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Monday 20 Nov 2017

भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में मीरा की काव्य साधना


निक्की कुमारी
राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय
बांदरसिंदरी, किशनगढ़ (अजमेर)
मो. 9166481719
मध्यकालीन भक्ति-आन्दोलन अपने समय का एक महान सांस्कृतिक आन्दोलन था। अपने युग संदर्भों में वह एक क्रांतिकारी तथा जन आन्दोलन भी था। डा. रामविलास शर्मा ने इस आन्दोलन का संबंध लोकजागरण से जोड़ा है जो बिल्कुल सही है। मीरा इसी भक्ति आन्दोलन की अनूठी देन है। मीरा की काव्य साधना उनकी भक्ति साधना ही है। उनके काव्य का एकमात्र स्वर भक्ति ही है, लेकिन वे मध्यकालीन सामंती व्यवस्था की पीडि़त नारी भक्त कवयित्री हंै। इस पीडि़त नारीत्व को भूलकर उनकी कविता को हृदयंगम नहीं किया जा सकता। भगवद्विरह की पीड़ा को कम कवियों ने इतना मादक और प्रभावोत्पादक बनाकर प्रकट किया होगा। मीराबाई की भक्ति युग सापेक्ष होते हुए भी अपने और परवर्ती युग के लिए मार्ग प्रदर्शक है। मीरा अपने लौकिक जीवन में एक क्रांतिकारी अथवा विद्रोही प्रवृत्ति की नारी के रूप में सामने आती है। मध्यकाल का पुरूष कवि भक्त होने के लिए जाति-पांति, धन, धरम, बड़ाई छोड़ता था तो स्त्री को लोक-लाज, कुल श्रृंखला तोडऩी पड़ती थी। मीरा की रचनाओं में लोकलाज, कुल को तोडऩे की बात बहुत बार आई है।1 तत्कालीन सामाजिक बन्धनों को तिनके के समान तोड़ देने वाली इस नारी रत्न ने भक्ति क्षेत्र में रूढ़ हुई अनेक मान्यताओं, मर्यादाओं अथवा बन्धनों को बड़े साहस से तोड़ा है। मीरा की कविता नारी के अंतर्मन की उस घुटन और तड़प का प्रतिनिधित्व करती है, हमारी परम्परा और वेद तथा धर्मशास्त्र विहित हमारे विधि-विधानों के चलते, जो सदियों से नारी के अंतर्मन में उमड़ती-घुमड़ती रहती है और जिसे ढोना नारी की नियति बन गया है, या मान लिया गया है। भक्ति के अंतर्गत सामाजिक समानता का जो भाव निहित था वही मीरा को आकर्षित कर रहा था। मीरा के भाव की अनुभूति किसी दर्शन या सम्प्रदाय के खांचे में नहीं बैठायी जा सकती। जिस प्रकार कबीर के विद्रोही व्यक्तित्व को किसी सम्प्रदाय या परिधि में नहीं रखा जा सकता ठीक उसी प्रकार मीरा का विद्रोही स्वर किसी खाँचे में नहीं आ सकता। मीरा के पदों के माध्यम से मीरा के आत्मनिवेदन को, उनके मन की कचोट को, उनके मन-मस्तिष्क में पल और पक रही समाज तथा सत्ता के महाप्रभुओं के प्रति उनकी गहरी वितृष्णा को तथा राजवधू होने के बावजूद, नारी होने के नाते अपने तथा नारीमात्र की असहाय स्थिति को पढऩा मुश्किल नहीं है।
    मीरा की भक्ति हमें दो रूपों में दिखाई देती है। एक ओर मीरा अपने युग के सम्पूर्ण धार्मिक बन्धनों से जुड़ी हुई दिखाई देती है तो दूसरी ओर उस युग में पूर्ण प्रचलित, अनिवार्य एवं रूढ़ मान्यताओं को तिनके के समान तोडऩे वाले साहसिक व्यक्तित्व की धनी लगती है। मीरा ने लंबा आयुष्य नहीं पाया, किन्तु जितने समय तक वे जीवित रहीं, एक शीतल ज्वाला की तरह जलती-धधकती रहीं, बहुत से लोग उनके तेज और ताप को न सह सकने