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Friday 24 Nov 2017

विस्थापन तथा नए देशकाल की पहचान

अमृता श्री
हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
मो. 9873182803
अरूण प्रकाश ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने हिन्दी पट्टी की वास्तविक समस्याओं को उसकी संपूर्ण पेचीदगी एवं विडंबनाओं के साथ सहज रूप से पेश किया। अरूण प्रकाश का जन्म बिहार मेें हुआ, यहीं पले-बढ़े। लंबे समय तक यहीं जीविकोपार्जन करने के साथ-साथ समाज के हाशिए पर फेंक दिए गए लोगों के राजनीतिक संघर्षों में शामिल रहे। जब उन्होंने अपना रचनाकर्म शुरू किया तो ज़ाहिर-सी बात थी कि बिहार समेत उत्तर-भारत के लोगों की समस्याओं को प्रकाश में लाने के लिए उसे अपनी कहानियों का विषय बनाते।
आठवें दशक की कहानी का प्रचलित स्वर राजनीतिक था। उसमें प्रमुखत: दो तरह की कहानियाँ थी। एक वह जो विशुद्ध रूप से गाँव की जातिवादी राजनीति एवं संघर्ष से जुड़ी थी। दूसरी, शहरी मध्यवर्ग की उहापोह की दास्ताँ कहती थी। अरूण प्रकाश ने इन दोनों प्रचलित विमर्शों को कहानियों का विषय नहीं बनाया। उन्होंने शहरी और ग्रामीण परिवेश की विभाजन रेखा की तलाश के बनिस्बत उसके अंतर्मिलन के रास्तों की शिनाख्त की। यह हिन्दी कहानी के लिए एक नया रास्ता था।
इस नये रास्ते को अरूण प्रकाश की विस्थापन संबंधी कहानियाँ एक स्वरूप प्रदान करती हंै। ''विस्थापन जो किसी भी कारणवश अपने मूल जगह से उखड़कर अनजान जगह पर बसने की विवशता का नाम है। भारतीय परिदृश्य में विस्थापन अमूमन गाँव से शहर की ओर उन्मुख है।ÓÓ विस्थापन के एक सिरे पर गाँव होता है तो दूसरे सिरे पर शहर। इन दोनों सिरों के बीच के 'स्पेसÓ में विस्थापन की प्रक्रिया घटित होती रहती और विस्थापन के परिणाम भी उजागर होते रहते हैं। विस्थापन की प्रकृति के संदर्भ में अरूण प्रकाश अपनी कहानी 'मँझधार किनारेÓ के एक भाग मेें कहते हैं- ''शहर तो गाँव के लिए आकांक्षा के द्वीप रहे हैं। उपेक्षित और विस्थापित लोग इस रोम की तरफ भागते हैं।ÓÓ
आधारभूत संरचनागत सुविधाओं की कमी, प्राकृतिक संसाधनों की दुर्लभता, राजनीतिक व्यवस्था की जड़ों तक समाया हुआ भ्रष्टाचार, रोजगार की तलाश, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए समुचित व्यवस्था का अभाव, असंतुलित बँटवारा, प्राकृतिक आपदाओं के कारण खेती-किसानी पर निरंतर संकट ने बिहार के आम लोगों को पलायन के लिए विवश किया है। पिछली कई शताब्दियों के इतिहास में इसके साक्ष्य उपलब्ध हैं। पलायन और विस्थापन की पीड़ा अकथ होती है और जीवन भर टीसती रहती है। यह भूख से लेकर नींद तक में शामिल होती है। यह पीड़ा केवल उन्हें ही नहीं सालती जो अपनी माटी से उखड़कर चले जाते हैं, बल्कि उन्हें भी तिल-तिल गलाकर मारती रहती है, जो अपनों से अलग होकर अपनी माटी में छूट जाते हैं। बिहार