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Monday 20 Nov 2017

बीसवीं सदी का नारी विमर्श और प्रेमचंद


उषा वैरागकर आठले
सहायक प्राध्यापक, किरोड़ीमल शासकीय महाविद्यालय,
रायगढ़ (छ.ग.)
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में 'नारी विमर्शÓ बहुत चर्चित हुआ है। यह 'विमर्शÓ पूर्व में भी उन्नीसवीं सदी के नवजागरण काल से नारी जीवन में सुधार आंदोलनों के रूप में और उसके बाद नारी मुक्ति आंदोलन, स्वतंत्रता आंदोलन में नारियों की सक्रिय सहभागिता और नारी-अस्मिता पर केन्द्रित नारीवाद जैसे विभिन्न चरणों में दिखाई देता रहा है।
बीसवींसदी के नारी विमर्श के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद पर बात करनी हो तो प्रेमचंद की पूर्व और समकालीन परिस्थितियां, सुधारवादी-वैचारिक-व्यावहारिक आंदोलन, इस काल की परिधि में किए गये लेखन की चर्चा भी की जानी चाहिये। प्रेमचंद पर विशेषांक निकालते हुए नमिता सिंह 'वर्तमान साहित्यÓ के संपादकीय में लिखती हैं- ''आज दलित विमर्श, नारी विमर्श, राजनैतिक विमर्श, सामाजिक विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, परंपरागत व्यवस्था-विमर्श जैसे अलग-अलग समूह हैं, दृष्टियां हैं, लेकिन एक अकेला रचनाकार अपने साहित्य में अपने समय को समग्रता से प्रस्तुत करता है। उसके सामने पूरा समाज है। ऐतिहासिक संदर्भों के साथ संपूर्ण जनता के संघर्ष हैं। सामाजिक परिवर्तन की जद्दोजहद, जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों से साक्षात्कार करती है और अपनी स्थिति को बदलने, बेहतर बनाने के लिए संघर्षरत है। इसीलिए वहां किसान, जमींदार, उद्योगपति, दलितवर्ग, स्त्री-समूह, मज़दूर, सर्वहारा हैं; वहां वकील, नेता, सत्याग्रही, अफसर, पुलिसबल के पात्र हैं; राजा, रानी, कारिंदे, महाजन हैं; ब्राम्हणवादी व्यवस्था के पोषक धर्मध्वजवाहक हैं, क्रांतिकारी नौजवान हैं, चोर-डाकू हैं, वेश्या हंै, यानि सम्पूर्ण समाज है। इतना विपुल साहित्य है प्रेमचंद का और उतनी ही गहरी आस्था है उनकी समाज में। वे साहित्य को एक मिशन के रूप में लेते हैं... वे आनेवाले समय को भविष्यद्रष्टा के रूप में पढ़ते हुए अपनी टिप्पणियाँ करते हैं और अपने पात्रों को रचते हैं।ÓÓ
प्रेमचंद का रचना-फलक बीसवीं सदी के प्रारंभिक चार दशकों में फैला हुआ है। इस दौरान लेखन-स्तर पर नारी विमर्श के अनेक बिंदु मिलते हैं परन्तु इसकी पृष्ठभूमि के रूप में हमें उन्नीसवीं सदी में भी थोड़ा झांकना पड़ेगा। उन्नीसवीं सदी के नवजागरण काल में स्त्रियों की पराधीन और हीन स्थिति को लक्ष्य कर समय-समय पर अनेक सुधार-आंदोलन आरंभ किये गये- राजा राममोहन राय की सक्रियता के कारण 4 दिसम्बर 1829 में सतीप्रथा को अवैध घोषित किया गया, सन् 1849 में दो भारतीय उदारपंथियों ने बालिका विद्यालय की स्थापना की, ब्रह्मसमाज के ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से 26 जुलाई 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम स्वीकृत हुआ, सन् 1896 में पुणे में महर्षि कर्वे ने 'विधवा आश्रमÓ की स्थापना की, सन् 1926 में प्रथम अखिल भारतीय महिला सम्मेलन आयोजित हुआ। ऐसी अनेक घटनाओं का प्रभाव स्त्रियों पर पड़ा था। इस दौरान न केवल पुरुष वरन् स्त्रियाँ भी स्वयं जागृत होकर अन्य स्त्रियों की स्थिति सुधारने में आगे आईं। रमाबाई रानाडे, सावित्रीबाई फुले जैसी स्त्रियों ने स्त्री-शिक्षा और स्त्री-सशक्तीकरण के लिए उस सदी में उल्लेखनीय कार्य किया। डॉ. शम्भुनाथ इनके योगदान की चर्चा करते हैं- ''नारी उन्मेष के लिए व्यापक जनमत तैयार करने में मैसूर की पंडिता रमाबाई की भूमिका कम नहीं थी। उन्होंने सबसे पहले अनुभव किया कि मेहनत करके अर्थोपार्जन का पथ चुने बिना नारी की मुक्ति संभव नहीं है। उन्होंने मध्य और निम्न वर्ग की कुछ औरतों को हाथ के काम सिखाये। पूना में 1889 में विधवाओं और निराश्रिताओं के लिए 'शारदा भवनÓ की स्थापना हुई। 