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Tuesday 21 Nov 2017

भोलाराम का जीव : राष्ट्र निर्माण का जिम्मा

पल्लव
393 डीडीए, कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी
शालीमार बाग़
दिल्ली 110088
भारतीय विश्वास और मिथक मनुष्यधर्मी हैं अथवा उन्हें पुरोहिती के खातिर गढ़ लिया गया था। हरिशंकर परसाई नाम का एक लेखक इन सबसे जूझा है और इन्हें नए अर्थ देने की कोशिश भी की। धर्म और लोक विश्वासों से जुड़ी बातों पर सीधे सीधे बहस करने में अब रचनाकार बचते हैं लेकिन परसाई नहीं। उनकी कसौटी बहुत मामूली है, मनुष्य। यदि कोई बात सदियों से चली आ रही है और परसाई को लगता है कि यह मनुष्य विरोधी रीत है तो वे उसे ध्वस्त करने में पल भर का समय भी खराब नहीं करेंगे और यदि इसका उलटा है तो उन्हें उसे स्वीकार करने में कैसा भी संकोच नहीं। संभव है इसके पीछे विचारधारा का असर हो जिससे उन्हें मनुष्यविरोधी विचार और शक्तियों से लडऩे की ताकत मिलती हो। दूसरी बात यह भी है कि अपनी बात कहने के लिए परसाई जैसा रचनाकार अकेला है जो विधा की परवाह नहीं करता कि यह जो लिखा जा रहा है वह कहानी बनेगा या निबंध। विधा को दरेरा देने वाले हिन्दी में वे पहले कथाकार हैं।  
भोलाराम का जीव परसाई की प्रसिद्ध कहानी है और सालों से पढ़ी जाती रही है। परसाई की शैली और भाषा इतनी सरल है कि प्रतीत होता है इसमें अव्याख्येय कुछ भी नहीं। तब भी एक रचना हमारे सामने चुनौती देती दिखाई दे रही है कि इसे लिखे बरस बीते और इसका व्यंग्य अब भी कुंद नहीं पड़ा। यहाँ भ्रष्टाचार की कथा है और यह भ्रष्टाचार कितना सनातन है यह परसाई बता रहे हैं। बात यह है कि मामूली सरकारी कर्मचारी रिटायर हो गया और पांच साल तक पेंशन के लिए चक्कर लगाते लगाते मर गया। हुआ यह कि उसके जीव को लेने जब यमदूत गया तो जीव यमदूत को चकमा देकर ऐसा गायब हुआ कि खोजे न मिला। आखिर जब नारद स्वयं उसे ढूंढते हुए धरती पर आए तो वह जीव अपनी पेन्शन फाइल में अटका पाया गया। आश्चर्य यही कि नारद के कहने पर भी वह स्वर्ग में जाने को तैयार नहीं क्योंकि उसका मन अपनी पेंशन फाइलों में ही अटक गया है।
क्या यह मामूली हिन्दुस्तानी की नियति नहीं? होरी क्या चाहता था? अमरकांत की कहानी दोपहर का भोजन की सिद्धेश्वरी को याद करें या फिर घीसू माधव के पास लौट जाएं। त्रास यही है कि जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में मनुष्य का दुर्लभ जीवन नष्ट हुआ जा रहा है और व्यवस्था तब भी उसे बुनियादी जरूरतें पूरा नहीं करने दे रही। इस पर दिक्कत गहरी है कि हमें आध्यात्मिक क्षेत्र में अव्वल माना जाए क्योंकि हम विश्वगुरु भी हैं। और जब विश्वगुरु हैं तो रोटी, कपड़ा और मकान जैसी क्षुद्र चीज़ों पर बात न की जाए। हमें बड़े दार्शनिक मामलों को देखना है। जीवन जगत के रहस्यों को सुलझाना है, वेद और उपनिषद देखिये।
परसाई ठीक यहीं चोट करते हैं। वे नाजुक स्थल पहचानते हैं और उनके माफऱ्त अपनी बात कहते हैं। उनकी अपनी बात और कुछ नहीं आज की बात है, जरूरी बात है। कहानी की शुरुआत देखिये। जिस भ्रष्टाचार से हम दबे हैं वह कितना सर्वव्यापी है कि उसकी पहुँच अलौकिक हो गई है।
धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास स्थान अलॉट करते आ रहे थे। अर्थात धर्म के ढकोसलों को सच्चा मानना व्यर्थ है।
नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाईं। बड़े बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मज़दूरों की हाजिरी भर कर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं।
यह कहानी का प्रारम्भ है और वे इस शुरुआत में ही स्वर्ग और नरक की दिव्यता-अलौकिकता का मिथक तोड़ देते हैं। मिथक यह तोड़ते हैं कि कुछ भी जीवन से बाहर नहीं है और जीवन से अधिक सत्य कुछ भी नहीं। जिस अलौकिकता का आधार बनाकर धर्म के पुरोहित-पण्डे लोगों को ठगते हैं उस अलौकिकता को कहानी के प्रारम्भ में ये वाक्य तत्क्षण धराशायी कर देते हैं। यह मनुष्य की जय का गान है क्योंकि परसाई की विचारधारा मानती है कि मनुष्य से बड़ा कुछ भी नहीं। न देवता और न स्वर्ग।  