और न झेल सकने के कारण भयभीत और आतंकित हुए, किन्तु अधिसंख्य भावुक जनों को उनके तेज और ताप ने सुख और संतोष ही प्रदान किया। जिस लोकलाज और कुल की कानी को छोडऩे के लिए उन्हें धिक्कारा गया, उन्होंने उस प्रताडऩा तथा लांछना को सिर-माथे, प्रभु के प्रसाद की तरह स्वीकार किया। मीरा ने सामाजिक प्रतिष्ठा का ख्याल नहीं रखा। समाज से प्रदत्त स्त्रीत्व के सीमित दायरे को उन्होंने तोड़ा। जब मीरा के सामने विष का प्याला आया तो निडर होकर आत्मविश्वास के साथ पी लिया। इस सन्दर्भ में आचार्य विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है-विषपान मीरा का, मध्यकालीन नारी का, स्वाधीनता के लिए संघर्ष है और अमृत उस संघर्ष से प्राप्त तोष है जो भाव सत्य है। मीरा का संघर्ष जागतिक, वास्तविक है, अमृत उनके हृदय या भाव जगत में ही रहता है। 2 मीरा के पदों में अपने समय के रूढिग़्रस्त समाज से टकराने का स्वर काफी मात्रा में सुनाई पड़ता है। मीरा जब बार-बार लोक लाज, कुल की मर्यादा को तोडऩे की बात करती हैं तब वह उसी बाधा का संकेत करती हैं। 3 मीरा ने ईश्वरीय आलम्बन को मानवीय सम्बन्धों से जोड़ा। मीरा ने पति की परम्परागत सत्ता एवं अधिकार को स्वीकार नहीं किया और न पति के देहान्त के बाद सती होकर परम्परा को आगे बढ़ाया। उस युग के सामंती परिवेश तथा पुरुष प्रधान समाज में पति परमेश्वर माननेवाली हिन्दू स्त्री का परमेश्वर को पति मानने का अधिकार प्राप्त करना आसान नहीं था। यह एक प्रकार से राजनीतिक सामन्तवाद तथा धार्मिक परम्पराओं के विरुद्ध मीरा के रूप में युग की नारी का मूल विद्रोह था।4 सामंती व्यवस्था के विरोध में भक्ति आन्दोलन खड़ा रहा। मीरा के अध्यात्म का समाजदर्शन और समाजदर्शन का अध्यात्म में सुधा चौधरी ने लिखा है, विद्रोही मीरा जिस घृणित भाव से सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पराधीन मूल्यों को चुनौती देती है उतनी ही परिपक्वता, समझ एवं सम्पूर्णता के साथ अध्यात्म के तात्विक मर्म का उद्घाटन करती हैं। महादेवी वर्मा ने अपने व्याख्यान में मीरा के संदर्भ में कहा है- मीरा के पदों की उड़ान समूचे भारतीय आकाश में व्याप्त है, मानो कोई मुक्त पंछी असीम आसमान में उड़ रहा है। वे राजस्थान की हैं, गुजरात की हैं, बंगाल की हैं, समूचे भारत की हैं। वे भक्ति आन्दोलन की प्रेरक शक्ति हैं जिसने ब्राह्मण और शूद्र का भेदभाव ही मिटा डाला है। अत: वे सभी जातियों की हैं, सभी धर्मो की हैं, सर्वकालीन सर्वदेशीय हैं।
निजी जीवन के अनुभवों एवं अनुभूतियों की सघन अभिव्यक्ति उनकी कविता में मिलती है। इनके काव्य में अपूर्व भाव विह्वलता और आत्मसमर्पण का भाव है। मीराबाई अभिजन वर्ग की थीं, इसी वजह से इस वर्ग की आंतरिक जिंदगी से बखूबी वाकिफ  थीं, अभिजन वर्ग के प्रति उनमें जबरदस्त घृणा का भाव था। भक्ति और माधुर्य तत्व के माध्यम से मीरा ने लिंगीय भेदभाव और सामाजिक वैषम्य दोनों को एक साथ चुनौती दी। स्त्री के सामाजिक अधिकारों, खासकर स्त्री के मन एवं तन पर स्त्री के स्वामित्व की वकालत करने वाली वह पहली भारतीय लेखिका हैं। प्रो. रामबक्ष का आलेख मीरा का मर्म बताता है कि मीरा की असली समस्या स्त्री के मूल अधिकार 400 साल पहले मांग लेना थी और इसी कारण उसे बावरी करार दिया गया। द्रोपदी, अहल्या, कुब्जा, शबरी और गोकुल की अहीरनों की पीड़ा को, उनकी कसक को मीरा ने अनुभव किया और अपने काव्य के माध्यम से उसे अभिव्यक्त किया।
