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Sunday 19 Nov 2017

चकिया

मुस्तफा खान
गली नं-1, नारायण रास की बगिया,
रामदास घाटी, ग्वालियर-12 (म.प्र.)
चकिया

रात के तीसरे पहर
नींद तोड़ती चकिया की घरर-घरर
दो पाटों के घूमने से निकलती
बेसुरी घड़घड़ाहट के बीच
अम्मा और काकी के लोकगीतों की
सुरीली जुगलबंदी
चीरती सबेरे रात की खामोशी
उनींदे पलों में लगती लोरी सी

तिबारे के कोने में जमीं चकिया
रोज पीसती बाईस जनों की भूख
अंधेरे को दलती-सबेरा करती
अपनी पुकार से पास-पड़ोस के
चरवाहों, खेतिहरों, कामगारों को जगाती
काम पर होने तैयार
जूझने सूरज से दिन भर।

संस्कार

रोजाना तय वक़्त पर
जैसे ही गुरती कोई सवारी गाड़ी
खेत पर बनी झोपड़ी से निकलकर
हाथ जोड़ करता अभिवादन एक बूढ़ा

गाड़ी की खिड़कियों से झांकते मुसा$िफर
नहीं जानते उसे
न वह जानता किसी को
कुछ स्वीकारते कुछ कर देते अनदेखा
मंजिल की ओर दौड़ जाती सवारी गाड़ी

उस बूढ़े की, ये कोई नौकरी नहीं, जिम्मेदारी नहीं
सादगी है, संस्कार हैं
अजाने रिश्तों को निबाह रहा है वह!

अपनी दुनिया में तितलियां

कभी-कभी पहुंच नहीं पाते हम उन तक
कभी छूट जाती हाथों से वे
उंगलियों में लगा रह जाता कच्चा रंग
कभी टूट जाते नाजुक पंख
छटपटाता रह जाता नन्हा कीट
पकड़ से छूटने मचलता नाकाम

मेरे दोस्तो !
हमसे कहीं ज्यादा मासूम
हमसे कहीं ज्यादा नाजुक
बहुत नाजुक हैं तितलियां

सिर्फ देखो इन्हें बारिशों के मौसम में
फूलों, बेलसुटों के साथ चुहलबाजियां करते
उठते, बैठते, उड़ते
उनकी अपनी अलग दुनिया में।।

बेखौफ तितलियां

तितलियां उड़ती हैं, बेखौ$फ
जितनी चाहें उतनी दूर तक
जितनी चाहे उतनी ऊंचाई तक
जब चाहें तब
तितलियां उड़ती हैं, बेखौ$फ

वे नहीं जानती
ढूंढती हैं उन्हें किसकी निगाहें
चाहता है उन्हें किसका मन
कौन है उन्हें छूने, पकडऩे, लपकने को आतुर
वे यह भी नहीं जानती
कहां घात लगाए हैं छिपकलियां-गिरगिट

वे उड़ती हैं बेखौफ
छूने आसमान, हवाओं के संग
घटाओं के वास।