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Monday 20 Nov 2017

रचनात्मकता के मर्म से ही बँधे हुए थे महेन्द्र भल्ला


प्रयाग शुक्ल
416, पाश्र्वनाथ प्रेस्टीज
सेक्टर 93। ए
नोएडा 201301
मो. 09810973590
महेन्द्र भल्ला (31 दिसंबर 1933-1 जुलाई 2015) के साथ बातचीत साहित्य और कलाओं पर तो होती ही थी, अकसर दिल्ली, उसकी सड़कें, दिल्ली के पेड़-पौधे, चिडिय़ां आदि भी इस बातचीत में शामिल हो जाते थे। और भी जीवन-जगत, राजनीति, समाज की, बहुत सी बातें। महेन्द्र ने दिल्ली में ही अपना अधिकतर जीवन बिताया। कई नौकरियाँ की, छोड़ीं। लेकिन लिखना कभी नहीं छोड़ा। उनकी रूचियां विविध थीं। मुझे याद है एक बार मैं और महेन्द्र जब इंडिया इंटरनेशनल में दोपहर का भोजन करके बाहर निकले थे तो महेन्द्र का ध्यान उस पेड़ की ओर चला गया था जिसमें एक विशेष ऋ तु में ही फूल आते हैं, ढेर सारे। वह उस पेड़ की ओर बढ़े और हम दोनों ही उसे बहुत देर तक निहारते रहे। इसी तरह एक बार शाम को त्रिवेणी कला संगम के बाहर एक सप्तपर्णी के पेड़ के पास वह ठहरे, ठिठके और मेरी ओर मुड़कर बोले, पेड़ साँस ले रहा है न। हमारे साथ महेन्द्र जितने ही पुराने मित्र चित्रकार गोपी गजवानी भी थे, वह भी ठिठक गये और अपने ख़ास अंदाज में बोले, अरे, हाँ यार। निश्चय ही पेड़ों की पत्तियों और फूलों के बीच सप्तपर्णी की गझिन सुगंध ने हल्की हवा से मिलकर यह साँस ध्वनि की थी। और हाँ, पेड़ों में भी प्राण तो होते ही हैं, उन्हें समझने-सुनने वाला चाहिए। महेन्द्र में सुनने-समझने की वह संवेदना थी। यह भी एक कारण है कि महेन्द्र अपने पहले ही उपन्यास एक पति के नोट्स से चर्चित हो गये थे। और उनके बहुतेरे पाठक-प्रशंसक, उनकी मनुष्य-मन, और प्रकृति की, बारीक अंतध्र्वनियों को सुनने बताने की क्षमता के कायल हो गये थे। एक पति के नोट्स की भाषा, आधुनिकता की प्रत्यंचा पर चढ़े हुए मर्मस्पर्शी संवेदित शब्द-निश्चय ही पाठकों के हृदय में सीधे उतरे थे। इसके बाद भी महेन्द्र ने तीन और उपन्यास लिखे उडऩे से पेशतर, दूसरी तरफ, दो देश और तीसरी उदासी वे सब भी प्रकाशित-चर्चित हुए और पैंसठ वर्ष की आयु पार कर जाने के बाद वह नाटकों की ओर भी मुड़े, दिमाग़े हस्ती दिल की बस्ती है कहाँ है कहाँ, भारतीय ज्ञानपीठ से अनमतर प्रकाशित, का मंचन भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए रामगोपाल बजाज ने किया। एक और नाटक उस चीज़ के ऐन आमने सामने को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल के लिए ही देवेंद्रराज अंकुर ने प्रस्तुत किया। दोनों सराहे गये। उनकी कहानियों के भी दो संग्रह प्रकाशित हुए हैं। तीन-चार दिन और पुल की परछाई। और उनका एकमात्र कविता संग्रह आसमाँ बस आसमाँ का देश है (वाणी प्रकाशन वर्ष 2011) में आया, ओम थानवी की पहल पर। जब ओम थानवी को यह मालूम हुआ कि महेन्द्र की कविताओं का अब तक कोई संग्रह नहीं है, तो उन्होंने ही इसे सामने लाने की पहल की। प्रसंगवश याद कर लूं कि महेन्द्र की कविताएँ आरंभ (संपादक: विनोद भारद्वाज) और अन्य पत्रिकाओं में साठ के दशक के अंतिम वर्षों में प्रकाशित हुई थीं तो उन्होंने एक हलचल-सी उत्पन्न की थी। महेन्द्र कृति मंडल के भी एक सदस्य रहे थे और कल्पना तथा कहानी जैसी पत्रिकाओं में एक समय उनकी कई चीज़ें आयी थीं। वह हमेशा प्रचार-प्रसार