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Thursday 23 Nov 2017

कस्तूरी

पूनम मिश्रा

डी 39, सीरी कॉलोनी, पिलानी; राज.333031 मो. 09829338092
डफर कहीं के, डॉक्टर क्या खाक बनोगे? सदा चूल्हे-चौके में व्यस्त मां के ममतामयी हाथों को लिवर, दिल, अंतडिय़ों में उलझे देख बच्चे हैरान थे।
इयाक्..मुझे उल्टी आ रही है... चेहरे पर जुगुप्सा भाव लिये पुलक बोला।
ऑब्जेक्ट राना टिग्रीना यानी मेंढक, उल्टे हवाई चप्पल पर पंजों में चुभे कीलों के साथ, चारों खाने चित्त चीरा-फाड़ी के लिये समर्पित भाव लेटा पड़ा था। पढ़ाई को अलविदा कहे इतने वर्षों बाद भी मेंढक की एनाटॉमी समझाते हुए शैली के हाथों में कंपन जऱा भी नहीं।
केमिस्ट्री, बॉटनी, जुलॉजी..इतनी कठिन पढ़ाई, आखिऱ किसलिये मम्मा? ये अब आपके किस काम की? पुलक ने माँ का पल्ला खींचा।
शिक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती बेवकूफ.. हाथ धोती शैली बोली।
और कहीं काम आती तो दिखती नहीं, न कुकिंग, न निटिंग में.. केया बीच में कूद पड़ी।
मैं बताऊं..आपकी सारी पढ़ाई हमें पढ़ाने में खर्च हो रही है.. है न मम्मा?
बेटी ने क्या सोच ऐसा कहा पता नहीं, पर शैली बुरी तरह खीझ गई। पंद्रह साल पहले, हूबहू ऐसे ही मंतव्य किसी और के मुखारविंद से फूटे थे। प्रयोजन खिझाना तब भी नहीं था, लेकिन वह तब भी चिढ़ी थी। चिढऩ भांति-भांति प्रकार की होती हैं, कुछ वक्त के साथ मौल जाती हैं, कुछ ऐसी बेशरम कि खूंटा गाड़े आजीवन अवचेतन में धंसी रहती हैं। वैसे इसका जिक्र शैली ने कभी किसी से नहीं किया। फिर उन्हीं शब्दों का दोहराव ये बच्चे....कैसे?
सच...कुछ भी तो नहीं बदला, न गीली मिट्टी की गंध, न यादों में बसी फॉर्मलीन की दुर्गंध, कुछ भी नहीं...कुछ बातें मन के आंगन में इतनी गहरी दबी रहती हैं कि वक्त चाहे कितना भी बीते, मिटने नहीं देतीं। बिल्कुल जीवाश्म की तरह। सच तो यही है कि एहसासों की पुनरावृत्ति को ही जीते हैं हम। अहम् और अस्तित्व को हॉन्ट करने वाली बातें लौट फिर के कहीं न कहीं आपसे टकरा ही जाती हैं, बारहा आप छिटकते फिरें। शैली मेंढक को दफनाने के लिये ज़मीन खोदती है। गड्ढे में जितनी मिट्टी पूरी, स्मृतियों की आवृत्तियाँ उतने ही शिद्दत से घूर्णन करने लगीं। जिसमें सबसे गाढ़े रंग की तसवीर उभरी उस अजनबी की..निर्लज्ज...ढीठ सी।
फाइनल ईयर की परीक्षाएँ सिर पर सवार थीं। विद्यार्थियों के पागल होने के दिन। साल भर किसी केमिकल को हाथ नहीं लगाया? लो अब छू लो, सूँघ लो, चाट लो...और नहीं तो...जाने प्रैक्टिकल में कौन सी पुडिय़ा थमा दी जाए। अभी तक एक भी डाईसेक्शन (चीरफाड़) नहीं किया? तो ये लो मेंढक, मच्छी, केंचुआ, कॉक्रोच, चूहा सब पर हाथ आजमा लो। वो जमाना और था, आज की तरह नहीं कि सारा कुछ किताबी रटंत, तब बाकायदा जन्तु जानवर प्रयोगशालाओं में काटे जाते।