मीराबाई ने पुंसवादी सत्ता को बड़े कलात्मक एवं कौशलपूर्ण ढंग से चुनौती दी और वैकल्पिक दृष्टिकोण का निर्माण किया। मसलन, मीरा जिस राणा परिवार की सदस्या थीं उसमें एक लिंग और भवानी की पूजा का विधान था। इन दोनों कुल देवताओं की उपासना की बजाय उसने गिरधर नागर की उपासना पर जोर दिया। मीराबाई के गिरधर नागर में मनुष्य एवं ईश्वर का अंतर मिट जाता है। ईश्वर एवं मनुष्य के बीच का फर्क तभी गायब होता है जब धर्म का मानवतावादी बोध हो। धर्म का मानवतावादी ज्ञान ही ईश्वर की जड़ पूजा एवं अंधभक्ति से मुक्ति दिलाता है, रूढिय़ों से संघर्ष की प्रेरणा देता है। मीरा ने अवैध साधनों वाली रागानुराग भक्ति का मार्ग अपनाया, जो स्त्रियों के लिए अमान्य मानी जाती थी और परमभाव का निर्वाह करती हुई उन्मुक्त विचरती रहीं। वह समाज द्वारा लांछित भी हुई किन्तु उन्होंने अपना आत्ममुक्तता का मार्ग नहीं छोड़ा। 5 मीराबाई ने आज्ञाकारी बनने से इनकार किया, पिता का घर छोड़ा, ससुराल छोड़ा, राजपाट छोड़ा और संत बनना पसंद किया। यह एक तरह से समूचे सामंती परिवेश का परित्याग था। सामंती परिवेश आज्ञाकारिता पर टिका होता है और आज्ञाकारिता को ही मीरा ने ठुकरा दिया। यह मूलत: स्त्रीवादी चेतना है। स्त्री का दु:ख, उत्पीडऩ एवं दमन हमेशा निजी रहा है। स्त्रियां इसे छिपाती रही हैं। इससे पुंसवादी वर्चस्व को लाभ होता है। मीरा ने जो कुछ व्यक्तिगत था उसे सामाजिक कर दिया। निजी के सामाजिक करने के पीछे आधुनिकता का नजरिया झलकता है। मीरा ने घूंघट का त्याग करके एक ही झटके में निजी एवं सार्वजनिक परिवेश के विभाजन को अस्वीकार कर दिया तथा साथ ही सामंती प्रतिष्ठा को स्त्री की प्रतिष्ठा का पर्याय मानने से इनकार किया। साधु संगती में शामिल होने का अर्थ है घूंघट की लाज का जाना और सामंती पर्दा प्रथा से मुक्ति। पारम्परिक पर्दा, जिसे वे लोक लाज कहती थीं, छोड़कर कुल की कानि को ठुकराकर, साधु संगति करती थीं। मीरा का यह नृत्य समाज की सामंती व्यवस्था को तोड़ता है। यह स्वच्छन्दतावादी विद्रोह का प्रतीक है और कला के माध्यम से परमात्मा तक पहुंचने का प्रयास है। मीरा की विद्रोही चेतना का एक अन्य प्रतीक है उसका सती होने से इनकार करना। राजवंश में पति के मरने पर स्त्री को सती होना पड़ता था। यह युग, वंश, समाज एवं जाति की मांग थी। मीरा को भी इसके लिए बाध्य किया गया। मीरा ने इसके खिलाफ कहा-
जग सुहाग मिथ्यारे सजणी होवां हो मिट जासी।
