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Saturday 18 Nov 2017

छिन्नमूल


पुष्पिता अवस्थी
निदेशक हिन्दी यूनिवर्स फाउंडेशन, पीओ
बाक्स-1080, 1810 के बी अलकामार, नीदरलैंड्स
18 सितंबर, ऑपरेशन हुआ। मरीजों के बेहोश होते ही ऑपरेशन थियेटर होश में आ जाता है। रोशनी जाग उठती है। ऑपरेशन कक्ष से जुड़े सारे विभाग काम करने लगते हैं। डॉक्टर और नर्सों की सांसें जीवन बचाने में लग जाती हैं। सन्नाटे के बीच सिर्फ डॉक्टर सोहन के संकेत बोल रहे थे। रोशनी के भीतर सिर्फ आंखों के इशारे पहचाने जा रहे थे। गायनोकोलॉजिकल केस के ऑपरेशन में प्राय: स्त्री को सौगात के रूप में उसकी छाती से लगने के लिए नवजात शिशु मिलता है। उस उत्साह में स्त्री की छाती प्रसव और ऑपरेशन की पीड़ा झेल लेती है। लेकिन ललिता के लिए यह ऑपरेशन दो चिपकी हुई नलियों को अलगाना और गाँठ निकलवाना था। अस्पताल के कमरे में उसे लगता है जैसे उसकी अस्पताली सफेद चादर के भीतर अंधेरा सो रहा है। समय अंधेरा बनकर उसके कमरे में ठहर गया है। घड़ी की सुइयाँ ही जैसे कहीं अटक गई हों। दिन का उजाला आँखों की रोशनी नहीं बन पाता है। तारीखें उसकी हथेली में हस्ताक्षर किए बगैर गुजऱ जाती हैं। सपने भी आँखों का रास्ता भूल गए हैं। जब-तब आंखों में रह-रहकर आँसू छलक आते हैं। ललिता के लेटे रहने के कारण दोनों आँखों से रिसते हुए आँसू कान में इक_ा होते रहते हैं, ललिता को लगता है जैसे उसके दोनों कान आंसुओं के कुंड बन गए हों।
ललिता अपने आप से अब परेशान हो चुकी है। देह के एक हिस्से में यदि ऑपरेशन होने के कारण दर्द है तो दूसरी ओर पूरी देह में बिस्तर पर पड़े रहने के कारण दर्द। कमरे की गिरफ्त और बिस्तर की कैद तथा भीतर ही भीतर लिखने-पढऩे की असमर्थता के कारण पागल होने की सीमा तक बेचैन है। पीछे छूट चुके देश और परिजनों से दूर देह के भीतर की आह और कराह को सिर्फ उसका तन-मन जानता है। उसे देखने आने वालों को यह सब कुछ नहीं महसूस होता सिर्फ देह के एक हिस्से में हुए ऑपरेशन की जानकारी भर होती है जिसमें पूरी देह एक हादसे से गुजऱती है और जिसे सिर्फ रोहित समझता है। अपने मोबाइल फोन से हर घंटे उससे बात करके वह दूर रहकर भी बिलकुल करीब रहता है, ललिता की सांस बनकर। फिर भी ललिता के कुछ अपने दुख हैं जिनसे ऑपरेशन करवाकर भी मुक्ति नहीं हासिल की जा सकती है। उससे पीछा छुड़ाने के लिए भूलने के अलावा कोई उपाय नहीं है लेकिन क्या भूलना उतना आसान है? अतीत बन जाने के बावजूद कुछ घाव नहीं भरते हैं।
अस्पताल में रविवार का दिन सिर्फ अवकाश का ही नहीं बल्कि सन्नाटे का भी दिवस होता है। डॉक्टर सोहन ऑपरेशन थियेटर को सुलाकर गए हैं, उनके साथ-साथ ऑपरेशन थियेटर भी जागता है। जब डॉक्टर ऑपरेशन थियेटर के बाहर होता है तभी ओटी आराम कर पाता है। अगर कोई इमरजेंसी न हुई तो शनिवार और रविवार के अलावा कोई ऐनेस्थिसिया, ऑपरेशन कक्ष को सुला नहीं पाता है। शनिवार या रविवार का दिन ही ऑपरेशन थियेटर का ऐनेस्थिसिया है।
अस्पताल के कोरीडॉर में देखा, पीनास खड़ी थी। उसके हाथ में खाली ट्रे थी। और वह अधेड़ हिंदुस्तानी मुस्लिम आदमी से डच में बातें कर रही थी। कभी मुस्कुरा पड़ती और कभी अपने अनोखे अंदाज़ में खूब तेज़ी से खिलखिलाकर हंस पड़ती। पीनास की खुशी की हंसी पूरे कोरीडोर और वार्ड में जहां तक पहुंचती, खुशियाली घुली रहती थी।
पीनास की हंसी की लय में जीवन की लय थी और वह उसे बाधित नहीं करना चाहती थी। जब तक वह बातों में लीन रहती ललिता उसको देखने में लीन रहती थी जबकि पीनास में दैहिक सौंदर्य की दृष्टि से देखने को कुछ नहीं था। लेकिन उसके मन की सुंदरता दुर्लभ थी।
पीनास की नजऱ जैसे ही ललिता पर पड़ी वह सॉरी कहते हुए ललिता की ओर लपक ली। ललिता का हाथ पकड़ते हुए बोली, यू नीड काफी ऑर टी सुनकर भी ललिता जवाब में कुछ नहीं बोली। ललिता का हाथ थामकर पीनास कमरे के भीतर ले गई। डच और अंग्रेज़ी मिलाकर पीनास ने बताया कि जिस आदमी से मैं बातें कर रही थी, उससे मेरी सिस्टर बहुत प्यार करती थी लेकिन उस समय यह आदमी उसके प्यार की सच्चाई और गहराई को नहीं समझ सका। तीन साल पहले इस आदमी को जब ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ी तो पीनास की बहन ने अस्पताल में उसके लिए पूरा पैसा भरा। और अपनी बहन सिस्टर पीनास से विशेष रूप से देखभाल करने को कहा था। आज वही आदमी सिस्टर पीनास को देखकर उसकी बहन के बारे में जानना चाहता था और वह कह रहा था, मैं उसे प्यार करता हूं और उसके बिना नहीं रह सकता हूं। जिसने मुझे जि़ंदगी दी, उसके बिना मैं कैसे जी सकता हूँ। पीनास ने इसके बाद जो ललिता से कहा था उससे उसके रोयें खड़े हो गए थे। मैं कैसे कहूँ उससे कि तुम्हारे हॉलैंड चले जाने के बाद कोई खबर न मिलने पर इंतज़ार से थक कर मेरी बहन ने आत्महत्या कर ली। पीनास एक साँस में यह कह गई थी।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद पीनास ने अपनी उजली मुस्कुराहट से ललिता के चेहरे की उदासी पोंछी और उसकी आदत के मुताबिक काफी बनाकर लाने के लिए चली गई थी। कमरे में पीनास नहीं थी। पर कमरे में पीनास की उपस्थिति का अहसास था। शायद ऐसे ही हर कमरे और वार्ड में नहीं होकर भी वह होती है। सभी नर्सों और डॉक्टरों से उसकी अच्छी दोस्ती है। जब पीनास अपनी ड्यूटी ऑवर में आती है तो पहले से ड्यूटी कर रही नर्सें उसे अपनी ड्यूटी ही हैंड-ओवर नहीं करती हैं बल्कि अपनी दिन भर की सारी बातें और घटनाएँ भी कह सुनाती हैं।
पीनास कमरे में दाखिल हुई। कॉफी के साथ-साथ वह कुछ बुकलेट और पेम्फ्लैट भी बटोर लायी थी। बाहर से अधिक अपने भीतर के सन्नाटे को छांटने के उद्देश्य से ललिता कुछ पेम्फ्लैट और बुकलेट उलटने-पलटने लगी। इसी में उसे मॉरियमब्रुख कांड की कहानी कहती पुस्तिका मिली। जिसमें स्लांडस हॉस्पिटल की भी कुछ तस्वीरें थीं। डच में बयां उस कांड को ललिता ने समझने की कोशिश की।