स्टूडेन्ट्स फॉर्मलीन की गंध सूँघते बेहोश होने तक काँपती टाँगे लिये लैब में घंटों ऐसे बिताते जैसे सब मेघनाद साहा, हरगोविंद खुराना बनकर रहेंगे। हे प्रभु, इतने छोटे जीव। फुदकते हुए कैसे प्यारे लगते हैं न? पर दिखता है किसी को, कितने औजार-पाँती ठुँसे पड़े हैं भीतर? ग्रीवा से लेकर पुच्छ दण्ड, हड्डियों के अनंत-क्लिष्ठ नाम। ईश्वर के सहस्र नामों से ज्यादा श्रद्धा पूर्वक उन नामों की घिसाई होती। एक शब्द भी छोड़ा, मतलब गए काम से। ऐसे अनंत-अथाह कोर्स से निबटने का क़ारगार तरीका शैली ने ढूंढा था-लाश उठा लो।
जिस उम्र में लड़कियों को जेवर या महंगे प्रसाधन सामग्री चुराने का शौक हुआ करता है, उस उम्र में शैली लाशें चुराने लगी थी। यदि डॉक्टर लाशों के बीच सो सकते हैं, तो वो स्पेसीमेन फ्र ॉग के साथ शाम नहीं बिता सकती? अल्फ्रेड हिचकॉक की मर्डर मिस्ट्री से ज्यादा रोमांचक था फॉर्मलीन में डूबे मेंढ़क की अकड़ी लाश उठाना। केशों से पतली तंत्रिकाओं, आंख की नाडिय़ों, कर्ण पटल की बारीक चीराफाड़ी तसल्ली से करने के बाद वापस कॉलेज ले जाकर फॉर्मलीन में डुबो देती, मजाल कि चोरी पकड़ी जाए। एक शाम घर लौटते हुए एक हाथ समोसा, एक हाथ बस्ता थामे भागती हुई बस पकड़ रही थी कि चोरी पकड़ी गई।
शैली.. किसी नौजवान स्वर ने पुकारा था।
ये आईटम आपका है? शैली ने बैग चेक किया। ओ गॉड..उसका आईटम वाकई मिसिंग था। चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ वो खड़ा था एकदम सामने। आस-पास बैठे लोग नाक-भौं सिकोड़ दूर खिसक लिये, सिवाय उसके। स्पेसीमेन फ्रॉग की लाश पर अपना नाम लिखा देख मारे शर्मिंदगी के थैंक्स भी न कह पाई।
पहले आप नाश्ता कर लें.. शैली का बैग और मेंढक हाथ में पकड़े वह साथ वाली सीट पर बैठ गया। शैली कॉलेज के सामने से बस पकड़ती और वो कहीं पीछे से आता था।
आप सोच रही होंगी, नाम मुझे कैसे पता, है न? पहले शर्मिन्दा फिर अचंभित किया।
मेंढ़क पर लिखा है। शैली किसी मेंढक का नाम तो नहीं हो सकता न? ओह... मूढ़मति सी समोसा चुभलाती उस बन्दे को ताकती रह गई थी।
जीवविज्ञान के सारे विद्यार्थी एक-एक जीव के हत्यारे होते हैं? मुलाक़ातों की भी अपनी गति होती है..द्रुत, मद्धम, विलंबित। सिलसिला चल पड़ा, द्रुत मुलाक़ातों में ज्ञानवद्र्धन का। भलामानस शैली के लिये रोज सीट रोके रखता।
एक क्यों? जाने कितने जीव, कीट-पतंगे, सरीसृप..उसकी जिज्ञासाएँ अनंत होतीं। सारे समय प्रश्नों का भिंडी बाजार लिये डटा रहता।
इन मासूमों को बेवजह मारना..ये पाप नहीं? वह कौन है, क्या करता है, कहाँ से आता और कहाँ चला जाता है, कुछ पता नहीं।
नहीं, बिल्कुल नहीं। विज्ञान के शोध, मानव विकास के लिये जरूरी है...
क्या बग़ैर जीव हत्या के शोध संभव नहीं.. शैली निरुत्तर। जब तक उसकी बारी आती, वो यह जा वह जा।
जीव-जन्तु, वनस्पति का इतना वृहत् ज्ञान..इस ज्ञान को कहां जाकर सद्गति मिलेगी? निस्संदेह उसकी वाक्पटुता, हाजिर जवाबी से वह प्रभावित थी। किंतु इस प्रश्न ने अभिमानी, प्रगल्भ शैली को आहत किया। होगा क्या...अपना ज्ञान लिये कुँए में कूदूँ या पेड़ पर लटकूँ तुमसे मतलब?