की माटी से उपजने वाले कई रचनाकारों ने इस अकथ पीड़ा को अपनी रचनाओं के केंद्रीय तथ्य के रूप में ढाला है। भिखारी ठाकुर से लेकर अरूण प्रकाश तक की रचनाओं में इस पीड़ा का हाहाकार उपलब्ध है। अरूण प्रकाश की कहानियों- 'भैया एक्सप्रेसÓ, 'तुम्हारा सपना नहींÓ, 'गज-पुराणÓ, 'मँझधार किनारेÓ, 'बेला एक्का लौट रही हैÓ, 'जल-प्रांतरÓ में इस पीड़ा की विविध छवियाँ गुँथी हुई हैं। पलायन की प्रक्रिया सबसे ज्यादा बिहार प्रांत से जरूर घटित होती है, लेकिन दूसरे अन्य प्रांतों में भी यह प्रक्रिया कमोबेश जारी है, जिसे अरूण प्रकाश की कहानियाँ रेखांकित करती हंै।
अरूण प्रकाश विस्थापन संबंधी कहानियों में केवल विस्थापन की पीड़ा को बयाँ कर इति श्री नहीं समझ लेते हैं। नई कहानी और बाद में अकहानी के दौर में भी विस्थापन संबंधी कहानियाँ लिखी गई लेकिन वहाँ पात्रों की ना तो मूर्त वर्गीय पहचान है और ना ही कोई मूर्त परिवेश। वहाँ अधिकांश पात्र शहर के सीमाने पर खड़े होकर पिता, माँ या खेत-खलिहान के माध्यम से गाँव को याद करते हैं। इसलिए उनमें से अधिकांश के यहाँ गाँव एक 'ब्लैक एंड व्हाइटÓ एल्बम की तरह ही नजर आता है। उनमें से अधिकांश कहानियों में इस ओर संकेत कम ही है कि क्यों गाँव से शहर की ओर प्रस्थान अनिवार्य हो गया और साथ ही प्रस्थान की प्रक्रिया में क्या कुछ बदलता है। इन संकेतों को अरूण प्रकाश की कहानियाँ बड़े पैमाने पर चिन्हित करती है।
'भैया एक्सप्रेसÓ बिहारी अर्थात् बिहार का 'डोमिसाइलÓ रखने वाले मजदूर के पलायन और शोषण की अंतहीन कहानी है। इसका एक सिरा बिहार की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से जुड़ता है तो दूसरा सामंतवाद और पूँजीवाद के वीभत्स रूप से जो अत्यंत ही हिकारत भरी नजर से श्रम-शक्ति को देखता है तथा उसे निचोड़ कर अवांछनीय वस्तु के समान फेंक देना चाहता है। अरुण प्रकाश ने ऐसे दारुण समय में 'भैया एक्सप्रेसÓ कहानी लिखकर लोगों का ध्यान खींचा जब बिहारी मजदूर पंजाब से थोड़ा भविष्य लाने जाते थे। भविष्य जो मौत की चादर में मुँह छिपाए प्रतीक्षा करता था। उन्हें पंजाब में भीड़ से, रेल-गाडिय़ों से, बसों से अलग कर गाजर-मूली की तरह काटा जा रहा था। अचानक मौत का शिकार बनते निरपराध बिहारी मजदूरों के लिए सरकार या महान मानवीय भारतीय समाज की ओर से कोई सहानुभूति के शब्द नहीं, कोई मुआवजा नहीं, इनका कोई मानवाधिकार नहीं। मानों वे इसी तरह की नृशंस हत्याओं और अमानवीय व्यवस्था में जीने के लिए पैदा हुए हों। अगर इन पूर्वी प्रदेश के मजदूरों को कोई सच्ची श्रद्धांजलि मिली तो कथाकार अरूण प्रकाश की तरफ से। यह कहानी जिसका नाम है- 'भैया एक्सप्रेसÓ। यह सिर्फ एक कहानी नहीं पूरा 'समाजशास्त्र, शोध-प्रबंध है पूर्वांचल हिन्दी प्रदेश के मजदूरों का।Ó