'मुक्तिसदनÓ, 'कृपासदनÓ खुले। रमाबाई रानाडे ने नारियों के मताधिकार के लिए संघर्ष किया। बंबई में 'सेवासदनÓ खुला, जिसमें विधवाओं और शादीशुदा औरतों को सिलाई-कढ़ाई की शिक्षा दी जाती थी और साप्ताहिक व्याख्यान होते थे। समाजसुधार के इन कामों ने राजनैतिक आजा दी और बराबरी के अधिकार के लिए नारियों की मांग तीव्र करने में काफी हद तक योगदान दिया। डी.के.कर्वे और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा और नारी जागरण के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एनी बेसेंट, सरोजनी नायडू, सरलादेवी, कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने भी औरतों में जागरण पैदा किया। मातिंगिनी हाजरा और बीना दास जैसी महिला क्रांतिकारियों का नाम भी गर्व से लिया जा सकता है। इन्होंने भारतीय नारियों में स्वत्व की भूख जगाई।ÓÓ
यह वह समय था, जब भारत के लगभग सभी चिंतकों, विचारकों, साहित्यकारों ने स्त्रियों की दशा पर अपने विचार व्यक्त किये। स्वामी विवेकानंद ने 'स्त्रियों की शिक्षाÓ विषय पर अपने शिष्य के साथ लम्बी चर्चा की, जिसमें उन्होंने अपने मठ में स्त्रियों को शिक्षा देने की बात कही। उन्होंने कहा- ''लड़कियों को शिक्षा देकर छोड़ देना होगा। उसके पश्चात् वे स्वयं ही सोच समझ कर जो उचित होगा, करेंगी। विवाह करके गृहस्थी में लग जाने पर भी वैसी लड़कियाँ अपने पति को उच्च भाव की प्रेरणा देंगी और वीर पुत्रों की जननी बनेंगी।ÓÓ महिलाओं की शिक्षा के लिए किये जा रहे प्रयत्नों और सुधारों का उस समय काफी महत्व मालूम होता था परन्तु आज जब हम वस्तुगत समीक्षा करते हैं तो प्रश्न उठता है कि नवजागरण में महिलाओं के लिए शिक्षा की ज़रूरत किस भाषा, किस तर्क या बोली में अभिव्यक्त हुई। बेहतर पत्नी और मां के निर्माण में मदद करने के लिए शिक्षा, महिलाओं के लिए शिक्षा एक मध्यवर्गीय हिंदू पहचान और सभ्यता निर्मित करनेवाला नैतिक कर्म, एक राष्ट्रीय निवेश था, जिसका मकसद उन्हें अच्छी गृहिणी बनाना, उन्हें अपने वैवाहिक जीवन में उत्तम और ज्ञानवान सहचरी की भूमिका में तैयार करना था। चारू गुप्ता के इस विश्लेषण में तथ्यात्मकता है क्योंकि स्त्री-शिक्षा के विषय और पुस्तकें अलग रखी गई थीं। पुरूष, शिक्षित स्त्रियों की एक विशिष्ट नैतिक छवि चाहते थे। महावीरप्रसाद द्विवेदी इस सम्माननीय, आदर्श महिला की तस्वीर खींचते हैं: वो साड़ी पहनती है, बिंदी लगाती है और अपने को फूलों से सजाती है। वो शिक्षित है, अपने पति के लिए प्रार्थना करती है, सभ्य सभाओं में जाती है और लौटकर अपने पति का दिल जीतती है।7 मैथिलीशरण गुप्त की तो नारीसम्बन्धी अनेक पंक्तियाँ प्रसिद्ध हैं। उदाहरणार्थ -
आर्य कन्या मान लेती स्वप्न में भी पति जिसे
भिन्न उससे फिर जगत में और भज सकती किसे ?ÓÓ
इन उद्धरणों से जाहिर है कि उस वक्त के पुरुष चिंतकों और सुधारवादियों में स्त्री और पुरुष से एक समान आचरण की अपेक्षा नहीं थी और उन्हें एक समान शिक्षा देना भी अपेक्षित नहीं था। बीसवीं सदी के पहले दो-तीन दशकों में ही अनेक लेखिकाओं ने इस विभेद को रेखांकित किया। सन् 1915 में दु:खिनी बाला नामक छद्मनाम से एक स्वअध्ययन से शिक्षित हुई स्त्री ने ''सरला: एक विधवा की आत्मजीवनीÓÓ शीर्षक के अन्तर्गत अपने व्यथापूर्ण विचार व्यक्त किये थे। दु:खिनी बाला ने सवाल उठाया कि ''ईश्वर ने लड़के और लड़की दोनों को ही बनाया है। उसकी सृष्टि के लिए, संसार के हित के लिए, उसकी उन्नति, उसके अभ्युदय के लिए दोनों ही एक से आवश्यक हैं... यह सब होते हुए भी स्त्री की अपेक्षा पुरुषों का आदर अधिक क्यों है? पुरुष में ऐसी कौन-सी बात है, जिसके कारण वह अधिक पूज्य हो रहा है?