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Thursday 23 Nov 2017

थाईलैंड की सड़कों पर


सुशील गौतम
एफ-1-210 चार्मवुड विलेज
पोस्ट- अयर नगर
फरीदाबाद-121009
यदि आप फाइव स्टार श्रेणीवाले पर्यटक हैं तो शायद आप के लिए ये संस्मरण समय का अपव्यय होगा लेकिन... खैर चेतावनी वगैरा में उलझने से अच्छा होगा कि बातों का सिलसिला शुरू किया जाए।
किशोरावस्था से यह प्रबल इच्छा थी कि दुनिया देखूं दुनिया घूमूं। मेरा एक घनिष्ट मित्र स्नातकोत्तर डिग्री लेते ही भूटान पहुँच गया था। उसने अनेक निमंत्रण दिए पर मैं जा नहीं सका। कारण विदेश जाएं तो टेंट में पैसा होना चाहिए और मैं अभी पढ़ ही रहा था, कमाई कुछ भी नहीं थी। बयालीस साल की उम्र में पहली विदेश यात्रा की सपरिवार नेपाल की; लेकिन नेपाल जा कर लगा हम हिन्दुस्तान में ही हैं। न भाषा की कठिनाई थी, न रहन- सहन की, न पहनावे-उढ़ावे की, न खान-पान की। नेपालियों के अपनत्व और सहयोगी व्यवहार ने मन पर अमिट छाप छोड़ी। नेपाल यात्रा यादगार बन गई। साठ की उम्र पार होने पर फिर विदेश यात्रा का ब्योंत बना। छ: साल में चार बार दुबई घूम आया। पहली बार पासपोर्ट का इस्तेमाल हुआ और फिर चार ठप्पे लग गए। दुबई जाएं, घूमें, सब अच्छा है। यहां भी न खाने की दिक्कत है न भाषा की, ऐसा कुछ खास महंगा भी नहीं है। लेकिन दुबई घूमना आम पर्यटक के लिए अधूरा है। आप देश तो घूमते हैं पर देश में नहीं। देश में घूमना तभी होता है जब देशवासियों से भी मिलना जुलना हो। उनसे परिचय हो, बातचीत हो, कुछ आत्मीयता बने। दुबई में सामान्यतया यह संभव नहीं। दुबई के मूल निवासी दुबई में ही रहते हैं पर उन्होंने अपनी अलग दुनिया बसा रखी है। आप दुबई आएं घूमें फिरें। रेगिस्तान को स्वर्ग में परिवर्तित कर देने की जिजीविषा की प्रशंसा करें। वैभव का आनंद लें, खरीद फरोख्त करें और बस, खुदा हाफिज़़। हम अलग हैं आप अलग।
सत्तर पार करने पर कमर कसी कि अमेरका यूरोप न सही थाईलैंड ही घूम लिया जाए। यहां आना कुछ कठिन नहीं था पर यहां सपत्नीक आना चाह रहा था और यह कई कारणों से संभव नहीं हो रहा था तो अंत में अकेले ही निकल पड़ा। नेपाल भूटान को छोड़ दें तो बस एकाध ही देश ऐसे हैं जहाँ जाना आसान और कम खर्चीला है। थाईलैंड इन देशों में से एक है। मेरी पुत्री यहां हो आई थी और वो मुझे लगातार सावधान करती रही कि थाईलैंड में भाषा एक बड़ी समस्या है। अंग्रेजी यहाँ बोली समझी जाती है पर थाई उच्चारण और भारतीय उच्चारण अंग्रेजी के दो अलग संस्करण उत्पन्न कर देते हैं और दोनों एक दूसरे को बड़ी कठिनाई और कोशिश के बाद थोड़ा बहुत समझ पाते हैं। इस खबरदारी ने मुझे नेट पर थाईलैंड खंगालने के लिए मजबूर कर दिया। ढूंढा तो मैंने बहुत कुछ पर थाईलैंड जा कर लगा बहुत कम शोध किया था मैंने। खैर, इन दुश्वारियों से पार पाने का एक सबसे आसान रास्ता है, आप अपने आप को टूर ऑपरेटर के हवाले कर दीजिये। यह कुछ महंगा शगल है पर जो लोग रोमांच पसंद नहीं करते और व्यवस्थित तथा बिना झंझट के घूमना चाहते हैं उनके लिए यह सर्वोत्तम तरीका है। लेकिन मुझे तो दुश्वारियां पसंद हैं तो मैंने अपना कार्यक्रम खुद ही बनाया।
थाईलैंड के सबसे सस्ते हवाई टिकट के लिए कोलकाता सबसे अच्छा शहर है। दो चार महीने पहले टिकट ले लें तो और भी अच्छा। मुझे लगभग आठ हजार रूपए में बैंकॉक तक आने जाने का टिकट मिल गया। एक अच्छे होटल में तीन रात रुकने की बुकिंग पांच हजार रूपए में हो गयी। मार्च से यहाँ ऑफ सीजन शुरू हो जाता है अत: होटल रियायत देने लगते हैं। मैंने मार्च की ही बुकिंग कराई थी। पंद्रह दिनों का वीसा थाईलैंड पहुँचने पर हवाई अड्डे पर बन जाता है एक हजार बात में यानी हमारे दो हजार रुपये। थाई करेंसी अंग्रेजी हिज्जे के अनुसार बाह्त है, पर स्थानीय उच्चारण में बात कही जाती है।
कोलकाता से मेरी उड़ान दस बजे सुबह की थी तीन घंटे पहले हवाई अड्डे पहुंचना था तो मैं सुबह छ: बजे होटल से निकल लिया। इतनी सुबह कोलकता में चाय भी नहीं मिलती रात में ही कुछ खाने का सामान मैंने रख लिया था। सात बजे जब मैं हवाई अड्डे पहुंचा तो अभी हवाई अड्डा सो रहा था। लगभग आधे घंटे की इंतज़ारी के बाद कार्रवाई शुरू हुई। विदेश जाने के लिए कोलकाता अच्छा हवाई अड्डा है यहां भीड़भाड़ नहीं होती और सेक्युरिटी वगैरा के झंझट बड़ी शान्ति से पूरे हो जाते हैं। इसलिए जब कार्रवाई शुरू हुई तो आधे पौन घंटे में सब खत्म अब जहाज में बैठने के लिए काफी समय था सोचा चाय पी ली जाय, अफ़सोस अभी यहां किसी ने रेस्त्रां शुरू नहीं किया है।
हवाई जहाज समय से उड़ गया। आसमान से कोलकाता का नज़ारा बहुत मायूस करता है। आगे भी बंगाल की धरती से हरियाली गायब थी तालाब पोखर भी नजऱ नहीं आ रहे थे। सब कुछ बहुत उदास लग रहा था। शायद वज़ह थी मौसम, गर्मी शुरू हो चुकी थी सो हरियाली को अब सावन की प्रतीक्षा थी। बात की बात में डेल्टा का क्षेत्र आ गया और फिर समुद्र। कुछ समय गुजरा और पायलट ने घोषणा की कि हम यंगून के नज़दीक से गुजर रहे थे। म्यांमार की धरती भी अपने बंगाल जैसी ही थी; उदास ! पर थाईलैंड शुरू होने के साथ नज़ारा बदल गया नीचे हरे खेत और तालाब नदी नजऱ आने लगे और लीजिये यात्रा खत्म जहाज सुवर्णभूमि पर उतर रहा था।
सोने की भूमि पर बने हवाई अड्डे पर सोने की खेती हो रही है। जहाजों की लाइन लगी थी और लगातार जहाज़ों के आने जाने का सिलसिला लगा हुआ था। हम लोग अब जहाज से उतर कर शहर में सांस लेने के लिए उतावले थे। बाधा सिर्फ एक थी, वीसा। वीसा काउंटर के पास कुछ नवयुवक नवयुवतियां फ़ार्म लहरा रहे थे और फार्म देते हुए बता रहे थे - एक फोटो चिपकानी है। फ़ार्म भरने के लिए कई काउंटर थे पेन के साथ। लगभग सभी को मालूम था कि फोटो की ज़रुरत पड़ेगी, पर एक दम्पति फंस गए वो फोटो नहीं लाए थे। लेकिन ये कोई बड़ा झंझट नहीं था। फोटो खींचने का इंतज़ाम वहां था। बस बात कीमत की थी। एक फोटो की कीमत दो सौ बात, अभी बेचारे हवाई अड्डे पर ही थे और आठ सौ रूपए का चूना लग गया। वीसा ओन अराइवल में लगभग दो घंटे बर्बाद हो जाते हैं। एक प्राइम लाइन भी लगती है, इसमें वीसा फीस एक हजार दो सौ बात है; लेकिन इसमें भी आप आधा पौन घंटा ही बचा पाते हैं। खैर इन झंझटों से निवृत्त हो जब मैं आज़ाद क्षेत्र में आया तो होटल पहुँचने की जद्दोजहद शुरू हुई। हवाई अड्डे पर संकेत बोर्ड खूब हैं और सही जगह पर हैं पर फिर भी एकदम अनजान जगह पर इंसान खो जाता है। मैं उलझन में था कि होटल बस से जाऊं या मेट्रो से? सामने चाय का कीओस्क दिखा मैंने सोचा चाय ही दिमाग को चैतन्य करेगी। चाय का एक कप कीमत अस्सी रूपए। अब जब ओखली में सर दे ही दिया था तो रूपए क्या गिनने। चाय के दो घूँट पीते ही दिमाग चलने लगा।
