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Monday 20 Nov 2017

रिश्ता


सुरेश शॉ
8, पॉटरी रोड, कोलकाता-700015
मो. 09163707510
सोये-सोये अचानक उसकी दोनों आंखों में आंसू की एक-एक बूंद ढुलक आई थी। उन्हें त्वरित पोंछ लिया, क्योंकि किसी भी कीमत पर वह भावुक होना नहीं चाहता था। डर था कि उसके पत्थर दिल और निष्ठुर स्वभाव को कहीं आघात न लग जाए।
आदमी अंतत: खुद के फॉर्मूले पर ही अपना जीवन जीना चाहता है ! अपनी आत्म-तुष्टि के एवज में दूसरों की परवाह वह भला क्यों करे! राजेश्वर भी पूरी तरह से निर्दयता की जिन्दगी ही जीना चाहता था; किसी भी हाल में भलमनसाहत की नहीं।
25 मार्च 2010 हां, यह वही तारीख है जिस दिन राजेश्वर के बाबू का निधन हुआ था। उस रात तकरीबन डेढ़-दो बजे मोबाइल की आवाज क्रमश: गूँज उठी थी- ''चल छंइयां-छंइयां-छंइयां-छंइयां; चल छंइयां-छंइयां-छंइयां-छंइयां।ÓÓ
बड़े अरमानों से उसने मोबाइल का एक महंगा सेट खरीदा था और उसी अरमान-उत्साह से उसमें- 'इश्क की छांव चले छंइयां-छंइयां... का रिंग टोन सेट करवाया था, पर राजेश्वर के इस शौक का ज्ञान उसके गँवार भतीजे परशुराम को कहाँ था कि छंइयां-छंइयां- का मधुर स्वर ए.सी.की हवा में सोने वाले उसके शहरी चाचा की नींद को हराम कर देगा।
मोबाइल की आवाज सुनकर वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसे लगा कि सुबह-सुबह उठाने वाली अलार्म ध्वनि उसे जगाने के लिए बार-बार ध्वनित हो रही है। लेकिन 'हेलो- के प्रति उत्तर में सिर्फ एक करुण और रुआंसापूर्ण कंठ-स्वर फूट पड़ा- ''बाबा अब इस दुनिया में नहीं रहे।ÓÓ
इतना भर सुनना था कि राजेश्वर के अन्दर की चिढ़ एकबारगी भड़क उठी। मन में आया कि उससे कह दे ''हरामखोर, यह भी कोई वक्त है किसी भले आदमी को नींद से जगाने का? बड़ा चले दु:ख जताने वाले पोता-बाबा अब इस दुनिया में नहीं रहे। हँ !ÓÓ
उसके भीतर का अंधापन हठात् बाहर झांकने लगा और उसे सर्वत्र अंधेरा ही दिखाई पडऩे लगा। अत: वह किसी भी कीमत पर कुछ अच्छा विचारने के मूड में नहीं था। वह बिल्कुल भूल गया कि अपने 'प्यारे बाबाÓ के शव को देखकर परशुराम पर क्या गुजरी होगी! अपने दु:खों को कम करने के लिए वह कितना छटपटाया होगा। शायद सांत्वना का एक कतरा भर पाने के लिए ही उसने अपने चाचा से इस आधी रात को बतियाना चाहा होगा। उसे संभवत: यही लगा होगा कि ऊंची इमारत की ग्यारहवीं मंजिल पर रहने वाले उसके चाचा का दिल कम से कम एक सौ ग्यारह मंजिल वाला होगा। पहले जैसे ही वे आज भी उदार, सहृदय और गँवई मानसिकता के मानुष होंगे।... और फोन पर अपने पिता के मरने के इस दुखद संवाद को सुनते ही उनकी लाश को कंधा देने जरूर अपने गाँव चले आएँगे।
मार्च 2010 के बाद के इन वर्षों में राजेश्वर को न बाबू की याद आई है, न सालों पहले गुजर चुकी अपनी माई की। पर न जाने क्यों आज उसकी आंखों में पिता की एक फडफ़ड़ाती-सी तस्वीर की चमक अचानक कौंध गई। फलत: दोनों नयनों के कोरों से आँसू की एक-एक बूंदें अनायास ढुलक पड़ीं।