गिरधर गास्यां, सती न होस्या मन मोहयो घनमाणीं 6। पन्द्रहवीं शताब्दी के राजपूताना समाज में  राजघराने की रानी सती होने से अस्वीकार करे, यह अपने आप में पितृसत्तात्मक समाज के लिए चुनौती थी। मीरा का यह विद्रोह व्यक्तिगत एवं सीमित परिवेश में था तथापि यह व्यक्तिगत होते हुए समाज के लिए चुनौती था। सामंती ढांचे में परिवार जैसी संस्था को ठुकराना, शादी के प्रति अस्वीकार बोध, निजी मन की अनुभूतियों को सर्वोपरि महत्त्व देना वस्तुत: स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता को निर्मित करने की काव्यात्मक कोशिश है। 7 मीरा का पितृसत्ता विरोध नैतिक धरातल से शुरू होता है और वहीं खत्म होता है। समूचे भक्तिकाव्य की कविता में विरोध का आधार नैतिक है। विरोध के नैतिक आधार को सामाजिक-आर्थिक विरोध के साथ जोडऩे में वह असमर्थ रही हैं। मीरा का पूरा काव्य सामाजिकता के रंग में रंगा हुआ दिखाई देता है और इसी वजह से मीरा का अध्यात्म अलग दिखाई देता है। मीरा का अध्यात्म पूरी तरह से सामाजिकता के रंग में रंगा हुआ दिखाई देता है। वह मैं के माध्यम से समूचे समाज की विवशता को दिखाती हैं। मीरा की आध्यात्मिकता के अंतर्गत लोकाभिमुखता, सामाजिकता आदि के दर्शन होते हैं, जिससे उनका काव्य काफी ऊँचा उठ जाता है।
मीरा की कविता प्रेम-भक्ति की कविता है। मीरा समूचे भक्तिकाल में अकेली नारी भक्त हैं जिन्होंने अपनी आत्मनिवेदनपूर्ण कविता में अपनी भक्ति और प्रेम के माध्यम से एक पूरी की पूरी समाज-व्यवस्था की असहिष्णुता और अमानवीय मानसिकता को, उसकी भेदभावपूर्ण रीति-नीति को और उसके दोमुंहे चेहरे को बेनकाब किया है। मीरा ने अपने प्रेम को अपनी अनुभूति का विषय बनाकर प्रस्तुत किया है। मीरा का प्रेम अभिव्यक्ति में उदात्त, अशरीरी, निष्कलुष और निश्छल है। इस प्रेम में दर्द की जो तीव्रता है, उससे उसकी प्रगाढ़ता का अनुमान लगाया जा सकता है। मीरा की कविता प्रेम की पीर की कविता है, दर्द की कविता है। प्रणय-निवेदन और उससे उपजा दर्द, यही मीरा की कविता का प्रधान विषय है। यह प्रेम सामान्य नहीं, कुछ अर्थों में असामान्य और असामान्य के प्रति है। मीरा के प्रेम को अलौकिक और दिव्य भी कहा गया है। अलौकिक वह इस अर्थ में है कि उसकी तरह की दीवानगी सामान्यत: हमें लोक में कम ही दिखाई पड़ती है। निराकार के प्रति तो वह नहीं ही है, उसका आलंबन कृष्ण है। 8 मीरा की भक्ति प्रेम रंग-रस से सरोबार थी। अत: यह स्वाभाविक ही था कि अपने प्रेमी के निश्छल प्रेम के लिए उन्हें कदम-कदम पर शारीरिक एवं मानसिक यातनाओं को झेलना पड़ा। यह सर्वविदित है कि प्रेम चाहे लौकिक हो या अलौकिक, समाज उसे आसानी से स्वीकार नहीं करता। इसी कारण मीरा को बार-बार अपने निश्छल, अटूट एवं अनन्य प्रेम की परीक्षा देनी पड़ी। वह एक पतिव्रता की तरह चित्रित की गयी है-
 कब री ठाढ़ी पंथ निहारां, अपने भवन खड़ी
अटक्या प्राण सांवरो प्यारो, जीवनमूर जड़ी।9
मीरा का प्रेम शुद्ध आत्मदान है, रूपासक्ति से सीधे प्रेमासक्ति में प्रवेश होता है, कामासक्ति की गंध भी उसमें नहीं मिलती। मीरा भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्णरूप से समर्पित थी। भगवान श्री कृष्ण की भक्ति के लिए उसने अपने सगे संबंधियों से भी नाता तोड़ लिया था। मीरा भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन करती है-
अरज करे अबला कर जोरे श्याम तुम्हारी दासी,
