Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

शहर आते आते


डॉ.बी.एस.त्यागी
140, अंकित विहार, पचैण्ड़ा मार्ग
मुजफ्फरनगर 251001 मो. 9456669403

यह तो उसे भी याद नहीं कब इमामुद्दीन से मामूद्दीन और फिर मामू तांगे वाला बन गया। अब्बा के मरने के बाद तो उसने भी कुछ नहीं सोचा अपने घोड़े और तांगे के सिवाय। सुबह घोड़े को तैयार करना, तांगे में जोतना और उसके खाने-पीने का पूरा खयाल रखना। तांगे के पहियों में तेल डालना और गद्दी को ठीक-ठाक रखना और दूसरी साज़-सफाई। या कहा जा सकता था कि उसका जीवन तांगे का पर्याय बन गया था। यही उसकी दुनिया थी। इस पर बैठ कर ही अपने घर, गाँव, खेत-खलिहान और रिश्तेदारों के बारे में सोचता था। कभी-कभी तो लोग हैरान होते उसे घोड़े के साथ बड़ी ही तन्मयता से बातचीत करते देख कर। जो थोड़ा बहुत समय बचता उसमें अपने लोगों से मिलता, उनके साथ वक्त बिताता। इस छोटी-सी दुनिया में वह खुश था। सुबह सबसे पहले अड्डे पर अपने तांगे को नीम के पेड़ के नीचे लाकर खड़ा कर देता। जिन लोगों को जल्दी पहुंचना होता, वे मामू के तांगे का ही रूख करते। इसके अलावा जिन लोगों को कुछ  मंगवाना होता वे यहां सवेरे ही आ जाते।
मामू, ये चार नुस्खे और एक अर्क की बोतल लानी है, बलबीर ने परचा थमाते हुए कहा।
ठीक है, उसने परचा पकड़ते हुए सिर हिलाया।
अब कैसी तबीयत है लम्बरदार की?
आराम है।
फिक्र मत करो। इन दवाइयों के बाद तो बिल्कुल दु़़रूस्त हो जाएंगे, मामू ने अपना विश्वास जाहिर करते हुए कहा।
मामू, दो सेब लेते आओगे? सोनवीर ने कहा।
क्या बात कर दी, भाई जान! भला मामू फिर किस काम आयेगा?
ये रक्खो पैसे, अगर कम पड़े तो...।
फिक्र मत करना। पैसे की कोई कमी नहीं, मामू ने पैसे जेब में रखते हुए कहा।
 ये सब काम करने में उसे बड़ा ही अच्छा लगता। लोग भी बेहिचक उसे काम बताते और वह बड़ी ही संजीदगी से करता। शाम को उनका सामान देने उनके घर जाता, दो-चार मिनट वहाँ बैठता और उनका सुख-दुख बाँटता। यदि अवसर होता तो जोर से खिलखिलाता।
खुदा का शुक्र है। इन शब्दों के साथ सिर पर हाथ फेरते हुए उठ खड़ा होता।
यदि किसी का सामान नहीं ला पाया तो शाम को उसके घर जाकर उसे वजह जरुर बताता।
भाई जान, आज तुम्हारा काम नहीं हो पाया, कल जरूर...।
कोई बात नहीं।
व्यक्ति जानता था कि अवश्य ही कोई मजबूरी रही होगी। नहीं तो ऐसा हो ही नहीं सकता  कि वह काम करने में आनाकानी करे।
     मामू ने चौधरी बलबीर का दिया परचा जेब में रखा। चौधरी ने बता दिया था कि ये सब दवाइयाँ राधे पंसारी के यहाँ मिल जाएंगी और अर्क की बोतल वैद्यनाथ की दुकान से ही लेना। भरोसे की दुकान है। दोनों दुकानों में काफी फासला था। इन जगहों पर आने-जाने में उसका आधा घंटे से भी अधिक वक्त लग जायेगा। फिर सब्जी मंडी के पास में फल की दुकान से सेब लेगा। इस काम को निपटाकर वह पेड़ के नीचे अपने तांगे के पास लौटेगा, फिर रुखी-सूखी रोटी खाकर थोड़ा सुस्तायेगा। पहले बीड़ी में दो चार दम मार लिया करता था लेकिन वैद्य जी के कहने पर छोड़ दी थी। दुपहर बाद सवारियां लेकर चल देगा। शाम को छह-सात बजे वह घर लौटेगा। फिर घोड़े को खुरेरा करेगा और चने का रदावा मिला हरी घास देकर खुद नहाएगा।
चार-छह सवारी हो जाएँ तो चल पडूँग़ा, जमीन पर बैठे मामू ने मन में कहा।
सबसे पहले नुस्खे ही लूंगा। चौधरी के कई एहसान हैं मुझ पर। जब कई महीने अब्बा बीमार रहा तो कई बार देखने आया था और दवा के लिए पैसे भी दिये थे। सोचते-सोचते मामू की आंखें कृतज्ञता से गीली हो गयीं।
कहां खो गये, मामू मियां?
