, गोया गुस्से में हो जमीन की ओर देखना लगा एकटक।
-तुम्हीं से पूछ रहा हूं- हाथ लहराते हुए मैंने मजूर से पूछा- बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर के चेहरे पर वही गुस्सा। आंखों में भी उसी का असर है। मेरे पूछने पर वह काठ बना रहा।
नालायक ! अंदर ही अंदर गाली देते हुए मैं मजूरन से मु$खातिब हुआ- क्यों रो रही है छोरी?- मेरी आवाज तीखी होती जा रही थी।
औरत ने गहरी सांस छोड़ी और मेरी ओर एक नजर डालकर दोनों हाथों से सिर थाम लिया जैसे कह रही हो पूछकर क्यों परेशान करते हो साहब!
मैंने बच्ची को देखा जो बेतरह आंखें मले जा रही थी और रोये।
मैंने अ$गल-ब$गल नर डाली- न चूल्हा, न राख- जाहिर  था रात में सत्तू व$गैरह खाकर भूख मिटा ली होगी या यह भी हो सकता है कुछ न होने पर भूखे ही सो गए होंगे। मजूर और मजूरन तो भूखे रह सकते हैं, लेकिन बच्ची? वह भूखी भला कैसे रही सकती? शायद इसीलिए रो रही है।
मैंने पूछा- आप लोगों ने कल कुछ खाया या नहीं?
दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों का जवाब न देना मेरे लिए असह्य होने लगा। कैसे हैं दोनों कि कुछ बोलते नहीं।
यकायक मैं बच्ची के सामने बैठ गया उकड़ूं। पुचकारते हुए उससे पूछा- क्यों रो रही हो बेटा?- मैंने आंखों पर से उसकी हथेलियां हटाना नहीं चाहीं लेकिन उसकी जकड़ इतनी मबूत थी कि हटा न पाया- वह रोती रही।
दूर के पास खड़े होते मैंने पूछा- कहां से आए हो? घर कहां है?
उसका मुंह खुला, बोला- बिलासपुर से!
-क्यों आए यहां? मैंने पूछा तो उसका जवाब था- पानी नहीं है साहब, मजूरी के लिए आना पड़ा।
-बच्ची क्यों रो रही है?- मैं मुद्दे पर आया।
गहरी सांस छोड़ता वह बोला- साहब, आंख पिरा रही है।
-इतनी देर से पूछ रहा हूं, अब बोली फूटी... मैं झल्ला पड़ा।
आंखें न मल बेटा- कहता मैं बच्ची के आगे बैठ गया। बहलाते हुए मैंने उसकी हथेलियां हटाईं आंखों पर से। एक तो आंखें आई थीं, दूसरे बच्ची ने इतनी ज्य़ादा मल ली थीं कि लाल भभूका हो रही थीं- उनमें से पानी झर रहा था।
मैंने मजूर से कहा- यहां बारह सौ पचास में सरकारी अस्पताल है, सीधी बस जाती है यहां से। चलो जाओ, दिखा दो, आंख का मामला है।
मेरे कहे का मजूर पर कोई असर न था। जैसे मैंने $गैररूरी बात कह दी हो।
मजूरन आंखें सिकोड़े मुंह बिचकाए ऐसे बैठी थी जैसे मेरी बात उसे खल रही हो।
मैंने मजूर को समझाया- देखो, मेरा कहा मानो, बच्ची को दिखा जाओ, अस्पताल कोई दूर नहीं है, यहां पांच मील होगा!
मजूर ने गरदन हिलाई जैसे मेरी बात मान गया हो। बीड़ी सुलगाते हुए उसने बच्ची को देखा, पूछा- चलेगी अस्पताल, साहब कह रहे हैं।
मुझे लगा कि मजूर मेरी बात मान गया, इसलिए मैं अंदर चला गया और ऑफिस के लिए तैयार होने लगा। तैयार होकर जब बाहर निकला- मजूर, उसकी घरवाली पूर्ववत् बैठे थे। बच्ची आंखें मलते हुए अभी भी सिसक रही थी।
मैं समझ गया कि इसके पास अस्पताल जाने और दवा के लिए पैसे नहीं है, इसलिए यह अस्पताल नहीं जा रहा है।
मैंने पचास का नोट निकाला और मजूर को थमाता बोला- लो, जाकर दिखाओ, ढील न करना।
मजूर के उदास चेहरे पर $खुशी की लहर तैर गई। वह उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर माथे पर लगाता मेरे प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने लगा।
मैंने कहा कि इसकी रूरत नहीं, तुम जाकर बच्ची को दिखाओ। आंख ऐसी ची है कि कुछ गड़बड़ हुआ तो बिचारी कहीं की न रहेगी!!!
उसने हामी में सिर हिलाया।
मैं स्कूटर स्टार्ट करता ऑफिस की ओर बढ़ा।
शाम को ऑफिस से लौटा तो भारी प्रसन्न था और सीधे मजूर परिवार की ओर बढ़ा। बच्ची चुप थी और आंखें मीचे हुए पोटली से टिकी रोटी खा रही थी।
मैंने मजूर से पूछा- क्यों, दिखा लाए?
मजूर मुस्कुराया, बोला कुछ नहीं।
मैंने बच्ची की आंखें देखी- पहले से ज्य़ादा लाल, सूजी और कीचड़ से चिपचिपाई हुई थी, दवा का नामोनिशान न था।
मैंने माथा सिकोड़ा, बिगड़ते हुए मजूर से कहा- मैंने पैसे दिए, तब भी तुम अस्पताल नहीं गए। डॉक्टर को नहीं दिखाया, हद्द है!
मजूर स$फाई देता बोला- साहब, रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जाएगी!
-रोटी खाने से कहीं आंख ठीक होती है! -गुस्से में हथेली पर मुक्का मारता हुआ मैं उसे कर्री निगाह से छेदता बोला।
-हां, साहब, ठीक हो जाएगी आंख! रोटी जो खा ली है!!! कल से भूखी थी! मजूर सहज था।
मैंने गुस्से में अलफ था- रोटी का आंख से क्या ताल्लुक?
मजूर का जवाब था- साहब, रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जाएगी! पक्का जानें!!!
लड़की को देखता मैं अवाक् था।