ÓÓ इन प्रश्नों का उत्तर तलाशते हुए वे आगे लिखती हैं- ''संसार में समस्त वस्तुओं की अपेक्षा धन का अधिक मान है और उस धन से मनुष्य का घना सम्बन्ध है। संसार रूपी बाज़ार में पुरुष का आदर अधिक है क्योंकि वह उपार्जन करता है, क्योंकि उसके द्वारा धन की आय और उसकी वृद्धि होती है। स्त्री लक्ष्मी होते हुए भी पैदा नहीं करती इसी कारण से उसका मान कम है।Ó महादेवी वर्मा ने साठ-सत्तर वर्ष पूर्व लिखा था - ''जब स्त्रियों को सुशिक्षिता बनाने के लिए सुविधा देने की चर्चा चली तो बहुत से व्यक्ति अगुआ बनने को दौड़ पड़े थे। यह कहना तो कठिन है कि इस प्रयत्न में कितना अंश अपनी ख्याति की इच्छा का था और कितना केवल स्त्रियों के प्रति सहानुभूति का; परन्तु यह हम अवश्य कह सकते हैं कि ऐसे सुधारप्रिय व्यक्तियों का दृष्टिकोण भी संकुचित ही रहा। उन्होंने वास्तव में यह नहीं देखा कि बौद्धिक विकास के साथ स्त्रियों में स्वभावत: अपने अधिकारों और कर्तव्यों को फिर से जांचने की इच्छा जागृत हो जाएगी तथा वे घर के बाहर भी कुछ विशेष अधिकार और उसके अनुरूप कार्य करने की सुविधाएं चाहेंगी। ऐसी परिस्थिति में युगों से चली आनेवाली व्यवस्था के रूप में कुछ अंतर आ सकता है।ÓÓ इक्कीसवीं सदी में होनेवाले नारी विमर्श को आसानी से महादेवी वर्मा के इस वक्तव्य से जोड़ा जा सकता है।
प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की कहानियों में निरंकुश और अत्याचारी समाज के प्रति आक्रोश का मुखर होना स्वाभाविक था।ÓÓ अपनी कहानी 'आहुतिÓ में उन्होंने लिखा - ''वह उनकी विवाहिता पत्नी ठहरी। सात भाँवरे लेने के बाद राधेश्याम को तो उसके शरीर की पूरी मोनोपोली मिल चुकी थी।ÓÓ इसी तरह 'मंगलाÓ में वे लिखती हैं- ''पति चाहे जितना पढ़ा-लिखा विद्वान हो, पब्लिक प्लेटफॉर्म पर खड़ा होकर स्त्री को समान अधिकार और स्वतंत्रता देने के विषय में चाहे जितनी लम्बी-लम्बी स्पीचें झाड़े, पर घर के अंदर पैर रखते ही पुरूष, पुरुष हो जाता है। स्त्री यदि उसकी इच्छाओं को अपनी इच्छा न बना ले, उसके इशारे पर आँख-कान बंद करके न चले तो खैर नहीं।ÓÓ
स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी के प्रवेश के बाद उनके आह्वान से हरेक वर्ग की स्त्रियां अपने घरबार से उबरकर आंदोलन में हिस्सा लेने निकल पड़ीं। उन्होंने भी स्त्रियों पर होनेवाले अन्याय और अत्याचार के खिलाफ काफी साहसी टिप्पणियां की थीं। 'यंग इंडियाÓ में उन्होंने लिखा- ''अगर पति अपनी पत्नी की परवाह नहीं करता तो ऐसी हालत में पत्नी को चाहिये कि वह बिना कानूनी संबंध तोड़े पति को छोड़कर अलग ऐसी जिंदगी जिये, जैसे उसकी शादी नहीं हुई हो। इसके अलावा एक हिंदू पत्नी, जिसे तलाक न मिल सके- के पास दो और कानूनी रास्ते हैं। पति को मारपीट के जुल्म में सज़ा दिलवाए और पति से भरणपोषण का हक ले।ÓÓ गांधीजी ने यह क्रांतिकारी रास्ता दिखाया ज़रूर; परंतु स्त्री कभी भी इतनी स्वतंत्र और सक्षम नहीं हो पायी कि अपवादों को छोड़कर वह पति या ससुरालवालों से अपने हक वसूल कर सके।
प्रेमचंद के लेखन पर विचार करते हुए हमें उनकी समकालीन व पूर्व की नारी संबंधी इस वैचारिक और व्यावहारिक पृष्ठभूमि से अवगत होना ज़रूरी था। अब हम प्रेमचंद के साहित्य में 'नारी विमर्शÓ पर चर्चा कर सकते हैं।
प्रेमचंद के साहित्य में हमें नारी विमर्श तीन स्तरों पर दिखाई देता है- पहला, उनके कथासाहित्य के स्त्री-चरित्रों के संवादों और आचरण में; दूसरा, कथासाहित्य के अन्य पात्रों में और तीसरा, कथासाहित्य और लेखों में व्यक्त उनके विचारों और टिप्पणियों के माध्यम से। यह 'विमर्शÓ सोचसमझकर या बहुत सचेतन ढंग से प्रेमचंद नहीं करते। तत्कालीन परिस्थितियों के बरअक्स उनके स्त्री विषयक विचार जगह-जगह अनेक रूपों में व्यक्त हुए। वे समाज में स्त्री की विषम परिस्थिति के प्रति संवेदनशील थे, वे ज़्यादातर इस परिस्थिति से जूझती स्त्रियों को अपने कथासाहित्य में सहानुभूति के साथ चित्रित करते थे। ''प्रेमचंद (1880-1936) का रचनाकाल एक तरह से स्वतंत्र