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Thursday 23 Nov 2017

नागार्जुन के काव्य का सत्य


डॉ. दीपशिखा
गुरु गोबिन्द सिंह धर्म अध्ययन विभाग
पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला
मो. 098556-19083
नागार्जुन के काव्य का मुख्य गुण बोधगम्यता, सरलता और सहजता के साथ ही लोकचेतना और यथार्थानुभव है। प्राय: इन्होंने स्वाधीन भारत के शोषित किसान और निर्धन वर्ग की पीड़ाओं को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। सच्चाई, गंभीरता, गहनता, अतीव तीक्ष्ण व्यंग्य काव्य को और भी अधिक प्रभावोत्पादक बनाते हैं। वर्तमान युग में आम जनता अकाल, भूख, बीमारी, प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों के जाल में ग्रस्त फडफ़ड़ा रही है। 'प्रेत का बयानÓ और 'अकाल और उसके बादÓ कविता में कवि ने भूख से पीडि़त परिवारों के माध्यम से स्वाधीन भारत में 'गरीबी हटाओÓ का नारा लगाने वालों पर कटाक्ष किया है।
नागार्जुन ने अपने काव्य में वर्तमान सत्य का उद्घाटन जिस निर्भीकता से किया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। उनका मानना है कोई भी कवि, कवि बाद में होता है वह पहले एक सामान्य व्यक्ति ही है। सामान्य जनता से अलग होकर जब कवि बौद्धिक आधार काव्य की रचना करता है तो उसकी कविता सत्य, यथार्थ से हटकर अपना प्रभाव खो देती है। जनता की भावनाओं से जुड़ा कवि ही सामाजिक अन्तर्विरोधों पर तीक्ष्ण प्रहार कर सकता है। मानव जीवन की सम्पूर्णता ईश्वरीय शक्तियों की अपेक्षा अत्यंत साधारण लोगों की पीड़ा के अनुभव में है। कवि ने अपने काव्य में सामान्य जन की उस बैल से तुलना की है जो भार ढोना नहीं चाहता मगर अपने से अधिक सामथ्र्यशाली व्यक्ति की शक्ति के आगे वह निस्सहाय है और भार ढोने को विवश है। उसके असंतोष और विद्रोह की वाणी ही नागार्जुन की कविता है। कवि का कहना है कि यदि कोई आपके प्रति हिंसा दिखाता है तो व्यक्ति के मन में हिंसा के प्रति प्रतिहिंसा का भाव होना अनिवार्य है। क्योंकि अन्याय को सहकर कभी खत्म नहीं किया जा सकता। उसका विरोध ही न्याय की स्थापना है
नफरत की भट्टी में
तुम्हें गलाने की कोशिश ही
मेरे अन्दर बार बार ताकत भरती है
प्रतिहिंसा ही स्थायीभाव है अपने ऋषि का
हिंसा मुझे थर्राएगी
मैं तो उसका खून पियूंगा
प्रतिहिंसा ही स्थायीभाव है मेरे कवि का
जन जन में जो ऊर्जा भर दे,
उद्गाता हूं उस रवि का।
नागार्जुन का व्यक्तित्व विविधमुखी और साहित्य बहुआयामी है। जहां उनका व्यक्तित्व वैद्यनाथ मिश्र बैदेह यात्री और अन्तत: शून्यवादी नागार्जुन बाबा के रूप में परिवर्तित हुआ वहीं दूसरी ओर उनका लोकाचार का उद्घोष क्रमश: दीनहीन, उत्पीडि़त, दलित, सामान्य जनसमुदाय के प्रबल नाद, व गृहस्थ धर्माश्रम के रूप में उग्र रूप में प्रस्फुटित हुआ। इस यायावर का बहुत व्यापक लोकानुभव और उनकी निश्छल स्पष्ट अभिव्यक्ति उन्हें महाकवि क्रांतिकारी कबीर, महाकवि तुलसीदास एवं महाप्राण निराला की समीपवर्ती श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है।