ओह! मुंशी जी, आप आ गये।
चलो, अब तो पूरी सवारी हो गयी।
हां, हां बिल्कुल...।Ó
चल जंगी, मामू ने सफेद घोड़े की कमर थपथपाते हुए कहा।
उसने संटी को फटकारा और लगाम हिलायी। घोड़ा टाप-टाप करता हुआ चल पड़ा। एक फर्लांग का रास्ता खण्डंजे वाला था। कई गड्ढे भी थे जिन्हें मामू को बचाना था। इसलिए घोड़े के लिए दौडऩा सम्भव नहीं था। जैसे उसकी चाल धीमी होती वह संटी फटकार देता। उसकी आँखों के सामने उसके अब्बा का चेहरा उभर रहा था मानो कल ही की बात हो।
    चार महीने तक चारपाई पर पड़ा रहा...। वैद्य जी के लिखे पूरे नुस्खे नहीं ला पाया था। बलबीर ने पैसे देते हुए कहा था,मामू, तुम्हारे अब्बा बड़े ही बेहतरीन इंसान हैं, इनकी तीमारदारी खूब करना, वरना बाद में पछताओगे।
चौधरी साहब मैं तो पूरी कोशिश कर रहा हूं, आगे अल्लाह ताला की मर्जी।
दूध खूब पिलाते रहना, चौधरी ने फिर कहा।
हां, दूध की तो कोई कमी नहीं। दूधिया को दूध देना बन्द कर दिया। कह दिया-जब तक अब्बा दुरूस्त हों, तब तक दूध लेने मत आना।
 यह तो बहुत ही अच्छा किया, चौधरी ने कहा।
कुछ देर दोनों चुपचाप बैठे रहे। अब्बा जान आंखें बन्द किये पुरानी चारपाई पर पड़े थे।
मियां, जल्दी ठीक हो जाओ, अभी तो बहुत काम करने हैं।
अब्बा ने आंखें खोली और सिर हिलाया। आज उसके चेहरे पर पहले जैसी मुस्कान नहीं थी। आंखों की रौनक भी गायब थी। बलबीर खड़ा हुआ और चला गया। इससे अब्बा को तसल्ली मिली और मुझे हिम्मत। मैं काफी देर तक वहीं बैठा रहा था चुपचाप, गुमसुम। न जाने कितने खयाल आये और गये। फिर खामोशी गहरी होती चली गयी और....।
    अब्दलपुर वालों चलना है तो आ जाओ, मामू ने संटी फटकारते हुए जोर से खनकती आवाज में कहा।
अरे! अरे! ठहर, जोर से लगाम खींचते उसने हुए कहा।
घोड़ा एकदम जहाँ का तहाँ रुक गया। मामू झट से नीचे कूदा और सड़क पर खेलते हुए बच्चे को गोद में उठा लिया और सीने से लगाकर उसकी कमर थपथपायी।
घर में जगह नहीं खेलने की? अभी चोट... बच्चे का गाल सहलाते हुए मामू बोला।
तभी दौड़ती हुई बच्चे की माँ घर से बाहर आई।
बच्चे का खयाल रखा करो। खुदा की रहमत है...,
मामू ने कहते हुए बच्चे को उसकी गोद में दे दिया। महिला कुछ नहीं बोली लेकिन उसकी आंखें मानो धन्यवाद दे रही थीं। वह अन्दर चली गयी। मामू के चेहरे पर सन्तोष का भाव उभर आया किन्तु उसकी उंगलियां अभी भी कांप रही थी।