भारत के बनने का भी रचनाकाल था। उनके उपन्यासों और कहानियों पर नवजागरण और गांधी के विचारों और कार्यों का प्रभाव भी था। प्रेमचंद की मृत्यु के दो वर्ष बाद यानी सन् 1938 में यूरोप में वर्जिनिया वुल्फ (1882-1941) की पुस्तकों 'ए रूम ऑफ वन्स ओनÓ तथा 'थ्री गिनी•ाÓ के प्रकाशन से नारीवादी साहित्य का आरंभ माना जाता है। इस तथ्य को इसलिए रेखांकित करना आवश्यक है क्योंकि सन् 1936 में लिखे 'गोदानÓ में प्रेमचंद ने वीमेन्स लीग की बात की है। महिलाओं के लिए एक जिम के खुलने की बात उसमें आती है तथा मालती और उसकी छोटी बहन जैसे पात्र हैं, जो स्वतंत्र वरण एवं निर्णय की संकल्पना को चरितार्थ करते हैं; यहाँ तक कि इस स्वतंत्र वरण को ग्रामीण स्थिति एवं परिवेश में सिलिया भी चरितार्थ करती है। एक सीमा तक जालपा भी- ये सारे पात्र तत्कालीन हिंदी लेखन में हम मौजूद पाते हैं। बिना किसी नामविशेष के नारी विमर्श की सार्थक पहल हिंदी में, तभी से शुरू हो जाती है।ÓÓ यह बात सच है क्योंकि सुभद्राकुमारी चौहान, महादेवी वर्मा जैसी लेखिकाएं और रवीन्द्रनाथ टैगोर, जयशंकर प्रसाद जैसे लेखक भी रुढि़-परम्पराओं का विरोध करनेवाले नारी-चरित्रों की सर्जना कर रहे थे। प्रसाद की ध्रुवस्वामिनी का चरित्र और राजपुरोहित द्वारा अंत में दिया गया रूढि़भंजक निर्णय क्रांतिकारी है।
प्रेमचंद के अनेक नारी पात्र परिस्थितियों से हार न माननेवाले हैं। अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार वे बिगड़ती स्थिति पर नियंत्रण पा लेते हैं। प्रेमचंद के नाम से उनकी जो पहली रचना 'ज़मानाÓ के दिसम्बर 1910 के अंक में छपी थी, वह 'बड़े घर की बेटीÓ थी। उनकी नजऱ स्वाभाविक रूप से शुरू में मध्यवर्गीय खानदान की शिक्षित स्त्रियों पर थी; जिनके मन में कठोर पारिवारिक दशाओं और धार्मिक वर्जनाओं के विरुद्ध स्वतंत्रता की पीड़ाभरी अकुलाहट थी। आनंदी एक भिन्न स्त्री बन रही थी। प्रेमचंद पुरूष-स्त्री विषमता का विरोध करते हैं, पर वे परिवार जैसी संस्था को उजाडऩे के पक्ष में नहीं हैं। यहां तक कि वे ऐतिहासिक स्थितियों के विरुद्ध जाकर 'संयुक्त परिवारÓ को भी टूटने से बचाना चाहते हैं। उनका परिवार को विघटन से बचाने का प्रयास करना वस्तुत: कुछ उच्चतर मानवीय मूल्यों को बचाने की कोशिश थी। खासकर कृषिजीवी परिवारों का विघटन भारत में काफी दर्दनाक नतीजों तक ले जानेवाला था। एक तरह से प्रेमचंद ने परिवार, विवाह, प्रेम, सेक्स और बदलती नैतिकता के संदर्भ में स्त्री की स्थिति पुनर्परिभाषित करनी चाही।ÓÓ वे परिवार को टूटने से बचाना चाहते थे परंतु साथ ही साथ स्त्री की स्थिति भी सुधारना चाहते थे। उन्हें महसूस होता था कि स्त्रियों की दयनीय स्थिति दो तरह से सुधर सकती है- पहली, स्त्री शिक्षित बनकर आर्थिक रूप से स्वावलम्बी बने और दूसरी, समाज की अनेक सड़ी-गली रूढि़-परम्पराओं को खत्म करें।
स्त्रियों में शिक्षा और आर्थिक स्वावलम्बन की बात प्रेमचंद के अनेक उपन्यासों, कहानियों और लेखों में आई है। कहीं-कहीं वे पुरुष के अन्याय से क्षुब्ध होकर लिखते हैं - ''पुरुषों ने स्त्रियों को इतना सताया है कि अब वे माताएं और गृहिणी न बनकर आर्थिक स्वाधीनता प्राप्त करने पर तुली हैं। अगर पुरुष बच्चे पालना और खाना बनाना नहीं जानते तो स्त्री क्यों सीखे! वे खाना क्यों पकाएं? वकालत क्यों न करें, अध्यापिका क्यों न बने?ÓÓ उनकी कहानी 'पत्नी से पतिÓ की पत्नी या 'गोदानÓ की गोविंदी तो स्पष्ट रूप से स्वयं द्वारा अर्थार्जन करने की पेशकश करती हैं। ये मध्यवर्गीय स्त्रियां हैं। निम्नवर्गीय स्त्रियाँ तो वैसे भी स्वयं अर्थार्जन करती ही हैं। 