अरे ! ये बगल में ही तो पर्यटक सूचना केंद्र है। कन्या वहां एक ही थी वो भी खाली। मैंने बताया कि मुझे खाओ सां रोड जाना है। कन्या ने फ़ौरन एक नक्शेवाला ब्रोशर निकाला उसमें नक्शे पर ऊँगली रख कर समझाया कि स्काई ट्रेन से मैं फाया थाई जाऊं और वहां से टैक्सी ले लूँ। ये जो स्काई ट्रेन है वो शुरुआत भूगर्भ से करती है। पूछता पाछता मैं बड़े आराम से नीचे स्टेशन पर पहुंचा टोकन लिया और ट्रेन में सवार। सारी व्यवस्था दिल्ली जैसी ही है। उतरना मुझे सबसे अंतिम स्टेशन पर था तो कोई चिंता भी नहीं थी। यहां स्टेशन के नाम थाई में तो बड़े हर्फों में लिखे हैं पर अंग्रेजी के हफऱ् बहुत छोटे हैं, इन्हें चलती ट्रेन में पढऩा संभव नहीं है। यदि बीच में उतरना होता तो सावधान रहना पड़ता। फाया थाई में भी बाहर निकल कर टैक्सी स्टैंड तक पहुँचने में कोई कठिनाई नहीं हुई। यहां एक लड़का और लड़की मुसाफिरों की मदद कर रहे थे। मदद के लिए इन्हें कौन भुगतान करता है ये जानने का मौका नहीं था। खाओ सां रोड पर पहुंचा तो वहां का माहौल देख लगा यहां होटल चुन कर गलती कर दी है। बड़ा हंगामा था सड़क पर। इस सड़क पर दोपहर के बाद वाहनों का चलना निषिद्ध हो जाता है। पर्यटक चिन्तामुक्त हो कर चहल कदमी करें।
तो जनाब, सड़क पर पर्यटकों का हुजूम ठांठें मार रहा था। खैर, होटल के कमरे तक पहुँचते पहुँचते यहां के सात बज गए, थक गया था भूखा भी था पर तै किया पहले आधे घंटे कमर सीधी कर ली जाए। थोड़ा सा आराम मिला तो पेट में चूहे कूदने लगे। कुछ कलेवा साथ ले गया था। दो समोसे खाते खाते बाहर निकला। यों तो अपने होटल से बाहर निकलते ही टेस्ट ऑफ इंडिया नाम का रेस्त्रां था पर मैं चूक गया और शायद ये अच्छा ही हुआ। आगे बढ़ा तो इंडियन करी का बोर्ड जगमगा रहा था पर मैं और आगे बढ़ा; और रेनबो में घुस गया ये भी भारतीय रेस्त्रां है। एक सौ साठ बात में जो थाली आई उस से पूरी तृप्ति हो गई। खाने के पहले कुछ पीने की भी पूछताछ हुई। मेरे जैसे न पीनेवाले कभी कभी ही आते हैं। रेस्त्रां में घुसते ही मैनेजर की जगह खड़े एक सरदारजी दिख गए थे। आमतौर से सरदारों के चेहरे पर एक दोस्ताना मुस्कराहट रहती है। अगर कुछ बेच बाच रहे हैं तो ये मुस्कराहट कुछ और खिल जाती है। खाने के दौरान सरदारजी पास आए तो मैंने खाने की प्रशंसा कर दी। उनके चेहरे की मुस्कराहट कुछ और गहरी हो गई। यानी दोस्ती हो गई। खाने के बाद मैंने उनसे पूछा यहां क्या देखूं, कहाँ घूमूं। सरदारजी ने कहा यहां आस पास बहुत से वाट हैं लेकिन सबसे पहले आप ग्रैंड पैलेस जाइए, दूरी कुछ भी नहीं है पैदल भी जा सकते हैं पर बस से जाएंगे तो आराम रहेगा। इसी सड़क से बस मिल जाएगी।
रेस्त्रां से बाहर निकल कर खाओ सां रोड के हुजूम में मैं भी शामिल हो गया। बड़ी हंगामाखेज सड़क है यह; अंग्रेजी में जिसे कहते हैं हैप्पेनिंग प्लेस, यानी पर्यटकों का स्वर्ग। टैक्सी से उतरते ही जो निराशा हुई थी उस पर मुझे खुद ही हंसी आई। पर्यटकों का जबरदस्त जमावड़ा था, लगभग सभी योरोपियन अमेरिकन या दिखने में वैसे ही, अब हों चाहें जहां के। फुटपाथ को वेंडर्स ने घेर रखा था। पब बार्स में गाने और बैंड के सुर तैर रहे थे। सड़क पर लड़कियां पब और बार के मेनू (सिर्फ मेनू ) लहरा रही थीं। सड़कों पर ही बैठ गुदना गुदवा लीजिये। लटें बंधवा लीजिये और न जाने क्या क्या। खाइये पीजिये, मज़ा करिये। मैं घूमते घूमते बाज़ार की रंगत देख रहा था।
अचानक एक लहीम शहीम कद काठी के सज्जन मेरे सामने खड़े हो कर बोल उठे - यहां के उच्चारण से बड़ी दिक्कत पेश आ रही है। लगभग पचपन साठ के गौरवर्णी सज्जन साथ में वैसी ही आकर्षक पचास पचपन की महिला (पत्नी थीं या मित्र?)। अब आप से एकदम मुखातिब हो कर कोई संभ्रांत दीखता व्यक्ति कुछ बोले तो उपेक्षा करने की असभ्यता आप कैसे कर सकते हैं। मैंने मुस्कुरा कर जवाब दिया- जी ये परेशानी तो है, वो बोले मैं मुसलमान हूँ आप ? मैंने जवाब दिया - नहीं। सवाल हुआ, आप कहाँ से हैं? -हिन्दुस्तान से। -ओह, हम लोग भी हिन्दुस्तान जानेवाले हैं, क्या आप हमें हिन्दुस्तानी करेंसी दिखा सकते हैं? हमने वहां की करेंसी देखी नहीं है? किस रंग के होते हैं नोट। मैंने कहा - भारतीय करेंसी मेरे पास नहीं है। -तो क्या आप थाई करेंसी दिखा सकते हैं? अभी तक हमने थाई करेंसी भी नहीं देखी है। मैंने कहा - इसी सड़क पर करेंसी बदलनेवाली एजेंसी है आप अपनी करेंसी बदलवा लीजिये। - हां वो तो ठीक है पर हमें कुछ भरोसा तो होना चाहिए कि एजेंसी वाले सही करेंसी दे रहे हैं। इसलिए पहले हम करेंसी देख कर आश्वस्त होना चाहते हैं। मैंने पर्स निकाल कर बीस थाई बात का एक नोट उन्हें दिखाया। उन्होंने फ़ौरन मेरे हाथ से नोट ले लिया। मेरे पर्स में बीस बीस के दो चार थाई बात ही थे, शेष रूपए अलग थे। दोनों ने बड़े खुश हो कर थाई बात पर हाथ फेरते हुए कहा - ओह ऐसा! इस रंग का होता है बात, पर ये तो छोटा नोट है आप कोई बड़ा नोट दिखा सकते हैं? वो किस रंग का होता है? उन्होंने मेरा बीस का नोट वापिस कर दिया था। मैंने कहा क्षमा कीजिये इस से बड़ा नोट इस वक्त मेरे पास नहीं है। अपना पर्स जेब में रख मैं आगे चल दिया। यह सारी बातचीत दो एक मिनटों का किस्सा थी। वहाँ से आगे बढ़ते ही मुझे ख्याल आया कोई पर्यटक सड़कों पर घूम रहा हो और उसके पास उस देश की करेंसी ही न हो क्या ऐसा हो सकता है? मेरी बुद्धि ने कहा- नहीं। ओह! तो ये ट्रैप था! मैं इस जाल में फंसते फंसते बच गया। एक सिहरन सी शरीर में दौड़ गयी। अभी तो इस देश में आये कुछ ही घंटे हुए हैं और मैं ठगों से इतनी देर तक बतियाता रहा। यहां आठ दिन गुजारने हैं! क्या होगा आगे? जऱा समझिए मैं हजार बात का नोट उन सज्जन के हाथ में देता और वो उसे अपनी जेब के हवाले कर आगे बढ़ जाते तो मैं क्या करता? अगर मैं हंगामा भी खड़ा करता तो कोई मेरी बात पर विश्वास ही न करता और मुझे ही ठग साबित करने के लिए उनके साथ एक आकर्षक महिला भी थीं। बस, अब मैं सीधा अपने होटल में पहुंचा और बिस्तर में धंस गया थकान भरपूर थी इसलिए गहरी नींद के लिए मुझे एक चम्मच मदिरा की भी ज़रुरत नहीं थी।
सुबह नाश्ते और स्नान ध्यान के बाद मैं बहुत स्फूर्ति महसूस कर रहा था। अच्छी नींद ने सारी थकान गायब कर दी थी। खाओ सां रोड अभी उनींदी थी, रात ढाई तीन बजे तक हंगामे के बाद सुबह बाजार में आलस्य दिखाई पड़े तो क्या ताज्जुब? मैं बस स्टैंड पर पहुंचा तो सामने ही एक भव्य वाट नजऱ आया। वाट यानी मंदिर या कहें बौद्ध विहार; नाम चाना (या छाना) सोंग्खाराम। यह पहला दर्शनीय स्थल था। मुख्य गृह की एक दीवार पर पुनर्नवीनीकरण का काम चल रहा था पर शेष तीन दीवारों और फिर मंदिर के अंदर की भव्यता ने मुझे बाँध लिया डेढ़ दो घंटे कैसे गुजरे इस का कोई हिसाब नहीं। मुख्य प्रवेश द्वार पर भी भगवान बुद्ध की प्रतिमा एक छोटे मंदिर में विराजमान थी। भक्त मंदिर परिसर के अंदर की दूकान से अगरबत्ती फूल माला ले कर प्रतिमा पर अर्पित करते। मुझ हिन्दू की भक्ति भावना भी जाग गई। उन के ढंग से मैंने भी फूल चढ़ा दिए। मेरे पिता धर्म में गहरी आस्था रखते थे, हमारे पूजा गृह में शिव, विष्णु, राम, कृष्ण, हनुमान और गणेश जी के साथ भगवान बुद्ध की एक भव्य प्रतिमा भी हुआ करती थी। इसमें कुछ अनोखा या उदारता वाली बात नहीं थी। भगवान बुद्ध के प्रति भी वही आस्था थी जो शेष देवी-देवताओं के प्रति। मैं बहुत छोटा था और सोचता था कि हम गौतम बुद्ध के वंशज हैं, यह बात एक दिन जब मैंने अपनी बड़ी बहन से कही तब उन्होंने बताया कि हम ऋषि गौतम के वंशज हैं। पिछले पचास वर्षों में धर्म के नाम पर तेरा-मेरा बहुत बढ़ा है पर मैं समझता हूँ कि थोड़े से संकुचित मनोवृत्ति के हिन्दुओं को छोड़ दें तो ज़्यादातर हिन्दू भगवान बुद्ध में वैसी ही आस्था रखते हैं जैसी राम कृष्ण में। हिंदुत्व की इस विशालता का सम्बन्ध थाईलैंड में बहुत महत्व रखता है, पर इसकी चर्चा बाद में।