नागार्जुन के काव्य में समाज से उपेक्षित वर्ग किसान, मजदूर, रिक्शा चालक आदि को सशक्त प्रखर वाणी मिली है। इनके काव्य का केन्द्र बिन्दु साधारण, लघु मानव रहा है। इनके काव्य में विद्रोह, सामाजिक परम्पराओं, रुढिय़ों और अन्तर्विरोधों पर तीक्ष्ण प्रहार, भ्रष्टाचार की पोल खोलना, वर्तमान समाज का सत्य अर्थात् स्वातन्त्रयोत्तर पराधीनता, राजनीति पर व्यंग्य, पूंजीपतियों की कूटनीति, श्रमिक वर्ग की स्थिति आदि का सजीव एवं यथार्य चित्रण प्राप्त होता है।
नागार्जुन मुंशी प्रेमंचद की तरह ही शोषित वर्ग को जागृत करना चाहते हैं। वे शोषक वर्ग के हृदय परिवर्तन में विश्वास नहीं रखते क्योंकि इनकी दृष्टि मेेंं अहिंसा का आज कोई महत्व नहीं रह गया है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह वृद्ध हो चुकी है और आंखों में एक उम्मीद लिए सड़कों पर भटकती हुई अपना संरक्षक ढूंढ रही है
105 साल की उम्र होगी उसकी
जाने किस दुर्घटना में
आधी आधी कटी थी बांहें,
झुर्रियों भरा गन्दुमी सूरत का चेहरा...
धंसी धंसी आंखें...
यह अहिंसा है
इमर्जेन्सी में भी...।
इसलिए वे जनसाधारण को अपने बल पर अपना हक मांगने के लिए प्रेरित करते हैं। 'क्षमाÓ उन्हें कायरों का हथियार लगती है। वे तो छल, कपट और भ्रष्टाचार का पूर्णत: पर्दाफाश करने में विश्वास रखते हैं, उसके लिए बल-सामथ्र्य और बुद्धि चातुर्य-सब उपयुक्त हैं-
कर न सके प्रपंच को छेदन-भेदन-
घबराएं रा-रा सी बातों में
ले नहीं पाए प्रतिशोध
क्षमा ही क्षमा करता चला जाए
ऐसी भी बुद्धि क्या!
ऐसा भी मन क्या।
कवि के लिए प्रत्येक मानव एक पृथक अस्तित्व एवं महत्व रखता है इसलिए उन्होंने किसी महात्मा साधु या नेता के स्थान पर आम व्यक्ति की अस्मिता को अधिक शक्ति दी है। कवि को प्रत्येक मनुष्य परमात्मा का पुंज, सपूत और दृष्टिगोचर होता है-
व्यक्ति-व्यक्ति को गौर से देखो...
साधारण में ही मिलेगा असाधारण
एक नहीं दस-बीस पचास
हजार-दस-हजार-लाख-दस लाख
करोड़... जी हां करोड़
करोड़ों में मिलेंगे लाखों महात्मा
सपूत क्या ऊपर से टपके हैं कभी?
कवि का मानना है कि वास्तव में वही कवि होता है जो सृष्टि के दु:ख और पीड़ा को अपने भीतर समाविष्ट कर लें तथा सृष्टि की वेदना और दु:ख देखकर जिसका हृदय चीत्कार कर उठे। किन्तु आज यह भावना कहीं लुप्त हो गई है। आज के कवि ने परिस्थितियों के समक्ष घुटने टेक दिए हैं। किन्तु नागार्जुन जहां एक सच्चे कवि हैं, वहीं वर्तमान कवि जगत के प्रति चिंतित हैं, आशावादी भी हैं और कवि को जागृत करने के लिए भी तत्पर है। उन्हें विश्वास है कि वर्तमान युग की विसंगतियां अधिक समय तक कवि को बांधकर नहीं रख पाएंगी। अपने हृदय में पल्वित होने वाले विद्रोह को वाणी देते हुए कहते हैं-
कवि हूं, सच है
किन्तु षट्पदों जैसा क्या मैं
फूल सूंघकर रह सकता हूं?