ज्ञान चाहे जैसा हो, कभी जाया नहीं होता। ये मगजमारी यूं ही व्यर्थ चली जाएगी? उसने खीझा जवाब दे दिया।
नहीं व्यर्थ क्यों जाएगी। इन्हीं हत्याओं के बदौलत आपको डिग्री मिलेगी, डिग्री के बदौलत शादी, शादी के बाद बच्चे और फिर...ये ज्ञान अपने बच्चों को पढ़ाने के काम आएगा न? भीड़ में बेतकल्लुफ़ ठहाके गूंज गए। सांप और स्त्री पलटवार करने का मौका नहीं चूकते। इस बनतू की क्लास लेनी होगी। जब सुनेगा कि ज्ञान न शक्ति से छीना, न अधिकार या रिश्वत से हड़पा जा सकता है। विद्या और विज्ञान कभी नष्ट नहीं होते। न किसी लिंग विशेष का, विषय विशेष पर आधिपत्य होता है। तब सारी हेकड़ी निकल जाएगी। जिसके लिये इतना खपना पड़े, उसे यूँ ही जाया होने देगी? अभी तो कितनी मंजि़लें, कितने आकाश छूने हैं.. मुंहतोड़ जवाब लिये कई दिन इंतज़ार में बीते, पर बंदा नजऱ नहीं आया।
फिर एक दिन कॉलेज के सामने एक मोटर बाईक रुकी और उसे ताका जाने लगा, जनाब जिज्ञासु ही थे। शैली ने देखा-अनदेखा किया। अजीब ढीठ है, पहले गुस्सा दिलाया अब लाईन मार रहा है? शैतान। शैली, बस में जा बैठी। फटफटी का रुकना, एक जोड़ी आँखों में आग्रह और दूसरी में अवहेलना का क्रम सात दिन चला। सोचती है शैली, आज का दौर होता आशिक की एक सॉरी, एक कॉफी, एक चॉकलेट और लड़की फि़दा...लपक के जा बैठेगी पीछे, चिपक कर। लेकिन वो युग ही और था। लड़का चार फेरे लड़की के गिर्द लगा ले, हवा में सरग़ोशियाँ तैरने लगतीं। अंतत: सातवें दिन अबोला टूटा।
सड़ी-गली लाशों के संग रह लेती हो। जिंदा से इतनी हिक़ारत? काँटे लगे हैं मुझमें? भलामानस शुभचिंतक निकला।
अब बैठो भी। सुरक्षित घर पहुँचाने की गारंटी... शैली अपने ताने-बाने समेटती गठरी बनी ऐसे बैठी, कि कहीं से कुछ छू न जाए। किन्तु उसमें से होकर आती फर-फर हवा ने रोम-रोम उगा दिये। कानों में अजीब झनझनाहट...जैसे हजारों झींगुर बोल उठे हों। फिल्में देख-देख किशोरवय में उसमें भी कल्पनाएँ जागी थीं, किसी मोड़ पर कोई मिल जाए तो उससे कहें कि - आ...क़ायनात बाँट लें, तू मेरा...बाकी सब तेरा...दिमाग में पहली दफ़ा आकर्षण ने सेंधमारी की थी, सारे किताबी कीड़े और दिमागी जाले साफ... यौवन से मुख़ातिब होने का पहला मुख्तसर मौका। इस मौके को हाथ से ऐसे कैसे जाने देती। नाम, गाँव-ठाँव पूछा तो कंपनी का बैज दिखा दिया मार्केटिंग और खानाबदोशी, यही है अपनी जि़ंदगी, क्या करोगी जानकर...।
विद्यार्थी का प्रबल शत्रु होता है, जो परीक्षाकाल में उच्चाटन दे जाय। किंतु उस उच्चाटन से अधिक दाहक थी वह प्रतीक्षा। प्रगल्भ शैली दिनों, महीनों हर फटफटी को ताकती रही, पर उसे नहीं आना था, नहीं आया।
वर्षों पुराना वाकय़ा, नागफनी का काँटा निकला। महीन किन्तु जहरीला। सुई लिये जूझते रहिये न किरचन निकलेगी, न फाँस। पर क्या फर्क पड़ता है, सोचती है शैली। जो बातें कभी जीने मरने का सबब हुआ करती थीं आज औचित्यहीन, आई-जाई सी लगती हैं। वक्त किसी के लिये नहीं रुकता, न कोई मोहलत देता है। वह तो बना ही है काटने के लिये। गुजश्ता वक्त के साथ स्त्री के जीवन की प्रासंगिकताएँ, प्राथमिकताएं बदलती चली जाती हैं। तभी तो...न वह कुँए में कूदी न पेड़ से लटकी। एमएससी जीव विज्ञान की डिग्री पर वर्षों की धूल लिये गृहस्थी की चारदीवारी में गोल-गोल रानी इत्ता-इत्ता पानी, करती घर-घर खेल रही है। अपने को व्यस्त, मस्त और अपनी अभ्यस्त हुए बैठी गृहिणी गृहमुच्यते को सार्थक कर रही है। लेकिन बच्चों के मुँह से वही प्रश्न...अनमनस्यता हदें पार कर गई।