वाट सोंग्खाराम से निकला और ग्रैंड पैलेस के लिए बस स्टॉप पर आ गया लेकिन बस कौन सी पकड़ी जाए? पास ही छोटा सा रेस्त्रां था चाय उपलब्ध थी मैंने चाय और मक्खन टोस्ट का आर्डर दिया। दो लड़कियां ये रेस्त्रां चला रही थीं. चाय ख़त्म की और ग्रैंड पैलेस के लिए बस के बारे में पूछताछ की, दोनों लड़कियां बिलकुल समझ नहीं पाईं। उन्होंने मुझे वहीं बैठे एक लड़के के सुपुर्द कर दिया। मैंने प्रश्न फिर दोहराया पर न जाने मैं क्या पूछ रहा था। लड़का कई बार की कोशिशों के बाद भी मेरी (कूट) भाषा का जाल तोड़ नहीं पाया, मैं मुस्कुराते हुए उठा। अब सरदारजी से ही सहायता लेनी थी लेकिन लड़के ने मुझे रोका और पेन दे कर कागज़ पर लिखने को कहा। मैंने लिखा - ग्रैंड पैलेस। इतना पढ़ते ही लड़का मुस्कुराया - ग्रैंड पैलेस ! बस नंबर तीस। हम दोनों हँसे, मैंने धन्यवाद दिया और तीस नंबर की बस पकड़ कर ग्रैंड पैलेस आ गया। कंडक्टर महिला थी, उसने स्टॉप पर उतरने का इशारा किया और मैं ग्रैंड पैलेस के सामने था। कोई आधा किलोमीटर दूर। सड़क के उस पार पर्यटकों का मेला लगा था। विदेशी पर्यटकों ने सारा फुटपाथ घेर रखा था सब पैलेस की ओर कूच कर रहे थे। मैं भी उनमें शामिल हो लिया। दोपहर के बारह बज रहे थे।
अच्छी खासी भीड़भाड़ के बावजूद टिकट आसानी से मिल रहे थे। कीमत थी पांच सौ बात, सुन कर झटका लगा सोचा टिकट लूँ या न लूँ। फिर ख्याल आया सात समुन्दर पार आया किस लिए हूँ, सो टिकट ले लिया और जन सैलाब के साथ अंदर हो लिया। यदि ग्रैंड पैलेस में न आता तो ये बड़ी मूर्खता होती। इस परिसर का वर्णन करने लगूंगा तो बस हो लिया। संक्षेप में बस इतना कि यह राज प्रासाद का धार्मिक तथा त्योहार और विशेष अवसरों पर इस्तेमाल का हिस्सा है; और इसके विशाल प्रांगण में एमराल्ड बुद्ध मंदिर है, स्तूप अर्थात चैत्य हैं कई मंडप और राज भवन हैं। इनमें से कुछ भवनों का इस्तेमाल संग्रहालय के रूप में हो रहा है। यों तो सारा क्षेत्र दर्शनीय है पर मुख्य आकर्षण का क्षेत्र है एमराल्ड बुद्ध मंदिर। एमराल्ड हरे रंग का जेड पत्थर होता है पर थाई भाषा में इसका अर्थ होता है हरा रंग। एमराल्ड बुद्ध का विशेष धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है। विशाल सिंहासन पर एमराल्ड बुद्ध की छोटी सी प्रतिमा प्रतिष्ठित है। प्रतिमा को ऋतु के अनुसार वस्त्र धारण कराए जाते हैं लेकिन यहां एक नहीं बुद्ध की कितनी ही अन्य प्रतिमाएं भी प्रतिष्ठित हैं। बहुत विशाल और बहुत लघु रूप में भी। दरअसल प्रत्येक वाट में बुद्ध की एक मुख्य प्रतिमा के बाद कितनी ही और प्रतिमाएं भी प्रतिष्ठित होती हैं। दीवारें और छत सुन्दर चित्रों से सजी होती हैं। अक्सर इन चित्रों के विषय होते हैं जातक या फिर बुद्ध की जीवन कथा। वाट बौद्ध विहार होते हैं। भगवान बुद्ध के मंदिर के अलावा विहार में भिक्षुओं के रहने के भवन भी होते हैं, परन्तु एमराल्ड बुद्ध मंदिर राज प्रासाद का अंग है इसलिए इस में भिक्षु विहार नहीं है।
जैसे भारत में मन्दिरों के स्थापत्य की विशेष शैलियाँ हैं. हिमालय क्षेत्र में बौद्ध पगोडाओं की विशेष शैलियाँ हैं उसी तरह थाई बौद्ध वाट की भी अपनी एक स्थापत्य शैली है। दीवारें, मूर्तियां कलात्मक अलंकरणों से सजी होती हंै और इस सजावट में रंगों का विशेष प्रयोग होता है। गहरे रंग इस्तेमाल किये जाते हैं। लाल, हरे, पीले पर सुनहरे रंग का अधिक इस्तेमाल होता है। यह रंग इन मंदिरों को स्वर्णिम आभा प्रदान करता है। थाई मंदिर वर्णन की नहीं दर्शन की अपेक्षा रखते हैं। कलाप्रेमियों को ये मंदिर बाँध लेते हैं। आप इन्हें घंटों निहार सकते हैं। प्रत्येक क्षण आप को इन मंदिरों का कोई नया रूप कोई नया अंश दिखाई दे जाएगा। कितने ही स्थानों पर आपको यहां पत्थर से बनी खूबसूरत मुँडेरें दिखेंगी इन के छोर पर मुंह बाए शेर का मुंह उकेरा गया है। शेर के थोड़े से खुले मुंह में हाथ डालें तो आपके हाथ लगेगी एक बड़ी सी पत्थर की गेंद। थोड़े से खुले मुंह में इतनी बड़ी गेंद कैसे पहुंची यह ऐसा विचित्र नहीं है पर गेंद को मुंह के अंदर आप एक तरफ ले जा कर छोड़ते हैं तो ये मुंह के अंदर दूसरी ओर लुढ़कते हुए बड़ी मधुर ध्वनि उत्पन्न करती है। मुझ से आगे जो पर्यटक थे वो शायद थाई थे। शेर की यह विचित्रता वो जानते थे। उन्होंने इस खेल का आनंद लिया तो मैंने भी उनकी नकल कर ली। बच्चों के लिए तो ये बड़ा ही मनोरंजक है।
इस बौद्ध स्थल में हिन्दू धर्म का भी महत्वपूर्ण समावेश है। मुझे यह समझने में पांच दस मिनट तो लगे पर भ्रम समाप्त होते ही विस्मय और प्रसन्नता से राम कथा के दर्शन किये। राम कथा को यहां रामकेनि कहते हैं (केनि से अवधी के कहिन जैसा ध्वनित होता है)। तो एमरॉल्ड बुद्ध परिसर एक विशाल बरामदे से घिरा हुआ है और इस बरामदे की दीवारों पर थाई शैली में पूरी रामायण चित्रित है। यह बरामदा एक विशाल क्षेत्र है और इन सुन्दर चित्रों को देखने के लिए पूरा एक दिन भी कम है। जैसा मैंने ऊपर कहा दार्शनिक मतभेद के बावजूद हिन्दू और बौद्ध धार्मिक परम्पराएँ और आस्थाएं एक दूसरे में समाहित हैं। गुंथी हुई हैं पर विघ्नप्रेमियों की बलिहारी कि एक वृक्ष की दो शाखाओं को दो अलग वृक्ष सिद्ध करने के वितंडावाद को मान्यता मिल गई है।
राज प्रासाद हो और हथियार न हों? इस परिसर के एक विशाल भवन में पुराने और आधुनिक हथियारों का विशाल संग्रह है। यहां ऐसे-ऐसे भाला बरछी त्रिशूल और तलवारें प्रदर्शित हैं कि इन्हें देख कर ही आपके रोंगटे खड़े हो जाएं। युद्ध दो सिपाही लड़ते हैं जिनकी आपस में कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होती पर फिर एक दूसरे को मौत के घाट उतारने के लिए क्रूर यातना के साथ मारने के पीछे कौन सा मनोविज्ञान है? आधुनिक हथियारों में बन्दूक और पिस्तौलों का भी बड़ा संग्रह है। एक जगह माउजऱ पिस्तौल रखा है, मैंने इसे कुछ देर ध्यान से देखा। सिर्फ इसलिए क्योंकि माउजऱ पिस्तौल भारत के स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद का प्रिय हथियार था। इसी परिसर में वस्त्रों का भी एक संग्रहालय है। इतने विशाल प्रांगण में सुविधापूर्ण साफ़ सुथरे शौचालय हैं, एक रेस्त्रां भी है भूख के बावजूद मैंने इसमें समय बर्बाद करना ठीक नहीं समझा, देखने के लिए यहां जितना था उसी के लिए समय नहीं था तो खाने में समय बर्बाद करना मुझे कुछ जमा नहीं।
ग्रैंड पैलेस के बंद होने का समय हो चला था तो लगभग साढ़े चार बजे के बाद मैं इस परिसर से बाहर निकला। थक कर मैं चूर हो चुका था। बस स्टॉप की ओर बढ़ते-बढ़ते गजब हो गया। पेट कुछ और कह रहा था, दस मिनट पहले यह समस्या उठी होती तो कोई दिक्कत नहीं थी। ग्रैंड पैलेस में सारी सुविधा थी पर अब? सामने एक टक टक यानी थ्री व्हीलर खड़ा था मैंने भाड़ा पूछा। जवाब मिला सौ बात। उफ़, तभी एक टैक्सी आ कर रुकी उस से पूछा तो जवाब मिला - एति, ये क्या बला बोल रहा है टैक्सीवाला? मेरे चेहरे की उलझन को देख उसने बात साफ़ की - एति बात। तो पैंतीस बात के काम के लिए अस्सी बात मांग रहे हैं जनाब! इस मामले में दिल्ली और बैंकॉक में ज़्यादा अंतर नहीं है। इसी समय बस भी आ कर रुकी और मैं फ़ौरन उसमें चढ़ गया।