कवि हूं, सच है,
पर अशोक के कीमत किसलय
पहन ओढ़कर ही कैसे मैं रह सकता हूं
किन्तु क्षणिक तथ्यों को यों अवहेलित करके
शाश्वत का सीमान्त कभी क्या छू पाऊंगा?
कवि हूं, सच है।
कवि हूं पीछे, पहले तो मैं मानव ही हूं
अतिमानव का लोकोत्तर किसको कहते हैं-
दु:ख दुविधा में झुलस-झुलसकर
सब जैसे अपने जीवन को बिता रहे हैं
वैसे मैं भी अपना जीवन बिता रहा हूं।
मनुष्य हूं।
सुनहले भविष्य की धरोहर आज का युवा वर्ग है। वही देश को निर्मित, संचालित और नई दिशा की ओर ले जाएगा यह कहना आज निरर्थक प्रतीत होता है। जिस युवा पीढ़ी की हम बात करते हैं, हमने उसे क्या दिया है- भूख, बेरोजगारी, गरीबी! आज के इस सबसे बड़े सत्य का उल्लेख कवि अपनी कविता 'नई पौधÓ में करते हैं-
मवाद, मिट्टी, पसीना और वक्त-
चार चार दुश्मनों की खाये हुए मार
निकर मना रही है मुक्ति की गुहार
आंत की मरोड़, छुड़ा न पाई बरगद की फलियां,
खड़ा है नई पौध पीपल के नीचे खाद की खोज में
देख रहा है ऊपर, कि फलियां गिरेंगी
पेट भरेगा।
आज की इन संघर्षमयी और विषम परिस्थितियों के प्रति कवि बहुत चिंतित हैं। शोषितों को जागृत कर उन्हें अच्छा जीवन जीने के लिए प्रेरित करने के लिए मानो नागार्जुन प्रतिबद्ध है। उनका प्रतिनिधि बनकर उनके सच्चे हितैषी के रूप में कवि कहता है-
उसका मुक्तिपर्व कब होगा?
कब होगी उसकी दीवाली?
चमकेगी उसके ललाट पर
कब ताजे कुंकम की लाली?
भले जनों की, बड़े बड़ों की
राजनीति का वो अछूत है।
दलित-पीडि़त मानवता का
वो प्रतिनिधि अग्रदूत है।
नागार्जुन के काव्य का आस्वादन विविध है। विविध है यथार्थ के रंग जिनमें राजनीति का भी एक रंग है। राजनीति का घेरा आज व्यापक होता जा रहा है। समाज का कोई भी भाग इसकी परिधि से बाहर नहीं है। कवि की विशिष्ट पहचान है उनका राजनैतिक व्यंग्य। राजनीतिक कविताओं के संदर्भ में पुराकथाओं का उपयोग करने वाली नागार्जुन की अन्तर्दृष्टि एक अन्य विशेषता की ओर भी ध्यान आकृष्ट करती है। भारत में गांधी जी से बड़ा जननेता नहीं हुआ जिसने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति स्तर पर जनता को इतनी बड़ी संख्या में सक्रिय किया हो। गांधीवादी विचारधारा से वे बहुत प्रभावित हुए किन्तु गांधी जी के अनुयायी दोमुंहेपन से बच नहीं पाए हैं। राजनीति और राजनेताओं की धूर्तता का बयान उनकी इन पंक्तियों में दृष्टव्य है-
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के,
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों ंबंदर बापू के।
नागार्जुन ने स्वातंत्र्योत्तर राजनीति को अपनी कविता का आधार बनाया। स्वतंत्रता से पूर्व स्वाधीनता संग्राम के अन्तर्विरोधों पर, उसके पूंजीवादी नेतृत्व पर कवि की कलम चली। आ जा दी के बाद जनता का मोहभंग हुआ। नागार्जुन ने रामराज्य में मानवीय स्वप्न और जनता के पाशविक दमन का, साम्राज्यवाद विरोधी संग्राम और उसके आगे घुटने टेक देने की नीति का अन्तर्विरोध बहुत तीव्रता से किया है-
गांधी का नाम बेचकर बताओ कब तक खाओगे।
यम को भी दुर्गंध लगेगी, नरक भला कैसे जाओगे।