उसकी पत्नी, बेटी को साथ लिये बनारस चली गई थी। ऐसे में इस बात का डर उसे कतई नहीं था कि उसकी आँखों में आंसू देखकर उसकी पत्नी रमा बेचैन हो उठेगी और उसके उदासी के काले बादलों को छाँटने के लिए उसके ललाटों को चूम लेगी। या फिर उसके बिखरे काकुलों में अपनी उंगली घुसेड़ कर कंघी करते-करते कहने लगेगी, ''राजेश्वर, मैं तुम्हारे हर दु:ख में समान रूप से सहभागिनी हूँ। बस, तुम कभी दु:खी न होना, उदास न होना, आंसू न बहाना और अपने आपको अकेला भी न समझना।ÓÓ
क्रूर और क्रूरता दोनों जब किसी शर्तिया रेस के शिकार हो जाते हैं, तो उनके आजू-बाजू में क्या हो रहा है, वे इससे बिल्कुल अनजान बन जाते हैं। अनजान ही नहीं; बल्कि वे अपनी दोनों आंखें बन्द कर लेते हैं, जबकि सब कुछ उन्हीं के सामने घटता चला जाता है।
राजेश्वर से इतना भी नहीं हुआ कि रोते-बिलखते परशुराम को सांत्वना के दो शब्द कहकर उसके गहरे दु:ख-दर्द को रत्ती भर कम कर दे। हाँ, उसे याद आ रहा है कि उसने आदेश देने जैसा ही कहा था, ''जाओ, जाकर अशर्फी, जोधा, दुलारे, मगरू (पड़ोसियों) को जगाओ और मुर्दा घाट जाने की तैयारी कर लो।ÓÓ
इसके बाद उसने झट से मोबाइल का स्वीच ऑफ किया और बड़बड़ाने लगा -''ले, कर तू फोन ससुरे ! देखता हूं कौन सुनता है तेरे फोन की आवाज को ! बड़ा दु:ख जताने चले थे-बाबा अब इस दुनिया में...।ÓÓ
इतना सब करने के पश्चत् वह पुन: सोने चला गया और निश्चिंत भाव से गहरी नींद में डूब गया, लेकिन नींद में उसके साथ भी वही हुआ, जो प्राय: जमाने भर के लोगों की नींद में हुआ करता है। जितनी गहरी नींद उतने ही गहरे रंग के बेतरतीब व अटपटे सपने। गाछी वाले खेत में हल जोतते बाबू के लिए रोटी और पानी लेकर वह पहुंचा है। खेत के पास खड़े सुकुल आम की छांव में बैठा वह इस ताक में है कि कब उसके बाबू खाने पर जुटें और वह बैलों को हांकते हुए हल चलाने लगे।
एक शाम, लोटा लिये दिशा-मैदान को जाते, किसी प्रेत-छाया को देखकर वह डर गया था। उसी उद्देश्य को उस दिशा में आए उसके पिता ने जब उसे हनुमान चालीसा की पंक्तियां दुहराते सुना तब उसे मौजूदा भय से उबारने के बजाय वे डांटने और धिक्कारने लगे थे- ''राजपूत का लइका भूत से डरता है, छि:।ÓÓ
''राजेसर, उठ जल्दी कर। चल, भकुरा भी_ी ईस्कूल में नाम लिखाने चलना है।ÓÓ उसके सपने का एक एपिसोड यह भी था। राजेश्वर के 'बाबूÓ ही उसके मां-बाप, सब कुछ थे।
इस क्रम में उसकी आंखें एक दफा खुलती हैं और दूसरी दफा बंद हो जाती हैं। लेकिन फिर वही सपना कि राजेश्वर को साइकिल के कैरियर पर बिठाकर उसके बाबू बनियापुर के मेले से बैल खरीदने जा रहे हैं। आज शिवरात्रि का दिन है। नहा-धोकर बिना कुछ खाये पिये बाप-बेटे साथ-साथ शिल्हौरी जा रहे हैं। पहले शिव जी पर जल चढ़ा लेंगे, फिर कचौड़ी-जलेबी उड़ाएंगे।  फ़ाज़िल  समय रहा, तो वे मढ़ौरा जाकर 'गरदेवी माईÓ के भी दर्शन कर आएंगे।
