Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

कचरा देखने का टिकट

प्रभाकर चौबे
शुक्ला प्रोविजन स्टोर्स के पास,
गोल चौक, रोहिणीपुरम, रायपुर (छ.ग.)
अब प्लेटफार्म अधिक दर्शनीय हो गया है। पहले प्लेटफार्म की गन्दगी देखने के आठ आने लगते थे, अब उसी का एक रूपया लगेगा। प्लेटफार्म का कचरा अब खूबसूरत लगेगा। हमें भी गर्व होगा कि हम एक रूपए में प्लेटफार्म देख रहे हैं। अब किसी को स्टेशन छोडऩे जाना भी शान को बढ़ाएगा कहेंगे कि एक रुपये में छोड़कर आ रहे हैं। ऐसा वैसा मत समझो। सरकार कीमतें बढ़ा बढ़ाकर दिन-ब-दिन हमें अमीर बना रही है। पहले पच्चीस पैसे में चाय पीते थे अब अस्सी पैसे में पीते हैं। पहले दो रूपये किलो की दाल खाते थे अब आठ रुपये किलो खाते हैं। चीजें महँगी हो रही हैं और हम सस्ते हो रहे हैं। जेब खाली हो रही हैं और हमारी रईसी बढ़ रही है। इस रईसी पर आश्चर्य होता है कि कुछ भी नहीं है फिर भी रईस हैं। सरकार ने प्लेटफार्म का टिकट बढ़ा दिया। आठ आने चिल्लर नहीं दे सकती सरकार तो पूरा रुपया ले लेगी। कमीज नहीं पहना सकती तो चड्ढी उतरवा ली कि अभी नंगे रहो जब कमीज देंगे तब चड्ढी पहनना। हमारे रेल मंत्री जमींदार हैं। चौधरी हैं तो पूरे गाँव का मालिकाना हक चाहिए। गाँव की एक दो बीघा जमीन से वे मानते ही नहीं। वे लेंगे तो पूरा रुपया, अठन्नी-चवन्नी का हिस्सा उन्हें पसन्द नहीं। तकलीफ देना है तो सोलहो आने की तकलीफ दो। आधा-पाव तकलीफ ज्यादा देना। वैसे मंत्रीजी जी धीरे-धीरे छुरी चला रहे हैं। हमारी गर्दन पर रेशमी कपड़ा रख दिया है। उस रेशमी कपड़े की मुलायमता के साथ छुरी गर्दन पर चलती है तो बड़ा आनन्द आता है। तो गर्दन पर छुरी भी चले और आनन्द भी आ जाये। ऐसा नहीं कि कसाई की तरह एकदम छुरी चला दी। बेचारा तड़पकर टें.... बोल गया। कसाई और सरकार में यही तो फर्क है। कसाई के पास रेशमी कपड़ा नहीं होता।
सरकार रेशमी कपड़ा रखती है। सरकार की इस प्यारी अदाकारी पर ही तो हम रीझ जाते हैं और अपनी गर्दन सामने कर देते हैं कि लो सरकार, हमारी गर्दन पर चलाओ छुरी। सरकार कहती है कि केवल प्लेटफार्म टिकिट बढ़ी है, रेल किराया नहीं बढ़ाया। अरे हम तो कहते हैं टिकिट भी नहीं बढ़ी। कहाँ बढ़ी, किधर बढ़ी। अब तो बढ़ी किसे कहते हैं यह ही हम भूल गए हैं। घर में एकाध बच्चा बड़ा पिन्ना होता है। दिन भर टुन टुन करके रोता ही रहता है। तो घर के लोग कह देते हैं- ऊँह, वह तो पिन्ना है ही। तो सरकार तुम जब कुछ बढ़ाती हो तो हमें आश्चर्य नहीं होता। हम कह देते हैं कि ये सरकार तो बढ़ौनी सरकार है। पिन्नी सरकार है। बात ऐसी है कि किसी को जोर का एक घूंसा मार दो और फिर एक चपत लगा दो। उसके बाद बहस करो कि घूंसा जोर से पड़ा या चपत। तड़पने वाला घूंसे और चपत दोनों की मार से तड़पे। रेल किराये की चपत तड़पा रही है कि प्लेटफार्म टिकिट का घूंसा तड़पा रहा है। सरकार इस पर बहस करेगी। अगर हम कहेंगे कि प्लेटफार्म टिकिट अधिक जोर से लगा तो रेल मंत्री कहेंगे कि इसका अर्थ हुआ कि रेल किराए की मार कम लगी। तो अब रेल मंत्री काम से नहीं बात से हमें हराना चाहते हैं। चतुर लोग हैं।