समाज का कुलीनतंत्र (वरिष्ठवर्ग) आम आदमी को शोषित अर्थात् उसका रक्त चूस-चूसकर पल रहा है। उन्हें कलपुर्जों की तरह घिसने के लिए विवश कर रहा है। ऐसी सामाजिक विषमता को नागार्जुन पूर्ण चुनौती देते हुए उसका विरोध करते हैं। कवि शोषक वर्ग की तुलना उस देवी से करते हैं जो सिरों गूंथी माला पहनकर प्रसन्न होती है। उसकी प्रतिदिन एक नये सिर की लालसा ने उसे आततायी बना दिया है। अब वह निर्धन जनता को अपना शिकार बना रही है। इस सत्य का उद्घाटन करते हुए कवि कहता है-
कितना खून पिया है, जाती नहीं खुमारी।
सुर्ख और लम्बी है मइया जीभ तुम्हारी।
मुण्डमाल के लिए गरीबों पर निगाह है।
धनपतियों के लिए दया की खुली राह है।
धन पिशाच का लहू नहीं अच्छा लगता है।
वह औरों की बलि देकर तुझको ठगता है।
आज अगर कहें कि राजनीति अपना कल्याणकारी रूप सर्वथा खोकर मात्र भ्रष्टाचार का पर्याय बनकर रह गई है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।
राजनीति अब पूर्णत: स्वार्थमयी हो गई है। जनता की भावनाएं, उनके अधिकार इत्यादि को राजनेताओं ने पूर्णत: आंखों से ओझल कर दिया है। उन्होंने मानवता का कत्ल कर उसकी लाश पर अपने महल, सुख-सुविधाओं का सृजन किया है।
परन्तु नागार्जुन की दृष्टि एकपक्षीय नहीं है। वे बिल्कुल निष्पक्ष रहकर अपनी बात को स्पष्ट कहते हैं। वर्तमान सामाजिक विसंगतियों या राजनीतिक प्रदूषण के लिए केवल राजनेताओं को ही नहीं कोसते अपितु जनता पर भी कटाक्ष करते हैं। क्योंकि जनता लकीर का फकीर बनकर रह गई है। शोषण को देखकर भी मौन है और रिश्वत व भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित कर रही है। देश के मान-सम्मान की रक्षा करते हुए महाराणा प्रताप, झांसी की रानी, भक्त सिंह इत्यादि वीरों ने अनेक कुर्बानियां दी और देश का गौरव बढ़ाते हुए विजय पताका फहराई। किन्तु आज देशवासियों ने उसकी पताका को बेचने में भी कोई संकोच नहीं किया। वे पूर्णत: निर्लज्ज और बेशर्म हो गए हैं। कवि उन्हें कोसता है-
मैं बतलाऊं झण्डे का अपमान तुम्हीं ने स्वयं किया है।
जादी के भव्य थाल पर, काला टीका लगा दिया है।
प्राण ले लिए जाने कितने, बदनामी की बोरी भर ली।
राष्ट्रध्वजा की यह महिमा तो तुमने खुद ही चौपट कर दी।
अर्थात् तुम जनता ही इस स्वाधीन भारत की दुर्दशा का कारण हो। तुम लोग ही इन भ्रष्टाचारियों आदि लोगों को रिश्वत देकर प्रोत्साहित करते हो-
गुलछर्रे वे उड़ा रहे है गुटबंदी के बल पर
उनकी निष्ठा टंगी हुई है केवल अपने दल पर।
भारत का इतिहास खोलकर देखें तो युग-युगों से नारी निन्दा और उपहास का पात्र बनी रही। हमारे गुरु साहिबानों ने नारी की स्थिति को सुधारने का महत्वपूर्ण प्रयास किया। आज यद्यपि देश स्वतंत्र है, आज नारी प्रत्येक क्षेत्र में पुरुष से आगे है, क्या वह वास्तव में स्वतंत्र होकर सबल हो पाई है? इसी प्रश्न के उत्तर नागार्जुन ने अपने काव्य में बहुत निर्भीकता से किया है।
अभी तो तरुणा हूं
चौंकते युवक-जन
भिक्षापात्र लेकर जब मैं निकलती
मेरा यह काषाय...