चल, जंगी, उसने लगाम हिलायी और घोड़ा पहली चाल से चल पड़ा। वह बराबर आवाज देता चला जा रहा था। पाँच मिनट में गाँव से बाहर आ गया। यहाँ से पुरा गाँव तक रास्ता ठीक-ठाक था। सड़क तो तारकोल की थी किन्तु मरम्मत माँग रही थी। चौड़ी भी ज्यादा नहीं थी। इसके दोनों ओर खेतों में फसल लहलहा रही थी। यदि इस पर कोई किसान अपने बैलों या बुग्गी को लेकर नहीं जा रहा होता तो घोड़े को सरपट दौडऩे में कोई दिक्कत नहीं होती। उसने संटी तांगे की बम में मारी तो जैसे घोड़ा समझ गया और वह दौडऩे लगा। कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें घोड़ा और उसका मालिक ही समझते हैं। वे किसी भाषा के व्याकरण की सीमा में नहीं आती। जो शब्द या ध्वनि हमारे शब्दकोश में नहीं हैं या फिर हमारे लिए उनका कोई अर्थ नहीं होता, उनके लिए वे अति अर्थपूर्ण होते हैं। उनका अपना अर्थशास्त्र होता है। उनके सहारे जीवन की गाड़ी का पहिया लुढ़कता रहता है।
वाह! ज्ंागी, क्या बात है! मामू ने उसके पैरों की टाप-टाप से उठते संगीत पर सिर हिलाते हुए कहा मानो उसका तन-बदन खिल गया हो। खेतों को छूती हुई हवा से उसकी आँखों में चमक आ गयी। उसने दूर तक फैले हरे-भरे खेतों पर एक नजर दौड़ाई तो देखता ही रह गया। फसलें मस्ती में झूम रही थीं। किसान भी इन्हें देखकर मन ही मन खुश थे। सुबह से खेतों में काम कर रहे लोगों के लिए महिलाएँ कलेवा ले जा रही थीं। उनकी चाल में मस्ती थी। चेहरों पर रौनक और आवाज में बहती नदी का संगीत था।
मुंशी जी, इस बार तो फसल धाँसू है। देखो, ईख, ज्वार, बाजरा, मक्का-पूरे खेत काले भिंडार।
हूँ -मुंशी जी ने मामू के हाथ के साथ-साथ खेतों पर नजर दौड़ाते हुए सिर हिलाया।
    अभी बहुत दिन नहीं हुए थे जब अब्बा के साथ यहाँ काम किया करता था। अब्बा से कई बातें सीखी थीं। कौन-सी फसल कब बोयी और काटी जाती? कैसे उनकी देखभाल की जाती? कीड़े मारने की दवाई कब डालनी चाहिए? अब्बा जब थक जाया करते तो आम के पेड़ के नीचे सुस्ता लेते थे। बरसात में जब हवा चलती, इस पेड़ से आम टपकते थे। काले-काले जामुन बराबर वाले खेत में पेड़ के नीचे बिछे रहते। चौधरी श्यामलाल-खेतों का मालिक अब्बा का पूरा ध्यान रखता। दो खेतों में साझा था और एक में मजदूरी करते थे हम। लेकिन वह बड़ी इज्जत करता था अब्बा की। उसके मरने के बाद फिर अब्बा यहां कभी नहीं आये। कोई जरुरत भी नहीं...। किसी ने जहमत भी नहीं उठायी पूछने की।
देखो भाईजान! जब तक तुम हो, तब तक हम काम करेंगे। फिर नहीं...।़
क्यों? क्या बात हुई?