शाम को फिर खाओ सां रोड की तफरी ली और रेनबो पहुँच गया। सरदारजी ने मुस्कुरा कर स्वागत किया। मैंने कहा बेनाम न रहिये नाम बताइये। - विकी।-लेकिन असली नाम क्या है? -अब तो मुझे यही नाम असली लगने लगा है। तो विकी जी कल मैं फ्राया नदी की सैर करना चाहता हूँ। उसके लिए मुझे कहाँ जाना पड़ेगा? कहीं नहीं! यहीं तो है फ्राया नदी, संगखाराम वाट के बगल से जो गली राम बुतरी गाँव में जा रही है उसको पकड़ लीजिएगा। बस एकाध किलोमीटर चलेंगे और नदी तट पर पहुँच जाएंगे। -अच्छा इस समय मैं सुखंवित क्षेत्र घूमना चाहता हूँ. -तो बाहर निकल कर दो नंबर बस पकड़ लीजिये, पॉश एरिया है, मैं वहीं रहता हूँ।
खाना खाया और रात के नौ बजे मैं सुखंवित के लिए निकल पड़ा। सुखंवित कुछ ऐसा है जैसे मुंबई का फोर्ट इलाका। पर्यटकों के लिए यहां होटलों की भरमार है। पब और बार के लिए तो खैर सारा थाईलैंड प्रसिद्ध है। सुखंवित में एक नाइट बाज़ार भी है। देखना तो था पर ग्रैंड पैलेस की थकान ने लौटने पर मज़बूर कर दिया। रात के बारह बजे लौटा। बस जहां रूकती है वो बड़ी चौड़ी शानदार सड़क है जैसे दिल्ली की चाणक्यपुरी का शान्ति पथ। खूब चौड़े फुटपाथ। रात में महिलाओं ने बिल्डिगों के साथ गद्दे डाल रखे थे। मालिश सेवा हाजिर थी खुले आसमान के नीचे। मैं खाओ सां रोड पर आया। यहां वास्तव में अभी सवेरा हुआ था लेकिन इस रौनक को छोड़ मैं अपने अपने होटल में पहुंचा और फिर बस; नींद और बेहोशीवाली नींद।
मोबाइल का अलार्म बज रहा था यानि सवेरा हो गया था। ये भला सवेरा क्यों हो गया? अभी थकान कहाँ मिटी है? लेकिन नाश्ते का वक्त था उठा; तैयार हो कर बफे में शामिल हो गया। सामिष मेहमानों की तो दावत थी, पर अपने लिए कॉर्न फ्लेक्स, टोस्ट, फल, चाय, कॉफी और फलों का रस, बस। बहरहाल मेरे लिए इतना भी काफी था। आसमान बादलों से घिरा हुआ था। कमरे में आया और फिर सो गया, सोते सोते भी गडगड़़ाहट सुनाई पड़ रही थी, फिर सोचा सोने के लिए आया हूँ या घूमने! तो उठा, घड़ी देखी, बारह बज रहे थे; यानी दोपहर तक का वक्त सो कर बर्बाद कर दिया था। दरवाज़ा खोला और लीजिये; यहां तो झमाझम बारिश हो रही थी। मतलब वक्त बर्बाद नहीं किया था।
कुछ देर बाद जब बारिश कम हुई तो मैं होटल से बाहर आया। बाहर तो गजब था। सड़क पर एक एक फुट पानी रुका हुआ था लेकिन सड़क पर बैठने वाले सारे वेंडर वाइपर ले कर जुटे हुए थे पानी निकले तो धंधा शुरू हो। मैं भी पैंट मोड़ माड़ कर जहां पानी कम था वहां से किसी तरह राम बुतरी गाँव पहुंचा और फिर फ्राया नदी की तरफ चल दिया। राम बुतरी गांव कभी रहा होगा गाँव, अब तो ये इलाका भी खाओ सां रोड का सहोदर है। होटल, पब, बार, मालिशिया, ठेले और.. और वही सब। मैं पूछता भटकता नदी तट पर पहुंचा। अब यहां तट वट कुछ भी नहीं है; है तो फेरी के लिए घाट। लेकिन जिस फेरी में मुझे जाना था वो यहां नहीं रुक रही थीं पता लगा उसके लिए नदी के उस पार जाना पड़ेगा। इस पार से उस पार के लिए भी फेरी थी तो मैं उस पार पहुँच गया। फ्राया नदी में बस की तरह फेरी चलती हैं ये जाम में भी नहीं फंसतीं। फेरी में करीब अस्सी सीटें थीं इतने ही लोग खड़े थे। कंडक्टर महिला थीं, यहां बस कंडक्टर भी महिलाएं ही होती हैं। फेरी के घाट पर लगते ही मांझी उसे घाट पर कस कर बाँध देते हैं फिर भी नदी के बहाव के कारण फेरी स्थिर नहीं होती। मुझ जैसे उम्रदराज अनाड़ी को मदद के लिये इधर-उधर देखना नहीं पड़ता। मांझी फ़ौरन हाथ पकड़ कर फेरी पर चढ़ा लेते हैं।
मैंने अंतिम स्टॉपेज का टिकट ले लिया। अब जिस घाट पर फेरी रूकती, वहीं मुझे देखने लायक वाट दिख जाता पर एक बार मैं पूरी यात्रा करने के बाद दर्शनीय स्थलों के लिए उतरना चाहता था। मुझे लगता है फ्राया नदी की तो यहां हत्या कर दी गई है। नदी के साथ कछार कहीं है ही नहीं, शहर में नदी पर मुसलसल पक्का बाँध बना कर इसे बाँध दिया गया है। नदी में बाढ़ आएगी तो नदी गहरी हो जाएगी और बाँध से ऊपर पानी हुआ तो फिर शहर वाले जानें कि इस बाढ़ से कैसे बचा जाए। तेज बहाव वाली नदी का पानी लगभग काला दिखाई देता है। हालांकि पानी में कोई दुर्गन्ध नहीं है।
डेढ़ दो घंटे की यात्रा के बाद हम अंतिम स्टॉपेज पर पहुँच गए। उतरने के बाद मेरे पास चार विकल्प थे अगली फेरी से सीधा अपने स्टेशन वापिस लौट जाऊं, इस बार दूसरे छोर तक की यात्रा करूँ, पहले वाट पर रुकूँ, या फिर इस बार बस से खाओ सां रोड जाऊं और नगर दर्शन करुं। मैं बस से वापिस हो लिया। यह नगर का अलग हिस्सा था, नगरवासियों का। पर्यटकों के लिए यहां कुछ नहीं। शहर व्यवस्थित और साफ़ है। खँडहर या गिरी पड़ी इमारतें नहीं हैं। घरों का रकबा छोटा भले हो पर आमतौर से तीन मंजि़ल से छोटे घर नहीं हैं। बीच-बीच में बड़ी और बहुमंजि़ला इमारतें भी हैं। सड़क चौड़ी हैं। साथ में फुटपाथ भी खूब चौड़े हैं। फुटपाथों पर ठेलेवालों को ठेला लगाने की छूट होगी तभी सारे शहर में ठेले नजऱ आते हैं। लेकिन ठेलेवाले ठेला लगाते हैं; फुटपाथ पर कब्ज़ा नहीं करते। नागरिकों की आवाजाही के लिए चौड़े फुटपाथ पर ज़्यादा जगह खाली रहे इसका ध्यान रखते हैं। अब लोगबाग आसानी से आवाजाही कर सकेंगे तभी तो उनको ग्राहक मिलेंगे। झोंपड़पट्टी मुझे नहीं दिखीं। फ्राया नदी के कुछ किनारों पर पानी में ही बल्ली गाड़ कर बनी झोपडिय़ों की पिछाड़ी मुझे ज़रूर दिखीं; पर इन्हें झोपड़ी के बजाय कॉटेज कहना उचित होगा। राजमहल भी रास्ते में पड़ा। विशाल क्षेत्र में बने महल पर चाक चौबस्त पहरेदारी थी। ग्रैंड पैलेस तो पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है शायद इसीलिए अब राजा इस नए महल में रहते हैं। विद्यालय और महाविद्यालय भी रास्ते में दिखे। खाओ सां रोड से कुछ पहले एक छोटा लेकिन शुद्ध शाकाहारी रेस्त्रां भी नजऱ आया। भक्ष्या-भक्ष्य की कोई रोक-टोक जहां न हो वहां इसे अजूबा ही कहेंगे। मुझसे सही स्टापेज पर उतरने में कुछ गलती हो गई कुछ ज़्यादा नगर दर्शन करना पड़ा। दोबारा गलती न हो जाए इस ख्याल से मैंने अपने सहयात्री से निवेदन किया कि खान सा रोड आए तो मुझे बता दें। उन्होंने मुझे सोचती निगाहों से देखा। मैंने सोचा ये मेरी बात नहीं समझे पर फिर मुझे खयाल आया कि मैं खाओ सां रोड की जगह खान सा रोड बोल गया हूँ, गनीमत रही खान साहब नहीं कहा था।
शाम को एक बार फिर सुखंवित बाज़ार के लिए निकला। जहां से बस मिलती है उस जगह एक बड़ी ज़मीन खाली पड़ी है। वहां इमारत बनानी है इसलिए ज़मीन को बड़ी टीन की चादरों से घेर दिया गया है। बहुत बड़े क्षेत्र में इन काली टीन की चादरों के साथ कुछ हलचल मुझे दिखाई दी। बस आने पर मैं घूमने चल दिया। रास्ते में दो जगह बहुत विशाल मॉल दिखाई दिए। इस इलाके में जाम बहुत रहता है, बस रेंगते हुए नाना पहुंची। आज मैं इसी क्षेत्र में घूमने निकला था, या तो मैं गलत जगह था या फिर वास्तव में यहां ऐसा कुछ ख़ास नहीं था कि यहां आनंदपूर्वक घूमा जाता। यहां एक मॉल है जिसे एडल्ट मनोरंजन का केंद्र कहा जाता है। बाहर से यहां भी ऐसा कुछ आकर्षक नहीं लगा कि मैं अंदर जाता। एकाध घंटे टांग तोड़ कर मैं वापिस हो लिया। पब बार इस क्षेत्र में भी थे लेकिन यहां वैसा जोश भीड़ और हंगामा नहीं था जैसा खाओ सां या राम बुतरी क्षेत्र में रहता है।
