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Tuesday 23 Oct 2018

जलन और ताप

हीरालाल मिश्र

द्वारा- राजेश कुमार मिश्र
न्यू ब्लू प्रिंट मेडिकल स्टोर्स
पीरबाबा मोड़, पोस्ट- इंदा, 
खडग़पुर-721305, प. मेदिनीपुर
(प. बंगाल) मो. 09933941962

घनघोर अंधेरी रात में
वर्षा की क्रमश: बढ़ती बूंदों के भय ने
आदिवासी उस राहगीर को
जो हाट से लौट रहा था
भूखा-प्यासा
बाध्य किया
फूस की उस कुटिया में
रुकने को।
चिन्तित बूढ़ी आदिवासी विधवा मां
लाठी टेके बैठी थी
विकास-शून्य
दरवाजे के बीचोंबीच
बेटे की प्रतीक्षा में।
ठीक पीछे-
फटी साड़ी में शरीर को छिपाती
खड़ी थी
उसकी बहू-
निस्पन्द
बुत की तरह।
चावल के दाने उभर रहे थे
उस बुत के निस्पन्द,
अचंचल अन्तर्मन में।
फूस के छप्पर की बूंदे
टपटप कर
घर की धरती को छेद रही थीं
उनकी छाती कुरेद रही थीं
मरती भावनाओं को वेध रही थीं।
बिजली के क्षणिक प्रकाश में
वह आदिवासी राहगीर
कभी-
लाठी पकड़े बूढ़ी पर तरस खाता
भूल जाता
कि वह भी उनके ही गोत्र का है।
उनकी नियति में समानता है
अभाव का कष्ट ही
उन्हें भाता है
पर-
निस्पन्द काली परी को देख
आनंदित, पुलकित
सुध-बुध खो
भूख की ज्वाला भूल जाता
पता नहीं-
भूख की ज्वाला में अधिक जलन है
या
काम का ताप
अधिक शक्ति-सम्पन्न है।