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Saturday 18 Nov 2017

अकोला में हिन्दी की राष्ट्रीय संगोष्ठी

 

अकोला में  हिन्दी की राष्ट्रीय संगोष्ठी
अकोला। जन-जन की भाषा हिन्दी न केवल राष्ट्रभाषा है, बल्कि वह हर भारतवासी के हृदय में समाई है, हिन्दी में गंगा की सर्वग्राह्यता, फूलों की कोमलता, प्रकृति की सृजनता और संवेदना के स्तर पर हिमालय की असीम ऊंचाई है। हिन्दी की इन विशेषताओं को अपने समेटे दीर्घकाल से उत्तरोत्तर विकसित होती कविता, हिन्दी भाषा का सर्वश्रेष्ठ अंग है,जिसके निरंतर उत्थान के लिए सभी को सदैव कटिबद्ध होना चाहिए। भाषा ही राष्ट्र को आवाज देती है। स्वभाषा ही राष्ट्र की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है। यदि राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं तो वह गूंगा हो जाएगा, इसलिए स्वभाषा की डोर को थामकर ही साहित्य के सर्वांगीण विकास की राह पकड़ी जा सकती है, यह सार मंथन के रूप में सामने आया 28 जून को महाराष्ट्र के अकोला शहर में आयोजित हिन्दी की एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में। राष्ट्रभाषा सेवी समाज अकोला और महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी का विषय था ''स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशा।ÓÓ
अकोला के आरएलटी साइंस कॉलेज के सभागृह में आयोजित संगोष्ठी का उद्घाटन किया रायपुर से पधारे दैनिक देशबन्धु के प्रधान संपादक एवं कवि ललित सुरजन ने। प्रमुख अतिथि एवं वक्ता के तौर पर उपस्थित थे हिन्दी कविता के हस्ताक्षर नरेश सक्सेना, अध्यक्षता की सत्यनारायण गोयनका ने तथा स्वागताध्यक्ष थे महाबीज के प्रबंध संचालक अरुण उन्हाले। उद्घाटन सत्र में उपरोक्त अतिथियों समेच मंच पर मौजूद संस्था के अध्यक्ष डॉ. रामप्रकाश वर्मा, विशेष अतिथि कवि प्रतापराव कदम, सुरेशनारायण कुसुंबीवाल, भोपाल की तबस्सुम खान, वर्धा की श्रीमती शशि पुरवार, अमरावती के राज्य साहित्य अकादमी सदस्य प्रो. डॉ. शंकर बुंदेले, प्रो. डॉ. ज्योति व्यास, डॉ. वर्षा शाह का संस्था की ओर से शाल श्रीफल, उत्तरीय तथा स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया गया। संगोष्ठी के कुल पांच चरण हुए, जिनमें कविता, साठोत्तरी कविता, अकविता, गद्यात्मक कविता, विविध विमर्श, आधुनिक कविताएं, व्यंग्य काव्य, नवगीत, हाइकू पर मंथन किया गया। संगोष्ठी में ''स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता : दशा और दिशाÓÓ विषय पर प्रकाशित पुस्तक का विमोचन भी किया गया।