Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

मानसिकता


सिरिल मैथ्यू
रहमान कोल्ड स्टोर के पीछे
छोटा बरियारपुर, मोतिहारी-845401 (पू.चंपारण)
मो. 8804117475
फस्र्ट क्लास थ्री टायर स्लीपर के पांच डिब्बों को छोड़, जनरल बोगियों में आदमी और सामान बुरी तरह एक पर एक चढ़े हुए थे। तीन आदमी के लिए प्रावधित सीटों पर एक-दूसरे के कंधे-पीठ से सटे सात-सात स्त्री-पुरुष-बच्चे भेड़ बकरियों की तरह बड़ी मुश्किल से बैठे हुए थे। चिल्ल-पों मची हुई थी। लेकिन फस्र्ट क्लास के डिब्बे इस रेलमपेल से लगभग मुक्त थे। सुविधा के लिए इन डिब्बों के यात्रियों ने पहले से सैकड़ों रुपए सामान्य भाड़ा से अतिरिक्त देकर ई-टिकट कटा लिया था। इसीलिए इन डिब्बों में बर्थ नंबर के अनुसार सीमित संख्या में लोग शांति-आराम से पैर फैलाए लेटे हुए या बैठे थे। बिन धक्कम-धुक्की के। कुछ वेटिंग लिस्ट वाले रेल विभाग को रिजर्वेशन का पूरा किराया देने के बाद भी बेवकूफ जैसे मुंह लटकाए टी.टी. के आगे-पीछे घूम रहे थे।
ट्रेन बापूधाम मोतिहारी स्टेशन से खुली। एक रिजव्र्ड कपार्टमेंट के दोनों गेट खुले थे। अगले गेट से दस साल का धूल पसीने से सना काला कलूटा बच्चा चढ़ा। पिछले गेट से एक गोरा अधेड़। बच्चे के पांव में न जूते थे चप्पल। ऊपर पसीने की सफेदी के बादल बना बदरंग हाफ शर्ट। नीचे गंदा हाफ पैंट। गोरे अधेड़ के पैरों में नई चप्पल चमक रही थी। देह पर पियरी धोती। गेरुआ कुर्ता। गले में तीन-चार तरह की मालाएं। हाथ में पीतल की थाली। थाली में ईश्वर की तस्वीर ओढ़उल के फूलों से सजी हुई। तस्वीर के आगे अधकटे आलू में गड़ी अगरबत्तियां जल रही थीं। उनकी सुगंध बर्थ के लोगों की नाकों तक पहुंच रही थी। थाली के एक कोने में चौकोर मिश्री के कुछ टुकड़े थे। उसने ललाट पर चंदन पोत रखा था। गाड़ी ने रफ्तार पकड़ी। वह बच्चा कुछ देर टाइलेट के पास खड़ा रहा। फिर वह अपनी शर्ट उतार अधनंगा हो गया। शर्ट से पूरे कंपार्टमेंट की जमीन साफ करने लगा। लोग उसे देखते और पैर उठाकर नीचे सफाई करने का निर्देश देते। वह गर्द-गुबार के साथ गुटखों की पन्नियां, सिगरेट के टुकड़े, बिस्कुट, मिक्सचर, चिप्स, भुजिया के रैपर्स बटोरता इस गेट से उस गेट तक पहुंचा। ट्रेन ब्रिज पार कर रही थी। सारा कचरा हाथों से बटोरकर ब्रिज के नीचे बहती नदी में फेंक दिया। पीछे घूमा। पपडि़आए होठों पर जीभ घुमायी। उसने वहीं बेसिन में उचककर हाथ मुंह धोया। शर्ट झाड़ा। उसी में हाथ-मुंह पोंछा और पहन लिया। उसके बाद हर सीट पर बैठे लोगों के सामने नन्हीं हथेली पसार कहने लगा... कुछ दे दो बाबूजी... मां जी... बहन जी..मिहनत किया है हमने... अधिकांश मुंह घुमा लेते। कोई-कोई एक या पांच रुपए का सिक्का, उसके शारीरिक स्पर्श से बचते हुए, उसकी हथेली में ऊपर से गिरा देते। एक ने कहा- क्या जरूरत थी तुम्हें साफ करने की! रेल के स्वीपर ही झाड़ू दे जाते हैं। चल हट््््!... चलेगा मेरे घर? मुझे एक नौकर चाहिए। नहीं न?... तो जा! बढ़ आगे...
उधर वह अधेड़ ब्रह्मबेला के समय लोगों के मन में भगवद्दर्शन कराकर आध्यात्मिक भाव भर रहा था। कुछ व्यक्ति प्रसाद लेकर टीका लगवा लेते थे। अगरबत्ती के ऊपर दोनों हाथ फैलाकर चेहरे सिर आंखों पर लगा लेते थे। बिन मांगें वे एक, पांच के सिक्के, दसटकिया उसकी थाली में रखने लगे। एक ने तो दान-पुण्य समझ पचासटकिया दे दिया। अंतिम सीट के आगे इंटरकनेक्टेड बोगी के बीच उसने पैसे गिने। कुल अंठानबे रुपए थे।
दूसरी ओर फर्श पर बैठे बच्चे ने अपनी कमाई बमुश्किल गिनी। उसे गिनती ठीक से नहीं आती थी। वह किसी स्कूल में आज तक नहीं पढ़ा। बार-बार प्रयास किया। तब गिन पाया। उसने तेरह एक रुपए के सिक्कों के बीच पांच रुपए के एकलौते सिक्के को मुट्ठी में रख लिया, सिक्का गर्म हो गया। उसकी कींच भरी आंखों में दीवाली जगरमगर करने लगी। सब मिलाकर अठारह रुपए थे। फिर उठा वह। एक लंबी सांस भरी। और अगली बोगी की ओर बढ़ गया।
ट्रेन चलती रही...चलती रही... धड़धड़...धड़धड़...