'समरयात्राÓ की नोहरी, 'गोदानÓ में धनिया, 'जुरमानाÓ की अलारक्खी जैसे अनेक स्त्री-पात्र हैं, जो अर्थार्जन के साथ-साथ घर-परिवार की जिम्मेदारियां भी निभा रहे हैं; इसीलिए वे मुंहफट भी हैं। प्रेमचंद घरेलू कामों को, बाहर निकलकर अर्थार्जन करने से कमतर नहीं समझते। उनके अंतिम अधूरे उपन्यास 'मंगलसूत्रÓ की पुष्पा अपने पति को साफ-साफ सुनाती है- ''यदि मैं तुम्हारी आश्रिता हूं तो तुम भी मेरे आश्रित हो। मैं तुम्हारे घर में जितना काम करती हूं उतना ही अगर मैं दूसरों के घर में करूं तो अपना निर्वाह कर सकती हूं।ÓÓ वह अपने पति को चुनौती देती है। प्रेमचंद ने नारी के घरेलू कार्यों को उत्पादन की विस्तृत प्रक्रिया से बाहर नहीं रखकर, नारी मुक्ति के अधिक व्यापक पहलुओं पर विचार किया। वह नारी को गरिमा प्रदान करना चाहते थे, इसलिए उसकी मुक्ति को उन्होंने शोषित मनुष्यता के ही एक मुक्तिचिन्ह के रूप में रेखांकित किया।ÓÓ
स्त्री घर में शोषण का शिकार होती है क्योंकि उसके घरेलू कार्य को अनुत्पादक और महत्वहीन मान लिया जाता है। जब किसी भी वर्ग की स्त्री अर्थार्जन के लिए बाहर निकलती है तब भी उसका पति या घर का अन्य पुरुष उसे घरेलू कामों में कुछ भी मदद नहीं करते। अत: उसका काम दोहरा हो जाता है। आज भी यह स्थिति नहीं सुधर पाई है। प्रेमचंद द्वारा आरंभ किया नारी विमर्श का यह बिंदु आज तक सुलझ नहीं पाया है बल्कि ज़्यादा विकराल रूप धारण करता जा रहा है। डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है- ''जहां श्रम की बराबरी होगी, स्त्री आर्थिक रूप से स्वतंत्र होगी, अपने पैरों पर खड़ी होगी, शिक्षित होगी, वहां सहयोग के आधार पर परिवार का नया रूप बनेगा। मैं समझता हूं कि इतिहास की गति यह है और नारी समस्या को हल करने का तरीका यह है।ÓÓ दिखने में आसान लगनेवाला यह तरीका सैकड़ों वर्षों के रूढ़ संस्कारों के कारण व्यवहार में आज तक नहीं उतर पाया है। हालांकि आर्थिक आजादी से स्त्रियों की हैसियत में कुछ तो परिवर्तन आया ही है। पति-पत्नी के संबंधों में 'मैत्रीभावÓ का समावेश निस्संदेह एक उपलब्धि है। पर निर्णयकर्ता अभी भी पुरूष ही है। घर और बाहर दोनों स्थलों पर। भारतीय स्त्रियों के लिए परिवार ही महत्वपूर्ण है।
प्रेमचंद के रचनाकाल में कुछ स्त्रियों ने स्त्री की पारम्परिक छवि को नकारकर विद्रोह किया था। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त इन स्त्रियों को लगने लगा था कि भारत की पिछड़ी स्त्री की छवि से छुटकारा पाने का एक ही रास्ता है कि वे पश्चिमी मूल्यों और आदर्शों का अनुकरण करें। प्रेमचंद इस प्रवृत्ति से काफी परेशान थे। वे लिखते हैं- ''एक तरफ पुरानी बेहूदा रस्में हैं, दूसरी ओर पश्चिम की अंधाधुंध नकल है और उससे पैदा होनेवाले उपद्रव।ÓÓ इसी तरह उन्होंने सन् 1935 में दयाराम निगम को लिखे अपने खत में कहा - ''भाई, मैं तो तालिमयाफ्ता लड़कियों की जानिब से खुदा जाने क्यों बदगुमान हूं। अभी तक तो लड़कों की लापरवाहियों के बावजूद गृहस्थी चलती थी, लेकिन जब दोनों एक ही रंग में रंग गये तो फिर खुदा ही हाफिज है। शिक्षा और पश्चिमीकरण की मिलावट ने शिक्षित पुरुषों-स्त्रियों, दोनों में खुदगर्जी, कृत्रिमता और पृथकता की प्रवृत्ति बढ़ा दी थी।ÓÓ मिस पद्मा, मालती, खन्ना, मिस मेयो आदि इसी तरह के पात्र हैं, जो शिक्षा से प्राप्त स्वतंत्रता को स्वच्छंदता में बदल देते हैं। परंतु प्रेमचंद मूल्यों को नहीं छोडऩा चाहते अत: वे गांधीवादी प्रभाव के कारण उन पात्रों का हृदय-परिवर्तन कर उन्हें अंतत: अपनी संस्कृति के अनुकूल बना देते हैं।