जाने किस किसको उन्मादित करता
यह मुण्डित मस्तक उत्तेजित करता
कलित ललित कवि को
कोमल कलाकार को
भगवान् अमिताभ!
किन्तु...
किन्तु कौन पूछेगा मुझे कल परसो?
गलित होगा, यौवन जब!
पलित होंगे केश जब!
समाज में नारी की असुरक्षा की भावना ने पिता को विवश कर दिया है कि वह अपनी अविवाहित बेटी से ये कहे-
रमा लो मांग में सिन्दूरी छलना...
फिर बेटी विज्ञापन लेने निकलना...
तुम्हारी चाची को यह गुर कहां था मालूम
एक पिता को विवश होकर संस्कृति और सभ्यता के साथ खिलवाड़ करना पड़ता है क्योंकि आज का समाज नारी के लिए असुरक्षित है। इस यथार्थ को लेखक ने निर्भीक होकर अभिव्यक्ति दी है। पुरुष रूपी दैत्य उसे किसी न किसी मोड़ पर झपट लेने को तैयार मिलता है और वह बेचारी निस्सहाय स्वयं को असुरक्षित अनुभव करती है-
बहरहाल अकेली हो इस वक्त,
ओफ, सामने तो आओ
निगाहों की मेरी बोधकता से इतना घबराई।
कि उल्टे पैर भाग गई?
बिल के होंठो पे मुस्काये चूहे
और तुम नदारद थी।
नागार्जुन का एक और सत्य है वो है आधुनिकता का आह्वान। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि परम्परा का उन्होंने त्याग किया हो। परम्परा और आधुनिकता उन्हें दोनों ही स्वीकार्य है। कवि ने जितना नयी पीढ़ी को आधार बनाकर लिखा है, उससे अधिक पुरानी-अपनी विगत और समकालीन पीढ़ी के लोगों के संघर्ष और त्याग को सामने लाने के लिए लिखा है। जहां उन्होंने नई पीढ़ी की दयनीय स्थिति को अभिव्यक्ति किया है वही उन्हें नई पीढ़ी पर विश्वास है कि उनमें जो बीजारोपण हो रहे हैं, वे पनपकर एक दिन नई क्रांति और नए विचारों को जन्म देंगे-
बस, थोड़ी और उमस
बस, थोड़ी और धूप
बस, थोड़ा और पानी
बस, थोड़ी और हवा
बस, थोड़ा भुरभुरापन
क्या देर है भला बाहर आने में
आज मैं बीज हूं
कल रहूंगा अंकुर।
'पीपल और पीले पत्तेÓ कविता में नागार्जुन पुरातनता से नवीनता की ओर अग्रसर होते दिखाई देते हैं। वे समाज में नई पीढ़ी को पनपने के लिए उचित अवसर प्रदान करते हैं-
खड़-खड़-खड़ करने वाले
ओ पीपल के पीले पत्ते।
अब न तुम्हारा रहा जमाना
शकल पुरानी ढंग पुराना
लाल गुलाबी पत्ते कैसे...
लह-लह-लह-लह लहा रहे हैं।
जैसा कि कहा गया है कि नागार्जुन पुरातना से नवीनता के प्रति समानधर्मी है, तो 'छेड़ो मत इनकोÓ कविता में ये पुरानी पीढ़ी के संघर्ष को भी वाणी देते हैं तथा उन्हें नई पीढ़ी के प्रति आस्थावान् रहने का परामर्श देते हैं। कवि का मानना है कि नवीन पीढ़ी जिस विचारधारा को लेकर आगे बढ़ रही है हमें उसे आगे बढऩे देना चाहिए, उसे बीच में रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए। क्योंकि वे जिस चक्र या मधुकोष की रचना कर रहे हैं वह वर्तमान समय की बिखराव पूर्ण •िान्दगी में सुख देने का काम करेगा-
तुम तो सयाने हो न?
