Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

समय की विश्वसनीय पुकार


संजय कृष्ण
ध्रुव तिवारी का मकान
तपोवन कॉलोनी, नीचे मुहल्ला
कोकर, रांची-834001
मो. 09885710987
मिथिलेश्वरजी का आत्मकथात्मक उपन्यास ‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’ वाणी प्रकाशन से छपकर आया है। पुस्तक की पीठ पर इसके बारे में सूचना दी गई है- ‘...आत्मकथात्मक उपन्यासों का यह तीसरा और अंतिम उपन्यास है। लेकिन अब तक की उनकी कृतियों में बेजोड़, बेमिसाल और यादगार कृति है।’ इसके पहले उनकी आत्मकथा की दोनों पुस्तकें ‘पानी बीच मीन प्यासी’ (2010) और ‘कहां तक कहें युगों की बात’ (2011) आ चुकी हैं। सूचना के मुताबिक, यह तीसरा और अंतिम है। मिथिलेश्वर जी 65 को छू रहे हैं। लेकिन अवकाश ग्रहण करने से पहले ही उन्होंने अपनी आत्मकथा अपने प्रिय पाठकों को सौंप दी। अपने जीवन-संघर्ष को अपने पाठकों से साझा किया है तो इसके पीछे एक दृष्टि और उद्देश्य भी है कि समय रहते पाठकों को अपनी राम कहानी बता दें। ऐसा न हो कि आगे चलकर उम्र आधिक्य के कारण स्मृति लोप का शिकार होना पड़े और ‘आत्मकथा’ मन में ही रह जाए। एक सजग, सच्चे और संवेदनशील रचनाकार के नाते उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई और यह आपबीती उनके निजी जीवन या गांव-घर की चौहद्दी तक सिमटी नहीं है। एक पूरा कालखंड और उस कालखंड में समय का पूरा इतिवृत्त अपने पूरेपन में समाया हुआ है। जिन लोगों ने उनकी पहली दोनों आत्मकथाएं नहीं पढ़ी हैं, वे इस अंतिम आत्मकथात्मक उपन्यास को पढक़र दोनों की कमी को पूरा कर सकते हैं। क्योंकि इसमें उन्होंने अपने अब तक के संपूर्ण जीवन के कालखंड को समेट दिया है।
साहित्य की सामाजिकता में विश्वास करने वाले मिथिलेश्वरजी पिछले 45-50 साल से रच रहे हैं। उनका पहला कहानी संग्रह 1976 में ‘बाबूजी’ नाम से आया था। तब से उनकी रचना प्रक्रिया अनवरत-सोद्देश्य जारी है। बेशक, इन 44-45 सालों में देश-समाज-गांव, परिवार-परंपरा और संस्कार बदले हैं। प्रेमचंद के गांव बदले हैं। रेणु के गांव ने नई शक्ल धारण की है। आरा-बैसाडीह का गांव भी बदलाव से अछूता नहीं रह सका है। वह गांव भी बदला। गांव की पगडंडियां बदलीं। गांव की संस्कृति और संस्कार बदले। तालाबों की शक्लोसूरत बदली। खपरैल और झोपडिय़ां बदलीं। खूटें बदले। आम, जामुन, कटहल के स्वाद बदले। संवेदनाएं बदली। घर बदले। आंगन बदले। चूल्हों की तासीर बदली। ये बदलाव कई स्तरों पर हुए। इन बदलावों को देखने, समझने और महसूस करने के लिए मिथिलेश्वरजी की रचनाएं सबसे अधिक विश्वसनीय, प्रामाणिक और तरतीब नजर आती हैं। पांच दशकों का उनका रचनात्मक संसार देश के बदलाव की यात्रा भी है और उनकी इस आत्मकथा का ‘उपसंहार’ भी।
जब हम ‘जाग चेत कुछ करौ उपाई’ से गुजरते हैं तो उनकी दोनों आत्मकथाओं की यादें ताजा हो जाती हैं और एक बार फिर हम उनके साथ उनके बचपन के गांव से यात्रा आरंभ कर देते हैं। बैसाडीह की यादें, खेत-खलिहान, चोरी-सीनाजोरी और फिर पिता का आकस्मिक निधन। मजबूरियों और विवशताओं के बीच आरा में ठिकाना। मां का संबल। भरा-पूरा परिवार। भाई-बहन की शादी-ब्याह की चिंताएं। फिर नौकरी के लिए संघर्ष। हारी-बीमारी। फिर बेटियों की शादी... वगैरह-वगैरह। जब हम चाहे-अनचाहे उनके जीवन की घटनाओं से गुजरते हैं, उनके जीवट, संघर्ष और मजबूत मनोबल को देखते हैं तो यह फिर असाधारण लेखक की साधारण कहानी भर