फिर जब धर्मराज से बात कर नारद तैयार हुए कि वे स्वयं धरती पर जाकर देखेंगे कि भोलाराम का जीव कहाँ अटक गया है, तो नारद सीधे भोलाराम के घर पहुंचे। भोलाराम की पत्नी ने जो बताया वह यह था -क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पांच साल हो गए, पेंशन पर बैठे। पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में सब गहने बेच कर हम लोग खा गए। फिर बरतन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दी। जिन्हें इस संसार में मनुष्येतर, जीवनेतर चिंताएं व्यापी रहती हैं वे अवश्य गरीबी की बीमारी से परेशान हो जाएंगे। भला यह भी कोई बात है? भारतीयता को आध्यात्मिकता से जोडक़र देखने वाले राष्ट्रप्रेमियों को भी यह बातें नहीं सुहातीं और हम कहाँ जाएंगे, सरीखी महान कला-चिंताओं से जूझते मनीषियों को यह साहित्य जैसे स्वयं के मूल्य में विचारधारा का हस्तक्षेप लगता है उन्हें अवश्य गरीबी की बीमारी एक वाहियात बात लगती है लेकिन परसाई को नहीं। जिस देश में और जिस दुनिया में आधे से ज्यादा मनुष्य गरीबी की बीमारी से त्रस्त हों वहां किसी लेखक और कलाकार की प्राथमिकताएं उन मनुष्यों के प्रति है। परसाई यही करते हैं। और जीवन की सम्भावनाएं कैसे खोज लाते हैं। नारद के कहने पर कि क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी।
भोलाराम की पत्नी जवाब देती है- ऐसा तो मत कहो, महाराज ! उम्र तो बहुत थी। पचास साठ रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं कर के गुजारा हो जाता। पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली। यह क्या है? यह मनुष्य विरोधी व्यवस्था को आईना दिखाना है कि यह वह व्यवस्था है जिसने असमय भोलाराम का जीवन समाप्त किया है जिसमें अभी सम्भावना थी। यह मनुष्य विरोधी शक्तियों को भोलाराम की पत्नी के मार्फत परसाई का करारा जवाब है जो मामूली लोगों को कीड़ा-मकोड़ा समझती है और कभी उन्हें कैटल क्लास तो कभी कुत्ता कह देती है। प्रेमचंद ने कहानी के जिस सिंहासन से राजकुमारों और अवतारों को उतारकर घीसू, हामिद और गंगी को बैठाया था, परसाई उस जगह को किसी भी मनुष्य विरोधी के हाथ में नहीं जाने देते। इस नजर से यह भोलाराम के जीव की नहीं भोलाराम की कहानी है जो महान राष्ट्र से कह रही है कि भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी को उसके हक़ का वाजिब न दे पाने वाली यह व्यवस्था असल में व्यवस्था कहलाने लायक भी नहीं है। जिस राष्ट्र के लिए हमारे लोगों ने अंग्रेजों से भारी लड़ाई की थी वह राष्ट्र हम बना नहीं पाये। और यही कारण है कि जिस स्वर्ग के लिए हमारे पुराणों -उपनिषदों और लोक में भारी तपस्याओं के उल्लेख हैं, जो मनुष्य जीवन के लिए सबसे बड़ा पुरुषार्थ बताया गया है भोलाराम का जीव उसे ठुकरा देता है और स्पष्ट कह देता है- मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोडक़र नहीं जा सकता। पेंशन की बात उसके लिए स्वर्ग से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है, जरूरी है।
ध्यान दें तो यह वह दौर है जब देश पंचवर्षीय योजनाओं के सुहाने सपनों से उत्फुल्ल है, समाजवाद के सुहाने दृश्य साकार होने की आशा जन मन में है और परसाई इन सपनों की हकीकत बता रहे हैं। परसाई चाहते तो यहां दर्शन के बड़े भारी जुमले इस्तेमाल कर सकते थे। उनकी लम्बी कहानी तट की खोज इसका प्रमाण है कि वे दर्शन और जीवन जगत के भारी मतों को रचनाओं में किस कुशलता से बोली-बानी में रख सकते थे लेकिन यहां ऐसा करना उन्हें आवश्यक नहीं लगता। कला का शिखर यहीं है जहां लेखक बहुत बड़े सत्य को मामूली दिखाई देने वाली बात में प्रकट कर दे। व्यंग्य उसके लिए औजार है और इस कहानी में भी वे ग़म का फ़साना मजे मजे से सुनाते हैं। नारद के पूछने पर कि भोलाराम का जी किसी स्त्री विशेष में तो नहीं लगा था तब उसकी पत्नी कैसे पलट कर जवाब देती है- अब कुछ मत बको महाराज ! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। जिंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आंख उठाकर नहीं देखा। यहां परसाई का उत्तर देखिये जो नारद के मार्फ़त आया है नारद हंस कर बोले- हां, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है। क्या यह बात राष्ट्र और नागरिक के सम्बन्ध पर लागू नहीं होती? वे चाहते हैं कि महान भारत राष्ट्र का जयगान करें ताकि गरीबी, भूख, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जातिवाद और अन्याय की बात न हो। क्या यही महान राष्ट्र का आधार नहीं है जो आजादी के बाद के नेताओं ने दिया है। वे यही चाहते हैं कि आप अध्यात्म पर विचार करें, आप यह विचार करें कि जन गण मन जार्ज पंचम की प्रशस्ति में है अथवा नहीं, आप नेताजी के जीवित होने की संभावना पर चिंतन करें और राष्ट्र निर्माण हम पर छोड़ दें। एक ऐसा राष्ट्र जहां गरीब और गरीबी जैसे फ़ालतू विषयों पर समय न खराब करना पड़े।