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटो जग की फांसी। 10
 प्रेम की परिधि की पूर्णता संयोग की सुखानुभूति और वियोग के ताप से ही संभव है। मिलन का सुख अपने आप में अपूर्ण और अधूरा होता है। प्रेम के संसार का सर्वाधिक उज्ज्वल पक्ष विरह की तड़प होती है। मीरा की पदावली में निस्संदेह मिलन से अधिक मिलन की उत्कण्ठा का, प्रियतम से अधिक प्रियतम की प्रतीक्षा का वर्णन मिलता है। मीरा का विरह-वर्णन उसकी स्वानुभूति से ओतप्रोत है। मीरा के विरह-वर्णन की सबसे बड़ी विशेषता मानसिक कष्टों का वर्णन है। मीरा के कई पदों में तो विरह का वर्णन इतना प्रभावोत्पादक और मार्मिक बन पड़ा है, कि वह आधुनिक युग के पाठक को भी झकझोर देने में समर्थ है। प्रत्येक पंक्ति में एक बेचैनी और व्याकुलता दिखाई देती है। मीरा अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में इतनी उन्मादिनी सी हो गई है कि लाज और संकोच का त्याग करके महलों के ऊपर चढ़-चढ़ कर अपने प्रियतम की बाट जोहती है-
सुण्यारी म्हांरे हरि आवाँगा आज,
म्हैलां चढ़ चढ़ जोवाँ सजणी कब आवाँ  महाराज। 11
मीरा की प्रेम भावना रहस्यवादी दृष्टि के स्पर्श से और अधिक घनीभूत हो गई है। मीरा की इस रहस्योन्मुखी भावना की भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता यही है कि प्रेम का सूत्र किसी न किसी रूप में सर्वत्र आच्छादित रहता है। मीरा का यह प्रेम भाव व्यापक तो अधिक नहीं है किन्तु तीव्र बहुत है। 12                                                                                                                       
भक्तिकालीन कवयित्री मीरा ने अपनी काव्य-साधना के माध्यम से व्यवस्था में परिवर्तन लाने की तमाम कोशिश की, लेकिन वो व्यवस्था आज भी वैसी की वैसी बनी हुई है, आज सिर्फ परिवेश बदला है। जिस भेदभावपूर्ण सामाजिक संरचना के तहत अपने समय में मीरा ने बहुत कुछ सहा और भोगा, तमाम प्रतिरोधों के बावजूद, वह सामाजिक संरचना न केवल बरकरार है, पहले से भी अधिक पीड़क हुई है। व्यवस्था के पंजे और मजबूत हुए हैं और उसके नाखून और दांत और भी पैने, व्यवस्था पहले से अधिक शातिर भी हुई है।
भक्तिकालीन संतों में कबीर हों, मीरा हों, प्रतिरोध सबने किया परंतु कुछ भी, इसलिए नहीं बदला कि मात्र सदिच्छाओं से या पीड़ा की वैयक्तिक अभिव्यक्तियों से, समाज नहीं बदला करता। 13 सामाजिक परिवर्तन जिन स्थितियों और जिन शक्तियों के तहत होता है, न तो वैसी स्थितियां उस समय थीं, ना ही वैसी शक्तियां। चली आ रही व्यवस्था के कुछ पहलुओं को विचार और आचरण के स्तर पर जरूर इन लोगों ने चुनौती दी, परंतु व्यवस्था के कुछ दीगर पहलू संस्कार बनकर उनके विचारों में घुले-मिले भी रहे, जिन्होंने उनकी सोच को भी प्रभावित किया और आचरण को भी। व्यवस्था की शातिर निगाहों ने उन्हें उनके समय में भी भांपा और आज भी उन्हें भांप रही है।