आज भी लाखों मजदूर अन्य प्रदेशों में रोजी-रोजगार के लिए 'बोरे में सूखे मिर्च कीÓ तरह अनेक 'भैया एक्सप्रेसÓ में ठुँसे चले जा रहे हैं। अमानवीय स्थितियों में काम करने को मजबूर हैं। उनका शोषण घर से निकलने के साथ जो शुरू होता है, रेल के डिब्बों में जिस-जिस व्यक्तियों से साबका पड़ता है, वह उन्हें लूटता है। सामान्य शहरी बाबुओं को तो उनको देखते ही उबकाई आती है। जहाँ जाते हैं वहाँ की सरकारों के लिए तो बोझ हैं ही ! कहानी के फ्लैशबैक में विशनदेव पहली बार पंजाब से लौट कर अपनी माँ को पंजाब के किस्से सुनाता है- ''नइँ गे माई, ऊ सब बनिहारवाला चाह में हफ ीम के पानी मिलाय दै छै, ओई सै थकनी हेंठ भए जाइ छ ै! आ बनिहार लोग खूब काम कइलक।ÓÓ आगे जब उसकी माँ पूछती है कि- ''मालिक मारै-पीटै तो नइँ ने छौ।ÓÓ तो विशनदेव कहता है- ''कखनो-कखनो, गाली हरदम भैनचो-भैनचो बकै छै।ÓÓ इन संवादों से कथाकार शोषण की पूरी प्रक्रिया को एकदम बेनकाब कर देता है। आज भी मजदूरों का बड़े पैमाने पर पलायन-विस्थापन और उसका शोषण बिहार के समाज का यथार्थ है।
बिहारी मजदूर के ही पलायन और विस्थापन से संबंधित दो अन्य कहानी हंै- 'तुम्हारा सपना नहींÓ और 'गज-पुराणÓ। 'तुम्हारा सपना नहींÓ का नायक चुन्नी हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई आता है। मुंबई शहर के चरित्र से जब उसका साबका पड़ता है तो वह अपना सपना ही बदल देता है। उसका सपना व उसके जीवन का उद्देश्य बस यह हो जाता है कि किसी तरह मुंबई की खोलियों में एक खाट डालने भर की जमीन का प्रबंध कर लिया जाये। यहाँ सपने का बदल जाना केवल सपने का बदल जाना भर नहीं है, बल्कि विस्थापन मनुष्य को यह एहसास करा देता है कि रोटी, कपड़ा और मकान का बंदोबस्त कर लेना ही जीवन की सफलता है। जीवन की मूलभूत सुविधाओं को ही जुटाते-जुटाते विस्थापित लोग अपना पूरा जीवन होम कर देते हैं।
इस कहानी में जो सपने में बदलाव दिखाया गया है, वह दरअसल दो देश के सपनों का ही अंतर है। क्रूप्सकाया ने 'लेनिन के संस्मरणÓ में लिखा है कि वे ट्रॉम पर बैठे लंदन की सैर कर रहे थे। लंदन के विभिन्न हिस्सों को देखकर चीख उठे- दो राष्ट्र- टू नेशंस। अपने हिन्दुस्तान ने एक और हिन्दुस्तान 'हिन्दुस्तनवाÓ को दबोच रखा है। इन दोनों देशों के रहने वालों की स्थितियाँ भिन्न हंै तो उनके सपने भी। 'तुम्हारा सपना नहींÓ का नायक इस हिन्दुस्तनवा का ही प्रतिनिधित्व करता है। जो मुंबई की खोलियों में एक खाट डालने भर की जमीन पर राशन कार्ड वगैऱह बनवाकर अधिकार प्राप्त कर लेता है। कहानी उसके ज़श्न के साथ खत्म होती है। विस्थापन किस प्रकार हिन्दुस्तान के अंतर्गत एक नये 'हिन्दुस्तनवाÓ का निर्माण कर रहा है; जिसका सपना, जश्न अलग है तो उसका देशकाल भी निश्चित तौर पर हिन्दुस्तान से अलग है। कहानी इस ओर भी हमारा ध्यान खींचती है।