बच्चे ठहरे नये जमाने के और हम पुराने।
हां, ये तो है।
मामू, कहां खो गये? एक सवारी ने कहा।
अरे जंगी, थक गया?
मामू ने खयालों से बाहर आते हुए धीरे से कहा। फिर सामने देखते हुए लगाम को थोड़ा खींचा।
लाला जी, देखते नहीं। रास्ता कच्चा आ गया है। पुरबालियान तक ऐसा ही है।
हाँ, अम्मा क्या बात है? मामू ने सड़क के किनारे खड़ी एक बुढिय़ा को देखकर तांगा धीमा करते हुए पूछा।
मंसूरपुर जाना है।
आ बैठ, खड़ी क्यों है?
मेरे पास दो रुपये हैं, बेटा।
अम्मा, बैठ तो...।
मामू ने पिछली सीट पर जगह बनाई और उसका हाथ पकड़कर किनारे की तरफ  बैठाया।
भाई, जरा खयाल रखना अम्मा का, पास में बैठे लड़के से कहा।
अच्छा ठीक है, अब चल भी।
चल जंगी, जरा संभल कर चलना, मामू ने लगाम हिलाते हुए कहा।
घोड़ा पहले से थोड़ा तेज चलने लगा। मामू का ध्यान इस बात पर था कि कहीं गहरा गड्ढा न हो। अब घोड़े की चाल धीमी हो गयी। यहाँ गड्ढे भी थे और कीचड़ भी। मामू नीचे उतरकर घोड़े के साथ-साथ चलने लगा। उसके चेहरे पर तनाव था। जैसे ही किसी छोटे गड्ढे में पहिया गिरता, वह हाथ से सहारा देता और आगे बढ़ जाता। बारिश की वजह से पूरा रास्ता खराब था जबकि बारिश अधिक नहीं हुई थी।
पता नहीं कब बनेगी यह सड़क? इतने लोग आते-जाते हैं, कोई सोचता ही नहीं। क्या करते रहते हैं ये खद्दरधारी? मामू ने बड़बड़ाना शुरु किया। उसके चेहरे पर गुस्सा और चिन्ता दोनों साफ दिखाई दे रहे थे।
ठहर, जंगी। मामू ने कसकर लगाम पकड़ी और घोड़े के आगे-आगे चलने लगा मानो रास्ता दिखा रहा हो। कभी नजर सड़क पर, तो कभी घोड़े पर।
घोड़ा भी तो हमारी तरह ही है। इसे भी दुख-दर्द होता है। अगर कहीं इसके पैर में...। बस, यही टुकड़ा खराब है, आगे तो फिर भी...।Ó वह नीची गर्दन किये बड़बड़ाता जा रहा था। दोनों लड़के उसके चेहरे को देखकर मुस्करा रहे थे।
अचानक घोड़ा रुक गया। मामू ने लगाम उसकी कमर पर रख दी। सामने गहरा गड्ढा था। मामू ने इसका मुआयना किया। फिर इधर-उधर देखा और दूर पड़ी चार ईंटें उठाकर लाया और उन्हें गड्ढे में डाल दिया। फिर पैरों से उन्हें दबाया।
हाँ, अब ठीक है, वह बुदबुदाया।
चल जंगी, उसने लगाम हिलाकर इशारा किया। जैसे ही घोड़ा आगे बढ़ा, दूसरा पहिया कीचड़ भरे गड्ढे में फंस गया।
हुआ न वही, जिसका डर था, मामू ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा। वह परेशान हो गया।
मुंशी जी, अब तो उतरना पड़ेगा।
हां, हां, कोई बात नहीं।
सभी सवारियां एक-एक करके नीचे उतर गयी।
बेटा, मेरा हाथ..., बुढिय़ा ने कहा।
नहीं अम्मा, कोई जरुरत नहीं। आराम से बैठी रहो।