मीरा की पदावली को देखें, पढ़ें और विचार करें, तो स्पष्ट होगा कि एक औरत होने के अहसास से ही नहीं, औरत होने के नाते अपने कमजोर, निरीह, असमर्थ और लाचार होने के अहसास से भी मीरा की मनोभूमि काफी कुछ आच्छादित और आक्रांत है। अबला होने का अहसास उन पर इस कदर हावी है कि वे बार-बार अपने प्रभु या प्रियतम से अपनी रक्षा की गुहार लगाती है। श्रीकृष्ण से उनका संबंध भक्त का, प्रियतमा का और पत्नी का भी है, और श्रीकृष्ण प्रभु हों, प्रेमी हों, पति हों, अंतत: पुरूष ही हैं। हर स्थिति में मीरा के संरक्षक और उद्धारक। परम्परा भी ऐसा ही मानती है।
हम कह सकते है कि मीरा ने अपने समय में, अपनी सीमाओं में जो किया, बड़ा काम था। संतों ने प्रतिरोध की जो बानी बोली उसका भी हमारे लिए महत्त्व है। व्यवस्था न कबीर बदल सके न मीरा। उनके लिए यह संभव भी न था। उनका महत्त्व इस बात में है कि मुक्ति के सपने को उन्होंने पराधीनों की आंखों में जीवित रखा। नई सदी में भी वह उनकी आंखों में जीवित है। मीरा ने कोई पंथ, जाति, धर्म या संप्रदाय नहीं बनाया। अपने स्व के अस्तित्व की यात्रा में सबको साथ लेकर सबके साथ होकर रहती हैं। कवयित्री के रूप में मीरा की काव्यात्मक शैली, भक्ति की गहराई, प्रेम की प्रगाढ़ता एवं व्यंजनापरक रचनात्मक क्षमता पुरूष श्रेष्ठता की विचारधारा के उस बोधीवृक्ष को गिराती है जो महिला को बुद्धिहीना हो तुम का अहसास करवाता है। मीरा अपनी भक्ति के माध्यम से सामजिक, सांस्कृतिक एवं पराधीन मूल्यों को चुनौती देती है। मीरा ने स्त्री चेतना और स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए भक्ति का सहारा लिया। सामाजिक विभेद और स्त्री की अधिकारहीनता के विरोध के लिए भक्ति साधन बनी।
सन्दर्भ-  
1. शिवकुमार मिश्र, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य; दर्द-दीवानी मीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.242
2.    विश्वनाथ त्रिपाठी ,  मीरा का काव्य, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली पृ. 55
3.    परशुराम चतुर्वेदी मीराबाई पदावली, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, पृ. 52
4.    डॉ कमल किशोर गोयनका, हिन्दुस्तानी जबान, अक्तूबर-दिसम्बर 2005, पृ. 6
5.    बलदेव वंशी, भारतीय संत परम्परा, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.273        
6.    शहनाज बानो, भक्ति काव्य में पितृसत्ता और स्त्री-विमर्श, अनिरूद्ध बुक्स, नयी दिल्ली,     पृ. 203
7.    सं जगदीश्वर चतुर्वेदी. स्त्रीवादी साहित्य विमर्श,  अनामिका पब्लिशर्स, नयी दिल्ली, पृ. 40
8.    शिवकुमार मिश्र, भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य, दर्द, दीवानी मीरा, लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद, पृ.248 90.    परशुराम चतुर्वेदी, मीराबाई पदावली, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, पृ.181  
10.वही पृ. 352
11. रामकिशोर शर्मा व सुजीत कुमार शर्मा, मीराबाई की सम्पूर्ण पदावली, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ.168
12. डॉ. कृष्णदेव शर्मा, मीराबाई पदावली; आलोचना भाग मीरा की रहस्योन्मुखी भावना, पृ. 92
13. शिवकुमार मिश्र भक्ति आंदोलन और भक्ति काव्य; स्त्री विमर्श में मीरा, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृ. 259