नहीं रह जाती। यह कहानी हमें कई स्तरों पर जोड़ती हैं, एकाकार करती है और हमारे मर्म को छूती हुई हमें संवेदित करती है। उनका जीवन, समाज का जीवन लगने लगता है। ऐसे चरित्र हमें अपने आसपास दिखाई देने लगते हैं। यह कहानी राम कहानी बन जाती है। घर-घर की कहानी बन जाती है। इस आत्मकथात्मक उपन्यास की यही विशेषता है कि वह सिर्फ उन तक ही सीमित नहीं रह जाता। उन्होंने अपने तक इसे केन्द्रित भी नहीं किया है। धुरी वही है लेकिन परिधि का विस्तार अनंत-असीम है।
अपनी इस तीसरी रचना में पूर्ववर्ती दोनों आत्मकथाओं का उल्लेख कथाकार ने किया है। ‘‘पानी बीच मीन प्यासी’’ नामक आत्मकथा का अंत गर्दिशों, परेशानियों और लंबी बेरोजगारी के बाद विश्वविद्यालय शिक्षक की नौकरी पाने के सुखद एहसास से किया था। मेरे जीवन में उस आत्मकथा के कालखंड की सबसे बड़ी घटना जीविकोपार्जन से जुडऩा था, इसलिए सुखद अनुभूतियों ने उस आत्मकथा को सुखांत बना दिया...। लेकिन इसके विपरीत ‘कहां तक कहें युगों की बात’ के कालखंड में मेरे जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना या सबसे बड़ा हादसा मां का निधन रहा। इस स्थिति में न चाहते हुए भी मां के निधन के पूरे प्रसंग से इस आत्मकथा को समाप्त करना पड़ा। अगर ऐसा नहीं करता तो मां के निधन की असह्य पीड़ा को कम नहीं कर पाता। मां से संबंधित लंबे और कारुणिक प्रसंग ने ही इस आत्मकथा को दुखांत बना दिया।’’
मृत्यु एक शाश्वत सत्य है, लेकिन असमय किसी का निधन हमें झकझोर देता है। इस रचना में भी हम मृत्यु की छाया देख सकते हैं। मिथिलेश्वरजी के पिता भी 43-44 साल की उम्र में चल बसे थे। इस उपन्यास का अथ और इति भी मृत्यु से ही होता है। शुरूआत उनकी नौकरानी रामरती के आकस्मिक निधन से होती है और अंत भी उनके मित्र चंद्रकांत के अचानक दुनिया छोड़ अनंत में विलीन हो जाने से होता है। दूसरे अध्याय में अपने कालेज के साथी रामनाथ मिश्र के निधन के बहाने उनके पूरे जीवन, कर्म और संघर्ष को याद करते हैं। एक होनहार, प्रतिभाशाली व्यक्ति कैसे व्यवस्था की चक्की में पिसकर असमय मौत को गले लगा लेता है। रामनाथ मिश्र एक वित्तरहित कॉलेज में पढ़ाते हैं जो सरकारी होने की बाट जोहता है, लेकिन प्रबंधन तंत्र के अपने गुणा-लाभ के कारण वह सरकारी नहीं हो पाता और मिश्रजी को इतनी कम तनख्वाह मिलती है कि वे अपने बीमार बच्चे का ठीक से इलाज भी नहीं करा सकते और एक रात यही सोचते-सोचते दम तोड़ देते हैं। एक सज्जन, कर्मठ और ईमानदार आदमी का यही हश्र होता है। मिश्र की पूरी कहानी अत्यंत संवेदना के साथ कही गई है। एक प्रतिभा का ऐसा काल-कवलित हो जाना हमें झकझोर देता है। सरकार और संस्थाओं के खोखले चरित्र और उनके जानलेवा तंत्र के वे अकेले शिकार नहीं है। सिर्फ आंख उठाकर अपने आसपास देखने की जरूरत है। शिक्षा का संस्थानीकरण आगे चलकर बाजारीकरण में बदल जाता है। अपने देश में सबसे बुरा हाल शिक्षा और शिक्षण संस्थाओं का है। सरकार ने निकम्मेपन की चादर ओढ़ ली है और शिक्षा को बाजार के हवाले कर दिया है।