वह इस मुग़ालते में कभी नहीं रही कि दस से पाँच की कलफ लगी साड़ी वाली स्त्री ही सर्वसुख संपन्न है। या फिर कि गृहस्थी के खटरागों से उसे नफरत है। नहीं कभी नहीं। पति, बच्चे, घर उसे भी प्यारे हैं, घर की धुरी है वो। फिर भी मंद बुद्धि बालक की भांति बार-बार ख़ुद को समझाइश देने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्यों रोजाना गुदगुदे नर्म बिस्तर पर सपनों की तलाश में नींद रूठ जाती है? क्यों अपने बनाए व्यंजन छोड़ भूखी उठती है? महंगे परिधानों में खुद को बदसूरत देखती है। मातृत्व, गृहस्थी की गधाखटनी और मिसेज सो एंड सो के कोलाज़ के बीच वही कहीं गुम है। कॉलेज वाली निद्र्वन्द्व, अखंडित शैली कहां खो गई। किससे कहे अपनी अकुलाहट? दुनिया कहेगी चार आखर पढ़ लिया, संतन को दुख दे दिया... क्या पागल औरत है, खुद को अफलातून समझती है? और क्या चाहिये औरत को? ख्वाहिशों के सारे अलंकरणों से सजी है। स्नेही पति, मेधावी बच्चे, वाहन, पांच सौ चैनल वाला टीवी, फिर भी सघन असंतोषी स्वभाव पैबस्त क्यों रहने लगा है? दुनियावी ताम-झामों के बीच भी उसमें एक अधूरापन पोशीदा है। पानी में नीर पियासी...क्यों अपने आह्लाद, अपनी परिपूर्णता और मैं के बीच किसी सेतु का निर्माण न कर पाई? गलत नहीं कहा था उसने कि कहां जाकर सद्गति मिलेगी इस डिग्री को? किसने कहा कि डिग्रियों के बड़े-बड़े झूमर लटकाओ? कि ज्ञान का अजीर्ण पालो, और जो मिल जाय उस पर ज्ञान वमन कर अफारा मिटाओ? कि अपने सुख वहाँ टांग लो जहाँ हाथ पहुँचने नामुमकिन हों..? यह जुमला इग्नोरेंस इज़ ब्लिस.. यानी अज्ञानता परमानंद है, कितना सही है।
अमूमन हर शाम वह तैयार होती है। लेकिन आज अतीत की प्रदक्षिणा ने ऊब को बढ़ाने में उत्प्रेरण का काम किया। कबीर ने फुदकते हुए ऐलान किया-कंपनी के काम से मार्केटिंग का कोई बंदा आया है..चाय पर बुला लिया...जनाब आप ही के शहर से हैं... लो जी। मरे पर दो लात और...बेतरह खिझिया गई।
सात लाख की आबादी वाले मेरे शहर से ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा कोई आए, आप नोत लेंगे?
आज घर का माहौल बदला सा है। बारामदे में पोस्टमार्टम की सुसायन गंध, अस्त-व्यस्त बैठक, अनमनाई गृहणी। मिनटों में कोढ़ में खाज सा बेनाम मायके वाला उपस्थित हो जाएगा। जाने कौन चिपकू है, जो पुरानी पहचान निकाल लद रहा है? शैली मात्र चाय ही बना पाई। उसके मूड की तरह किचन में भी पतझड़ का मौसम है। यूं भी अतिथि और रसोई में पुराना बैर है। जिस दिन अतिथि का अकस्मात आगमन होना होता है, किचन को सूडान-ईथोपिया बनने का शौक उसी दिन चर्राता है। चाय, बिस्किट रख औपचारिक अभिवादन कर वह मुड़ी, कि आगन्तुक की आवाज ने चौंकाया-हलो शैली जी..
