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Tuesday 21 Nov 2017

बदलते सामाजिक परिवेश का आकलन


उर्मिला शुक्ल
ए-21, स्टील सिटी, अवंति विहार
रायपुर (छ.ग.)
सुषमा मुनीन्द्र महिला कथालेखन के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है। पर इस नाम के साथ नारीवादी या स्त्री-विमर्श जैसा कोई टैग चस्पा नहीं है। सच तो ये है कि सुषमा मुनीन्द्र की कहानियां किसी एक खाके में बंधी हुई नहीं है। उनकी कहानियां समाज के हर पहलू को अपना आधार बनाती है। यही कारण है कि उनकी कहानियां कभी वृद्धों के अकेलेपन में झांकती हैं, तो कभी अद्र्धविकसित मस्तिष्क वाले बच्चे की अनकही और नासमझी व्यथा को समझने का प्रयास करती नजर आती हैं। जसोदा एक्सप्रेस में ऐसी अनेक कहानियां हैं जो हमें सिर्फ झकझोरती ही नहीं बल्कि सोचने पर भी विवश करती हैं।
जसोदा एक्सप्रेस सुषमा मुनीन्द्र का ताजा कहानी संग्रह है। इसमें समाज के कई अनछुए पहलुओं को छूती ऐसी दस कहानियां संकलित हैं जिनमें वर्तमान सामाजिक परिवेश के कई रंग उभरते हैं। जिसमें वृद्धावस्था की पीड़ा है, मगर वैसी नहीं जैसी पहले के जमाने में हुआ करती थी। पहले जमाने में पीड़ा आर्थिक थी मगर इस सदी में ये भावनात्मक पीड़ा है। इसमें अकेले छूट जाने की पीड़ा ही नहीं उसके कारणों की पड़ताल भी है। 'गुस्ताखी माफÓ ऐसे ही वृद्ध दम्पति की कहानी है जिसके पास पैसा तो है मगर भावनात्मक संबल देने वाला कोई नहीं है, ऐसा नहीं है कि वे नि:संतान हों। तीन बेटे हैं मगर कोई उनके पास नहीं रहता। भाई के बच्चे भी उन्हें धमकाने से नहीं चूकते। बुढ़ापे का दिन-प्रतिदिन झीजता शरीर और अकेलापन उन्हें निरंतर तोड़ता रहता है मगर बेटे के पास जाकर रहना उन्हें असह्य है। इसमें उनका तथाकथित स्वाभिमान आहत होता है। मगर अपने व्यवहार के विषय में वे सोचते हैं और पोते को अच्छे इंस्टीट्यूट में दाखिला करवाने का आश्वासन देकर जैसे खुद भी आश्वस्त होते हैं कि अब वे एकदम अकेले नहीं हैं।
'पिया बसंतीÓ बदलते सामाजिक परिवेश में स्त्रियों की बदलती स्थिति के माध्यम से समाज की पड़ताल करती है। ये कहानी वर्तमान समय में स्त्री सशक्तीकरण के माध्यम से स्त्रियों की तीन पीढिय़ों की हालत का जायजा तो लेती ही है, साथ ही पुरुष के बदलते स्वभाव या बदल जाने की मजबूरी को भी दर्शाती है। क्योंकि स्त्रियां अब सशक्त हो गई हंै ज्ञान से भी और पैसे से भी। यही कारण है कि निशा की डॉक्टर बहू नवधा अपने को असुरक्षित नहीं पाती क्योंकि वो सक्षम है। और ये सक्षमता निशा की तरह सिर्फ ज्ञान की नहीं, अर्थ की भी है। और इसके साथ बदला हुआ सामाजिक परिवेश भी है, जिसमें उसका पति और उसके ससुर दोनों उसके साथ हैं। ऐसे में निशा को लगता है कि वो गलत समय में सास बनी है। इसीलिए पहले उसे अपनी सास के आगे-पीछे घूमकर परिवार में अपनी स्थिति बनानी पड़ी और अब बहू के आगे-पीछे घूमकर अपना स्थान बचाना पड़ रहा है। देखिये उसकी व्यथा को व्यक्त करती ये पंक्तियां :-
''सचमुच इच्छा है, थोड़ा शासन करे। पर निशा गलत समय में सास बनी है। इक्कीसवीं सदी में बहुएं पति को पटाती हैं फिर ससुर को। दोनों पट जाए तो पिचके गुब्बारे के तरह सास स्वत: नि:शक्त हो जाएगी।ÓÓ
पृष्ठ-77
उसे बहू की अति स्वतंत्रता रास नहीं आती। मगर बेटा और पति उसे बहू से तालमेल बिठाने की की सलाह देते हैं। बेटा समझता है कि आप माने या न माने वो विवाह के साथ ही इस घर की सदस्य बन गई है और इस घर में उसका अधिकार है। उससे समझौता कर लेने में ही भलाई है क्योंकि आज तो कानून भी उसके साथ है। पति समझाते हैं कि बेटा बहू से तालमेल बिठाने में ही भलाई है। ये बहुत बड़ी बात है कि वे हमारे साथ रह रहे हैं वरना वे भी औरों की तरह अलग रह सकते हैं और ये सब सुनकर निशा को लगता है कि उसका जीवन तो व्यर्थ हो गया। न तो पति ने वैसा साथ दिया है जैसा बेटा बहू का देता है और न ही अब बेटा ही उनका साथ दे रहा है। इस तरह ये कहानी बदलते परिवेश में टूटते पारिवारिक संबंधों की पड़ताल करती है।