स्त्रियों की दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार एक अन्य पहलू है - समाज में व्याप्त अनेक सड़ीगली अन्यायपूर्ण रूढिय़ां। प्रेमचंद इनके खिलाफ भी अपने पात्रों को खड़ा करते हैं। अनमेल विवाह, विधवा समस्या, वेश्या समस्या, पुरुषों के बहुविवाह को मान्यता आदि अनेक समस्याओं पर उन्होंने नारीवादी ढंग से सोचा समझा है। 'निर्मलाÓ में अनमेल विवाह की समस्या पर बहुत गहराई से विचार किया गया है। इसमें प्रेमचंद तोताराम के मुंह से कहलाते हैं- ''जब युवक वृद्धा के साथ प्रसन्न नहीं रह सकता तो युवती क्यों किसी वृद्ध के साथ प्रसन्न रहने लगी?ÓÓ इस समस्या से ग्रस्त अनेक नारी-पात्रों की उन्होंने रचना की है - 'कुसुमÓ कहानी की कुसुम, 'स्त्री-पुरुषÓ की आशा, 'गृहदाहÓ की देवप्रिया, 'शांतिÓ की शांति, 'सेवासदनÓ की सुमन, 'प्रतिज्ञाÓ की सुमित्रा, 'निर्मलाÓ की निर्मला, 'कन्याविवाहÓ की आशा आदि ऐसे पात्र हैं, जिनका विवाह उनके माता-पिता या सगेसंबंधियों ने आर्थिक अभाव या अच्छे खानदान के लालच के कारण उम्र से काफी बड़े या अयोग्य व्यक्तियों से कर दिया था। 'कायाकल्पÓ की मनोरमा तो कह देती है- ''जो विवाह लड़की की इच्छा के विरूद्ध किया जाता है, उसे मैं विवाह नहीं समझती।ÓÓ
दहेज भी हमारे समाज की एक ऐसी प्रथा है, जिसने स्त्री को अपने ही घर में पराया और हीन बना रखा है। प्रेमचंद के अनेक स्त्री पात्र दहेज प्रथा का सीधा-सीधा विरोध करते हैं। 'गोदानÓ में होरी की बड़ी लड़की सोना पिता की आर्थिक दयनीयता का अनुभव कर वर पक्ष के पास दो टूक संवाद भेजती है कि उसे विवाह में सोना के घर से दहेज की कोई रकम नहीं मिल सकती। यदि बिना दहेज के रिश्ता करना कबूल हो तो ठीक, नहीं तो सोना आत्मघात कर लेगी। किसी भी परिस्थिति में वह अपने विपन्न बाप के बोझ को बढ़ाने के लिए तैयार नहीं होगी। लड़की द्वारा ऐसा 'बोल्डÓ कदम उठाना, प्रेमचंद के विचारों की बोल्डनेस का परिणाम है। विवाह के लिए दहेज दिया जाना और विवाह के बाद पति के घर जाने की जो सामाजिक परंपरा है, वह भी स्त्री की कमज़ोर स्थिति के लिए जिम्मेदार है। सामाजिक कार्यकर्ता मणिमाला स्त्री के पिछड़ेपन के लिए इस कारण को जिम्मेदार मानती हैं - ''औरत का आदमी के घर जानेवाली आवश्यक स्थिति का असर मां-पिता के घर पर भी पड़ता है। चूँकि यह तय रहता है कि बेटी तो दूसरे को सुख देने के लिए एक दिन यह घर छोड़कर हमेशा के लिए दूसरे के घर चली जाएगी, उसका लालन-पालन भी केवल विवाह के बाजा र की मांग एवं पूर्ति के नियमानुसार होता है, उसमें विवाह करने भर की योग्यता पैदा की जाती है। इसी कारण औरतें भी स्वतंत्र रूप से अपनी भावी योजना नहीं बना पाती हैं क्योंकि यह इस बात पर निर्भर होता है कि ससुरालवाले उससे क्या अपेक्षा रखते हैं। इन्हीं कारणों से पिता के परिवार में भी पुत्री की जगह पुत्र के बाद होती है और पति के परिवार में तो वह अनुचरी है ही। इस तरह परिवार का तानाबाना कुछ ऐसा है कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का भी इस्तेमाल औरतें नहीं कर पाती हैं।ÓÓ
स्त्री के इस 'परिवार-परिवर्तनÓ के कारण ही वह विवाह होने तक पिता और भाई पर निर्भर रहती है और विवाह के पश्चात पति और पुत्र पर। इसी स्थिति के कारण पति की मृत्यु के बाद उसे जो विधवा की जि़ंदगी जीनी पड़ती है, वह आश्रयहीन असहाय औरत में उसे बदल देती है। विधुर दोबारा-तिबारा भी विवाह कर सकता है पर स्त्री के लिए अभी भी पुनर्विवाह काफी कठिन है। प्रेमचंद ने सन् 1933 में 'विधवाओं के गुज़ारे का बिलÓ शीर्षक लेख में विधवाओं के पुनर्विवाह से आगे जाकर स्त्री को सम्मानित जि़ंदगी जीने का रास्ता सुझाया है- ''वही स्त्री, जो पति के जीवनकाल में घर की स्वामिनी थी और जिसने उस गृहस्थी के निर्माण में पति के साथ सारी कठिनाइयां झेलीं, पति के मरते ही अनाथ हो जाती है। उसी की गोद के लड़के उससे आँखें फेर लेते हैं और उसकी जो दुर्गति होती है, वह हम नित्य अपनी आँखों देखते हैं। उसे केवल अपने लड़कों या पति के बंधुओं की दया का अवलंबन रह जाता है। पति की छोड़ी हुई सम्पत्ति पर उसका कोई अधिकार नहीं रह जाता। अगर सम्मिलित परिवार है, तब तो उसकी दशा और भी शोचनीय हो जाती है। वह स्वामिनी से लौंडी हो जाती है और सारे घर की सेवा करके अपने जीवन के दिन काटती है। इस दशा में कितनी ही घर से निकल जाती हैं, कितनी अपमान और कठिनाइयों से तंग आकर पतिता हो जाती हैं। अगर पुरुष अपनी सम्पत्ति का जिस तरह चाहे उपयोग कर सकता है, तो स्त्री को क्यों उस अधिकार से वंचित किया जाए! जब सम्पत्ति पर उसका कानूनी अधिकार हो जाएगा तो उसके लड़के अथवा बंधु सभी उसका आदर करेंगे और किसी को उसकी मर्जी के खिलाफ कोई काम करने का साहस न होगा।