से दूर, एक स्वाभिमानी लेखक बने रहे। न संस्थाओं के मुखापेक्षी रहे, न ही मीडिया के। अचरज तो नहीं होता पर अफ़सोस ज़रूर होता है कि साहित्यिक संस्थाओं की ओर से उनके निधन के बाद उन्हें याद करने का कोई विशेष जतन नहीं हुआ। इतना कामकाज करने के बाद और सौभाग्य से उस कामकाज के सामने आने के बाद भी, राजकमल प्रकाशन के बाद वाग्देवी बीकानेर से उनकी पुस्तकें प्रकाशित हुईं, उन्हें हिंदी की मुख्यधारा से वह स्वीकृति नहीं मिली, जिसके कि वह अधिकारी थे। एक ही पीढ़ी के और एक ही मित्रमंडल के तीन सदस्य, अशोक सेकसरिया, कमलेश और महेन्द्र भल्ला एक-एक कर चले गये, यह याद दिलाते हुए कि रचनाकार को वास्तव में किस विनम्रता, किस स्वाभिमान और ज़रूरत पडऩे पर किस हठधर्मिता तथा अध्ययन-मनन के किस स्तर पर जीना-मरना चाहिए और रचनात्मक कामों और लेखन की प्रतिश्रुति को किन गहरे स्तरों पर सिद्ध करना चाहिए। अपने और दूसरों के लिए। इनके जाने के बाद यह बोध और गहरा होता है कि हिंदी अगर एक बड़ी भाषा है, जो कि वह है, तो इसीलिए कि उसमें समय-समय पर, लेखन को इतनी गंभीरता, और अपने को पीछे रखकर, रचनात्मकता की कठिन शर्तों को ही साधते रहने का जोखिम उठाने वाले लेखक होते रहे हैं। ऐसे लेखक जो हिंदी के विस्तृत संसार के न जाने कितने कोनों-अतरों को, अपनी उपस्थिति से स्पर्श करते हैं, करते रहते हैं और अपने कामकाज से बहुतों के लिए कुछ निकालते रहने का साधन भी बने रहते हैं, भविष्य में। वे केवल नामीगिरामी नाम बनकर जीवित नहीं रहते, काम के आधार पर जीवित रहते हैं, जो न जाने कितने प्रबुद्धों और उत्सुकों को आकर्षित करता रहता है। देवीशंकर अवस्थी ने उनकी कहानियों पर सारवान टिप्पणियाँ की थीं। वह साठोत्तरी कहानी के प्रमुख कथाकारों में थे। सन साठ के बाद की कहानी संपादक: विजयमोहन सिंह, में उनकी कहानियाँ संकलित हुई थी। मेरा भाग्य कि मैं इन तीनों के निकट संपर्क में रहा, पचास वर्षों से भी अधिक वर्षों तक। महेन्द्र से भेंट-मुलाकात नियमित रूप से होती रही। और पिछले कुछ वर्षों से तो हम तय करके महीने में एक बार भोजन के लिए भी मिलते थे, अकसर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ही। इन पिछले वर्षों में हमारे साथ कवि-लेखक राजेन्द्र उपाध्याय भी हुआ करते थे, जो महेन्द्र से भले लगभग पच्चीस वर्ष छोटे हों, पर उनके स्नेह भाजन बनने के साथ, एक मित्रवत व्यवहार के पात्र बने।
महेन्द्र से मेरी भेंट तब हुई थी जब मैं बीस वर्ष का था। मैं बीए की पढ़ाई के दौरान, कोलकाता से दिल्ली आया था अशोक सेकसरिया से मिलने, और उन्हीं के साथ ठहरा था। अशोक सेकसरिया, महेन्द्र भल्ला की मैत्री प्रगाढ़ हो चुकी थी। और कृष्णा सोबती, राम कुमार, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा आदि से इनके साहित्यिक संबंध बन चुके थे। इनमें से तब दिल्ली में उस वक्त जो भी मौजूद थे, उन सबसे मेरी भी भेंट हुई, अशोक और महेन्द्र के कारण। अनंतर तो होती ही रही। इन सबके स्नेह का पात्र भी बना। महेन्द्र मुझसे सात-आठ वर्ष बड़े थे। जब हम मिले तो वर्षों का यह अंतराल हमारी मैत्री में कोई बाधा नहीं बना। उनकी प्रकृति ही ऐसी थी। व्यवहार भी गर्मजोशी और एक आंतरिक आँच से भरा हुआ। वह कंधे से कंधा भिड़ाकर मिलते थे। और मित्र के नाते किन्हीं विषम क्षणों में कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़े होते थे। बहुत-सी स्मृतियाँ हैं। वे चि_ियाँ भी हैं जो अपने लंदन प्रवास के दौरान महेन्द्र ने मुझे लिखीं। उन क्षणों की स्मृतियाँ भी हैं, जो वह परिवार के किसी नाजुक क्षण में या मेरी किसी व्यक्तिगत समस्या के वक्त, मेरे साथ खड़े हुए। मित्रता क्या होती है, यह अशोक सेकसरिया और महेन्द्र भल्ला से जाना। उनमें अनेक परिवारिक गुण थे। बेटे अतुल और बेटी संगीता को जिस तरह महेन्द्र की पत्नी इंदिरा जी और महेन्द्र ने बड़ा किया, उन्हें संस्कार दिए, उसके हम साक्षी रहे हैं। पर, इस वक्त मुझे महेन्द्र के रचना-गुणों और उनकी रूचियों की बात करनी है, जिसमें सभी साझीदार हो सकें। चीज़ो को अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर परखने की ही उनकी प्रकृति थी और यही उनके लेखन में प्रतिबंबित हुई है। स्त्री-पुरुष संबंधों और जीवन में सेक्स की भूमिका को उन्होंने अपने लेखन में पूरी संजीदगी के साथ उतारा। प्रकृति के रंग-रेशों को परत-दर परत पहचानने-बताने की उनमें एक अदम्य इच्छा और लालसा थी। काफ़ी हाउस, टी हाउस, श्रीराम सेंटर, त्रिवेणी और अन्यत्र की हमारी अनंत बैठकों में पृथीपाल वासुदेव, रमेश गोस्वामी, अशोक सेकसरिया, गिरधर राठी, जितेन्द्र कुमार, सूरज घई, कृष्णगोपाल वर्मा, अशोक वाजपेयी, शानी, हरीश त्रिवेदी, विष्णु खरे, विजय मोहन सिंह, विनोद भारद्वाज आदि मौजूद रहते थे। ये बैठकें इस बात की साक्षी रही हैं कि फिल्म, नाटक, संगीत, किताब, पर बातचीत कितनी सरस, कितनी गंभीर, कितनी पंखदार और कितनी उत्तेजक हो सकती हंै। रूसी साहित्य, और खास तौर पर टाल्सटॉय, तुर्गनेव, चेखव को लेकर उनका उत्साही पाठकमन, जब बात करने पर आता था तो उसमें साहित्य और जीवन कई रूपों में धड़धड़ाता हुआ चला आता था। ग़ालिब, मीर की चीज़ें उन्हें याद और बेहद पसंद थी। उनकी मंडली में कुछ देर से ही सही, जुडऩे वालों में नंदकिशोर आचार्य भी रहे हैं। वे जब भी दिल्ली में होते, ऐसा कोई अवसर जुट ही जाता, जब जीवन-जगत पर, सांस्कृतिक-सामाजिक स्थितियों पर, उनके साथ भी उनका संवाद और वार्तालाप होता। गुणों के पारखी और प्रशंसक, महेन्द्र एक-दो बार की मुलाकात में ही, किसी व्यक्ति या कलाकार के गुणों को पहचान कर, उसके प्रति एक गहरे अनुराग से भर उठते। रतन थियाम से मिलने और उनका काम देखने के बाद, महेन्द्र के साथ यही घटित हुआ था। वे रतन जी की चर्चा हमेशा अत्यंत स्नेह और सम्मान से करते थे। उनकी पसंद-नापसंद यों बहुत सख्त थी। और कई बार वे ऐसी तल्खी पर भी उतरते कि बहस-बातचीत के वक्त कि उन्हें सँभालना मुश्किल हो जाता। एक बार किसी रंगयुक्ति और सृजनात्मकता के सवाल को नाटककार महेश एलकुंचवार के साथ उनकी तीखी झड़प का मैं साक्षी रहा हूँ। जब मैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका रंग-प्रसंग का संपादक था, तो महेन्द्र वहाँ प्राय: आते थे। उन दिनों तो ख़ास तौर पर, जब उनके नाटक वहां मंचित हो रहे होते थे। वे उनके मानो फिर से युवा हो जाने के दिन थे। मेरे कमरे में उनकी बहुत से ऐसे लोगों से भी भेंट होती, जो उनसे पहली बार मिल रहे होते थे, परिचय कराये जाने पर कई लोग, कुछ प्रसन्न होकर कह उठते, एक पति के नोट्स वाले महेन्द्र भल्ला! तब महेन्द्र के चेहरे की मुस्कान कुछ फैल जाती। वे कुछ विनोद पूर्वक कहते, अरे, आप वहीं अटके हुए हैं। मेरे नाटक भी तो देखिये। महेन्द्र के अभी तीन और नाटक अप्रकाशित हैं। उनका मंचन भी नहीं हुआ है। वे संस्मरण लिखने की ओर भी प्रवृत्त हुए थे, कुछ अरसा पहले। वे भी अप्रकाशित हैं।