अगर हम नारी सशक्तीकरण की बात करें तो इस संग्रह की कहानी 'हमारी न मानो बधाई से पूछोÓ को इस दायरे में रखकर देख सकते हैं। ऊपर से देखने पर तो ये कहानी एक प्रेम कहानी है, जिसमें प्रेम के प्रति सामाजिक विरोध ही मुखर दिखाई देता है। मगर अपनी भीतरी परतों में जाकर ये कहानी आज के बदलते परिवेश में स्त्री स्वतंत्रता और उसके मानसिक बदलाव की कहानी है। जिसमें गांव की एक साधारण सी लड़की भूमि अपने परिवार के विरुद्ध जाकर न केवल प्रेम विवाह करती है वरन् अपने मायके से अपना हिस्सा लेने के लिए अदालत तक जाने का हौसला रखती है। समाज में, परिवार में लड़के और लड़की के भेद पर आक्रोश व्यक्त करते हुए भूमि कहती है- ''भाइयों का नहीं अपना हिस्सा/हमारी कायदे से शादी करते तो कुछ न देते का।ÓÓ पृ.175। और पिता के इन्कार करने पर वह कहती है- ''तब सुनो पापा। हम कानूनी शादी किये हैं अब कानून से हिस्सा लेंगे। अदालत जाएंगे।ÓÓ पृ. 175।
सुषमा मुनीन्द्र ने अपनी कहानियों में नारी स्वतंत्रता का झंडा भले ही बुलंद नहीं किया है पर उनकी कहानियां नारी चेतना के स्वर से सर्वथा अछूती नहीं है। वक्त आने पर उनकी स्त्री पात्र पूरे जीवटता के साथ परिस्थितियों से मुकाबला करती नजर आती हैं। 'क्या हुआ है तुम्हारी गैरत कोÓ कहानी की गौरी, जो जीवन भर पति के आगे दब्ब ूबनी रही, मगर भाई के साथ होते अन्याय को देखकर विद्रोही हो उठती है। इस संग्रह में एक और कहानी है 'दर्द ही जिसकी दासता रहीÓ इसमें कहानी की नायिका हरबो तो स्त्री की ताकत और उसकी जीवटता की मिसाल ही है। जीवनभर तकलीफ में रहने, समाज के भेडिय़ों से बचने के बाद भी उसका हौसला टूटता नहीं है। ये कहानी एक आदिवासी महिला के पीड़ा की कहानी तो है ही इसके साथ ही साथ तथाकथित सभ्य समाज के द्वारा आदिवासियों के भोलेपन का लाभ उठाकर उन्हें उत्पीडि़त करने की भी कहानी है-'जसोदा एक्सप्रेसÓ।
ये कहानी आज के बदलते परिवेश में गांवों की स्थितियों, आवागमन की त्रासदी बयान करती है। अन्य कहानियों में 'अल्लटप्पूÓ और 'जनसाधारणÓ जैसी कहानियां भी वर्तमान समाज के बदलते स्वरूप और निरीह होते चले जाते व्यक्ति की पीड़ा को उकेरती हैं। मगर इस संग्रह की एक कहानी ऐसी है जो परिवार में अद्र्धविक्षिप्त व्यक्ति की स्थिति को उजागर करती है। 'हवा ने रुख बदल लिया हैÓ इस कहानी में शरद के बहाने उन अद्र्धविकसित मस्तिष्क के तमाम लोगों की हालत सामने आती है जिन्हें उनके ही घर के लोग भार समझते हैं। जबकि घर पर, उसकी सम्पत्ति पर उनका भी उतना ही अधिकार होता है जितना कि एक स्वस्थ मस्तिष्क के सदस्य का। इस कहानी में अल्पविकसित मस्तिष्क वाले शरद की भाभी उसे घर से निकाल देना चाहती है। जबकि उसका भाई बसंत उसके प्रति संवेदनशील है। और वो ख्याति को जता देता है कि इस घर पर, सम्पत्ति पर शरद का भी बराबरी का अधिकार है। अंतत: ख्याति को अहसास हो जाता है कि वो गलत है और वो शरद को स्वीकार करती है। इस कहानी को आदर्शवाद के खांचे में रखा जा सकता है। और ये कहानी ही क्यों, संग्रह की गुस्ताखी माफ, क्या हुआ है तुम्हारी गैरत को, अल्लटप्पू जैसी कहानियां भी आदर्श की सीमा को छूती हैं। मगर ये कहानी की स्वाभाविकता में शामिल हुआ है, उस पर थोपा हुआ नहीं लगता।
इस तरह संग्रह की कहानियां सामाजिक सरोकार की कहानियां हैं और अपनी कथा और पठनीयता से पाठकों को आश्वस्त करती  हैं।