वापसी में रात के ग्यारह बजे भी रास्ते में पडऩे वाले मॉल्स में खूब भीड़-भाड़ थी। मन हुआ यहां घूमा जाए लेकिन अगले दिन पट्टाया जाना था इसलिए नहीं उतरा। इस रास्ते से आते जाते खाओ सां रोड के पास ही एक भव्य वाट था हर बार यह सोचा कि इस वाट के दर्शन करूं पर हर बार गलत समय से गुजरा, तय हुआ पट्टाया से वापिस आ कर यहां घूमूँगा। बस मेरे स्टॉप पर पहुँच गई थी मैं उतर गया। खाली ज़मीन के पास रात के इस समय भी कुछ हलचल जारी थी।
बैंकाक में आज तीसरी रात थी। सुबह कुछ देर स्वीमिंग पूल में हाथ पैर चलाता रहा। नेट पर इसी पूल की धांसू फोटो ने इस होटल तक पहुँचाया था। वास्तविकता कुछ अलग थी। यह सब फोटोग्राफी का कमाल है। ऐसा नहीं की फोटो में कुछ गलत था पर एक सुन्दर पूल को भव्य बनाने में कैमरामैन ने अपना योगदान भी दिया था। बाकी मैं संतुष्ट था, पूल के आस पास का क्षेत्र सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाया गया था। पूल छत पर यानी छठी मंजि़ल पर था। होटल भी अच्छा बेहद साफ़-सुथरा और सुरक्षित था। पूरे होटल में शायद मैं अकेला भारतीय था। कलेवा करने गया तो एक मेज को घेरे अकेले सज्जन को देख मैंने पूछा - मैं बैठ सकता हूँ? -हाँ हाँ क्यों नहीं। पचास-पचपन के सज्जन पूर्वी दुनिया के थे। जाने कैसे बात शुरू हुई - मैंने कहा - मैं शाकाहारी हूँ। मेरी प्लेट में तरबूज और अनानाास देख बोले - फल ललचा रहे हैं, बोले मेरी सीट देखिएगा मैं भी फल ले कर आता हूँ। फल खाते हुए उन्होंने कहा मैं हांगकांग से हूँ आप? मैंने कहा भारत से। उन्होंने पूछा, क्या भारत के बुद्ध और थाई बुद्ध अलग-अलग हैं? मैंने उनकी शंका का समाधान किया और पूछा ब्रिटिश कब्ज़ा ख़त्म होने के बाद हांगकांग में क्या फर्क पड़ा। जवाब मिला कुछ नहीं। सब कुछ वैसा का वैसा ही है। बस नौजवान पीढ़ी जऱा ज़्यादा उतावली है। फिर बोले राजनैतिक विषयों से मुझे चिढ़ है, राजनैतिज्ञ दुष्ट होते हैं। ये छोटी सी मुलाक़ात नाश्ते के साथ ख़त्म हो गई।
पट्टाया जाने के बारे में सूचना मैं ले चुका था। विकी कहीं व्यस्त थे तो उनके सहायक विजय ने कहा कि मैं एकामाई बस स्टेशन पहुँच जाऊं। बस के लिए मैं स्टॉपेज पर आया यह स्टॉपेज उसी खाली बड़ी ज़मीन के पास था। आज तो यहां मेला लगा था। स्थानीय कला विद्यालय के नौजवान विद्यार्थी कूची रंग पेंसिल वगैरा ले कर खाली टीनों के ऊपर स्केचिंग में जुटे थे। सौ सवा सौ विद्यार्थियों के हाथों में चित्रों का खाका था और सब प्रसन्नचित्त अपनी कल्पना को रंग देने में जुटे थे। यहां रात में दिखी हलचल का राज़ समझ में आ गया। हर्ष और जोश में पेंटिंग करते इन नौजवान कलाकारों की कला का आनंद तो मैं लेता, पर जाना था पट्टाया और बस आ गई थी। मैं बस में चढ़ गया। एक स्टॉपेज गुजरा दूसरा फिर तीसरा पर कंडक्टर देवी टिकट देने के लिए आ ही नहीं रही थीं। यात्री बस में चढ़ते-उतरते, टिकट-विकट के लिए कोई परेशान नहीं था। मैंने बगल में बैठी लड़की से कहा कंडक्टर टिकट ही नहीं बाँट रही। लड़की ने निर्विकार मुद्रा में कहा- नो टिकट। मैं चकराया ये नो टिकट क्या मामला है? ड्राइवर के पीछे की सीट पर कंडक्टर की पोशाक पहने एक महिला सो रही थी। मैं उसके पास पहुंचा और दो तीन बार टिकट के लिए कहा पर न जाने कितनी गहरी नींद में वो सो रही थी। मैं फिर अपनी सीट पर आ गया। बस अब सुखंवित क्षेत्र से गुजर रही थी। मेरे लिए ज़्यादा तनाव झेलना मुश्किल था। अपना बैग ले कर मैं उतर गया। क्या पता कहीं कोई टिकट चेकर मिल जाता और अगले दिन बैंकाक के अखबारों में खबर छपती - एक भारतीय वरिष्ठ नागरिक बस में बिना टिकट यात्रा करते पकड़ा गया।
उतर तो गया पर अब पूंछूं किस से कि एकामाई पीछे छोड़ आया हूँ या कहीं आगे है। सड़क के किनारे टू व्हीलर टैक्सी वाला दिखा। मैंने उसी से पूछा, उसका प्रतिप्रश्न था - जाना है क्या? बैग के साथ मोटर बाइक की यात्रा मुझे ठीक नहीं लगी सो मैंने कहा - नहीं बस आप रास्ता बता दें। अब टैक्सीवाला मुझे यों देखने लगा जैसे वो मेरी बात समझ न पाया हो। अचानक उसने मुझे सड़क के किनारे खड़ी एक टैक्सी की ओर इशारा किया। टैक्सी चालक महिला थी वो अपनी सीट से कुछ खिसक खिड़की से मुंह निकाल कर बोल रही थी - सामने मेट्रो की सीढ़ी है यहां से मेट्रो पकड़ लो चौथा स्टेशन एकामाई है। मैं आश्चर्य और ख़ुशी से अभिभूत हो उठा। जऱा सोचिये जाम सड़क की ड्राइविंग के तनाव में वह महिला गाड़ी के बाहर दूर खड़े एक अजनबी की बात सुन सकी, बिना उच्चारण की परेशानी के, और फिर मदद के लिए गाड़ी किनारे लगा कर समस्या हल कर दी। मैं आभार से दब गया - बोला अब आप ही छोड़ दीजिये। वो बोली - मेट्रो से ही जाना ठीक रहेगा मैं आप को छोड़ भी देती पर मुझे किसी मीटिंग में जाना है, मेरा रास्ता अलग है। मैंने हाथ जोड़ कर उस भली महिला को धन्यवाद दिया और सीढ़ी के पास पहुँच गया। यहाँ एस्केलेटर नहीं था, मैंने इधर-उधर देखा शायद लिफ्ट हो। लिफ्ट भी नहीं थी। मैंने सड़क के उस ओर देखा शायद उधर एस्केलेटर हो। इस बीच जाम में रेंगती वही टैक्सी फिर किनारे हुई, भली महिला ने फिर कहा - यही है सीढ़ी चढ़ जाइए। मैंने पुन: उन्हें हृदय से धन्यवाद दिया और ऊपर चढ़ गया। कुछ लोग जीवन में ऐसे मिलते हैं जिन्हें अपनी स्मृति में संजो लिया जाता है। मेरी स्मृति में ये टैक्सी चालक महिला हमेशा बसी रहेंगी।
एकामाई पहुंचा बस पकड़ी और अब हमारी बस जो वास्तव में वैन थी फर्राटे मार रही थी। डेढ़ सौ किलोमीटर में से आधा रास्ता तो फ्लाईओवर के ऊपर ही पूरा हो जाता है बाकी आधा रास्ता शहरों कस्बों से होता हुआ गुजरता है। चिकनी सड़क पर लगभग एक सी गति से बस भागती है और दो घंटे में यात्रा पूरी हो जाती है। बैंकॉक से बाहर निकलने पर भी यह लगता नहीं कि शहर खत्म हो गया है। कम तो हो जाती हैं इमारतें पर हल्की फुल्की बस्ती का सिलसिला बना रहता है। खेत खलिहान कहीं नजऱ नहीं आते हाँ बड़े वृक्षों के कारण खुला मैदान कहीं नहीं दीखता। कहीं-कहीं भव्य वाट दिख जाते हैं, एक वाट के बाहर बुद्ध की विशाल सुनहरी प्रतिमा चमचमा रही थी। फ्लाई ओवर के बाद वाली बस्ती में सड़क के किनारे गणेश जी की स्थापित छोटी प्रतिमा दिखी। आगे एक बड़ी प्रतिमा भी देखी। पट्टाया करीब चालीस किलोमीटर रहा होगा कि एक बस्ती में दूर हिन्दू मंदिर जैसा ऊंचा शिखर नजऱ आया। शिखर पर नीले टाइल्स या पत्थर लगाए गए थे। बैंकाक में अच्छा नाश्ता किया था फिर खाना नहीं खा सका, चार साढ़े चार बजे तक पट्टाया पहुंचते-पहुँचते भूख से बुरा हाल था। होटल में सामान रखा और खाना खाने निकल पड़ा। अपने होटल के पास एक पंजाबी रेस्त्रां दिख गया था; इसी में खाना खाया, बहुत महंगा था।