मॉरियमब्रुख कांड को ढुनढुन कांड के नाम से भी जाना जाता है। मॉरियमब्रुख (पुल) प्लांटेशन से पेपर पॉट के बीच पूरी सोलह सौ हेक्टेअर से अधिक की ज़मीन आती है जो उस समय का सबसे बड़ा प्लांटेशन था। गन्ना ही यहाँ की खेती थी। जिसकी पेराई से बनने वाली चीनी को व्हाइट गोल्ड कहा गया। जिसने कोलोनाइजर की तिजोरियां भरी। दरअसल वह मज़दूरों की देह का श्रेड गोल्ड था जिसे वह मज़दूरी की आंच में पिघलाते थे। इनके पेट की रोटी दूसरे के हाथों में थी जिसे वे खटकर हासिल करते थे। कटलिस, हंसिया, फावड़ा और कुदाल भारतवंशियों की खेती के औजार ही नहीं हथियार भी थे। सांप, बिच्छू के अतिरिक्त चींटी, चूँटा से हर पल जूझना पड़ता था। आज भी पार्क और सड़कों के किनारे सांप आते-जाते मिल जाते हैं। मज़दूरों के लिए उस समय प्लांटेशन में जंगली जानवरों का खौफ था तो बाहर मानव जानवरों का जिनका पेट एक शिकार से नहीं भरता था।
वैसे भी मॉरियमब्रुख प्लांटेशन में पहुंचे हुए हिन्दुस्तानी पहले से ही भारत के जमींदारों और अंग्रेजों के शोषण और दमन चक्र से वाकिफ थे। ज़मींदारों की देह की भूख मज़दूरों की पेट की भूख से ज़्यादा भयानक थी। डच सत्ताधारियों ने गयाना के डमरारा को बहुत लाभ दिलवाए हुए स्कॉटलैंड निवासी सी जेम्स मेफर को प्लांटेशन में निदेशक बनाकर भेजा था। चौबीस घंटे वह मज़दूरी करवाता था। आठ-आठ घंटे की तीन बार पारी लगाता था, पर कभी गन्ना की कटाई-ढुलाई के आधार पर मज़दूरी तय करता था और कभी रस पेराई के आधार पर। पांच सौ से अधिक की तादाद में काम कर रहे मज़दूरों को यह बर्दाश्त नहीं था। तिस पर वह मज़दूरों की रूपवान और सुघड़ औरतों को अपने ऑफिस के काम-काज के नाम पर अपनी निगाह और पहुंच के घेरे में रखता था जो मज़दूरों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था। एक दिन, दोपहर बारह बजे के बाद गन्ना कटाई के काम को छोड़कर डायरेक्टर को समझाने-बुझाने के लिहाज से मज़दूर मिल कारखाने पहुंचे। उसे कमरे से बाहर निकाला। मुआयने के बहाने से डायरेक्टर को खेतों की ओर ले गए। यहाँ तक उसे अटपटा नहीं लगा। लेकिन गन्ने के खेतों के पार पहुँचने पर दिल मुहम्मद, खुदा बख्श से रहा नहीं गया। बदरी के साथ मिलकर गन्ने से उनकी पिटाई की। वह कारखाने की ओर भागा। बाबू नंद, गुलाब आदि के साथ तीन सौ मज़दूरों ने उसका पीछा किया। अपने कमरे में पहुँचकर वह फोन करता इससे पहले मज़दूरों ने टेलीफोन और बिजली के तार वगैरह काट दिए थे। लेकिन कार्यालय के अधिकारियों ने इस घटना की संभावना से हैड-क्र्वाटर पारामारिबो में पहले ही खबर भेज दी थी। निदेशक, ऑफिस में असुरक्षा के भय से गोदाम में घुस गया था। मज़दूरों ने उसके बाहर आग लगा दी थी और मारो स्साले मैनेजर को..मारो स्साले डायरेक्टर को, के नारे लगा रहे थे। ऐसे में कुछ इंडोनेशियन मज़दूर हिन्दुस्तानियों के साथ भाग खड़े हुए थे। लेकिन बाइस वर्षीय बुगासोरोजो ने सबको रोकने की कोशिश की। बदरी, महंगू, गणेश और नत्था सहित कुछ मज़दूर गोदाम में घुस लिए थे। निदेशक लेबोरेटरी की ओर भागा। मज़दूरों के हुजूम ने उस पर पत्थर बरसाने शुरू किए। वह लेबोरटरी के पीछे की लोहे की सीढिय़ों से उतरकर भागा लेकिन महंगू ने उसे बीच में ही धर दबोचा। बदरी ने कटलीस से कनपटी पर वार किया। ऐसे में निदेशक चिल्ला-चिल्लाकर जान की भीख मांगने लगा। लेकिन हिंदुस्तानियों पर खून सवार था। शोषण के विरोध की आग रक्त का हिस्सा बन चुकी थी। हिंदुस्तानी मज़दूरों को अब अपने को बचाने के लिए भी इसको मारना जरूरी हो गया था। अब देर हो गइल बा, कहते हुए मज़दूर फिर से उस पर टूट पड़े थे। देवकली ने निदेशक के गले के पास कंधे पर वार किया और वह गन्ने के ढेर पर गिर पड़ा। मज़दूरों ने हंसिया और कटलीस से उसके टुकड़े करके अपने शोषण का बदला लिया। कटे हुए गन्नों के ढेर को ट्राली पर लादने का काम करने वाली फुलिया एक बहादुर स्त्री थी। शोषण के खिलाफ वह हर एक को उकसाती थी। निदेशक की हत्या के दौरान वह भी मर्दों की तरह चिल्लाती-चीखती थी, कहाँ है स्साला डायरेक्टर! और उसके मरने के बाद खुशी से छाती पीटती हुई चिल्ला रही थी..मर गया स्साला।
इतना पढ़कर ललिता ने आँख मूँदकर एक गहरी सांस ली। अपनी गर्दन थोड़ी देर के लिए ढीली की। कंधे पीछे किए। तकिया पर अपने को ढीला छोड़ दिया और अधलेटे ही फिर पढऩे लगी। आखिर घटना का दूसरा रूप क्या है? जाने बगैर उसे नींद नहीं आ सकती थी। फिर वह इसी अस्पताल से जुड़ी ऐतिहासिक घटना है जिसके साक्षी यहां के बूढ़े वृक्ष, अधेड़ इमारतें और पुस्तिका के ये शब्द हैं-
पारामारिबो से वारदात स्थल पर पुलिस, मिलेट्री और वकील शाम ढलने तक पहुंच चुके थे। डच सत्ताधारियों के लिए सनाके की घटना थी। अगर ऐसा ही दूसरे प्लांटेशन पर शुरू हो गया तो और भी बहुत से मज़दूर उनके काबू के बाहर हो जाएँगे। देखते-देखते उनकी जमी-जमायी कमायी उखड़ जाएगी। इधर कुछ मज़दूर अपने घरों के भीतर डरे हुए दुबके थे। जैसे इस घटना से सबको सांप सूंघ गया हो।
दूसरी सुबह पूछताछ शुरू हुई। जांच-पड़ताल हुई। अनुवादक के ज़रिए मज़दूरों से पूछताछ हुई। कमिश्नर अकरम मियाँ द्वारा चौदह मज़दूरों को तत्काल गिरफ्तार करने की कार्यवाही की गई। प्रतिशोध की ज्वाला फिर धधक उठी। मज़दूरों का जत्था एक बार फिर से कटलीस लेकर दफ्तर की ओर दौड़ा। कटलीस और हँसिया की संख्या बढ़ती जा रही थी। बुढ़ुक्की पुल तक तीन सौ मज़दूरों की संख्या बढ़ आई थी। वे छाती पीटते हुए चिल्लाते थे। इशारा होने पर जान जोखिम में डालकर टूट पडऩेे को तैयार थे। कटलीस भाँजते हुए चिल्लाते थे जिन्हें पकड़ा है उन्हें छोड़ो।
हमारे आदमियों को छोड़ो..सबको मारो, सबको मारो! चीखते हुए धड़धड़ाते हुए बढ़ते थे। परिस्थिति गंभीर होती जा रही थी। ऐसे में डच शासकों ने पंद्रह लोगों को हिरासत में ले लिया। शेष भाग गए। पचपन में से तेरह शहीद हो गए। दो की मृत्यु बाद में हो गई और एक ने अस्पताल जाते-जाते दम तोड़ दिया। उनतालीस हिन्दुस्तानी घायल हुए जिन्हें मिलेट्री अस्पताल में भर्ती किया गया। दूसरी ओर पारामारिबो के मिलेट्री अस्पताल से शिनाख्त के बाद निदेशक की पत्नी की चाहत और सहमति से मॉरियमब्रुख के कार्यालय में निदेशक का शव कर्मचारियों के अंतिम दर्शन के लिए अस्पताल से रात तीन बजे ही रवाना हुआ जो साढ़े चार बजे शाम को प्लांटेशन कार्यालय पर पहुंचा।
