Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

ताऊ जी से बात करवा दो

जवाहर गोयल
बी-6/11 अभ्युदय सोसायटी आनंदपुर कोलकाता- 700107
मो. 9831460917
ताऊ जी से बात करवा दो
आवाज भर्राई हुई थी भारी
मैं उसके गुस्से का अभ्यस्त था रोने का नहीं
फ ोन पर बिलखते कहा उसने
पापा ताऊ से बात करवा दो
दस हजार मील और सात समुन्दर पार से
सुनता चीत्कार का सन्नाटा मौन था झन्नाता
क्यों क्या हुआ तुझको ठीक है ना तू
क्या बात है बोल
पापा ताऊजी से बात करनी है
कल से सोचती थी तुमसे कहूंगी
ताऊजी से मेरी बात करवा दो
अच्छा नहीं लगता कोई नहीं है जो
बराबरी देता मुझसे बात करता
मुझे केवल उनसे बात करनी है

कुछ नहीं कहने का भार बढ़ता गया क्षण भर में
फोन दूरियों को दूनी दूर कर देता
छोडऩा चाहकर भी छूटी नहीं मेरी चतुरता
तुम उन पर मेरा लेख पढ़ लो
नहीं, मुझे उनसे बात करवा दो
तुम लेपटॉप पर उनकी तस्वीर देख लो
देख मन में उनसे बात कर लो
नहीं तुम बात करवा दो
यही हम सभी चाहते हैं
ताऊजी से बात कर लें
बात कर उनसे अपने मन की कह दें
कहता नहीं पर जानता हूँ कभी-कभी कहने से बढ़कर
कुछ नहीं होता
हममें हर कोई उनसे बात करने को
आपस में ही बात कर लेता
और वो जहां भी हैं वहीं से उसी तरह
अपने को भूल
पीड़ा में हमारी लहक छूकर
हमें दोगुन कर
हकलाते उत्साह से भर कह उठते
अरे वाह तुम
क्या खूब
पर ऐसी क्यों
और अपना हाथ धरते
गाल छूकर कन्धों पर
जब कुछ भला कर पाते लगता
हमने उनसे बात की है
तुम भी कुछ भला कर जानो कि
बेटी तुमने उनसे बात कर ली है

सारे दिन

सारे दिन बारिश रही
सारे दिन हवा चली
सारे दिन पेड़ झुके रहे
सारे दिन शाम थी
चिडिय़ा सारे दिन साथ रही


पानी

बोलना बंद किया पर
तब भी कहना जारी रहा
सुनने में बाधा था भीतरी कोलाहल
इसीलिए बाहर आ अँधेरे में
पत्तों पर झूमती बारिश को सुनता रहा
वहां पानी भिगोता घोलता धोकर सभी कुछ अपने साथ मुझको भी धरती में बहाता गया


अनुमान

पक्षी नहीं केवल पक्षियों की ध्वनियां और
अँधेरे में पक्षियों के होने के अनुमान
प्रात: के पूर्व प्रकाश के आने के अनुमान
नींद की कोरों पर स्वप्नों के होने के अनुमान
जागकर सोये रहे होने के अनुमान
अनुमानों में असल था अपने खोते जाने का ज्ञान

कुछ नहीं करते हुए

कुछ नहीं करने के समीप जाकर
कुछ नहीं करने से डरता रहा
सभी को सभी कुछ करते देखता था
सभी के सभी कुछ को बीतते भी देखा
फिर देखा पेड़, देखा आकाश, देखा प्रकाश
साहस बटोरता कुछ नहीं करने के केंद्र में गया

और बाहर आ बेचैनी से अपने को देखा
कुछ नहीं करते हुए सबको अपने बहुत पास-पास देखा

स्मृतियां

स्मृतियाँ धूप की
स्मृतियाँ प्रकाश की
स्मृतियाँ सड़क की
स्मृतियाँ आकाश की
स्मृतियाँ अनन्त की
स्मृतियाँ अवाक् की
बची रहतीं बचातीं
स्मृतियाँ अखंडित
अमूर्त और प्राणवान
शून्यता सींचतीं
एकांत को आलापतीं
संजीवनी सौंपती
स्मृतियां विश्वास की

समय जब पत्थर हो जाये

समय जब पत्थर हो जाये
हमें नदी होना चाहिए
रुके बिना बहते