हमें तो मालूम है कि चतुर लोग गद्दी में बैठे हैं। पहले जोर की पिटाई लगा देते हैं फिर झुनझुना बजाकर हमारा मन बहलाते हैं कि प्लेटफार्म टिकिट बढ़ी अब इसे भूल जाओ और देखो रेल यात्रा में सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं। सुविधाओं का झुनझुना बजाकर सरकार हमारा दर्द दूर करना चाहती है। देखो छत्तीसगढ़ ट्रेन में नई बोगियां लगेंगी। रोज ही दक्षिण पूर्व रेल्वे यह कह रहा है। तो अब तीन नई बोगियाँ लग जाने से छत्तीसगढ़ ट्रेन राइट टाइम चलने लगेगी। ऐसा न हो कि ये तीन बोगियां पहले ही दिल्ली पहुंचे और पुरानी बोगियाँ लेट चलें। एक ही ट्रेन की कुछ बोगियां सही समय पर चलें और कुछ लेट। सरकार यह भी कर सकती है। सरकार के लिये कुछ भी असंभव नहीं। अरे भइया,जो सरकार हमें आँकड़ों के भरोसे ही जिन्दा रख ले उसके लिए क्या असंभव है। भ्रष्टचार को जो सरकार कहे कि भ्रष्टाचार अधिक नहीं है उस सरकार के लिए क्या असंभव है। हमारे पास कुछ न हो तो भी सरकार को बहुत कुछ दिखे।
लोग कहते हैं कि यह चुनावी साल का रेल बजट है इसलिए किराया नहीं बढ़ा। पार्सलों में छूट मिली। लड़का जब तक दूल्हा बना रहता है तब तक उसे कुछ नहीं कहा जाता। उसकी इज्जत की जाती है। लड़का उस समय मुन्ना से कुंवर साहेब कहलाने लगता है। तो चुनावी साल में जनता भी दूल्हा बन गई है। जनता की सुख सुविधाओं का पूरा पूरा ख्याल रखा जा रहा है। जनता इस चुनावी साल में जनता से माई बाप बना दी जाती है। यानि कि  चुनावी साल है तो किराया कम बढ़ा अगर चुनाव न हो तो तो दे मार, दे मार। और ठीक भी तो है कि शादी के बाद बोझ तो ढोना ही पड़ेगा। दूल्हा शादी के बाद पति बनकर गृहस्थी का बोझ ढोता है और जनता चुनाव के बाद टैक्स का बोझ वहन करती है। रेल दुर्घटनाओं पर हमारे रेल मंत्री अध्यात्मवादी चिन्तन पेश करते हैं कि होनी कौन टाल सका है। वे कहते हैं कि रेल दुर्घटनाएँ होती रही हैं और होती रहेंगी। सही कहते हैं भइया, रेल लाए हैं तो दुर्घटनाएँ सहना ही पड़ा और फिर हमारे देश में तो सारी बातें दुर्घटनाओं में होने लगी हैं। दुर्घटनाओं के कारण कोई पार्टी सत्ता में आ जाती है और कोई पार्टी सत्ता से हट जाती है। आपातकाल की दुर्घटना ने जनता पार्टी को सत्ता में बैठा दिया। किसी का रेल मंत्री बन जाना भी दुर्घटना है। कल हटा दिए जाएंगे तो हम कहेंगे कि रेल मंत्री का डीरेलमेन्ट हो गया। हमारी रेलें जनता की तरह सहनशील हैं। हम कहें कि रेलें, एकदम गऊ है। कितनी भी छेडख़ानी करो बुरा नहीं मानतीं। जो कहीं न खपे वह रेल में खप जाए। टैक्स पूरा करना हो वह रेल-टिकिट से पूरा कर लो। करना तो कुछ है नहीं, क्योंकि रेलें अपनी मंथर गति से ही चलेंगी।
सरकार गरीबों का बहुत ध्यान रखती है। रेल विभाग भी रखता है। प्लेटफार्म में जिन्दगी बिताने वाले गरीब अब कहेंगे कि हम एक रुपये वाले प्लेटफार्म में रहते हैं। इन गरीबों में भी स्वाभिमान जागा। यह देश विविधताओं का देश है- महँगे होटल में रहने वाले लोग हैं तो महँगे प्लेटफार्म में रहने वाले भी हैं। इन्हें देखना है तो एक रुपये का प्लेटफार्म टिकिट लीजिए। रेल मंत्री जी ने बहुत सोच समझकर ही प्लेटफार्म टिकिट बढ़ाया है। कचरा देखने की कीमत एकदम डबल हो गई।
विशेेष - यह व्यंग्य 1979 में लिखा गया था- आज रेल्वे प्लेटफार्म टिकिट 5/- रु से 10/- रु. हो गया है, यह व्यंग्य संदर्भ को पेश करता है।