कुछ देर आराम करने के बाद होटल मैनेजर के पास पहुंचा और पूछा शाम को यहां कहाँ घूमूँ? पट्टाया के बारे में जानकारी तो थी पर मैंने कुछ तै नहीं कर रखा था। अपनी इटीनररी में कुछ नहीं लिखा था। मैनेजर ने कहा समुद्र तट पहुँच कर जिस ओर भीड़ जा रही हो उधर चल दीजिएगा। खूब घूमिये लड़कियां भी मिलेंगी लेडी बॉय भी, हालांकि मैं लेडी बॉय पसंद नहीं करता। अब मैं उसे क्या जवाब देता! बहरहाल मैं समुद्र तट पर पहुँच गया तट के समानांतर सड़क जा रही है समुद्र तट को छूते चौड़े फुटपाथ को वेश्याओं और लेडी बॉय यानी हिजड़ों ने घेर रखा था। दूसरे ओर की फुटपाथ के साथ बाज़ार था, मैं बाज़ार के साथ साथ उस दिशा में चल दिया जिधर ज़्यादा लोग जा रहे थे। एकाध किलोमीटर के बाद सड़क के दोनों ओर बाज़ार शुरू हो गया अब इस सड़क पर वाहनों का जाना निषिद्ध था। ये वही क्षेत्र है जिसके आकर्षण में बंधे थाईलैंड में आनेवाले लगभग एक तिहाई

पर्यटक आते हैं। सड़क के दोनों ओर पब, बार, रेस्त्रां, कैबरे, पोल डांस और स्ट्रिप क्लबों की भरमार है। लड़के लड़कियां पर्यटकों को आमंत्रित करते रहते हैं। यहां की सरकार को यह सब मंजूर है। मैं इस विषय पर नैतिक उपदेशक की तरह ऐसे मनोरंजन के गुण-दोष की व्याख्या नहीं करना चाहता।
आठ-नौ साल की उम्र से ले कर नब्बे वर्ष तक के पर्यटकों का हुजूम इस सड़क को रौंदता है। टूर ऑपरेटर अपने जत्थों के साथ यहां की रेल-पेल में शामिल रहते हैं। लेकिन इस सड़क पर इस सब के अलावा भी काफी कुछ है क्युरिओ शॉप्स, के अलावा बजाज और दरजी भी यहां हाजिर है। इन्हीं दुकानों के बीच एक सरदारजी भी कपड़े और टेलरिंग की दूकान जमाए बैठे थे उनकी सहायक थी उनकी बीस बाइस साल की कन्या। दूकान के बाहर लाल जैकेट और लाल टोपी पहने भरे बदन के एक गोरे सज्जन का आइसक्रीम स्टाल था, हाथों में छ: फुट लम्बा लोहे की छड़ वाला स्कूप। इस लम्बे चम्मच से वो सज्जन आइसक्रीम निकालते कोन में भरते और ग्राहक को पेश कर देते। लेकिन यह सब इतना सीधा नहीं था। यह तुर्की आइसक्रीम शो होता है। तुर्क महोदय इस लम्बी कलछी को शरारत के साथ घुमाते हैं, अपने ग्राहक से छेडख़ानी करते हैं। खूब गहरे अंदाज़ में मुस्कुराते हैं और फिर आइसक्रीम पेश कर देते हैं। इस सड़क पर ऐसे सात आठ स्टाल हैं सब एक जैसे। छेडख़ानी का वही अंदाज़। क्या पता सब एक ही खानदान के हों। इस सड़क पर दो तीन मजमेबाज जादूगर मुफ्त में अपना कमाल दिखाते रहते हैं। न कोई स्टेज, न पीछे काला पर्दा, न ध्यान बंटाने के लिए सहायिकाएं, न लम्बा गाउन। जिस अधेड़ जादूगर का खेल मैंने देखा वो तो बस एक जींस और टोपी भर पहने था। बीच सड़क पर वो हाथ की सफाई इतने कलात्मक रूप में दिखा रहा था कि आप ताली बजाए बिना नहीं रह सकते। खेल खत्म करते ही उसने अपनी टोपी दर्शकों के सामने कर दी। मैंने उसकी टोपी में अपने टिकट के बात डाल दिए। कुछ कलाकार यहां बुत बने हुए खड़े मिलेंगे। कभी-कभी पास खड़े दर्शकों को चौंकाते हुए अचानक अपना अंदाज़ बदल कर सबको हंसा देते हैं। ऐसे बुत कलाकार अपने देश में भी कभी-कभी दिख जाते है। आपको अपना पोट्र्रेट पेंट कराना हो तो सड़क पर बैठे चित्रकार आप की सेवा में हाजिर हैं। यों पोट्र्रेट या स्केच बनानेवाले कलाकार पूरे शहर में उपलब्ध हैं। यहाँ मेरे तीन घंटे कब गुजर गए पता ही नहीं चला, लौटानी एक भारतीय रेस्त्रां में खाना खाया। भारतीय रेस्त्रां यहाँ बहुत हैं। एक रेस्त्रां तो जैन भोजन भी परोसता है मतलब बिना प्याज लहसुन का। रात के बारह बज रहे थे पर लग रहा था रात अभी-अभी हुई है। लौटते हुए बाज़ार में बहुत कुछ ऐसा दिखा जिसे खरीदने के लिए मन ललचा उठा। आमतौर से मैं कहीं जाता हूँ तो कुछ खरीदने खरादने में दिलचस्पी नहीं लेता, पर पट्टाया का बाज़ार अलग है। रात एक डेढ़ बजे कमरे पर लौटा और बिस्तर पर बेहोश हो गया।
सुबह उठ कर समुद्र तट पर आया। सोचा था अलग माहौल होगा। हाँ! रात से अलग था पर इस बीच पर कोई आकर्षण नहीं था। घूमते हुए चाय की तलब मिटाने एक रेस्त्रां में पहुंचा। चार योरोपियन चाय के साथ चीन और भारत की चर्चा कर रहे थे। विषय आर्थिक परिवर्तन के इर्द गिर्द था। मेज पर बैंकाक टाइम्स पड़ा था। सम्पादकीय पृष्ट पर किन्हीं नय्यर साहब का लेख था। मतलब भारत चर्चाओं में है। वापसी में कुछ खरीद-फरोख्त की। अपने लिए फल खरीदे, एकाध ऐसी किस्म भी थी जो सिर्फ यहीं दिखाई दी। कमरख यहाँ खूब थी। जैसी अपने देश में होती है वैसी तो थी ही; उस से दुगने आकार की एक अलग किस्म भी थी। वापिस आया तो होटल मैनेजर खाली दिखाए दिए। पचीस-तीस के बीच की उम्र, एकहरा बदन। मैंने पूछा आप अंग्रेजी समझ लेते हैं। मुझसे मुखातिब हो वो आधे मिनट मुझे गुस्से से घूरते रहे, फिर बोले - कल रात ही तो आपने मुझसे अंग्रेजी में पूछताछ की थी। मैं मुस्कुराया और बोला - बात शुरू करने के लिए मैंने यह प्रश्न किया था। फिर पूछा बैंकाक से पट्टाया तक कहीं भी मुझे खेत नहीं दिखे कोई गाँव नजऱ नहीं आया। वो बोले -मैं उत्तरी थाईलैंड से हूँ खेत खलिहान देखने हों तो आप उत्तर थाईलैंड जाएं; च्यांग माई, नाम सुना है? अपने प्रश्न पर वो ठठा कर हंस दिए। मैंने कहा - हाँ सुना है, वो बोले वहां गाँव में मैं अपनी माँ के साथ रहता था। लेकिन जवान लड़का माँ पर कब तक निर्भर रह सकता है? रोजग़ार की तलाश में मैं बैंकाक आया। वहां से अच्छा मौका मुझे यहां मिला तो यहां आ गया। मुझे लड़कियां बहुत पसंद हैं और इस मामले में पट्टाया अच्छी जगह है तो मैंने यहीं नौकरी जारी रखना तै किया है। वो फिर ठठा कर हँसे। हमारे इस गेस्ट हाउस के मालिक के दो गेस्ट हाउस हैं। मालिक मुझे दोनों जगह दौड़ाता रहता है। एकदम निचोड़ कर रख दिया है इस कंजूस ने, तो अब मैं होटल बदल रहा हूँ उन्होंने फिर ठहाका लगाया। मैंने कहा - यहाँ का सी बीच तो बस ऐसे ही है। वो बोले - अरे सी बीच का आनंद लेने लोग कोरल आइलैंड जाते हैं और भी कई खूबसूरत आइलैंड है सभी जगह नाव से जाना पड़ता है।
मुझे तुरंत याद आया कोरल आइलैंड के बारे में नेट पर खासी सूचनाएं थीं मेरे अनिश्चय ने सारा गुडग़ोबर कर दिया। कोरल आइलैंड की बुकिंग करानी पड़ती है और आठ बजे सुबह नाव निकल लेती हैं। अब तो बारह बज रहे थे। शाम को यहाँ अल्काजऱ और टिफेनी शो होते हैं ये लेडी बॉय कैबरे हैं और प्रसिद्ध भी हैं पर न जाने क्यों मेरे मन में कोई उत्साह पैदा नहीं हुआ। आराम के सिवा करने को और कुछ भी नहीं था। खाना खाने निकला तो मोटर साइकिल टैक्सी द्वारा नगर भ्रमण कर डाला। पट्टाया छोटा शहर है। पर्यटक इस शहर में ख़ास महत्व रखते हैं। पूरे शहर में पब, बार, रेस्त्रां, एडल्ट क्लब यहाँ तक कि मुजरे के कोठे भी खुल गए हैं, मसाज पार्लरों की ऐसी भरमार है कि एक जगह देवनागरी में मालिश के द्वारा भी मालिश का आमंत्रण दिया जा रहा है। मैंने भी मालिश के लिए अपने आपको एक महिला के हाथों सौंप दिया। कभी नौजवानी तक अपने यहां नाई मिल जाया करते थे; जो जमा कर मालिश करते थे; अब ज़रुरत पर भी वैसे नाई नहीं मिलते। मालिश की सुविधा कहीं कहीं है पर पांच सौ से नीचे कोई लेता नहीं। केरल और गोवा में तो हजार दो हजार खर्च हो जाते हैं। मैं तो भूल ही गया था कि मालिश कैसी होती है। यहां दो सौ बात यानी अपने यहाँ के चार सौ रुपयों में मालिश हो रही थी। यों तेल से मालिश कराएं तो तीन सौ और हर्बल मालिश कराएं तो सात आठ सौ बात लिए जाते हैं। जिस मालिश की बातें लोग चटखारे ले कर करते हैं; वो और महँगी होती है। घड़ी देख कर उस महिला ने पूरे एक घंटे मालिश की, मुझे थकान से काफी राहत मिली इसलिए जब उस महिला ने टिप मांगी तो मुझे टिप देना बहुत वाजिब लगा।