तुम दोनों, पहिए को आगे की ओर धकेलो, मामू ने लड़कों की ओर देखते हुए कहा।
ठीक है।
मुंशी जी, आप यहां से हाथ लगाना।
मामू खुद बम को धकेलते हुए कह रहा था-चल जंगी, निकल जा। सबने पूरी कोशिश की, लेकिन पहिया निकल नहीं पाया।
इसे तिरछा लेना पड़ेगा, एक लड़के ने कहा।
मामू ने लगाम खींची और घोड़े को तिरछा किया। उसके चेहरे पर घबराहट तो नहीं थी किन्तु जंगी की परेशानी से थोड़ा दुखी था। लीक काटने में घोड़े पर जोर पड़ेगा।
सब एक साथ धकेलना।
अब लगाओ जोर, मामू ने लगाम आगे की ओर खींचते हुए कहा।
घोड़े ने भी पूरी कोशिश की। पहिया फिसल कर फिर गड्ढे में जा गिरा। बुढिया थोड़ी कंपकंपायी। फिर वह और संभल कर बैठी। उसके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें साफ  थीं। जब सब जोर लगा रहे थे, वह भी दांत भींच कर आगे की ओर देख रही थी।
मामू मियां, ऐसे बात बनने वाली नहीं। यहां आओ और पहिए को उठाकर बाहर रखना पड़ेगा, लड़कों ने कहा।
हां, यही ठीक रहेगा, मुंशी जी ने कहा।
मामू, और दोनों लड़कों ने एक साथ पहिए को ऊपर उठाया और गड्ढे से बाहर रख दिया। मामू ने दौड़कर घोड़े के पैरों में गिरी लगाम को उठाया।
शाबास जंगी, मामू ने उसकी कमर थपथपाते हुए कहा।
वाह! मामू मियां, पहिया हमने निकाला, शाबासी जंगी को, एक लड़के ने कहा।
बाबू, बोलता धन है, बहुत काम करता है, उसने घोड़े की कमर पर हाथ फेरते हुए कहा।
चलो, भाई बैठो।
बैठे कैसे? कीचड़ में पैर सने हैं, लड़कों ने कहा।
आगे रजबाहे में धो लेना,Ó मामू ने कहा।
दोनों लड़के बम पर पैर लटका कर बैठ गये। घोड़ा मामू के इशारे पर चलने लगा। अभी भी रास्ता कच्चा था। लेकिन इस लायक था कि थोड़ा तेज चल सके। लेकिन मामू ने तेज नहीं चलाया। वह उसके साथ-साथ पैदल चल रहा था। उसे समय का पूरा खयाल था। इसकी भरपाई सड़क पर हो जायेगी। बस, किसी तरह पुरबालियान पार हो जाये। दस मिनट बाद तांगा रजबाहे की पुलिया पर आ पहुंचा। मामू ने तांगे को सड़क के किनारे रोक दिया। दोनों लड़कों ने पैर धोये। बाद में मामू ने किनारे पर बैठकर अपने पैर धोये। वे ऊपर तक कीचड़ में सने थे। कपड़ों पर भी कीचड़ के छीटें आ गिरे थे। उन्हें सिर पर बंधे साफे से साफ किया। रजबाहे में कुछ ढोर पानी पी रहे थे। लोग इन्हें पटरी पर चराने ले आते हैं। कुछ मामू को जानते थे। उन्होंने उसे देखा और मुस्करा दिये।
'अबे, नामरजाद होकर कूद रहे हो, कुछ तो किसी का लिहाज करो,' उसने किनारे पर खड़े छोटे लड़कों से कहा।
इन लड़कों ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर पानी में छलांग कर तैरने लगे।  