उधर पारामारिबो में ही घायल हिंदुस्तानियों के लिए मिलेट्री अर्थात स्लांडस अस्पताल के सामने भीड़ उमड़ पड़ी थी। निदेशक के शव को गर्वनर विलियम याकुबेरूस्ट ग्रेवयार्ड में दफनाया गया जहाँ पहले अन्य अधिकारियों की माटी दफनायी गई थी। हिंदुस्तानी मज़दूरों द्वारा सामूहिक हत्या के कारण ग्रुप मर्डर केस था। इसलिए किसी भी डच अधिकारी ने किसी को कोई दोष नहीं दिया और न ही कोई अपराधी घोषित किया गया। जिन बाइस लोगों को दोषी ठहराया गया उनके नाम इस प्रकार है- इमामबख्श, देवकली, बदरी, महंगू, नत्था, छीटू, चरन, बली, मुहम्मद, गनपत, छारू, शिवसिंह, सम्पत, वोनसोरजो, हरिदत्त, ननकू, अब्दुल्ला, बलदेव, रामटहल, गजाधर, गनेश, अलम। जिन्हें बुधवार पाँच नवंबर को सज़ा सुनायी गई। सोलह को बाद में रिहाई मिल जाती है। देवकली, बदरी, महंगू, नत्था, गनपत, छारू, शिवसिंह, हरिदत्त को बारह साल की कालापानी की सज़ा दी जाती है। इन्हें अतंलातिक महासागर से लगे न्यू एम्स्टर्डम फ ोर्ट की जेलों में रखा गया जहाँ मोटी लोहे की चेन से इनके हाथ-पैर बँधे होते थे और वह मोटी चेन कहीं और बँधी रहती थी। शिवसिंह को जल्दी छोड़ दिया गया था। हरिदत्त, गनपत और महंगू ने दस वर्ष की सज़ा काटी। बदरी ने ग्यारह और देवकली ने बारह साल जेल में बिताए। ढुनढुन दरअसल मॉरियमब्रुख कांड का मुख्य आदमी था। इसलिए यह कांड ढुनढुन कांड के नाम से भी जाना गया।
ललिता हिन्दुस्तानियों की इन कुर्बानियों को जानकर इनके प्रति सम्मान से भर उठी थी। भीतर की उमंग से ऑपरेशन का दर्द फड़कने लगा था। उसने वह पुस्तिका अपनी छाती पर रखी। आंखें मूँदीं और कुछ सोचते हुए उसकी आँखें लग गई।
ऑपरेशन के तीसरे दिन ज़मीन पर ललिता के पाँव पीनास ने रखवाए थे और उस समय ललिता को पहली बार लगा था कि मनुष्य के पाँव ही पंख हैं..वह खड़ी नहीं हो पा रही थी, तब पीनास ने ललिता को लंबी साँस ऊपर को खींचने को कहा। और उसे अपने बल पर हाथों से लंबा खींचकर खड़ा किया। साथ ही खुद भी लंबी साँस लेकर अपने काले नीग्रो नथुने फुलाकर आँख फैलाकर खड़ी हो गई थी, हिम्मत बनकर।
पीनास जाति से बुश नीग्रो है। जंगल से आई हुई इंटीरीयर की एक प्रजाति। अगले माह अड़तालीस साल की हो जाएगी। खायी-पीयी गदराई देह। बड़े से साँवले चेहरे में पनीली आँखें, जिसमें मानवीय करुणा की झील है। अनगढ़ सी स्थूल नाक, जिसके नथुने पीनास की सेवाभाव की खुशी के कारण फूले रहते हैं सदा। खुशी से चहकती हुई प्राय: वह अपने हृदय का ज़ोर लगाकर कहती है कि जब मैं लोगों की सेवा करती हूँ तो मुझे भीतर से बहुत खुशी होती है।
दूसरे दिन सूरीनाम की चटखती तेज़ धूप से होकर पीनास अस्पताल पहुंची। अपने कमरे में आदतन बैग रखने के बाद सीधे ललिता के कमरे में पहुंची। पसीने से तरबतर पीनास को ललिता के वातानुकूलित ठण्डे कमरे में राहत मिली। लंबी आह भरते हुए पीनास सामने की कुर्सी पर बैठ गई। इतनी दोहपर में पीनास? ललिता ने घड़ी की ओर ताकते हुए पीनास से पूछा था। यस मैम आई लाइक मनी पीनास ने सिक्के की तरह गोल-गोल आंखें घुमाते हुए चहककर जवाब दिया। ललिता ने लगे हाथ पीनास से धूप में आने और रात में नाइट ड्यूटी करने की तनख्वाह भी पूछ डाली तो पता चला कि आठ सौ सूरीनामी गिल्डर है, जो भारतीय केरेन्सी के अनुसार पंद्रह हज़ार है और डॉलर में इसे तीन सौ के आसपास मान सकते हैं।
उसी शाम को टहलते हुए ललिता पीनास के कमरे की ओर चली गई जो नर्सों का मॉनीटरिंग रूम भी था। वहाँ देखा-पीनास के सामने की मेज़ पर बेबी गारमेंट, तौलिये और बेडशीट आदि सजे हुए रखे थे। ललिता को देखकर लगा कि आई लव मनी कहने वाली पीनास अपनी अन्य ज़रूरतों के लिए यह भी करती है और वह भी नि:संकोच। इससे थोड़ा ललिता चौंकी भी थी। पीनास के व्यक्तित्व के बाज़ारूपन की झलक से वह थोड़ा सनाका भी खा गई थी।
दूसरे दिन पीनास को दूसरी नर्सों की रिपोर्ट से पता चला कि ललिता ने कुछ खाया नहीं है। वह ललिता के पास आई और अधूरे अंग्रेज़ी वाक्यों में कमरे से निकलते हुए कह गई कि मैं पंद्रह मिनट में आती हूँ इसलिए कॉलिंग बेल मत दबाइएगा। बीस मिनट बाद पीनास जब कमरे में दाखिल हुई तो उसके हाथ में फ्रूट जूस की दो बोतलें थीं जिनका स्वाद अलग-अलग था। काले पत्थर से बनी पीनास की देह पसीने से भीगकर और चमक आई थी। उसके खून की करुणा पसीना बनकर पीनास की देह को नहला रही थी। ललिता ने जब पैसा देने की बात कही तो दोनों हाथ उठाकर नो-नो कहती हुई कमरे से बाहर हो गई। ललिता की आँखों में पीनास के लिए अथाह अपनापन आँसू बनकर तैरने लगा था। हार्दिकता-निकटता में कोई भेदभाव कारगर नहीं होता है। मानवीय आचरण ही आत्मा की अभिव्यक्ति है जिससे सारे फासले खत्म हो जाते हैं। दो वर्षों के प्रवास के दौरान ललिता की आंखों में इतने पवित्र आंसू पहली बार आए होंगे। उसे लगा, आज आँखें पाक-साफ हो गईं हैं। इस आंसू के जल को किसी भी तीर्थ पर चढ़ाया जा सकता है। फिर वह चाहे किसी भी धर्म का हो।
जबकि कल भी, इसी अस्पताल में, ललिता की आँखें ही नहीं भर आई थीं बल्कि वह सारा दिन और सारी रात रोती रही थी। उठने की कोशिश में जब वह अपने बिस्तर से नीचे गिर गई थी और उठ नहीं पा रही थी, तो किसी तरह खिसक कर उसने कॉल बेल बजाई। नर्स के रूप में झाईं से भरे चेहरे ने कमरे में झाँका और कहा, कॉलबेल न बजाया करें। ललिता ने इस नर्स को पहली बार देखा था। वह उसे हैडनर्स लगी। बाकी नर्सों के वार्ड में न होने के कारण उसे उठने की और झाँकने की ड्यूटी निभानी पड़ी जो उसे नागवार लग रही थी। ललिता अपने दर्द के कारण प्रतिउत्तर में कुछ बोल न सकी।
लेकिन आंखें कराहकर पीडि़त स्रोत की तरह फटकर छलक पड़ीं। प्रतिरोध के शब्द आंखों में आंसू बनकर तैर रहे थे। ईश्वर की कृपा से तत्काल डॉक्टर सोहन आ गए थे। अपने वीआईपी रोगी का आंसुओं से भीगा चेहरा देखकर डॉक्टर ने अनुमान लगा लिया और साथ लगी हुई चली आई आशा और फ्रीमान नर्स को कमरे से बाहर हो जाने के लिए कहा जिससे अपने अनुमान को वह ललिता की कथनी से प्रमाणित कर सकें। ललिता ने सूचना के लहजे में मर्यादित ढंग से अपनी पीड़ा कह डाली। उस दिन रह-रहकर रात भर ललिता की आंखें आंसुओं से डबडबा आती थीं। इस अमानवीय आचरण की पीड़ा को धोने के लिए आंखें गंगा-यमुना की धारा बनी हुई थीं। चाहते हुए भी आंसू नहीं बंध पा रहे थे। ललिता को भी आश्चर्य हो रहा था कि कहां से आंसुओं का स्रोत उमड़ पड़ा है। ऐसे तो कभी वह बचपन में भी नहीं बिलखती थी। इकलौती होने के कारण पानफूल की तरह पाली गई थी। ऑपरेशन के बाद रोने का तनाव और सिसकियों के दबाव को ललिता अपने टाँकों पर नहीं पडऩे देना चाहती थी और चिकित्सक सोहन को भी इसकी गहरी चिंता थी कि कहीं मन का दुख रिसकर घाव को और न गीला कर दे। सूजी हुई पलकों की सूजन कहीं टाँकों पर न उतर आए!