ÓÓ इसी तरह श्री हरविलास शारदा द्वारा जनवरी 1931 में प्रस्तुत किये गये विधवाओं के सम्पत्ति संबंधी अधिकार के बिल की भी प्रेमचंद प्रशंसा करते हैं। ''विधवाओं को अपने स्वर्गारोही पति की जायदाद पर अधिकार दिलाने का जो बिल मि. शारदा पेश करने जा रहे हैं, उससे एक बड़े भारी सामाजिक अन्याय का परिशोध होगा। हिन्दू समाज ने अपनी देवियों के साथ बहुत दिनों तक जुल्म किया और अब उसे इस जुल्म की जड़ खोदने में विलंब न करना चाहिये। हमें आशा है, मि. शारदा के इस बिल का देश में स्वागत होगा।ÓÓ इसके अलावा उन्होंने 'नारी जाति के अधिकारÓ लेख में विवाह और सम्पत्ति-संबंधों में स्त्री-पुरूष समानता संबंधी क्रांतिकारी विचार व्यक्त किये हैं- ''1. एक विवाह का नियम स्त्री-पुरुष दोनों ही के लिए समान रूप से लागू हो। कोई पुरूष पत्नी के जीवनकाल में दूसरा विवाह न कर सके। 2. पुरुष की सम्पत्ति पर पत्नी का पूरा अधिकार हो। वह उसे रेहन-बाय, जो कुछ चाहे कर सके। 3. पिता की सम्पत्ति पर पुत्रों और पुत्रियों का समान अधिकार हो। 4. तलाक का कानून जारी किया जाए और वह स्त्री-पुरुष दोनों ही के लिए समान हो। 5. तलाक के समय स्त्री, पुरूष की आधी सम्पत्ति पाये और यदि मौरूसी जायदाद हो, तो उसका एक अंश।ÓÓ यह कहना सच है कि प्रेमचंद अपने स्त्री पात्रों को अपने जा माने से काफी आगे चित्रित करते थे। आज जब स्त्री विमर्श की एक चिंता यह भी है कि स्वतंत्रता और वैश्वीकरण के नाम पर स्त्री को एक नये प्रकार की 'बाजा रू छविÓ देने की कोशिश की जा रही है, स्त्रियों का एक छोटा हिस्सा अपने दैहिक सौंदर्य को बाज़ार में हर कीमत पर बेचने को तैयार बैठा है और इसको वह अपनी आ जा दी और हक समझ रहा है। टी.वी.धारावाहिकों में स्त्री-पुरूष की यौन स्वच्छंदता का भद्दा चित्रण हो रहा है, विवाह बाह्य संबंधों को भावनात्मक चाशनी में लपेटकर प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रेमचंद ने इसका लघु संस्करण 'गोदानÓ की मालती और 'मिस पद्माÓ की पद्मा में पेश किया है। परन्तु प्रेमचंद अपनी मूल्याधारित दृष्टि के कारण इन दोनों स्त्रियों का हृदय परिवर्तन कर उनकी जीवन धारा को मोड़ देते हैं। पद्मा अपने ही जाल में स्वयं फंसकर जीवनभर के लिए दु:खी हो जाती है पर मालती सामाजिक कार्यों में स्वयं को लगाकर अपने 'तितलीÓ रूप से छुटकारा पा लेती है।
प्रेमचंद के अनेक स्त्री पात्र अपनी परिस्थितियों से विद्रोह कर अप्रत्याशित व्यवहार करते हैं। खासकर 'गोदानÓ में इस तरह के अनेक प्रसंग मिलते हैं। 'गोदानÓ के स्त्री पात्रों पर टिप्पणी करते हुए डॉ. रमेश कुंतल मेघ लिखते हैं - ''इस कृति में गोबर, झुनिया, रूपा, सिलिया, मीनाक्षी के रूप में एक ऐसी विद्रोही पीढ़ी उभर रही है, जो गांव का गर्म खून है। मसलन- विवाहपूर्व गर्भवती झुनिया को सास धनिया, अपनी पुत्रवधु के जायज़ हक देती है; मीनाक्षी अपने ऐयाश पति को हंटर से पीटकर विवाह-विच्छेद कर लेती है; रूपा अपने भटके हुए किसान पति को गंडासा तानकर खबरदार करती है और चमारिन सिलिया अपने ब्राम्हण प्रेमी मातादीन को हड्डियां-मांस खिलाकर अपनी बिरादरी में सहजत: शामिल कर लेती है। वह नारी सशक्तीकरण, दलित-विद्रोह, युवा-रूपांतरण का भविष्यवादी घोषणापत्र बन जाता है, जो प्रेमचंद के सुधारवाद को सदैव के लिए हाशिये से भी बहिष्कृत कर देता है।ÓÓ सचमुच 'गोदानÓ में रायसाहब की बेटी मीनाक्षी के चरित्र का विकास चौंकानेवाला है। वह पहले आम लड़कियों जैसी थी। दिग्विजयसिंह से उसकी शादी हुई पर वह उसे पसंद न कर पाई क्योंकि वह ऐयाश, मगरूर और डींगखोर था। इसके विपरीत मीनाक्षी अध्ययनशील लड़की थी। ''...