आप...? हे भगवान, आदमी है या प्रेत? आज ही मेरे भीतर रेंग रहा था, साक्षात् खड़ा है। पंद्रह वर्षों बाद उसे यूँ देख रही थी जैसे कोई आतंकवादी हो।
देखा.. अति उत्साही कबीर उछल पड़े-मैंने कहा था न, तुम जरूर जानती होगी। पतियों की प्रसन्नता भी अजीब होती है, ऐसे जैसे स्वाति नक्षत्र की फुहार। आवश्यकता पडऩे पर नहीं बरसेंगे, जब नहीं होगी तब जरूर बरसेंगे। प्रस्तर बनी वह सामने बैठी रही, सतर्क, चुप, कि कुछ कहने में कौन से अर्थ-अनर्थ निकल आएं? एक और तनाव, कहीं फिर अपने प्रश्नपत्र का सबसे मुश्किल सवाल, जो आज भी यक्ष प्रश्न सा मुंह बाएं खड़ा है, का स्यापा ले बैठा तो?
जीवन तब और अब। कितना कुछ बदल गया। दो कालखंडों के बीच उसका हृदय..एक यौवन से परिचित करवाने वाला, दूसरा उसके यौवन का स्वामी..दो पुरुषों के बीच सैंडविच बन कैसे तो धड़क रहा है। पति व्यावसायिक बातों में उलझे थे। किन्तु आश्चर्य जिज्ञासु महोदय महज हां-हूँ में वार्तालाप निपटाते रहे। परन्तु शैली की उचाट दृष्टि किसी और तलाश में व्यस्त। रचयिता ने स्त्रियों को अद्भुत अंतदृष्टि दी है, जो पुरूषों से ज्यादा गहरी होती है। शैली देखती है, अब वह पहले जैसा नहीं रहा। प्रज्ञा, मेधा, हाजिरजवाबी, जिज्ञासु और हँसोड़ प्रकृति को जैसे पाला मार गया हो। एक बच्ची है। बोर्डिंग स्कूल में..पत्नी दूसरे शहर में प्राध्यापिका हैं।.. फिर एक लंबा चुप।
मैं आज भी नितांत अकेला ही हूँ, इन्हीं के शहर में...शैली की ओर इशारा करता है।
पत्नी का कहना है इतनी पढ़ाई, मेरी तपस्या घर बैठे व्यर्थ जाने दूँ? बिना अर्धविराम, पूर्णविराम बदले हूबहू उसी वाक्यांश को दोहरा दिया। पर इस बार भाषाई संकेतों का लक्ष्य शैली को आहत करना नहीं था। उसके चेहरे के आते-जाते भावों को देखकर शैली कहीं खो गई। शैली, ये जा रहे हैं।...पति ने टोका।
थके कदमों वह लौट रहा था..कभी अपने शहर आएँ तो हमारे मकान पर आइये..हम तीन प्राणी देश के तीन कोनों में रहते हैं। मैं अकेला ही हूँ सो उसे घर तो नहीं कह सकता। फिर भी...मुझे अच्छा लगेगा।..
शैली जी, कुछ याद आ रहा है.. वह वापस मुड़ा।
आपने यही कहा था न कि शिक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती...सही कहा। आप अकेली दोनों बच्चों को शिक्षित कर रही हैं, आपकी तपस्या सफल रही। हम दो शिक्षित माता-पिता मिलकर अपनी बच्ची के लिये कुछ नहीं कर पाए। ज्ञान का जाया होना सच्चे अर्थों में इसे ही कहते हैं।...भ्रांतियों की कुहेलिका से निकाल, मन की कस्तूरी से परिचय करवाने वाला अजनबी ओझल हो रहा है। जी में आया रोक ले, पूछे कि..उसके भीतर भी कुछ वैसा ही घटा था, जैसा उसके भीतर। पर चुप लगा गई, क्योंकि जब अपनी जमीन पोली हो तो दूसरों की खुदाई से क्या हासिल? पैरों तले की जमीन पिलपिली है, तभी तो मुर्दा मेंढ़क दफनाते वक्त पता नहीं कितने गड़े-मुर्दे खोद डाले अनर्गल.. कस्तूरी के मृग ज्यों, फिर-फिर ढूँढे घास... क्या खुशियों का पैमाना शेयर बाज़ार है, जिसे कैरियर और पैसों के ग्राफ से नापा जाए? भीतर के उथले सोचों को ज़ोर से दाबती है और फेफड़ों में ऑक्सीजन खींचती हुई तनकर खड़ी होती है, परिपूर्ण शैली पुन: ऊर्जस्वित...।