अपनी ड्यूटी पर जब सिस्टर पीनास अस्पताल आई और रोज़ाना की तरह फ्रीमान और बेलम आदि नर्सों से हादसे की दास्तान सुनी तो मन भर आया था और भारी मन से कमरे में दाखिल हुई और छत की ओर आंखें उठाकर डच अंग्रेज़ी मिलाकर कह रही थी-मैडम, वी मस्ट प्रे..भगवान से हम लोगों को ऐसे लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि वे दूसरों को दुख पहुंचाने वाले कठोर हृदय को बदल दें और उनके निर्दयी अत्याचारों के लिए उन्हें क्षमा करें। जिससे वह निर्बल-सरल लोगों को दुख पहुंचाना छोड़ दे! उन्हें नहीं मालूम कि असहाय और ज़रूरतमंदों को दुख पहुंचाना ईश्वर को दुख पहुंचाना है और ईश्वर को पहुंचा हुआ दुख पलट कर दुख देने वाले तक पहुंचता है, देर-सबेर ही सही।
सुनने के बाद ललिता की आँखें एक बार फिर छलक आईं। उसे लग रहा था जैसे पीनास के माध्यम से ईश्वरीय संदेश का वाचन हो रहा हो। ललिता के भीतर भी अपने आसपास के दुष्टों के प्रति क्षमाभाव जाग्रत होने लगा जो अब तक उसके कलेजे को साल रहा था।
रात में, ललिता को टहलाने ले जाने के लिए पीनास आई। ललिता ने इस बार कई वार्ड के राउंड लिये और देखा अपने-अपने शारीरिक कष्ट के साथ जनरल वार्ड के लोग भी टीवी देखने में मन लगाए हुए हैं। विश्व चैम्पियनशिप के लिए फु टबाल मैच आ रहा था। नीदरलैंड की टीम इटली के साथ सेमीफ ाइनल में थी। सूरीनाम देश के नागरिक नीदरलैंड की फुटबाल टीम में ही अपना प्रतिनिधित्व मानते हैं। और नीदरलैंड में होने वाले सभी फुटबाल मैच देखते हैं। अलग से प्रसारित होने वाली खबरें देखते और सुनते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है वे रहते सूरीनाम में है पर उनके मन-प्राण नीदरलैंड में ही बसे रहते हैं। सप्ताह-भर अस्पताल में रहने वाले लोगों के बीच भी एक रिश्ता बन जाता है। नर्सें उनके दुख में जीने लगती हैं और मरीज नर्सों में अपना जीवन जीने लगते हैं। सच्चाई यही होती है पर दोनों बेखबर रहते हैं। वापस लौटते हुए ललिता ने पीनास की दुकानदारी का हालचाल लेते हुए कुछ कहा तो पीनास ने कहा कि अपना मन लगाने के लिए ऑफ. टाइम में खरीदते और बेचते हैं। इससे जो कमायी होती है उसे चैरिटी में लगा देते हैं..सप्ताह में एक दिन चर्च, कभी अनाथालय और कभी ओल्ड हाउसेस जाते हैं तो खाली हाथ जाना अच्छा नहीं लगता है इसलिए ज़रूरतमंदों और अनाथों में कुछ खाना, कपड़ा और पैसा बाँट देते हैं। यहाँ अस्पताल के वार्ड में भी किसी गरीब को इलाज-खाना, कपड़े या पैसे की ज़रूरत पड़ती है तो पीनास को ही फोन करते हैं, तान्ता पीनास (सिस्टर पीनास) और मैं उनकी सहायता करती हूँ।
ललिता के पूछने पर कि घर में कितने लोग हैं, वह बताती है-दो बच्चे हैं..एक छब्बीस साल का, दूसरा अट्ठारह वर्ष का..दोनों हॉलैंड में पढ़ रहे हैं। घर में तीन अनाथ बच्चों को पाल-पोस रही हूं। पढ़ा रही हंू। घर में अनाथालय के बच्चों को रखकर उसने अपने मकान को घर बना लिया है। पति के बारे में पूछने पर बताया कि दूसरे बेटे के पैदा होने के बाद वह दूसरी औरत के साथ रहने लगा था और जब उसकी औरत दूसरे के साथ भाग गई तो वह बच्चों का हवाला देकर, कसम खाकर फिर से पीनास के साथ पुन: घर वापसी चाहता है। पर पीनास का स्वाभिमान उस ठुकराये हुए को अपनाना नहीं चाहता है।
सुनने के बाद ललिता को लगा, जिसके मन में विश्व भर के लिए करुणा और प्रेम समाया हुआ है उसके मन में अपने पति के लिए कोई क्षमा नहीं है। पीनास को उसके नर्सिंग धर्म ने अद्भुत गढ़ा है। वह नर्सिंग को ही अपना धर्म मानती है, अस्पताल के भीतर भी और अस्पताल के बाहर भी। उसे इस बात से अक्सर शिकायत रहती है कि जो असहाय, निर्धन और बेसहारा हैं उन्हें भी नर्सिंग चाहिए..जबकि आज नर्सिंग का मतलब सिर्फ अस्पताल में सिमटकर रह गया है।
दरवाज़ा खटका। ललिता के सोचने का क्रम टूटा। पीनास बेड की साइड टेबिल पर कॉफी छोड़कर चली गई और ललिता के भीतर अपने आपको। स्लांड्स हॉस्पिटल के इस काले हीरे की आंतरिक चमक को कितने लोग जानते हैं?