पत्रों में स्त्रियों के अधिकारों की चर्चा पढ़-पढ़कर उसकी आंखें खुलने लगी। वह क्लब में आने-जाने लगी। वहाँ कितनी ही शिक्षित, ऊंचे कुल की महिलाएं आती थीं। उनमें वोट, अधिकार, स्वाधीनता और नारी-जागृति पर खूब चर्चा होती थी। जैसे पुरूषों के विरुद्ध कोई षड्यंत्र रचा जा रहा हो। अधिकतर वही देवियाँ थीं, जिनकी अपने पुरूषों से नहीं पटती थी। जो नई शिक्षा पाने के कारण पुरानी मर्यादाओं को तोड़ डालना चाहती थीं। कई युवतियाँ भी थीं, जो डिग्रियां ले चुकी थीं और विवाहित जीवन को आत्मसम्मान के लिए घातक समझकर नौकरियों की तलाश में थीं। ऐसी स्त्रियों के बीच मीनाक्षी मिस सुल्ताना से कानूनी सलाह लेकर दिग्विजयसिंह पर गुज़ारे की डिग्री ठोंक देती है और सफल भी हो जाती है। पर उसे चैन नहीं मिलता। एक दिन वह हंटर लेकर दिग्विजय की कोठी पर पहुंचती है और वहां चल रहे वेश्या के नाच को रुकवाकर सबको हंटर से खूब पीटती है परंतु वेश्या के प्रति सहानुभूति दिखाती है। यहां प्रेमचंद पर सन् 1930 के आसपास बन रही हिंदी फिल्मों का प्रभाव दिखता है। नाडिया की 'हंटरवालीÓ फिल्म की नायिका को उन्होंने मीनाक्षी में उतारा है। वे चूँकि फिल्मजगत से भी कुछ दिनों तक जुड़े रहे थे, इसलिए उन पर हिंदी फिल्मों के कुछ तत्वों के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता।
प्रेमचंद के कथासाहित्य में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के भी प्रसंग आते हैं। इसमें भी वे कई स्त्रियों की भागीदारी और सहानुभूति दिखाते हैं। 'पत्नी से पतिÓ में स्पष्ट रूप से पत्नी को देश और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अनुराग होता है; तो 'समरयात्राÓ में नोहरी जैसा चरित्र देशभक्ति का झंडा बुलंद करता है। प्रेमचंद स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे तक प्रभावित थे। ''वे स्वतंत्रता आंदोलन में जेल नहीं गये थे, परंतु शिवरानी देवी इस संघर्ष में जेल गई थीं। प्रेमचंदजी के घर का यह सत्य उनके स्त्री पात्रों की शक्ति बना।ÓÓ शशिकला राय प्रेमचंद के स्त्री-पात्रों के संदर्भ में अपना मत प्रकट करते हुए लिखती हैं- ''प्रेमचंद ने स्त्री-हृदय को विविध कोणों से पढऩे की कोशिश की है। स्त्री मुक्ति की अवधारणा को लेकर प्रेमचंद की लड़ाई कई जगह समाज से न होकर खुद से ही है। एक तरफ स्त्री-पात्रों में स्वाधीनता की चाह है, अपने लिए भी और राष्ट्र के लिए भी। दूसरी तरफ मूल्य, त्याग, समर्पण, शील, मर्यादा के प्रति गहरी आस्था है। सड़ीगली मान्यताओं के केंचुल उतार फेंकने का विद्रोही तेवर भी हैं।ंÓÓ इन तेवरों के बावजूद प्रेमचंद पुनर्जागरण युग से आगे आकर स्त्री को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर देखना चाहते हैं। जहां वे अंधविद्रोह या पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण की बात करते हैं, वहां उनकी भाषा व्यंग्यात्मक हो जाती है, वे स्थितियों की आलोचना करने लगते हैं। 'गोदानÓ में मीनाक्षी वाले प्रसंग में ही वे क्लब की स्त्रियों का वर्णन करते हुए छिपा व्यंग्य करते हैं कि वहां आनेवाली स्त्रियों को घर-परिवार की जिम्मेदारियों से कोई लेना-देना नहीं है। हम ऊपर कह आये हैं कि प्रेमचंद 'परिवारÓ को तोडऩा नहीं चाहते परंतु 'गोदानÓ में ऐसी स्थितियां हैं, जहां उन्हें स्वयं के विचारों से संघर्ष करते हुए टूटन दिखानी पड़ी है। नारी विमर्श का एक चरण 'टूटनÓ भी है।
प्रेमचंद के समूचे लेखन में स्त्री चरित्रों की इतनी विविधता और सूक्ष्मता है कि उसका समग्र और गहराई से अध्ययन कर उसके परिप्रेक्ष्य में सदी के नारी विमर्श की समीक्षा करना काफी समय और विस्तार की मांग करता है फिर भी यह कहना मुनासिब होगा कि प्रेमचंद का नारी विमर्श हमारे सामाजिक ढांचे के नुकीले कोणों को ठीक करता हुआ है, उसके अनुरूप है अत: आज भी स्वीकार्य है, वह उसे तोड़ता हुआ नहीं है।