सुबह फिर बाज़ार गया जो कुछ खरीदने से रह गया था खऱीदा और बस, पट्टाया बाई बाई। यहां पिक अप वैन सिटी बस का काम करती हैं चौदह से सोलह यात्री इसमें बैठ लेते हैं। बस स्टेशन पहुंचा और फिर बैंकाक के लिए वापसी। रास्ते में इस बार कुछ बाग़ नजऱ आए एक जगह अनानास से लदा मिनी ट्रक जा रहा था मतलब अनानास की खेती यहाँ हो रही है। होटल पहुँचते पहुँचते पांच बज गए। सामान रख फ़ौरन छाओ फ्राया नदी की ओर चल दिया। वाट अरुण का टिकट लिया। जी! अरुण का अर्थ वही है जो हिंदी में होता है। लेकिन पहुँचते पहुँचते देर हो गई। छ: बजे मंदिर का सबसे दर्शनीय क्षेत्र बंद हो जाता है। लोहे के फाटक से बंद वाट को दूर से तो देखा ही जा सकता था। कुछ देर प्रशंसा के साथ वाट को देखता रहा। जो वाट अवश्य देखने चाहिए उनमें से एक है ये वाट। यूरोपीय पर्यटकों का एक दल साइकिलों पर सवार आ पहुंचा था। वाट का सारा परिसर वृक्षों और बागीचे से घिरा हुआ बेहद साफ़-सुथरा था। पास ही एक विशाल मंडप था मैं वहां चला गया। भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के समक्ष बैठे बौद्ध भिक्षुओं का एक दल संध्या प्रार्थना कर रहा था। सबसे पीछे किशोर भिक्षु बैठे यदा-कदा पलट कर भक्तों को देख लेते। भिक्षु रहे होंगे बारह पंद्रह। इतने ही भक्त भिक्षुओं के पीछे बैठे थे। मैं भी इन्हीं भक्तों के पास बैठ गया। साथ बैठने में मेरे पैर परेशानी कर रहे थे। हम जैसों के लिए दीवार से सटी कुछ कुर्सियां रखी गई थीं। प्रार्थना थाई भाषा में थी लेकिन आम थाई से मुझे ये कुछ अलग लगी। मुझे इसमें हल्का सा संस्कृत का नाद सुनाई पड़ रहा था। हो सकता है ये मेरा भ्रम रहा हो।
रात आठ बजे बाहर निकल कर घाट पर आया लेकिन एक नई मुसीबत यह थी कि कोई फेरी इस घाट पर रुक नहीं रही थी। होटल जाने के लिए नदी के उस पार जाना ज़रूरी था तो पार उतारने वाली फेरी से मैं उस पार आ गया। यहां दो परिवार फेरी का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ देर हम सब फेरी की राह देखते रहे पर अब जो फेरी नदी पर दौड़ रही थीं वो न इस पार के घाट पर रुक रही थी न उस पार के। दोनों परिवार निराश हो सड़क से अपने गंतव्य के लिए चल दिए। मुझे भी यही ठीक लगा। सड़क पर आया तो चारों ओर एकदम सन्नाटा था। शायद यह ग्रैंड पैलेस का पिछवाड़ा था। खुले मैदान, ऊंची चारदीवारी इनके बीच सोई हुई चौड़ी सड़क। बस स्टेशन पर दो नौजवान जोड़े बैठे थे। मैं भी वहां बैठ गया। कुछ देर गुजरने पर भी जब कोई बस नहीं दिखी तो मैंने एक नौजवान से पूछा - खाओ सां रोड के लिए यहां से बस मिलेगी? सवाल सुन कर वो लड़की से बात करने लगा। मुझे ऐसा लगा बातचीत मेरे सवाल के परिप्रेक्ष्य में हो रही थी। ऐसा ही था। जवाब लड़की ने दिया, उसने बस नंबर बताया और कहा हम काफी देर से यहां बैठे हैं यहां कोई बस आई नहीं है। अब सिवाय इन्तेज़ारी के और क्या किया जा सकता था? कुछ देर और बीतने पर लड़का लड़की फिर बात करने लगे, बात के बीच उन्होंने मेरी तरफ देखा। शायद फिर इनकी बात में मैं भी शामिल था। इस बार लड़का बोला - बहुत देर हो गई है बस का कोई अता-पता नहीं है, हम लोग टैक्सी कर रहे हैं। क्या आप हमारे साथ चलना पसंद करेंगे। अँधा क्या चाहे - दो आँखें, मैंने कहा - क्यों नहीं। हम तीनों टैक्सी में बैठे और बात की बात में हम खाओ सां रोड के मोड़ पर आ गए। मैंने कहा, बस मैं यहीं उतर जाऊँगा। टैक्सी के रुकते-
रुकते मैंने टैक्सी को पैसे देने के लिए पर्स निकाला भर था कि लड़की इसरार के साथ बोल पड़ी - नहीं नहीं आप पैसे नहीं देंगे, मेरे कई बार कहने पर भी उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया। टैक्सी चालक महिला के बाद यह यह नौजवान जोड़ा मेरी स्मृति में थाई मोमेंटो की तरह बस गया। जो देखा और घूमा वो एक तरफ, इन दो व्यक्तियों की सदाशयता मेरी थाईलैंड यात्रा का ऐसा हृदयस्पर्शी अनुभव है जो मेरे मन से कभी मिट नहीं सकेगा। यों ऐसा लग सकता है कि ये मामूली घटनाएं हैं पर विदेश में यह सदाशयता कितना सुख देती है यह भोगने पर ही अनुभव किया जा सकता है।
रात का खाना फिर विकी साहब के रेस्त्रां में ले रहा था पर विकी थे नहीं। मैंने उनके सहायक विजय से पूछा तो उसने बताया कि वो अपनी टेलरिंग शॉप पर हैं रात को देर से आएँगे। विजय भी भारतीय हैं पर भारत से नहीं बर्मा यानी म्यांमार से हैं। म्यांमार से थाईलैंड आ कर काम करते मुझे भारतीय के अलावा नेपाली भी मिले लेकिन सबकी हिंदी एकदम साफ़। विजय ने पूछा - पट्टाया की यात्रा कैसी रही? मैंने जाते वक्त बस में बिना टिकट यात्रा की बात बताई। विजय ने बताया बैंकाक में कुछ समय कई रुट पर बस सेवा मुफ्त होती है।
बैंकाक कोई अमीर देश नहीं है, इसलिए गरीबों की कुछ सहायता इसी तरह करता है। ऐसी मुफ्त सेवा शायद ही कोई देश देता हो। संपन्न देशों का क्या हाल है यह तो किसी संपन्न देश में जाने पर ही पता लगेगा। सिटी बसें यहां ए सी भी है और सामान्य भी। टिकट दरों के हिसाब से चार-पांच श्रेणी की बस सेवाएं हैं। कंडक्टर महिलाएं हैं और दौड़-दौड़ कर टिकट बांटती रहती हैं। हमारी दिल्ली की तरह नहीं जहां कंडक्टर इतने अस्वस्थ होते हैं कि वो अपनी सीट पर बैठ कर ही टिकट देते हैं। थाई कंडक्टरों का थैला रेजगारी से भरा रहता है इसलिए टिकट के साथ पैसे वापसी की कोई किल्लत नहीं होती।
रात में वापसी के समय फेरी न मिलने का भी कारण था। फेरी भी कई श्रेणी की होती हैं। कुछ एक्सप्रेस श्रेणी की होती हैं जिनके स्टॉपेज कम होते हैं। रात ढलते-ढलते इनकी सेवाओं में कमी होने लगती है। कुछ फेरी केवल पर्यटकों के लिए होती हैं। टूर ऑपरेटर अपनी विशेष सुविधावाली फेरी चलवाते हैं। बैंकाक जाएं तो फेरी का आनंद अवश्य लें। आपकी जेब और सुविधा जैसी इजाज़त देगी वैसी फेरी यात्रा आपको मिल जाएगी।
खाओ सां रोड पर टेलरिंग की भी बहुत दुकानें हैं। कोट की डिजाइनें इतनी आकर्षक कि आप का मन बेसाख्ता दो- चार कोट खरीदने के लिए ललचा उठे। लेकिन टेलरिंग की दुकानें सारे बैंकाक में भरी पड़ी हैं खासतौर से सूट और कोट्स की स्त्री पुरुष दोनों के लिए। अगली बार आया तो एक-दो कोट मैं ज़रूर खरीदूंगा।