धीरज से काम लो
छेड़ो मत इनको
करने दो जमा शहद
भरने दो मधुकोष
रचने दो रस-चक्र
छेड़ो मत इनको।
'सत्यमेव जयतेÓ अर्थात् सत्य कभी पराजित नहीं होता इस सिद्धांत का खण्डन करते हुए नागार्जुन कहते हैं कि वर्तमान समय में सत्य का कोई अस्तित्व नहीं रह गया वह बिल्कुल निष्क्रिय हो चुका है। सत्य की दयनीय एवं विकटमयी स्थिति को देखते हुए कवि सत्य की तुलना उस व्यक्ति से करता है जिसको लकवा हो गया है तथा उसकी बौद्धिक और शारीरिक क्षमता दोनों खत्म हो चुकी हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह किसी को भी नहीं पहचानता अर्थात् वर्तमान समय में सत्य बोलने का साहस किसी में नहीं है। सत्य केवल एक लाश बनकर रह गया है-
वह लम्बे काठ की तरह पड़ा रहता है
सारा-सारा दिन, सारी-सारी रात
वह आपका हाथ थामे रहेगा देर तक
वह आपकी ओर देखता रहेगा देर तक
वह आपकी बातें सुनता रहेगा देर तक
लेकिन लगेगा नहीं कि उसने आपको पहचान लिया है
जी नहीं, सत्य आपको बिल्कुल नहीं पहचानेगा।
पहचान की उसकी क्षमता हमेशा के लिए लुप्त हो चुकी है
जी हां, सत्य को लकवा मार गया है।
किन्तु कवि हताश नहीं है उसे देश में जागृति का आर्विभाव साफ दिखाई दे रहा है। नई क्रान्ति जन्म ले रही है और सर्वहारा वर्ग अपने अधिकारों के प्रति सजग हो चुका है-
सर्वहारा ने निकाला है स्वयं ही मुक्ति का यह मार्ग
महाश्वेता दानवी कवल से सर्वाशत:
अब मुक्त होगा राष्ट्र।

अब आजाद होंगे नगर, आजाद होंगे गांव
अब आजाद होगी भूमि, अब आजाद होंगे खेत,


मशीनों पर और श्रम पर, उपज के सब साधन बन,
सर्वहारा स्वयं अपना करेगा अधिकार स्थापित।
'होते रहेंगे बहरे ये कान कब तकÓ कविता में नागार्जुन ने मेघों और सूखी घास का दृष्टांत देते हुए श्रमिक वर्ग को आशावादी विचारों से पल्लवित किया है। आशा के बादल एक न एक दिन अवश्य बरसेंगे। बुरे दिन नहीं रहेंगे अर्थात् धूप से झुलसी दूबों में हरियाली अवश्य आएगी।
यों ही गुजरेंगे हमेशा नहीं दिन
बेहोशी में, खीझ में, घुटन में, ऊबो में, आएंगी वापस जरूर हरियालियां
घिसी-पिटी झुलसी हुई दूबो में।
कवि ने दमित वर्ग की तुलना जुगनुओं से की है। जिनका अपना महत्व है। अंधेरे वातावरण निर्जन एकान्त जंगल में वे जगमगाते हुए व्यक्ति को दिशा निर्देश देते हैं। ये असंख्य हैं इन्हें मिटाना सरल नहीं-
जुगनू हंै ये स्वयं प्रकाशी
पल-पल भास्वर पल-पल नाशी
कैसा अद्भुत योगदान है
इनका भी वर्षा-मंगल में
लगता है ये ही जीतेंगे
शक्ति प्रदर्शन के दंगल में। साम्यवादी विचारधारा के प्रवर्तक नागार्जुन ने सर्वहारा वर्ग को गौरव प्रदान करते हुए उन्हें समाज का एक मूल्यवान हिस्सा घोषित किया है।
