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Wednesday 22 Nov 2017

यही बन्धु, अपराध हमारा

कुमार रवीन्द्र
क्षितिज 310 अर्बन एस्टेट- 2 हिसार -125005
मो. 094169.93264
यही बन्धु, अपराध हमारा

हम संतों की
भाखा कहते
यही बन्धु, अपराध हमारा

नए वक्त की
अलग किसिम की बोली-बानी
केक-पेस्ट्री के युग में हम
माँग रहे लपसी-गुडधानी

स्वारथ की नगरी में
पुरखों के सँग रहते
यही बन्धु, अपराध हमारा

कथरी-माला-झोली लेकर
हम हैं नई सीकरी आये
अम्मा-दादी ने सिखाये थे
वही भजन-पद हमने गाये

उम्र कटी
शाहों की सिरजी विपदा सहते
यही बन्धु, अपराध हमारा


विश्वहाट में बड़े शाहजी
बेच रहे कबिरा की साखी
तुलसी-सूरा की बानी की
नहीं किसी ने भी पत राखी

नहीं बयार संग
हम बहते
यही बन्धु, अपराध हमारा

यही गीत होना है

राख हुए टापू पर
बरखा की रिमझिम को सुनना
यही गीत होना है
बजे कहीं भी वंशी
रस-फुहार भीतर हो
दादी के आसीसों
अम्मा की आरती बसा घर हो

नेह की मिठास को
साँसों में अचरज से बुनना
यही गीत होना है

पनघट पर टेर रहा
लहरों को जलपाखी
फूलों की घाटी में
गुनगुन है कर रही मधुमाखी

शूल-बिंधी उंगलियों
पंखुरी-पंखुरी गुलाब को चुनना
यही गीत होना है

मेह-झरे मुरझाये पत्तों में
इन्द्रधनुष हेरना
पाखी-संग
किसी गये युग को ही टेरना

संतों की बानी को
हाट हुए मौसम में गुनना
यही गीत होना है

शुभ दिन होगा

शुभ दिन होगा
जब घर-घर में कविता होगी

नेह-भिगोई आंखें होंगी
सांसें भी होंगीं वंशीधुन
कोई ऋ षि सिरजेगा गीता
हिरदय, बन्धु, रचेगा फ ागुन

बोल गीत के
सच्चे होंगे
शब्द नहीं होंगे तब ढोंगी

पेड़ जपेंगे मन्त्र भोर के
धूप आरती हो जाएगी
सगुनचिरइया आम्रकुञ्ज में
फ ाग और चैती गाएगी

नहीं रहेगी
ऋ तु प्रपंच की
पुरखों ने जो सदियों भोगी

गीत-हुए सूरज को उस दिन
एक खुला आकाश मिलेगा
छंद और साखी कबिरा के
साधू द्वार-द्वार टेरेगा

उस पावन बेला में
मानो
नहीं रहेगा कोई रोगी

उठो राजन!

बहुत सोये
उठो राजन!
राजगृह के द्वार खोलो

सुनो परजा की गुहारें
हर दिशा से आ रही हैं
गाँव-जंगल की हवाएँ
रामधुन फि र गा रही हैं

उलटबासी
सुनो युग की
हाट के मत बोल बोलो

दे रहा है समय दस्तक
गुंबदों की सीढिय़ों से
रोशनी होगी नहीं हर ओर
इन बुझते दियों से
दो प्रजा को
दाय उसका
टेंट मत अपनी टटोलो

ये ज़हर के बीज अपने
मत हवाओं में बिखेरो
और रघुकुल की कथा के
मन्त्र उलटे नहीं फेरो

राम होना
कठिन, माना
तुम भरत के संग हो लो

देवी है या भोग्या नारी

प्रश्न, बंधु, है
वही सनातन
देवी है या भोग्या नारी

दुविधा में हैं खड़े रामजी
रावण को कैसे वे मारें
असुर न व्यापे गाँव-गली में
भला कौन-सा मंत्र उचारें

खड़ी अकेले
वन के पथ पर
बिलख रही हैं सियादुलारी

विरुदगान सुनकर अंधों का
हुए गुणीजन सारे गदगद
दाँव लगे ख़ुद धर्मराज हैं
बजा रहे तालियाँ सभासद

विवश द्रौपदी की
आँखों में
अब भी भरा हुआ जल खारी

जंगलराज हुआ बस्ती में
कुछ भी करे कोई आज़ादी
देख दशा इस रामराज की
बिलख रही गाँधी की खादी

परजा रहे
दूर महलों से
यह फ ऱमान हुआ है ज़ारी