ललिता ने कॉफी खतम की..अपने दरवाज़े की ओर देखा। परदा हिला। रोहित फूलों का गुलदस्ता लिए हुए भीतर दािखल हुआ। हाथों में फूल थमाया। फूलों की नरमी और सुगंध से ललिता का चेहरा खिल उठा। ललिता अपनी मुस्कुराहट रोहित की आंखों तक पहुँचाती कि उससे पहले रोहित ने कहा- मैं यह फूलों का गुलदस्ता आपको देने के लिए नहीं..इन फूलों के साथ तुमको लेने आया हूँ। और यहाँ से तुम अपने घर नहीं..मेरे घर चलोगी। दस-पंद्रह दिन में तुम्हारे थोड़ा ठीक होते ही हम..दोनों हॉलैंड चलेंगे..। इस बीच मैंने अपनी कंपनी का काम यहां से समेट लिया है..पहले से ही मेरी कंपनी का हैडक्र्वाटर हॉलैंड में ही है सिर्फ मातृभूमि प्रेम और पुरखों की ज़मीन की सेवा के मोह में यहाँ पड़े हुए थे, शायद तुम्हारे लिए भी।
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ब्राउन्सबेर्ख के रास्ते की ओर गाड़ी मुड़ गई थी। इसी रास्ते पर थोड़ी दूर जाने पर दाहिनी ओर सोने की खदानों का रास्ता जाता था जहाँ सरकारी तौर पर खुदाई होती थी जिसे सूरीनाम सरकार ने कनाडा देश को ठेके पर दे रखा था।
इन क्षेत्रों में हाल ही में नई सड़कें बनकर तैयार हुई थीं। जिनका ठेका चीन को मिला हुआ था। चिकनी नई सड़क पर एक सौ तीस की स्पीड से कार ड्राइव करते हुए रिचर्ड ने उत्साह से भरकर कहा, थैंक्यू, चाइना मैन..जो भी हो, कम-से-कम इस देश को विकास के नाम पर तुमने कुछ अच्छी सड़कें तो दे ही दी हैं।
चार-पाँच किमी के बाद ही फिर वही अनगढ़ रास्ता शुरू हुआ था कि रिचर्ड ने अपनी कार रोकी। बाहर निकला। सिगरेट सुलगायी। नाक से धुआं और मुंह से योजनाएं, इस देश के लिए।
सिगरेट के खतम होते ही फि र से कार के भीतर घुस लिया। कार स्टार्ट करके कहने लगा-अट्ठारह किमी चढ़ाई है। सात किमी की चढ़ाई, थोड़ी इज़ी है..सरल है। लेकिन इसके बाद कठिन चढ़ाई है और उस चढ़ाई के रास्ते पर कोई सड़क नहीं है। रेनफॉरेस्ट की बरसात के बहाव के कारण, उन रास्तों के भीतर की मिट्टी बह गई है। इसलिए गढ्ढे ही गढ्ढे हैं। रास्ता इतना संकरा है कि बमुश्किल दोनों ओर से गाडिय़ां पास हो पाती हैं। खैर, अभी आप लोग खुद ही देखिएगा। इतना कहना भर था कि रिचर्ड को इधर की वापसी के लिए दो-चार गाडिय़ां आते हुए दिखीं। रिचर्ड ने आधा किमी तक अपनी गाड़ी पीछे की। भीगे पतझड़ से ढका हुआ संकरा जंगली रास्ता था। जिसके दोनों बगल पेड़ों और लताओं से पटी हुई घाटियां थीं। इसलिए जंगल की घाटी की ओर बहुत दबाकर कार खड़ी करना अपने को खतरे में डालना था। फिर भी, दूसरा कोई उपाय न होने के कारण रिचर्ड बिल्कुल लटकाये हुए कार खड़ी किए हुए थे। कुछ कारों के अलावा, सवारियों के साथ एक मिनी बस भी पार हुई, जिसमें बच्चे भी थे और वे सब डरे हुए चुपचाप बैठे हुए थे जैसे ललिता पीछे बैठी हुई थी। तभी अचानक सहमी हुई ललिता को व्हीवर-मंकी दिखाई दिया। जिसके हाथ में आधा से कम बनी हुई टोकरी थी। अपनी टोकरी बुनने की कला के कारण ही इसका नाम व्हीवर मंकी (बुनकर बंदर) पड़ा।
देखते ही रिचर्ड ने अपनी कार रोके रखी थी। टोकरी बुनने वाला वह बंदर कार के शीशे के सामने आकर निडर होकर बैठ गया था। और अपनी हरकतों के तहत हल्की सी घुड़की के साथ वह शीशे के दूसरे तरफ से रोहित और रिचर्ड की ओर हाथ बढ़ाता था। रिचर्ड ने अपने खाने के लिए लाई हुई ब्रेड के टुकड़ों को अपनी साइड के विन्डो शीशे खोलकर आगे बढ़ा दिया। तुरंत, अपना हक लेकर वह आगे बढ़ लिया था।
रिचर्ड ने फि र से कार स्टार्ट की। बंदर ने पलटकर पीछे ताका। रोहित ने उससे, अपनी हथेली हिलाकर विदा ली। तभी ललिता ने बताया कि पिछले साल जब एलबीना से हम दोनों वापस लौट रहे थे तो रास्ते में प्यास बुझाने के लिए एक ढाबेनुमा खुली बीयरबार की मामूली सी दुकान पर रुके थे। जहाँ बड़े और लंबे तकरीबन आधा मीटर की लंबाई के रंगीन तोतों का सुंदर जोड़ा था। जो अपनी टहक भरी आकर्षक आवाज़ से पूरे इलाके में संगीतमय टेर लगाये हुए थे। पूरा जंगल गूँज रहा था। उस दुकान की बुश-नीग्रो लड़की ने बीयर थमाकर जब थिरकना शुरू किया तो साथ में अपनी टेर के साथ वे भी नाचने लगे थे। थोड़ी देर बाद, वे दोनों शोर सा मचाने लगे थे। पूछने पर उस लड़की ने बताया कि ये दोनों हँस रहे हैं। अक्सर हर जानने वालों को ऐसे ही नाचते-गाते और हँसाते हुए ये दोनों खुश करते हैं। जो मुझे भी बहुत अच्छा लगता है।
अंतत: ब्राउन्सबेर्ख पहाड़ी पर कार पहुंच चुकी थी। उबड़-खाबड़ चढ़ाई से वे तीनों थक चुके थे। रिचर्ड को ड्राइविंग में बहुत परेशानी हुई थी जिसकी थकान उसके चेहरे पर थी। ललियाये चेहरे पर पसीने की बूंदें इस कदर थीं जैसे अभी-अभी उसने अपना चेहरा पानी से धोया हो।
कार के ऊंची पहाड़ी एरिया पर पहुंचते ही एक नीग्रो लपककर निकट पहुँचा। उसने उन लोगों को वहाँ जाने और कार पार्किंग की रसीद कटवाने का प्रस्ताव रखा, जिसने अपने घने बालों की चोटियों को, अपने सिर पर एक गट्ठर की तरह बांध रखा था। यह उसके चेहरे पर एक और काली छोटी पहाड़ी से कम नहीं लग रही थी। जो सब कुछ उसकी फूली हुई अनगढ़ नाक पर टिका हुआ था। पचहत्तर एसआरडी सूरीनामी डॉलर की रसीद काटी। रिचर्ड ने कार पार्क की। उसके आने पर तीनों उस प्रसिद्ध शांत नीली झील के सामने थे।
ब्राउन्सबेर्ख! झील को देखते हुए ललिता सोचने लगी थी, एक समय में यह सूरीनाम की स्वर्ण घाटी थी। आज नीली घाटी के रूप में विख्यात है। इसको देखकर आंखों को ठंडक मिलती है। जि़लेन्दिया से उत्तर दिशा को बॉक्साइट के लाल-पथ और घने जंगलों को पार करते हुए वे लोग वहां पहुंचे थे। बॉक्साइट की खदानों को किसी तरह से ढके-तोपे हुए सूरीनाम के जंगल बचाये हुए थे। प्रकृति की रक्षा में-प्रकृति ही पहरेदार बनी हुई है, वरना मनुष्यों के हाथों कब की मसल दी गई होती, प्रकृति और उसका अपरूप-रूप। सूरीनाम देश की धरती की नींव बॉक्साइट और सोने की खदानों से बनी है। हरीतिमा का जंगल ही सूरीनाम की सृष्टि है। सूरीनाम देश का जंगल विश्व के प्रसिद्ध जंगलों में से एक है। उलझा हुआ जंगल..अपने में फंसा हुआ जंगल, अपने में एक-दूसरे को लिपटाये हुए जंगल ज़मीन से उगा हुआ जंगल और फिर जंगल से जंगल में..जंगल के भीतर उगा हुआ है जंगल। माटी के तन पर बसा हुआ है जंगल। जिसकी हरियाली में टंके हैं फूल और लटके हुए हैं फल।