उस रात अनगिनत सपने उसकी आंखों के परदे पर किसी चलचित्र के दृश्य की तरह आ-जा रहे थे। किन्तु सच यह था कि ये केवल सपने थे। अच्छे-बुरे सपने। वही राजेश्वर था कि वह इन्हें देखता जा रहा था और देख देखकर भूलता भी जा रहा था। क्योंकि वह नहीं चाहता था कि इनका एक भी कण सच बनकर उसकी प्रगति की राह में अवरोधक बने। इसलिए बड़ी सख्ती से वह उन्हें भुलाए जा रहा था।
सिलसिलेवार उसे याद आया, स्कूली शिक्षा के बाद वह छपरा के जगदम्बा कॉलेज में पढऩे चला गया था। उसके बाबू की मनोकामना थी कि उनका राजेश्वर पढऩे के लिए जिस नगर-महानगर में जाना चाहे जाए। इसके लिए 'धुर-धुरÓ खेत बेचने को तैयार थे उसके बाबू। वे कहा भी करते थे ''राजेसर की पढ़ाई की खातिर हम कहां पीछे हटने वाले हैं कभी।ÓÓ
अच्छी पढ़ाई का फल अच्छी नौकरी। ऊंचा पद और दफ्तर का बड़ा अधिकारी। पोजिशन के अनुरूप उसके गंवई परिवेश में पूरी तब्दीली, विचारों में पूर्ण परिवर्तन। ऑफिस में धाक, बुद्धिजीवी होने का सम्मान, ऑ$िफसरों का-सा व्यवहार। एक देहाती कहावत अपने देश में खूब प्रचलित है- ''बेटे को पढ़ाओ-लिखाओ, नहीं तो शहर में बसाओ।ÓÓ
बुधन बाबा के राजेश्वर ने इन दोनों ही सांचों में अपनी जगह बना ली थी। वह पढ़ा-लिखा तो था ही; शहर के एक सरकारी दफ्तर का उच्च अधिकारी भी था। अब उसके परिवेश के साथ-साथ बात-विचार, हाव-भाव और बुद्धि-विवेक में भी पूरा बदलाव आ गया था। उसके मातहत कार्यरत कर्मचारी उसे 'बड़ा बाबूÓ ऐसे ही नहीं कहा करते! उसने अपने को बड़ी मेहनत और चुतराई से इस शब्द के समानांतर ला खड़ा किया था।
वह जानता था कि मरने के बाद कोई जीव जन्नत नहीं जाता, क्योंकि जन्नत-वन्नत कुछ होता ही नहीं। जन्नत की कल्पना एक कोरी कल्पना मात्र है। जो भी हो, इन्हीं सीधी-पेचीदी राहों पर भटकते-भटकते वह कब इतना कठोर और निष्ठुर बन गया, उसे स्वयं पता तक नहीं चल पाया। वह कहता है- मरी देह को पशु-पक्षियों के सामने डाल देना चाहिए। इसे खाकर वे कुपोषण के शिकार भी नहीं होंगे और उनकी प्रजातियां भी लुप्त होने से बच जाएंगी।
जागृत अवस्था में हम अपने आचरण को लेकर जबरन चाहे जो कर लें, परन्तु आंखों में जब बेतरतीब-अटपटे सपनों की रील चल रही हो, तब न जाने कब उन्हीं में से कोई एक दृश्य हमारे हठी स्वभाव के विरुद्ध अपना वर्चस्व जमाने में कामयाब हो जाता है और हमारा अनोखापन धरा का धरा रह जाता है।
स्वप्नलोक में ही सही, किन्तु कुछ ऐसे ही भाव धीरे-धीरे राजेश्वर की आत्मा में घर करने लगे। ऐसे में, परिस्थितियों का मारा राजेश्वर बेचारा जागते हुए भले निष्ठुर और कठोर बन सकता था, लेकिन सुप्तावस्था के हर क्षण में वह अपनी आंखों से आंसू की दो बूंदें ढुलकाने को बाध्य था।