'गज-पुराणÓ कहानी के दो छोर हैं। एक छोर पर बिहार के जिला मुंगेर का एक गाँव है तो दूसरे छोर पर राजधानी दिल्ली। इन दोनों छोरों को जोडऩे का काम करता है पुत्तु, जो रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली आकर रबड़-फैक्ट्री में काम करना शुरू करता है। रबड़-फैक्ट्री में काम करते-करते उसका नाजुक किशोर शरीर फैक्ट्री की प्रदूषित हवा, पैसे जोडऩे के चक्कर में कुपोषण की स्थिति और काम की अधिकता से टी.बी. ग्रस्त हो जाता है, और अंतत: मौत का शिकार। फैक्ट्री किस प्रकार पुत्तु का 'यूजÓ करता है और अमानवीय स्थितियों में जीने के लिए बाध्य करता है; कहानी इस यथार्थ को भी हमारे सामने लाती है। अक्सर यह कहा जाता रहा है कि नगरों के विकास और विस्तार से गाँवों के सामाजिक अंतर्विरोध मिट जाएँगे या मिट रहे हैं। यह कहानी केवल इस झूठ का ही पर्दाफाश नहीं करती, बल्कि विकास के निरंतर मनुष्य विरोधी होते जाने की भयावहता को भी उजागर करती है।
अरूण प्रकाश ने अपनी कहानियों में विस्थापन के स्तरीकरण को दिखाया है। कितने स्तरों पर विस्थापन की प्रक्रिया घटित होती है, इसका आभास अरूण प्रकाश की विस्थापन संबंधी कहानियाँ पढ़कर होता है। अभी तक विस्थापन की जिस प्रकृति की ओर संकेत किया गया, वह गाँव से शहर की ओर उन्मुख था। विस्थापन की उक्त प्रकृति से नितांत भिन्न एक कहानी है- 'मँझधार किनारेÓ। इस कहानी में विस्थापन की प्रकृति अंतर्राष्ट्रीय है।
पाक-बांग्लादेश विभाजन के फलस्वरूप बांग्लादेशी असलम रोजी-रोटी के जुगाड़ में भारत आकर बसता है। खुद असलम के शब्दों में- ''क्या करता उधर मैं? हर साल बाढ़। खाली मछली से क्या बनना था। एक दिन पार कर गया बकरा नदी। दिन में सोता, सवेरे उठकर कटिहार की तरफ चलने लगता। उधर माँ का कर्णफूल बेचा और टिकट लेकर दिल्ली। भटकते-भटकते एक अपने बांग्लादेशी से टकराया तो नई सीमापुरी आ गया। झल्ली ढोया, रिक्शा चलाया, मछली बेचा। बाद में कबाड़ी का काम शुरू कर दिया।ÓÓ असलम जैसा व्यक्ति भारत में आकर इसलिए नहीं बसता है कि वह टाटा बिरला या अंबानी बन जाए। अगर वह बांग्लादेश जैसे साधनविहीन गरीब राष्ट्र में मरने की स्थिति में था तो भारत में आकर बस जीने की स्थिति तक पहुँच पाता है।
असलम अपना जीवन-यापन सुनिश्चित करने के बाद एक हिंदुस्तानी कलंदर लड़की रंजो से प्रेम-विवाह करता है। कलंदर जाति के लोग इस विवाह से नाखुश थे। इसलिए उनकी नाराजगी से बचने के लिए रंजो की जिद्द पर असलम कलंदर बस्ती से दूर यमुना के 'मँझधार किनारेÓ अपनी झुग्गी डालता है। ''असलम रंजो से शादी कर अपने को हिन्दुस्तानी समझने लगा था। उसे लगता कि कभी इन बांग्लादेशियों को वापस भी जाना पड़ा तो असलम यहीं रहेगा। वह क्यों डरे?ÓÓ लेकिन असलम यह भूल गया था कि वह भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में रह रहा है, जहाँ पुरुषों का प्रभुत्व है स्त्रियों का नहीं। एक भारतीय स्त्री से शादी करने मात्र से कोई विदेशी पुरुष भारतीय नहीं हो सकता।
