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Friday 24 Nov 2017

जिन्दगी

हेतु भारद्वाज
ए-243, त्रिवेणी नगर
गोपालपुरा, बाईपास,
जयपुर- 302018
मो. 09414752039
जिन्दगी

सुबह-सुबह
देखा मैंने-
सामने पत्थर की दीवार में
उग आई हैं हरी-हरी पत्तियां
हवा में नाच रही हैं मस्ती में
वाह ! जिन्दगी,
कहां-कहां छिपी रहती है तू?

योजना

1. बच्चा बहुत सुन्दर है
खूब फब रहा है उसके चेहरे पर
सुनहरा चश्मा
पता नहीं कब किसने तय किया?
चश्मा टिकाने के लिए
दो आंखों के बीच
एक अदद नाक चाहिए।

2. न डाल जानती है न पेड़-
कैसी पत्तियां लगेंगी
खिलेगा कैसा फूल?
चुपचाप, सब हो रहा है
कहीं कोई अतिक्रमण नहीं।

सप्त स्वर

सात सुरों से ही रचा गया है
विश्व का सारा संगीत
क्या कोई आठवां स्वर भी है?
मौन अंधेरे की सांय-सांय, अंधड़ की ज्हांय-ज्हांय
ज्वार की ढहांय-ढहांय
इन्हीं से निकलता है कोमल गांधार
और भैरवी का भैरव।

चलना

सब कुछ कितना तय है
सूर्य घूमता है अपनी धुरी पर
सारे ग्रह-उपग्रह घूमते रहते हैं
सूर्य के चारों ओर
संतुलन बनाए रखने के लिए जरूरी है चलना
अगर कभी हो जाए चलना बंद?
जाहिर है उसे नहीं कह पाएंगे
सद्गति।

पहेली

आज तक नहीं समझ पाया
मैं कहां होता हूं खत्म
तुम कहां शुरू?

प्यार

सही है आसमान बहुत विशाल है
मुझे तो आज तक नहीं लगा
कुछ भी बड़ा है
तुम्हारे प्यार जितना?