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Friday 24 Nov 2017

विराट के मुक्तक

चन्द्रसेन विराट
121, बैकुंठधाम कॉलोनी,
आनंद बाजार के पीछे,
इंदौर 452018 (म.प्र.)
मो. 09329895540
दंभ का भान नहीं जाता है
खुद का स्तुति-गान नहीं जाता है
व्यक्ति का मान चला जाता पर
उसका अभिमान नहीं जाता है
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ज्ञान में गर्क नहीं चलता है
अक्ल का अर्क नहीं चलता है
भाव श्रद्धा का हो उसके आगे
बुद्धि का तर्क नहीं चलता है
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सूखी करुणा की है नदी कितनी
होती दुनिया में है बदी कितनी
सुप्त संवेदना नहीं जगती
घटती रहती है त्रासदी कितनी
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कोर उसकी है नुकीली कितनी
कोरे नभ में है सजीली कितनी
तीज का चांद है हसिया जिसकी
धार चांदी की कटीली कितनी
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रस है आराध्य, रसोपासक हैं
रस है प्रतिपाद्य, रसोपासक हैं
इसकी साहित्य रहा साधन ही
रस रहा साध्य, रसोपासक हैं
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आत्म-अपवाद हो गई जैसे
लुप्त-प्रतिसाद हो गई जैसे
शब्द-उद्योग में ढली कविता
एक उत्पाद हो गई जैसे
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हर नवाचार हेतु तत्पर हों
सुष्ठु संवाद भी परस्पर हों
आधुनिक आप हैं अगर पथ में
वक्त के साथ हों, समान्तर हों
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अस्मिता हस्तामलक करती है
पूर्ण वह छवि का मिथक करती है
उनका वैदग्ध्य औÓ भाषा, शैली
रचनाकारों को पृथक करती है
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लक्ष्य को बाण-बिद्ध करता है
जग को, खुद को समृद्ध करता है
मंत्र होते हैं किन्तु मंत्रों को
कोई बिरला ही सिद्ध करता है
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तुमको लग सकती है हर बार नया
हो नई सोच, हो व्यवहार नया
वैसे संसार है प्राचीन बहुत
है नई दृष्टि तो संसार नया
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उध्र्व उच्ध्वास ही नहीं होता
अश्रु-आभास ही नहीं होता
भोथरा हो गया क्या संवेदन?
सूक्ष्म अहसास ही नहीं होता
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आद्र्र होने भी नहीं देता है
होश खोने भी नहीं देता है
मुझ पुरुष का ही अहम् तो मुझको
खुलके रोने भी नहीं देता है
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मैं न इनकार, यार! करता हूं
क्यों यकीं बार-बार करता हूं
धोखा खाता हूं दोस्त से लेकिन
हर दफा एतबार करता हूं।।