थाईलैंड गरीब देश नहीं है लेकिन संपन्न भी नहीं है; इसलिए यहां भिखारी दिख जाते हैं। कम हंै; लेकिन हैं। वाट के आस-पास, मेट्रो स्टेशन के अलावा, इधर-उधर कहीं भी बैठे मिल जाते हैं। पट्टाया में तो फुटपाथ पर एक बड़ी दुर्दशा में पड़ा भिखारी दिखा। लावारिस कुत्ते भी सड़कों पर घूमते उसी तरह मिलते हैं जैसे भारत में। संख्या कम ज़रूर है पर विदेश में इनसे इसलिए डर लगता है कि अनजान जगह में अस्पताल डाक्टर खोजने की ज़रुरत पड़ जाएगी। अच्छा हाँ, पट्टाया में अस्पताल और डाक्टरों की उपस्थिति विशेष रूप से नजऱ आती है। ख़ास तौर से प्लास्टिक सर्जरी के विशेषज्ञ। पट्टाया जाते हुए रास्ते में कहीं भी गाय, भैंस बकरी नजऱ नहीं आईं। न डेरी फ़ार्म दिखे न पोल्ट्री फ़ार्म। शायद ये सारे व्यवसाय उत्तरी थाईलैंड में होते हैं। थाईलैंड में पानी खूब बरसता है सड़कों पर भर भी जाता है पर निकासी भी जल्दी हो जाती है। खुले नाले तो हैं पर गन्दगी कहीं नहीं है। कूड़े के ढेर मुझे कहीं नहीं दिखे। न सड़कों पर कूड़ेदान दिखे। सुबह मेरी रोज़ देर से हुई इसलिए यह जानना संभव नहीं था कि सफाई की क्या व्यवस्था है। व्यवस्था जो भी हो; है बहुत अच्छी और मुस्तैद। हालांकि यहां सिंगापुर और मलेशिया जैसी सख्ती नहीं है और इक्का-दुक्का ठेलेवाले लापरवाही भी कर देते हैं फिर भी शहर एकदम साफ़ है।
शहर में ठेलेवालों यानी स्ट्रीट वेंडर्स की भरमार है। आमतौर से जब तक साफ़ सफाई का पूरा भरोसा न हो जाए मैं ठेले खोमचेवालों से दूर ही रहता हूँ। एक दिन मैं शांति रेस्त्रां में चाय पी रहा था। रेस्त्रां पहली मंजि़ल पर था। नीचे एक ठेलेवाला तरबूज बेच रहा था। स्टील के चमकते ठेले का ऊपरी कैबिनेट शीशे का था। तरबूज की फांकें कैबिनेट में थीं। ठेलेवाले ने दस्ताने पहन कर कैबिनेट से एक फांक निकाली। चाकू से फाँक के टुकड़े तराशे और टुकड़ों को बिना छुए प्लास्टिक के थैले में डाल कर क्रोशिये जैसी एक लम्बी लकड़ी की सींक टुकड़ों में खोंप दी। उसने फांक और टुकड़ों को हाथ ही नहीं लगाया था। इसके बाद घूमते घामते जहां मुझे प्यास लगती। मैं तरबूज या अनानास खरीद लेता। मांस-मछली के बिना यहां कुछ बनता नहीं पर ठेलेवाले व्यंजन बनाने के बाद तवा या पैन साफ़ कपडे से इस तरह पोंछ डालते हैं कि बने व्यंजन का अंश भी इन पर न रहे। ठेले पर गंदगी आप को ढूंढे नहीं मिलेगी। आश्चर्य तो यह कि यहां मक्खियाँ हैं ही नहीं। मोदी जी यदि थाईलैंड जाएं तो मक्खियों से छुटकारे का राज़ जान कर आएं। भारत के स्वच्छता अभियान में यह रहस्य बड़े काम आएगा। पट्टाया में तो एक ठेले पर पूरे कुत्ते को चारों पैर खींच कर बाँध दिया गया था, खुले ठेले पर साबुत कुत्ते के नीचे अंगारे और उलट पलट कर उसे भूना जा रहा था। कुत्ते के जिस हिस्से की बोटी चाहिए मांग लीजिये। मक्खियाँ इस ठेले के पास भी नहीं थीं। सौदा सुलफ यहां प्लास्टिक के थैलों में ही मिलता है; लेकिन कहीं एक थैला भी आपको सड़क फुटपाथ नाली, नाले या फिर छाओ फ्राया नदी में नहीं दिखेगा। सफाई का रहस्य जो भी हो पर इतना तो तै है कि यहां के नागरिक इस मामले में चाक-चौबस्त हैं। अगला दिन थाईलैंड की यात्रा का मेरा अंतिम दिन था।
सुबह आठ बजे मैं नहा-धो कर फिर मुख्य सड़क पर था। बस पकड़ कर मैं वाट रत्चानड्डा के पास उतर गया। दूसरा या तीसरा स्टॉप ही था। इस वाट को बस से गुजरते हुए मैं पांच-छ: बार देख चुका था। उतरने के बाद करीब आधा किलोमीटर वापिस आना पड़ा बीच में एक तिराहा पड़ा। यहां एक संकेत बोर्ड वाट सीता राम का मार्ग बता रहा था लेकिन मुझे तो रत्चानड्डा में ही जाना था। पहले पता होता तो वाट सीता राम के लिए भी समय निकालता पर अब समय नहीं था। शाम की फ्लाइट जो पकडऩी थी।
वाट रत्चानड्डा की भी मरम्मत चल रही है। मरम्मत भले चले पर भक्त बड़े हिस्से में घूम सकते हैं। प्रार्थना कर सकते हैं। इस वाट में एक लौह प्रासाद है जो तीन मंजि़ल ऊंचा है सबसे ऊपरी मंजि़ल में भगवान बुद्ध के शरीर का कोई अंश एक मंजूषा में रखा है। शीशे के केबिनेट में यह मंजूषा रखी है। वाट में भगवान बुद्ध के अष्टांग मार्ग के उपदेश थाई और अंग्रेजी में लिखे हैं। वाट रत्चानड्डा विहार का परिसर खूब विस्तृत है, दरअसल सभी विहारों के परिसर बड़े क्षेत्र में फैले होते हैं। सारा परिसर व्यवस्थित सुन्दर और साफ़ सुथरा होता है। वाट रत्चानड्डा का थाई उच्चारण अवश्य कुछ भिन्न होगा। (वाट) अरुण या लौह प्रासाद जैसे हिंदी या कहें संस्कृत शब्दों से हम खूब परिचित हैं और जब दूर देश थाईलैंड में ये शब्द सुनाई पड़ते हैं तो कानों में मिश्री घुल जाती है। यह तो मैं लिख ही चुका हूँ कि इन थाई विहारों के वास्तु की एक थाई शैली है पर इस शैली में बंधे होने के बावजूद सभी वाट अपनी एक अनोखी भव्यता लिए होते है; इसीलिए एक दूसरे से ये एकदम अलग दिखाई देते हैं और अपनी सुंदरता से चमत्कृत कर देते हैं।
इस विहार की ऊपरी मंजि़ल में एक नौजवान मिला। मैंने उस से क्या पूछा याद नहीं पर वो बोला रात ही तो आप से मुलाक़ात हुई थी, टैक्सी में हम लोग साथ-साथ आए थे। अपने भुलक्कड़ स्वभाव के कारण मैं उसे पहचान नहीं पाया था। शर्मिंदगी से मैं पानी-पानी हो गया, जब तक मैं कुछ कह कर बात संभालता नौजवान दो मंजि़ल नीचे उतर चुका था। काफी देर हो चुकी थी बारह बजे मुझे होटल छोड़ हवाई अड्डे के लिए चल देना था। इसलिए विहार के लौह प्रासाद के बाद अन्य मंडपों के लिए समय ही नहीं बचा था।
होटल मैंने भागते-दौड़ते बारह बजे छोड़ दिया। खाना खाने का समय नहीं बचा था। फ्राया थाई के लिए कोई टैक्सी मीटर से चलने को तैयार नहीं थी तो मैंने पास खड़े एक सिपाही की मदद ली। फ्राया थाई का रास्ता एकदम रुका पड़ा था टैक्सी रेंग रही थी, मुझे थोड़ी चिंता हुई कहीं एयरपोर्ट पहुँचने में देर न हो जाए। फ्राया थाई पहुँचने के बाद जाम से मुक्ति मिली और ढाई बजे मैं हवाई अड्डे पर था। बोर्डिंग पास लेने के बाद मैं आश्वस्त हुआ। आते वक्त तो सुवर्णभूमि का हवाई अड्डा मुझे भव्य नहीं लगा था पर जाते समय पोर्ट की लॉबी में समुद्र मंथन की विशाल झांकी ने मन मोह लिया। अल्पसंख्यक मुसलमानों के बाद थाईलैंड की लगभग सारी जनसँख्या बौद्ध है, पर सुवर्णभूमि परिसर में हिन्दू पौराणिक झांकी से इस देश की धर्मनिरपेक्षता के दर्शन हो जाते हैं। थाईलैंड धर्मनिरपेक्षता के जोश में धर्म से एलर्जिक नहीं है।
वापसी में प्लेन के बाहर सिर्फ हिमशैलों जैसे बादलों के विशाल पर्वतों के बीच हमारा वायुयान कुछ हिचकोले खाता गुजर रहा था समझिए सड़क टूटी हुई थी। मैं सोच रहा था आज से ढाई तीन हजार साल पहले भारत से किस जिजीविषा के साथ हिन्दू विद्वान यहां आए होंगे? कैसे उन्होंने हिन्दू दर्शन का सन्देश यहाँ से इंडोनेशिया तक दिया होगा, फिर कैसे बौद्ध विद्वान आए होंगे और उन्होंने न केवल दक्षिण-पूर्वी एशिया बल्कि चीन और जापान तक भगवान बुद्ध का दर्शन पहुँचाया होगा? ये विद्वान इन देशों में धर्म की विजय पताका फहराने नहीं गए थे, ये भारत से दार्शनिक सन्देश ले कर गए। यह सन्देश इन देशों की संस्कृति में समाहित हो गया।
तो यों मेरी थाईलैंड यात्रा पूरी हुई, पर ये यात्रा कहाँ थी ये तो धैयाँ छूने जैसा था। भला आठ दिनों में थाईलैंड जैसे बड़े देश की यात्रा होती है? अब देखिये यदि दोबारा यहां आ सका तो कम से कम एक महीने के लिए तो आऊंगा ही, और हाँ खाली हाथ। बिना बैग सूटकेस के झंझट के। कपड़े खाओ सां रोड पर बहुत सस्ते मिल जाते हैं। पचास बात में एक किलो कपड़े धुल भी जाते हैं। वापसी में ये कपड़े यहीं दान कर जाऊँगा। भारी सामान ढोने से बचने का यह सबसे अच्छा तरीका है। फिर आजकल हवाई कंपनियां कम सामान वाले यात्रियों को रियायत भी दे रही हैं। पर देखिये यह ख्वाब कब पूरा होता है? होता भी है या नहीं?