जो डर असलम के दिल के एक कोने में दबा हुआ था, वह अपना विकसित रूप तब अख्तियार करता है जब पुलिस उससे झुग्गी खाली करने को कहती है और इस आदेश के साथ असलम के दिलों-दिमाग में अनंत प्रश्न कौंध जाते हैं- ''पुलिस इधर से भगा देगी तब वह कहाँ जाएगा? क्यों भगाती है पुलिस हम लोगों को? अल्ला ने सबको यहाँ भेजा तो मुलुक अलग-अलग कैसे हो गए? मैं यहाँ रहकर चोरी तो नहीं करता? मिहनत-मजदूरी करता हूँ, किसी का क्या लेता हूँ? आदमी किधर भी रहे, मुलुकवाले को क्या? मैं मुफ्त का तो नहीं खाता इधर, फिर काहे को मुझे वापस भेजेगा? मुझे उधर भेज देगा तो रंजो इधर ही रहेगी?ÓÓ इन तमाम प्रश्नों के डर के साये में असलम अपनी जिंदगी को जीते चला जाता है।
भारतीय पुलिस और भारत सरकार का बांग्लादेश के साथ शुरू से सौतेला व्यवहार रहा है। जब बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के रूप में पाकिस्तान देश का ही एक भाग था और भारत-पाक विभाजन के फलस्वरूप पश्चिमी बस रहे थे, उनके पुनर्वास में जो मदद भारत सरकार कर रही थी, उसमें सौतेला व्यवहार पूर्वी पाकिस्तानी शरणार्थियों के प्रति भारत सरकार का शुरू से रहा है। पश्चिमी पाकिस्तानियों के लिए जो सरकारी मदद की गई उसका दसवां अंश भी पूर्वी पाकिस्तानियों के लिए नहीं किया गया। वही पूर्वी पाकिस्तान भारत सरकार की जद्दोजहद व कोशिश से सन् 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान यानी आज के पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना। उक्त विवरण एक तथ्य है जिसे रामचंद्र गुहा की पुस्तक 'भारत: गाँधी के बादÓ में भी देखा जा सकता है।
अपने जीवन को किसी तरीके से जीने की स्थिति में लाने के लिए जब असलम जैसा बांग्लादेशी भारतीय सीमा में घुस जाता है तो इनकी खोज-खबर न तो बांग्लादेश सरकार लेती है और न ही भारत सरकार। लावारिस जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त इन बांग्लादेशियों की कभी खोज-खबर ली भी जाती है तो भारत सरकार की ओर से घुसपैठिये, अवैध निवासी आदि उपाधियों से नवाजे जाने के कारण और अखबारी समाचार की इन सुर्खियों के साथ- ''असम में मतदाता सूची से हटेंगे 36 हजार अवैध बांग्लादेशी।ÓÓ अभी भी न जाने कितने बांग्लादेशी प्रवासी डर और आतंक के साये में असलम जैसी जिंदगी जीने के लिए बाध्य हैं। इन लोगों को न तो बांग्लादेश अपना नागरिक मानता है और न भारत। आए दिन ये प्रवासी इन दोनों देशों के बीच की कूटनीतिक चालों और राजनीतिक दाँव-पेंचों की बलि चढ़ते रहते हैं। बांग्लादेशियों की इस समस्या का समाधान न तो अरूण प्रकाश के समय में हुआ और न ही अब तक।
विस्थापन की प्रकृति केवल गाँव से शहर या एक देश से दूसरे देश के बीच तक ही सीमित नहीं है। विस्थापन का एक स्तर वहाँ भी घटित होता है जहाँ हाशिये का समाज मुख्यधारा के समाज में आने की जद्दोजहद करता है। विस्थापन के इस स्तरीकरण में एक और स्तर जोडऩे का काम करता है- 'बेला एक्का लौट रही हैÓ कहानी।
'बेला एक्का लौट रही हैÓ एक आदिवासी लड़की के संघर्ष एवं वर्चस्वशाली सामाजिक संरचना से टकराहट उसके बिखर जाने की यथार्थपरक कहानी है। जब हाशिये पर से उठकर कोई एक लड़की अपने और अपने परिवार के जीवनयापन के लिए समाज की मुख्यधारा में शामिल होती है तो उस लड़की को वहाँ 'एडजस्टÓ करने में जो समस्याएँ व परेशानियाँ आती हैं, उसको अरूण प्रकाश ने इस कहानी में अभिव्यक्त किया है।
कहानी की नायिका बेला एक्का संघर्ष कर पढ़ती-लिखती है, फिर नौकरी भी मिल जाती है। नौकरी करने के लिए वह झारखंड के एक गाँव से बेगुसराय- जो कि बिहार राज्य का एक जिला व शहर है- में विस्थापित होकर आती है। कार्यस्थल पर अधिकारी से लेकर अमले तक की गिद्ध दृष्टि उस पर लग जाती है। शिकायत करने पर वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षिका, गलत नियत वाले कल्याण सिंह (अधिकारी) का पक्ष लेती हैं और एक्का पर ताना कसती है कि साहब बच्चों को पढ़ाना इन आदिवासियों के बस की बात नहीं। अंतत: बेला एक्का को काम छोड़कर लौटना पड़ता है।
'बेला एक्का लौट रही हैÓ में बेला एक्का का लौटना प्रमुख है। यह कहानी इस सवाल की ओर हमारा ध्यान खींचती है कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने की सरकारी योजनाओं का हमारे समाज की मुख्यधारा से किस प्रकार का संबंध है। यह विडम्बना उस यथार्थ को मूर्त करती है जिसमें सरकारी योजनाओं के तहत बेला एक्का अपने मूल जगह से विस्थापित होकर मुख्यधारा में शामिल तो हो जाती है लेकिन समाज के मुख्यधारा के वास्तविक चरित्र से टकराकर चूर-चूर होकर उसे अंतत: लौटना ही पड़ता है।
'जल-प्रांतरÓ कहानी विस्थापन के उस स्तर की ओर संकेत करता है जहाँ अपनों से अलग होकर न जाने कितने अपनी माटी में ही छूट जाते हैं। 'जल-प्रांतरÓ जल-प्रलय की कथा है। एक ऐसे जल-प्रलय की कथा, जिसका दोष प्रकृति के सिर नहीं थोपा जा सकता। खुद कथाकार के शब्दों में- ''अस्सी साल पहले बना गुप्ता बाँध बूढ़ा हो चुका था। जगह-जगह दरारें थी। चूहे और ठेकेदारों ने बाँध के अंदर-अंदर बिलें बना रखी थी। बाँध कभी नदी के तल से पचास फीट ऊँचा होता था। लेकिन धीरे-धीरे गंगा की कोख में बालू भरता गया। नदी का तल ऊँचा उठता गया। इस तरह बाढ़ से रक्षा करने वाला गुप्ता बाँध बौना दिखाई देने लगा था।ÓÓ अपने फूले हुए पेट लेकर आखिर कहाँ जाएँ नदियाँ? और रेत से फूले अपने पेट मेें कैसे धारण करें मेघों की सौगात? और हर साल यह प्रलय न आए तो कैसे भरे पेट मुल्क के रखवालों के? यह जल-प्रलय गिद्धों और हुक्मरानों के लिए महामहोत्सव होता है। जल-सतह पर तैरती लाशों को देखकर आकाश में परवाज भरते गिद्ध और हुक्मरान एक साथ हर्षित होते हैं।
