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Sunday 19 Nov 2017

अक्षरपर्व का चिरप्रतीक्षित भीष्म साहनी अंक प्राप्त हुआ। अंक का अंतर्बाह्य दोनों ही पर्याप्त श्लाघ्य हैं।

अक्षरपर्व का चिरप्रतीक्षित भीष्म साहनी अंक प्राप्त हुआ। अंक का अंतर्बाह्य दोनों ही पर्याप्त श्लाघ्य हैं। आदतन मैं अक्षरपर्व के आदि और अंत से सर्वप्रथम रूबरू होता हूं। ललितजी ने प्रस्तावना में भीष्म साहनी की कतिपय चर्चित कहानियों के माध्यम से उन्हें स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कथा साहित्य का एक मूर्धन्य कथाकार प्रमाणित किया है। पुनश्च, आपने भीष्म जी को अल्पोक्ति (अंडरस्टेटमेंट) का कलाकार यथार्थ ही कहा है। निश्चय ही उनमें अपने समकालीन कहानीकारों की भांति बड़बोलापन (अतिशयोक्ति) रंचमात्र भी नहींथी। कथ्य के स्तर पर उनकी कहानियां मर्मस्पर्शी यथार्थ से संपृक्त हैं और शिल्पगत अकृत्रिमता उनकी उल्लेखनीय विशेषता है। सर्वमित्राजी ने उपसंहार में भीष्मजी के बहुआयामी व्यक्तित्व को पत्रिका के किसी एक अंक में समेटना कितना दुरह व श्रमसाध्य कार्य है इस तथ्य को बड़ी ईमानदारी से स्वीकार किया है। आपकी इस सहज स्वीकारोक्ति से असहमत नहींहुआ जा सकता कि भीष्म जी की रचनाओं पर गहन मंथन कर हम आज के जटिल समय को भी बेहतर बना सकते हैं। यों तो अंक की कुल सामग्री बड़ी बहुमूल्य है और भीष्मजी के व्यक्तित्व व कृतित्व का सम्यक अनुशीलन करने में सहायक है। तथापि कुछ आलेखकारों की सामग्री अंक को गरिमामंडित बनाती है, जैसे प्रो.अर्चना जैन, आनंदस्वरूप श्रीवास्तव, चंचल चौहान, प्रो.दिनेश कुमार चौबे, कमल कुमार, मंजू कुमारी, प्रो.आलोक भल्ला, तरसेम गुजराल आदि। कुछ आलेख पढऩा अभी शेष है। भीष्म साहनी जन्मशती विशेषांक एक ऐसा बहुमूल्य दस्तावेजी अंक है जो भीष्म जी के अनुसंधित्सुओं के लिए तो वरदान ही है।

भगवानदास जैन, अहमदाबाद