महेन्द्र, विट और ह्यूमर के भी धनी थे। अचानक उनकी कही हुई कोई बात, आपकी हंसी को जोरदार बना सकती थी, जिसमें उनकी जोरदार हंसी मिलकर, हंसी का एक ऐसा वृत्त बना सकती थी, जो कभी-कभी ही देखने को मिलता है।
भाषा के प्रति उनकी सावधानी गज़ब की थी। किताबी, औपचारिक और अलंकारिक भाषा से उन्हें चिढ़ थी और बहुत अधिक चिढ़ थी हिंदी समीक्षा की कई मायनों में गोल-गोल घूमने की प्रवृत्ति से। क्या हाल है हिंदी का भाई? कुछ सचमुच का नया कहीं दीखा। यह उनका विनोदी जुमला हुआ करता था।
महेन्द्र निजी जीवन में भी कभी-कभी मनोवैज्ञानिक ढंग के विश्लेषणवादी लगते थे, चीज़ों को कुरेद-कुरेद कर जांचना चाहते थे। लेखन में तो वह ऐसा करते ही थे। कथा-साहित्य में सदियों से मानव-संबंध ही मानों प्रमुख विषय रहे हैं। पर, 19वीं-20वीं शताब्दी में इन संबंधों की जो एक चीरफाड़ भी शुरु हुई, वह एक अलग कहानी कहती है। चीर फाड़ में महेन्द्र का भी दूर तक भरोसा था, ऐसा लगता है। पर, करूणा की एक संवेदित धार जो एक पति के नोट्स से बही, उसने महेन्द्र के कथा-साहित्य को एक अलग गरिमा भी दी। उनके यहां व्यक्ति से व्यक्ति का टकराव अधिक मुखर है। सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना भी वहाँ मौजूद है ज़रूर, पर महेन्द्र का ध्यान प्रमुख रूप से दो या अधिक व्यक्तियों के आपसी टकराव पर टिकता है। अंतत: एक के द्वारा दूसरे को न समझे जाने की नियति पर। आदमी के अकेलेपन पर। लेकिन इसके बावजूद इस अकेलेपन से कैसे निबटा जाये, उसे कैसे दूर किया जाये, के गहरे सरोकार भी उनके यहाँ हैं।
महेन्द्र की घनिष्टता चित्रकारों से भी रही, विशेष रूप से हिम्मत शाह से, जिन्होंने एक पति के नोट्स के कवर के लिए अपना एक रेखांकन दिया और उनके एक अन्य उपन्यास का कवर आकल्पित किया। रामकुमार, निर्मल वर्मा से तो उनका बहुत अच्छा परिचय रहा ही। स्वामीनाथन, अम्बादास के काम को भी वह सराहते रहे। शास्त्रीय नृत्य और संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। और भारतीय शास्त्रीय नृत्य को वह सौंदर्य की दैहिक-आंतरिक ख़ोज के क्रम में एक बड़ी उपलब्धि मानते थे। अजंता-एलोरा, खजुराहो, मिनियेचर चित्रों आदि पर उनसे बातचीत कई कला-आयामों को छूती थी। महाभारत और रामायण पर वह उत्सुक-उत्साही-विस्मय के साथ बातें करते। महात्मा गांधी के जीवन के वह गहरे अध्येता थे। विश्व सिनेमा पर उनकी दृष्टि हमेशा बनी रही, अमृता शेरगिल की चर्चा उन्हें प्रसन्न करती थी और उनसे जुड़ी अच्छी सामग्री की खोज में वह रहते थे। अकारण नहीं कि उनके बेटे अतुल भल्ला ने अंतरराष्ट्रीय कलाजगत में अपने लिए एक जगह बनायी है।
जब अशोक सेकसरिया का निधन हुआ और जनसत्ता में उन पर मेरा एक संस्मरणात्मक लेख प्रकाशित हुआ तो महेन्द्र ने फोन किया और अपने खास लहजे में बोले, मेरा भी मर जाने का मन कर रहा है ताकि तुम मुझ पर भी ऐसा ही कुछ लिखो। तब मैं उन उदास क्षणों में भी हँस पड़ा था, अंतत: वह भी। पर, महेन्द्र तुम पर लिखना तो एक ओर बहुत सरल, पर कितना कठिन है, इसका अनुभव आज और ज्यादा कर रहा हूँ। बाक़ी, फिर कभी सही। अगर बन पड़ा तो।