रोहित बताते हैं कि सूरीनाम की इस ऊंची पहाड़ी की खोज सर्वप्रथम यूं कहें खनिज वैज्ञानिक ब्राउंस ने की। स्वर्णघाटियों और खदानों की तलाश की, रास्ते बनवाए इसलिए इस इलाके को उन्हीं के नाम से जाना गया। ब्राउन्सबेर्ख की स्वर्ण उपत्यकाओं से झर आये बरसात और जलस्रोतों का पानी सिर्फ पानी नहीं है बल्कि उसमें अन्य वनस्पतियों की हर्बल तासीर के साथ-साथ सोने के परतों की भी तासीर है। इसलिए यह स्वर्ण की भी जलधारा है जो जहाँ-तहाँ पहाडिय़ों और कोने-अतरे से सम्पूर्ण ब्राउन्सबेर्ख भर की पहाड़ी से रिस बह आई है।
रोहित की बातों को सुनते हुए ललिता सोच रही थी कि यह नीली झील किसी नील परी की तरह अपनी गीली ओढऩी के भीतर अपने वक्ष में छुपाए हुए हो, जैसे स्वर्ण की पयोधरी शिलाएं। सूर्यास्त और सूर्योदय के समय तो इसकी आंखों की नीलिमा में उतराने लगते होंगे, स्वर्ण घट। ललिता ब्राउन्सबेर्ख की सुंदर और सुनहरी नीली झील में खोयी हुई थी।
रोहित ने ललिता की हथेली थामी और वे तीनों वहाँ के इकलौते रेस्तराँ की ओर बढ़े। कोने की एक मेज़ के चारों ओर रखी हुई तीन कुर्सियों पर वे बैठ लिए। झील की इस पहाड़ी पर तीनों को अपनी तरह से ठंडक महसूस हुई। पारबो बीयर का ऑर्डर दिया। जो सूरीनाम की अपनी प्रोडक्शन बीयर है।
बीयर की एक लीटर की बड़ी बोतल को नीग्रो वेटर मेज़ पर ठोंक कर रख गया। साथ में कांच के तीन बड़े गिलास भी। रोहित ने बीयर गिलास में डाली। फेन उझक आया,जैसे कभी-कभी गलत और झूठ बात सुन लेने पर दिमाग में गुस्सा भर आता है। फिर से रिचर्ड ने बातों का सिलसिला शुरू करते हुए कहा कि मैं अपने बारे में कुछ कहना चाहूंगा। मैं नीदरलैंड में पैदा हुआ था। मेरे तीन भाई थे। पर, तीनों तीन तरह के हुए। पिता ने हम सबके साथ बहुत कठोर व्यवहार किया था। जिससे हम सब आज की तारीख में कुछ न कुछ तो बन गए हैं और इसीलिए बहुत इज़्ज़त के साथ अपने पिता को हम लोग अपनी-अपनी तरह से याद करते हैं। कहकर उसने बीयर का गिलास अपने मुंह से लगाया।
उनका नाम क्या है? रोहित ने बहुत इज़्ज़त से जानना चाहा।
फादर साइमन, आज मैं अपने मुंह से उनका नाम पुकार सकता हूं। अपने मुंह से बोल सकता हूं लेकिन बचपने में सिर्फ अपने कानों से सुनता था। उनके नाम को अपने मुंह से पुकारकर बोलने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था। अपने कानों को छूने के बाद मुंह पर हाथ रखते हुए उसने जवाब दिया।
आगे कहने लगा कि मेरे पिताजी यदि एक बार अपने कमरे में जाने को कह देते थे तो दुबारा उनके आवाज़ देने पर ही वापस हम लोग उनके कमरे में दाखिल होते थे। उनके पिता होने का डर इस कदर हम सबके मन में बैठा हुआ था कि उनकी इच्छा के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाते थे। मैं जब दस वर्ष का था तो मैं अपनी माँ की छोटी कार को धोने और साफ करने का पाँच गिल्डर पाता था और पिता की कार की धुलाई का साढ़े आठ गिल्डर मिलता था जबकि वह कार, मेरी माँ की कार से तिगुनी बड़ी थी और उसे भीतर से भी साफ करना पड़ता था। एक साल तक लगातार ऐसा करते रहने के बाद अचानक एक दिन न जाने कहाँ से मुझमें हिम्मत आ गई थी कि मैं साहस करके अपने पिता से एक झटके में पूछ बैठा कि माँ तो अपनी कार की सिर्फ धुलाई का पाँच गिल्डर देती हैं और आप अपनी कार की पूरी धुलाई सफाई का सिर्फ साढ़े आठ गिल्डर ही क्यों देते हैं? जबकि उसे मैं भीतर से भी साफ करता हूँ। उनका इतना सुनना था कि इन्होंने उत्तर में सिर्फ इतना कहा था कि, यह मेरा निर्णय है।
तो फिर, आज से मैं नहीं धोऊँगा। कहकर मैं पलटकर चल दिया था। और वे भी कार धुलवाने के लिए बाहर निकल गए थे। दो पखवारे बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरी कमाई कम हो गई है इसलिए मैं फिर से पिताजी के पास पहुँचा। और हिम्मत करके उनसे निवेदन करते हुए कहा, मैं फिर से आपकी कार धोऊंगा। मैंने अपने बचपने के स्वाभिमान को दाँव पर लगाकर बात कही थी।
ठीक है, लेकिन अब सिर्फ पाँच गिल्डर ही मिलेंगे। पिताजी ने मेरी मजबूरियों का भरपूर फायदा उठाते हुए उत्तर दिया था। जिसमें आज के कठोर ज़माने की अद्भुत सिखावनी शामिल थी। जिसका अहसास अब होता है। ऐसे पिता के साथ मेरा बचपन बीता था। फिर भी आज की तारीख में, मैं उन्हें बहुत खुश होकर याद करता हूँ। उन पर गर्व करता हूँ और उनकी कठोरता की प्रशंसा करता हूँ। रिचर्ड की आँखों में उन स्मृतियों की भीगी चमक थी।
बीयर की एक बड़ी बोतल इन बातों के साथ कब खत्म हो चुकी थी। किसी को पता नहीं चला। फिर से एक नई बोतल लाने का आदेश दिया। बीयर आने और गिलास में पडऩे के बाद रोहित ने अपने पिता की स्मृतियों को ताज़ा करते हुए कहा, मेरे पिता हिंदुस्तानी किसान थे। सूरीनाम में उनका जन्म हुआ था। भारत से आये हुए पुरखों से उन्हें धर्म और जीवन की शिक्षा मिली थी। धर्म पर उनकी गहरी आस्था थी। मुझे हिंदी भाषा और रामचरित मानस का ज्ञान अपने पिता से ही मिला है। रामचरित मानस और महाभारत उन्होंने अपने साथ पढ़वायी थी। धान लगवाये, गट्ठर बंधवाये। गायें चरवायीं। और अपने कमाये हुए धन का कुछ हिस्सा वे एक आलमारी के कोने में रखते थे और मुझसे कहते थे कि तुम इस परिवार के बड़े लड़के हो, जब ज़रूरत पड़े तो यहां से ले लेना लेकिन बर्बादी के लिए इस पैसे को भूलकर भी हाथ मत लगाना। समझना, यहां पैसा रखा ही नहीं है। बहुत पाप पड़ेगा, यदि गलत काम के लिए यहां का धरा पैसा इस्तेमाल होगा। रोहित ने बहुत संक्षेप में अपने बचपन और पिता की झलक एक साथ प्रस्तुत कर दी।
