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Wednesday 17 Jan 2018

आईना है

नरेन्द्र दीपक
4, पारिका-2, चूनाभट्टी, कोलार रोड
भोपाल (म.प्र.-462016, मो. 09425011570
1. आईना है

साफ सुथरा खूबसूरत आईना है,
उसके बारे में मेरा ये सोचना है।

मैं खुद को उसमें कब तलक देखा करूं,
मुझको भी, मुझ में, किसी को देखना है।

बात ये समझे कभी वह नासमझ भी,
मेरे भीतर भी कहीं इक आईना है।

उसका चेहरा मेरा चेहरा लग रहा है,
सामने, वो शख्स है, या आईना है।

आईने पर, शक-शुबा मत कीजिएगा,
आईने में, आप का ही चेहरा है।

जिसने अपनी शक्ल खुद की तराशी हो,
उस शख़्स को, आईना क्या देखना है।

2

यादों के परिन्दे कल चहके तो गजल  लिख दी,
इक सादा से कामकाज पर, मैंने तेरी शक्ल लिख दी।

जिस बात को लेकर मैं, मुद्दत से परेशां था,
वो बात उसे $खत में, मैंने चुपके से कल लिख दी।

मैं नींद से जागा था, तू ध्यान में थी शायद,
मेरे बारे में पूछा था, मैंने तेरी कुशल लिख दी।

कुछ आंसू साथ रहे, कुछ दर्द जमाने के,
मैंने तन्हा बेहतर था, क्यों चहल-पहल लिख दी।

क्या खूब बयान किया, इक हुस्न का शायर ने,
ओठों को कमल लिक्खा, और आंख सजल लिख दी।