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Thursday 23 Nov 2017

खोजता हूं जब किनारों पर

राघवेन्द्र तिवारी
ई.एम.- 33 इंडस राउन, राष्टï्रीय राजमार्ग- 12, भोपाल- 462047
मो. 09424482812
1

खोजता हूं
जब किनारों पर
भीड़ में मिलते
हजारों पर
बांह आकर थाम लेते ही
बहुत फुरतीली
समय की तितलियां

गंध घायल
पंख बेतरतीब होते ही गये
हम अकेले आकलक थे
बीज बोते ही गये

रास्तेभर जिन सहारों पर
उन ढलानों पर पहाड़ों पर
फसल-खेती चर गई सब कुछ
पड़ोसी बेचैन कुंठित बकरियां

कभी आने की वजह
बस एक सन्नाटा रही है
पत्तियों में बुना डाली
पर गया काटा, रही है

जिन्दगी अनगिन प्रभारों पर
जा बंटी थी चार तारों पर
किन्तु माथे पर लगाए हाथ बस
मौन गुमसुम सी खड़ी है खिड़कियां

2

समय गये
सोचा करते सभी
हमने भी बहुत कुछ
नहीं किया

नदियों को उत्तर की
ओर तक बहाना
सूरज को पश्चिम से
साल भर उगाना

या दिन के होने को
रात में
रख देते माटी का
एक दीया
आंखों के पानी
को तेल सा जलाना
सांस की हवाओं में
मुट्ठियां घुमाना
खुद के होने के
अहसास को
बतलाते गा-गा कर
मर्सिया
खाई को समतल तक
ऊंचा उठाना
ऊंचे पहाड़ों को
जमीं तक ढहाना
सचमुच कुछ भी
तो नहीं कर पाये
कर जाते सभाओं
में तखलियां

3

बासमती चावल सी तुम
महकती तुषार धवल
झील सदृश नील नवल
घेरदार पायल सी तुम

समयवृन्त दांत में दबाये
हलचल समेटती हवायें
बूंदों के सपनों को जोड़तीं
खोज रहीं अर्थ सभ्यताएं

विद्युत सी चाल चपल
फुदक रही कमल कमल
हंसिनिया घायल सी तुम
संध्या की सिन्दूरी गंध में
पल छिन डुबोये से छंद में
ऐसा क्यों भीग गया आंचल
शहदीली बांह के निबंध में

चंदन वाली चंचल
डूबी लाली-संदल
श्यामा तुलसी दल सी तुम

4

सुनो परम सुख!
सीमाओं में
रहते-रहते
मत जाना रुक
खाली घर सुनसान
गिरस्ती
रही अपरिचित
सारी बस्ती
सुनो परम सुख!
घर-गलियारे
कहते चलते
चुप बैठे दुख
यह कैसा आतम
परमातम
भीतर भी तम
बाहर भी तम
सुनो परम सुख!
बढ़ो निडर तुम
छोड़ो
धुंकपुक
आले में पुरजे
कबीर के
कुछ टुकड़े
चंदन अबीर के
सुनो परम सुख
पोथी पढ़ते
बैठे ठाले
मत पकड़ो तुक।
5

पर्वतों से टूटकर
बिखरी हुई हो
नदी तुम इस जगह क्यों
संकरी हुई हो
उधर भी घर द्वार था
ठंडा-ठिठुरता
पहिन गंदुम देह पर
मलमली कुरता
धूप में पीली हुई
कन्या-कुमुदिनी
की उजड़ती दूधिया
बखरी हुई हो
इधर जबकि पंथ
कंकरीला-कंटीला
ढूह-ढोहर, खाई-खंदक
गंवई-गुबरीला
तुम सहज ही गाछिनी
वन्या सहेली
वीथियों में फुदकती
बकरी हुई हो
तुम नदी, मैदान की
बेशक सगी हो
किन्तु धन की जेब में
जाने लगी हो
कुछ हमारे यहां
की आदत समझती
गांव के गुर्दे में क्यों
पथरी हुई हो।