अत: कहना होगा कि नागार्जुन उन गिने-चुने कवियों में से है। जो अपनी कविताओं के माध्यम से चुनौती देते हैं, अनुभूतियों और अनुभवों के लिए जनसामान्य के बीच इनका हिस्सा बनकर रहते हैं। कविता का सृजन करते हुए वे अपनी अभिव्यंजना को इन लोगों की स्थिति, आवश्यकता और समझ के स्तर पर ढालकर पेश करते हैं। इनके काव्य की महत्वपूर्ण विशिष्टता यह भी है कि उनकी कविता स्थान विशेष की कविता न होकर देश की कविता है, राष्ट्र की कविता है। मानवतावाद उसका प्रमुख लक्षण है। नागार्जुन का यह मानवतावाद एक तरफ वैज्ञानिक चिंतन की ओर उन्मुख है और दूसरी ओर समाज के अन्तर्विरोधों के विरुद्ध एक जागृत रचनाकार की तीव्र प्रक्रिया से संबंधित है। वे पुरातनता और नवीनता के संगम को लेकर चलते हैं पर अंधानुकरण नहीं। जनजीवन से अविच्छेद संबंध और सांस्कृतिक परंपरा से विपुल ज्ञान के कारण उनकी कविता में सांस्कृतिक गरिमा का समावेश हुआ। राजनीतिक मान्यताओं में असंगतियों के बावजूद उनकी प्रतिक्रियाएं जनता के हित के विरुद्ध कभी नहीं गई। कवि का सचेत और अचेक भावबोध जनता के साथ अभिन्न रूप से सम्बद्ध है और वे मध्यवर्ग की क्रांति में शामिल हैं। वे पूंजीवाद नौकरशाही का ढांचा चूर करके मजदूर, किसानों द्वारा परिवर्तन लाने के इच्छुक हैं। राजनीति का राजनेताओं से कुछ लेना-देना नहीं है अपितु वे व्यवस्था को सुधारकर मानव जीवन को सुलभ बनाना चाहते हैं। वे समाज को पूर्णत: सुधार कर एक सभ्य एवं आशावादी समाज की रचना करने के लिए संकल्पबद्ध रहे। उन्होंने अपने यथार्थवाद को निरंतर उच्चतम धरातल तक पहुंचाया। उनका राजनैतिक व्यंग्य तीक्ष्ण होता रहा और भौतिक रुझान अविचल। नागार्जुन ने 'हरिजन गाथाÓ और 'छोटी-मछली-बड़ी-मछलीÓ इत्यादि कविताओं की, रचनाओं की सृजना कर प्रगतिशील कविता को, हिन्दी साहित्य को मूल्यवान अवदान दिया है-
बड़ी मछली, झपाटे से छोटी मछली के करीब आई
'गुफ्तगूÓ वाली शैली में बोली-
'तेरे अन्दर,
मौजूद है परिवर्तन और विकास के तत्व
तू खुद ही एक दिन
'बड़ी मछलीÓ में तब्दील हो जाएगी...
इतना कहकर बड़ी मछली मुंह फाड़कर
छोटी मछली के बिल्कुल निकट आ गई...
अब तू आराम से इन जबड़ों के अंदर, आ जा।
उत्तरोत्तर अपने प्रखर यथार्थवादी और दृढ़ भौतिकवादी उन्मेष के कारण नागार्जुन हिन्दी साहित्य में निराला के बाद एक विशेष पदवी को धारण करते हैं। वे मानव को और मांजने अर्थात् बौद्धिक दृष्टि से सजग और परिष्कृत होकर आगे बढऩे का आह्वान करते हैं-
नहीं-नहीं, अभी नहीं
अभी तो सिर्फ श्री गणेश है
अपने पदों को
बार-बार मांजो
मांजों और मांजो, मांजते जाओ
लय करो ठीक, फिर-फिर गुनगुनाओ
मत करो परवाह- क्या है कहना
कैसे कहोगे, इसी पर ध्यान रहे
चुस्त हो सेंटेन्स, दुरुस्त हो कडिय़ां।
पके इत्मीनान से गीत की बडिय़ां।
ऐसी जल्दी भी क्या है?
उस्ताद पुराना, भले, शार्गिद नया है। नैतिक-अनैतिक, सामाजिक-असामाजिक
भला या बुरा कुछ भी क्यों न हो।
मांजो और मांजो।