तीसरे अध्याय में तीसरे मित्र प्रो. डी.के. तिवारी की कहानी है जो उनसे उम्र में बड़े थे और एक राजनीतिक दल में सक्रिय थे। इस दल के पास वैज्ञानिक विचारधारा थी। जिंदाबाद-मुर्दाबाद जैसे सुघड़-जीवंत नारे थे, वर्गहीन-जातिहीन समाज का सपना था, लेकिन यह पार्टी भी, जब टिकट देने का समय आता, जाति देखने लगती या जनाधार। इस तरह एक समर्पित और ईमानदार पार्टी कार्यकर्ता भी चुनाव लडऩे से वंचित हो जाता। के.डी. तिवारी भी अवकाश ग्रहण करने के बाद बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सके और वर्गहीन समाज का सपना भी उनके साथ ही चला गया। कथनी-करनी का अंतर व्यक्ति को भी कठघरे में खड़ा करता है और दल या पार्टी को भी। अपने को प्रगतिशील कहने या कहलाने वाली पार्टियां भी अपवाद नहीं रह सकीं और इसका खामियाजा तिवारी जैसे कर्मठ और समाज बदलने के धुन के पक्के कार्यकर्ताओं को निराशा या अवसाद में जाकर चुकाना पड़ता है। भारतीय राजनीति का चरित्र-चेहरा, चाल और छल-छद्म दिखाई देने लगता है। बदलाव की बात या तो घोषणापत्रों में होती या भाषणों में। यह तब भी सच था आज भी सच है। यह सचमुच भरोसा और विश्वसनीयता का संकटकाल है। संक्रमण का दौर है।
इस संक्रमण के दौर से गुजरते हैं तो बहुत कुछ दिखाई देता है। एक तो यही कि हमारे विश्वविद्यालय मूर्खों के अड्डों में तब्दील होते जा रहे हैं, जहां रचनात्मकता के लिए कोई स्पेस नहीं बचा है। देश में विश्वविद्यालयों की संख्या कम नहीं। हिन्दी विभाग तो होंगे ही। अब उन पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे यहां सबसे अधिक जातिवाद है। नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद आगे हो जाता है और प्रतिभा मुंह ताकती रह जाती है। गुरु-शिष्य परंपरा भी कायम है। यहां रचनाकार नहीं, डिग्रीधारी अध्यापक चाहिए। जिसने चोरी से ही सही, डाक्टरेट किया हो, डी.लिट् किया है। प्रोन्नति तो उसे ही मिल सकती है। यह महत्वहीन है कि आप रचनाकार हैं, दर्जनों संग्रह छप गए हों, देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हों, इसलिए, हमारे देश के विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों में आपको रचनाकार कम, तथाकथित विद्वान और डिग्रीधारी खूब मिलेंगे। शोध की तो पूछिए ही मत। पैसा दीजिए शोधग्रंथ लीजिए। विद्या के मंदिर में यह खेल खूब है। और तो और, हिन्दी के प्राध्यापक भी यूजीसी से शोध के नाम पर लाखों वसूलते हैं और शोध के नाम पर कूड़ा-करकट एकत्रित करते हैं। हमारे विश्वविद्यालयों का यही हाल है। अपवाद हो सकते हैं। उन्हें आप उंगलियों पर गिन सकते हैं लेकिन विश्वविद्यालयों में प्रतिभा का प्रवेश जैसे वर्जित है। मिथिलेश्वर जी ने इस तरह के अपने कई अनुभव साझा किए हैं, जो सिर्फ उनके अनुभव नहीं रह जाते। मिथिलेश्वर जी को जब नौकरी मिली तो उनकी कहानियों के कई संग्रह आ चुके थे। सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार उनकी झोली में था। इस बिना पर उनकी नियुक्ति हुई, लेकिन ये अपवाद ही हैं। फिर भी उन्हें कम परेशानी नहीं झेलनी पड़ी। प्रोन्नति के लिए पीएचडी करनी पड़ी। हिन्दी के कथित-तथाकथित सेवकों के ताने अलग से। लिखने के लिए समय कैसे निकाल लेते हैं, इसकी चिढ़ साथी प्राध्यापकों को। जैसे ये कोई बड़ा अपराध कर रहे हों। ऐसे दुर्गंध देते विश्वविद्यालयों में रचनात्मक काम छोड़ हर काम होते हैं, जिससे उसका कोई वास्ता नहीं होना चाहिए। अच्छा, आप किताब कैसे लिख लेते हैं? कैसे समय निकाल लेते हैं? जैसे पढऩा-लिखना पाप हो। हम ऐसे ही समाज में रह और जी रहे हैं। प्राथमिक विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक यही स्थिति है। विश्वविद्यालय ही क्यों, बदबू देते सरकारी अस्पताल भी हैं, जहां इस लेखक को कई तरह के अनुभव से गुजरना पड़ता है। मिथिलेश्वरजी ने ठीक ही लिखा है कि ‘‘जीवन की यात्रा किसी सरल रेखा की तरह नहीं होती, हमारे व्यक्तिगत जीवन में उतार-चढ़ाव के साथ-साथ हमारे अनुभव हमें बहुत कुछ समझाते-बताते तथा जमीनी सच्चाइयों से अवगत कराते हैं।’’ मिथिलेश्वरजी की यह आत्मकथा दरअसल उनका ‘आत्म’ भर नहीं है, यह समाज की, व्यवस्था की, घटना संवेदना और निर्लज्ज राजनीति की भी कथा-व्यथा है, जिसमें हम जी रहे हैं। सांस ले रहे हैं। इस कथा को पढ़ते हुए हम उनके ‘आत्म’ और उसके विस्तार को देख सकते हैं। उनकी सादगी, ईमानदारी और लेखन के प्रति उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता और उत्तरदायित्व को समझ सकते हैं, जहां किसी प्रकार के नारे का शोर नहीं है। यहां कोई वाद नहीं, न उसका दावा है। बहुत सादगी के साथ हम उनकी रचना प्रक्रिया को महसूस करते हैं। कहानियों और उसके पात्रों की स्थिति, परिस्थिति और मन:स्थिति को समझ सकते हैं। चरित्रों के बहुलतावादी संसार में विचरण कर सकते हैं, जिसके पास कहने और सुनाने को बहुत कुछ है। यहां गंवई मन के शहरी अनुभव भी हैं। क्योंकि यहां रमेसर बाबा जैसे चरित्र हैं, जिनके पास लोककथाओं का अनमोल खजाना है। तीव्र वैज्ञानिक विकास के तहत तेजी से बदलती और ग्लोबल होती दुनिया में हमारी लोक कथाएं और लोकगीत बहुत तेजी से गायब हो रहे हैं। कहने-सुनने की परंपरा भी खत्म हो रही है। गांवों में लगने वाले चौपाल पर चलने वाली किस्से-कहानियों की जगह राजनीति ने ली है। तब, इन्हें बचाना और भी जरूरी हो जाता है। मिथिलेश्वरजी ने इसके लिए कई खतरे उठाए। जान जोखिम में डाल गांव-गांव जाकर लोककथाओं को संकलित किया। रमेसर बाबा हों या पोखरिया गांव की नानी या फिर रसिक बिहारी ओझा निर्भीक से मुलाकात। और इस यात्रा में लहूलुहान एक बूढ़ी माता, जिसे चाहते हुए भी एक संवेदनशील रचनाकार नहीं भूल पाता। मिथिलेश्वर जी लिखते हैं, ‘आज मैं आकलन करता हूं तो पाता हूं कि भोजपुरी लोककथाओं की खोज-यात्रा ने मुझे अनेक नई जानकारियां दीं, नए अनुभव से संपन्न बनाया तथा नई रचनात्मकता प्रदान की। अपने पारंपरिक सृजन से अलग का रचनात्मक सुख मैंने पाया। लेकिन इस सबके बावजूद इस यात्रा ने मुझे एक स्थायी पीड़ा भी दी है। अपने बेटे की मार से अपने दोनों लहूलुहान पैर गुमटी से लटकाकार बैठी इस बूढ़ी माता को मैं चाहते हुए भी भूल नहीं पाता हूं...।’ इस पुस्तक में इस तरह के कई अनमोल और संवेदित करने वाले अनुभव हैं। सातवें अध्याय में इसकी विस्तार से कहानी कही गई और इस कहानी में एक पात्र और है जो छाया की तरह उनके साथ हैं, वह हैं कृष्ण कुमार। 277 पेज के इस रचनात्मक यात्रा में वे अदृश्य नहीं हैं। सदेह यहां हाजिर हैं। पत्नी रेणु और बेटियां तो है हीं।
16-17 सालों से मिथिलेश्वर जी को जान, समझ और पढ़ रहा हूं। उनकी सादगी, सज्जनता और सरलता उनकी भाषा में भी दिखाई देती है। उनकी रचनाओं में भी एक ताजगी मिलती है और उनकी आत्मकथाएं भी किसी रचना की तरह ही आस्वाद देती हैं। इस आत्मकथा को पढ़ते हुए नहीं लगता है कि हम किसी रचनाकार को पढ़ रहे हैं, बल्कि एहसास यह तारी होता है कि हम अपने समाज को देख-पढ़-सुन रहे हैं। हमारी आंखों के सामने एक आईना है, जिसमें हम खुद दिखाई दे रहे हैं और हमारा समाज भी। कहीं कोई रंग-रोगन नहीं; जैसा है वैसा ही। लथपथ भी, लहूलुहान भी, लौकिक भी, अलौकिक भी, भौतिक भी, अभौतिक भी, सुंदर भी-असुंदर भी। गंध भी दुर्गंध भी। आप बीती के साथ जग बीती भी।