अपना घर-आँगन छोड़कर महीने दो महीने के लिए कोई भाग सकता है, पर गाँव-जवार छोड़कर कोई कहाँ जाए! हर साल अपनी माटी से उखडऩा और फुंफकारती जलधारा के द्वारा कईयों के लीले जाने पर भी जलधारा के नरम पड़ते ही फिर आकर बसना, उत्तर बिहार के ग्रामीणों का प्रारब्ध है। इन ग्रामीणों के लिए विस्थापन की प्रक्रिया उनके जीवन-यापन के एक अनिवार्य घटक के रूप में जुड़ जाता है, जिससे हर साल उनका साबका पड़ता है और हर साल वे इस जल-तांडव के फलस्वरूप विस्थापन की मार को झेलते हैं।
अरूण प्रकाश ने अपनी कहानियों में विस्थापन की प्रक्रिया का जो स्तरीकरण दिखाया है; वह किस प्रकार एक नये देशकाल का निर्माण कर रही है, इसके तरफ भी अरूण जी की कहानियाँ इशारा करती हैं। अरूण प्रकाश विस्थापन की प्रक्रिया को उसकी परिवेशगत सच्चाई से जोड़कर दिखाते हैं। 'भैया एक्सप्रेसÓ, 'बेला एक्का लौट रही हैÓ, 'तुम्हारा सपना नहींÓ, 'गज-पुराणÓ, 'मँझधार-किनारेÓ- इन तमाम कहानियों में न तो पारंपरिक अर्थों में किसान है और न ही मज़दूर। विस्थापन ने एक नए तरह का निम्न वर्ग पैदा कर दिया है। वे जिन जगहों पर रहते हैं उसे न तो हम शहर कह सकते हैं और न ही गाँव।
यमुना के किनारे बसी असंख्य बस्तियों को हम क्या कहेंगे या मुंबई के बाहर खोली में रहने वालों को उस अर्थ में मुंबईवासी कैसे कह सकते हैं? शहर और गाँव से इतर यह एक नया भूगोल है, जिसकी जटिलता निश्चित रूप से शहर और गाँव से भिन्न है। गाँव से बाहर निकलने को अभिशप्त और शहर तक पहुँच सकने में असमर्थ यह समूह नई आर्थिक नीतियों का परिणाम है। अरूण प्रकाश की विस्थापन संबंधी कहानियाँ इसी नये देशकाल की पहचान करती है।
'मँझधार-किनारेÓ कहानी के एक हिस्से में कथाकार लिखता है- ''शहर तो गाँव के लिए आकांक्षा के द्वीप रहे हैं। उपेक्षित और विस्थापित लोग इस रोम की तरफ भागते हैं। बेकारी से बड़ा विस्थापन क्या है? यह विपदा दुश्चक्र की तरह घूमती रहती है और इस रोम को गुलामों से भरती रहती है। सत्ता के खेल में ये ही गुलाम भाड़े पर जुलूसों में घसीटे जाते हैं। ...हमारे रोम पर लांछन लगाने की सहूलियत देती हैं ये झुग्गियाँ। बदबू- महामारी-अपराध के मारे, मनुष्यता की सहूलियत के मानदंडों से नीचे धकेले ये लोग जनतंत्र को सफल दिखाने के लिए जरूरी भीड़ हैं।ÓÓ
कभी रघुवीर सहाय ने इन्हीं लोगों के लिए लिखा था मनुष्यता से एक दर्जा नीचे जीने का दर्द। अरूण प्रकाश की कहानी तक आते-आते ये मनुष्यता से कई दर्जा नीचे पहुँच जाने को अभिशप्त हो जाते हैं। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के जगमगाते और चकाचौंध रोशनी से भरे राजमार्गो से थोड़ी दूर पर बसी ये बस्तियाँ सवाल पूछती हैं, तुम्हारी दिल्ली और हमारी दिल्ली को जोडऩे वाली सड़क कब बनेगी। भले यह सड़क कभी न बने लेकिन लोकतंत्र यह भ्रम तो पैदा करता ही है और अरूण प्रकाश की कहानियाँ इस भ्रम को तोडऩे का काम करती हैं, भ्रम को वास्तविकता में बदलने का काम करती हैं