लेकिन रिचर्ड, सूरीनाम में तुम्हारा सेटिलमेंट कैसे हुआ? थोड़ा बहुत जानते हुए भी रोहित ने और जानना चाहा। इसी बीच सो काल्ड लंच भी आ गया था। मुर्गे के तीन टुकड़े, सलाद, खुशवन्ती (बोड़ा) और कटोरे से भरकर निकाला हुआ भात। सब कुछ एक ही प्लेट में एक ढेर की तरह रखा हुआ था। गरम भोजन की प्लेट होते हुए भी खाने की उसमें कोई सुगंध नहीं थी। लेकिन तीनों ही भूखे थे और साँझ के तीन बज चुके थे। कुछ बातचीत के साथ किसी तरह उन दोनों ने खाना लील लिया। ललिता ने तो आधा से ज़्यादा ही छोड़ दिया। वह उस खाने को खाने से अधिक भूखे रहने में खुश थी।
गिलास को फिर से, बीयर के झाग से भरा। उन तीनों ने फिर से, प्रकृति के सौंदर्य में डूबने के लिए अपनी आंखें झील की ओर कर लिए कि रिचर्ड ने अपनी डिब्बी से सिगरेट निकाली। सुलगायी और शुरू हो गए।

जब इस कम्पनी में मैनेजरी की पोस्ट के लिए एडवर्टाइजमेंट निकला। मैं इसमें शामिल हुआ और साक्षात्कार के लिए नीदरलैंड से सूरीनाम आया। इन्टरव्यू से तो कुछ अंदाज़ा नहीं मिला कि मैं चुना गया हूं या निकाला गया हूं। लेकिन, इस कंपनी का मालिक जो दो मीटर लंबा था और तकरीबन एक मीटर से ज़्यादा ही चौड़ा होगा। वह अपने तीन मित्रों के साथ मुझे भी सारमाक्का की एक कनाल (नहर) की ओर ले गया। सबके हाथ में पन्द्रह-बीस कटिया (मछली मारने के यंत्र का सूरीनाम के हिंदुस्तानी द्वारा प्रयुक्त नाम) थी। और वे पटापट मछली मार रहे थे। मेरे पास उसकी ही दी हुई सिर्फ एक कटिया थी और शाम के पांच बजे तक मेरे हाथ में एक भी मछली नहीं लगी थी। तिस पर, धूप में लगभग मैं भुना जा चुका था और मरने-मरने को था कि उसने सब कुछ समेटकर चलने का आदेश दिया कि इसी बीच अचानक मेरी नुकीली कटिया में बड़ी मछली फंस गई। मेरे तपे लाल चेहरे पर मुस्कान फैल गई। तभी कंपनी के मालिक ने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, कंपनी के लिए मैं तुम्हारा चयन करता हूं। इस तरह, कंपनी के उस मालिक ने सूरीनाम की इस जलन भरी धरती पर दिनभर मुझे तपाकर मेरी कड़ी परीक्षा ली। मैं उसे भूलता नहीं हूँ। कहते हुए लकड़ी की सिगरेटची डिबिया से दूसरी सिगरेट निकाली।
और यह विवाह, प्रेम, यह सब कैसे, कब? रोहित ने जानना चाहा क्योंकि उसने कल ही खज़ाना नाम के रेस्तरां में रिचर्ड के परिवार को डिनर दिया था। उसके तीनों बच्चे, पूजा, लक्ष्मी और दो वर्ष के तरुण के साथ उसकी श्यामा पत्नी थी जो अपनी प्रौढ़ अविवाहित बहन को भी साथ लायी थी, संभवत: बच्चों को संभालने के लिए। रेस्तरां में बुफे-पद्धति से सबको खुद ही अपनी इच्छा और ज़रूरत के अनुसार खाना लेना था। ड्रिंक्स और आइसक्रीम वगैरह ऑर्डर से दिया जाता था जो प्रति व्यक्ति बावन यूरो से अलग था। उन दोनों बालाओं ने तीन-तीन बार लेकर भरपेट खाना खाया था। पहली बार फिश-सलाद से प्लेट भरकर ली थी। दूसरी बार में तली हुई मछलियों और सब्जियों से प्लेट भरी थी और तीसरी बार मांस और तरकारियों से प्लेटफुल थी। इसके बाद आइसक्रीम और पीना-पिलाना अलग से शामिल था। उन लोगों ने पेट भरकर ही नहीं बल्कि मन भरकर खाया था। ललिता यह सब देखकर चकित थी..वह इस तरह से खाना खाते हुए लोगों के बीच प्राय: खा ही नहीं पाती है बल्कि उसकी भूख ही मर जाती है। उसके लिए खाना, भूख और स्वाद के साथ-साथ सुगंध और सौंदर्य भी है, उसे लगा कि इसी तरह के खाने वालों के लिए हिंदुस्तानी समाज में कहा जाता है, वह मन भरकर खाईस रहा। या तो भुक्खड़ जनात रहा मान! मान मतलब आदमी।
इसी बीच बीयर पीते हुए रिचर्ड ने कहा, सर्विस के ग्यारह माह बाद मेरी श्यामा से मुलाकात हुई। प्रेम हुआ। शादी हुई। हनीमून के लिए हम दोनों ने सूरीनाम के इन्टीरियर को चुना। मेरी पत्नी ने इस देश में जन्म ज़रूर लिया है, पर और लोगों की तरह ही अपने गांव को छोड़कर कहीं गई नहीं थी इसलिए इन्टीरीयर में जाकर वह हमसे ज़्यादा खुश थी और मैं उसकी खुशी से खुश था। रिचर्ड ने यह सब बहुत चहककर और अपने प्रेम की स्मृतियों से भरकर कहा था। जैसे यह कोई इसका पहला प्रेम हो। लेकिन रोहित को फिर भी इन दोनों के प्रेम का अलौकिक कारण समझ में नहीं आया था और उसने खोलकर पूछना उचित भी नहीं समझा। क्योंकि, अंतत: यह बहुत ही व्यक्तिगत मामला होता है और सच में देखा जाए तो, प्रेम अकारण ही होता है। और प्रेम का कारण तो सिर्फ प्रेम होता है क्यों, कैसे, कब की तलाश तो बहुत बाद में शुरू होती है, वह अगर अपने को ही देखे तो।
तभी रिचर्ड ने आगे बताना शुरू किया, यूँ तो आप जानते हैं श्यामा के पिता और माँ दोनों ही एक प्लांटेशन में काम करते थे। वहाँ उनके दस बच्चे हुए। श्यामा पाँचवें नम्बर पर है। पिताजी बहुत ही धार्मिक व्यक्ति थे और साथ में घर के मुखिया भी थे। दिन में एक बार, जब भात के साथ तरकारी या कुछ जुट जाता तो सब बच्चे अपनी-अपनी प्लेट लेकर खड़े हो जाते थे। जितना खाना तैयार हो पाता था उसमें से सबको बराबर-बराबर बँट जाता था। फिर किसी का पेट भरे या नहीं, इसकी चिंता माँ-बाप ने कभी नहीं की थी क्योंकि कभी-कभी इस बँटवारे में उन्हें भी भरपेट खाना नहीं मिल पाता था। इस तरह से रिचर्ड ने अपनी पत्नी के परिवार की सच्चाई नि:संकोच कह डाली। जिससे रोहित को रहा नहीं गया और उसने प्रत्युत्तर में अपने माँ-बाप के बारे में कहना शुरू कर किया, हमारे पिता भी माँ के साथ मिलकर और कुछ मज़दूरों को लेकर धान की खेती किया करते थे। इसके अलावा मेरे पिता ने सोलह गायें पाल रखी थीं और कुछ तरकारी वगैरह की भी खेती किया करते थे। मुर्गा-मुर्गियों और बत्तखों के दरबे थे। इसलिए दूध-दही के साथ-साथ खाने-पीने की कमी कभी नहीं रही। पर, इन सबके साथ-साथ काम का कभी कोई अंत नहीं हो पाता था। पूरा परिवार अपनी तरह से काम में लपटियाया रहता था। उस समय के सात भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ा लड़का था। मेरे नीदरलैंड आने के बाद, मेरे दो भाई और पैदा हुए थे। उन लोगों ने माँ-बाप के साथ मेरे संघर्ष को कभी देखा नहीं, जाना ही नहीं। मैं सबसे बड़ा लड़का था। मखैनता कनाल की बोइती से निकलकर पथ-वानिका, इंदिरा गांधी वैख से होते हुए लाटूर स्कूल में पढ़ाई की। उस समय के रेलवे-लाइन पर ही पाँव धरकर मैं स्कूल पहुँचता था। आजकल पुलिस स्टेशन के बगल में जो स्कूल है उसी में उन्नीस सौ पचास-पचपन के बीच में मैं नीग्रो-कफन्नियों के बीच में अकेले हिंदुस्तानी लड़के के रूप में पढ़ाई करता था। मैंने अपनी क्लास में हमेशा आगे की लाइन में बैठकर पढ़ाई की थी और एक बजे दोपहर में स्कूल खत्म होने के बाद, गरम भुलभुली के धूल भरे रास्ते में नंगे पाँव छ: किमी चलकर घर पहुंचता था। रोज़ सिर से पाँव तक भीग जाता था, कभी सूरीनाम की बरसात से और कभी अपनी ही देह के पसीने से। जब तक साइकिल नहीं मिली थी, तब तक जूते भी नहीं मिले थे इसलिए चहेंटा के कारण, पाँवों को बहुत दिनों तक तकलीफ उठानी पड़ी थी। घर पर आकर, जो कुछ छोटे भाई-बहनों से बचा-खुचा होता था, उसे खा-पीकर खेतों पर निकल जाता था धान काटने, गट्ठर बँधवाने के लिए और सूर्यास्त तक गाय-गोरू को चराते-हाँकते घर आ जाता था। कभी-कभी गायें तो अपने से भी घर पहुँच जाती थीं। लेकिन भुंडा नन्दी तो बगैर हमारे बुलाये घर नहीं पहुँचता था। प्राय: आधी रात को उसे जंगल से लाना पड़ता था लेकिन वह हमारी आवाज़ के साथ-साथ मेरी महक भी पहचानता था। मेरे पहुँचते ही वह खुद ही लम्बी-लम्बी साँसें फेंकते हुए बढ़ आता था। आज भी हमें उसकी आवाज़ महसूस होती है और कभी-कभी उसकी बहुत याद आती है। कहते हुए रोहित का गला भर आया था और अपने भुंडा नंदी की स्मृति से आँखें भी सजल हो आई थीं। वह उसे शंकर के नंदी की तरह महत्त्व देते थे। रोहित के कहे के उतार-चढ़ाव को ललिता उनके चेहरे पर देख रही थी और उनके अतीत में खो गई थी। साँझ घिरने-घिरने को थी। अंधेरा बढ़े, इससे पहले वे तीनों कार में हो लिए क्योंकि यहां अंधेरा इतना घना होता है कि अपने हाथ को हाथ नहीं दिखाई देता है। झील की ओर मुँह किए हुए पाँच कमरों की अतिथिशाला है, लेकिन मच्छरों और जंगली कीट-पतंगों के भय से बहुत कम सैलानी ही यहां टिकते हैं।
उसने गीली पहाड़ी उतराई के लिए फिर से कमर कसी। और जैसे ही रोहित और ललिता टॉयलेट की ओर बढ़े तो रिचर्ड ने अपने होंठों के बीच नई सिगरेट सुलगायी। जब तक वे दोनों कार तक पहुँचते, रिचर्ड सिगरेट खतम कर चुका था। ब्राउन्सबेर्ख की चढ़ाई उतरकर कार पुन: प्रमुख सड़क पर आ गई थी। चीनवा ठेके पर बनी हुई चिकनी सड़क थी। स्पोट्र्स कार की तरह एक सौ तीस की स्पीड से ड्राइव कर रहे थे। पर ललिता के मन में रिचर्ड के कई गिलास बीयर चढ़ाने का डर चढ़ा हुआ था फिर भी, वह अपने इस डर को, जताकर रिचर्ड को और अधिक असंतुलित नहीं करना चाहती थी। नीदरलैंड और यूरोप के अन्य बड़े शहरों में भी, रात में कभी-कभी कार रोककर, पुलिसवाले कार चालकों की एल्कोहॉल की मात्रा की जांच करते हैं और नियंत्रण से अधिक होने पर सड़क के किनारे ही कार रुकवा लेते हैं। इसके बाद जैसी चढ़ी होती है, उसी हिसाब से निर्णय लेते हैं। वरना एक-दो घंटे रुकवाकर जाने की अनुमति दे देते हैं। पर, सूरीनाम की सड़कों पर तो ऐसा कोई विधान है ही नहीं..इसलिए भी उसको चिंता थी। फिर भी ललिता ने यह सोचकर संतोष कर लिया कि थोड़ी देर में खराब सड़क आ जाएगी तो स्पीड अपने आप ही कन्ट्रोल में आ जाएगी।
जंगली क्षेत्र के खतम होते ही कुछ लकड़ी के छोटे-मोटे झोपड़ीनुमा मकान दिखाई देने लगे थे। जो मकान से अधिक घर लग रहे थे। और पूरे इलाके को गाँव होने का अहसास दे रहे थे। लेकिन कुछ दूर चलने के बाद अनगढ़ और पुराने मकानों का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे वे घनी बस्ती वाले क्षेत्र में पहुंच गए थे। जहां उन्हें राजनीतिक पार्टियों के झंडे भी दिखाई देने लगे थे। एक-एक घर के अहाते के भीतर चार-पांच राजनीतिक पार्टियों के झंडे गड़े हुए थे, वीएचपी (फीहापी),बीवीडी(बीफीडी), एनडीपी(एनडेईपी), एनपीएस(एन पेई एस) आदि पार्टियों के पीले, बैंगनी, हरे रंग के झंडे थे जिसमें किसी पर हाथी तो किसी पर शेर बना हुआ था। प्राय: घरों पर राजनीतिक पार्टियों के झंडे वैसे ही गड़े हुए थे जैसे सनातनी हिंदुओं के घरों और मंदिरों के अहाते में श्रीगणेश, शिव, हनुमान, देवी माता और आर्यसमाजियों के यहां ú की झंडियां फरफराती हुई मिल जाती हैं। ड्रम्पेल स्पीड को देखते ही रोहित ने कहा, यह ड्रम्पेल (स्पीड-ब्रेकर) और टेम्पेल (मंदिर) एक ही जैसे हैं गांव या शहर के शुरू होते ही यह भी शुरू हो जाते हैं। जहां-तहां बने हुए ड्रम्पेल से गाड़ी चलाने में और टेम्पेल से समाज चलाने में बड़ी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं..पता नहीं लोग इसे समझते हैं या नहीं। रोहित ने अपने संशय के साथ रिचर्ड के सामने बात रखी थी।
हां, मैं आपसे पूरी तरह से सहमत हूं आजकल सूरीनाम, गयाना, ट्रिनीडाड और मॉरीशस जैसे देशों में असेम्बली और पार्लियामेंट सीट के लिए जितनी पॉलिटिक्स और राजनीति होती है उससे कहीं अधिक पॉलिटिक्स हिंदुओं के मंदिरों के फोरसीटर (अध्यक्ष) और पंडिताई के लिए छल-प्रपंच और दंद-फंद में होता है फिर चाहे वे आर्य समाजियों के मंदिर हों या सनातनी हिंदू के। कहकर रिचर्ड बगल में बैठे हुए रोहित को गंभीरता से देखने लगा तो उसने कहा, आजकल तो पूरी दुनिया में पावर-प्लांटेशन के साथ-साथ रिलीजऩ प्लांटेशन की पॉलिटिक्स चल रही है। जिसकी आम जनता शिकार हो रही है। सुनते ही सभी चुप और चिंतित हो उठे थे। पारामारिबो शहर शुरू हो चुका था। ंैपैबन्द लगी हुई सड़क पर पिकअप कार चालीस-पचास की गति से धचके खाते हुए रेंगने लगी थी। सामने, सूर्यास्त का समय था। सफेद बादलों के टुकड़े सिन्दूरी हो आये थे। अस्त होते हुए सूर्य के सामने बादल का टुकड़ा, ऐसा प्रखर अग्नितम लाल था जैसे सूरज ने आग लगा दी हो और वहां एक अबुझ मशाल जल उठी हो।