अब वह थोड़ा तेज चलना चाहता था। पुरबालियान में प्रवेश करने के बाद फिर उसे धीमा चलना पड़ेगा क्योंकि सड़क पर बच्चे खेलते रहते हैं। कुछ बड़े-बुजुर्ग सड़क पर खाट डालकर बैठे रहते हैं। अभी थोड़ी दूर ही चला था कि सामने से एक शवयात्रा आती दिखाई दी। तुरन्त मामू ने तांगा सड़क के किनारे खड़ा किया। लगाम घोड़े की कमर पर रख छोड़ी। फिर जेब से गोल टोपी निकाली और शव यात्रा में शामिल हो गया। वह सबकी तरह गर्दन नीची कर चल रहा था। कुछ दूर चलकर लौट आया। वह पूरी तरह गमजदा था मानो मृतक उसका कोई परिजन या दोस्त हो।
या खुदा, गहरी सांस लेते हुए उसने कहा।
 टोपी उतारकर जेब में रखी। लगाम उठाई और एक नजर सवारियों पर डाली।
चल जंगी, उसने धीरे से कहा।
कोई जानने वाला था? मुंशी जी ने पूछा।
नहीं।
मामू अभी भी गम्भीर दिख रहा था। वह चुपचाप तांगा हांकता रहा।
मुंशी जी, यह जिन्दगी की बड़ी हकीकत है।
हां, ठीक फरमाया। मुंशी जी भी थोड़े गम्भीर दिखाई दिये।
ऐसे मौकों पर दार्शनिक बातें शुरु हो जाती हैं। लोग जीवन-मृत्यु की चर्चा करते हैं। उनसे जुड़े सवालों पर जिक्र होता है। मानो उनके उत्तर तलाश रहे हों। फिर थोड़ी देर बाद पहले जैसा। यहां भी ऐसा ही हुआ।  
    पुरबालियान पार करने के बाद पक्की सड़क पर घोड़ा तेज दौडऩे लगा। घोड़े के पैरों की टाप-टाप की आवाज दूर तक सुनी जा सकती थी। बीच-बीच में मामू लगाम को हिला देता था। पांच मिनट में नये पुल को पार कर तांगा भोपाड़ा पहुंच गया। यहां सवारी कभी-कभी मिलती है। मामू को इसकी परवाह कभी नहीं रही। उसने सड़क के किनारे सूट-बूट में खड़े एक आदमी को देखा। वह हाथ का इशारा कर रहा था। मामू ने घोड़ा रोका।
मंसूरपुर जाना है।
पांच रुपये।
पांच रुपये तो पुरबालियान से लेते हैं।
बाबू जी, दूर ही कितना है। आप बड़े आदमी नहीं दोगे तो हमारा काम कैसे चलेगा? अगर पैसे न हों तो कोई बात नहीं, आओ बैठो।
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।
मामू ने पिछली सीट पर जगह बनाई और नयी सवारी को बैठाया।
मुझे नौ वाली ट्रेन पकडऩी है।
चिन्ता मत करो, बाबू जी। घड़ी में देखकर दस मिनट लगेंगे।
चल जंगी, उसने लगाम जोर से हिलायी।
घोड़ा अपनी चाल से चलने लगा। अब रास्ता ठीक था इसलिए उसे दौडऩे में भी कोई दिक्कत नहीं थी। एक बार उसने संटी फटकारी और घोड़ा तेज दौडऩे लगा। सड़क के मोड़ पर उसने तांगा रोक दिया। यहां से जी टी रोड शुरु हो जाती है। जिस दिन एक-दो सवारी मंसूरपुर की होती थी वह अड्डे की बजाय यहीं उतार देता था।
देखो बाबू जी, दस मिनट से पहले ही आ गये।
अड्डे पर चलो।
अब तो सब यहीं उतरते हैं। आगे दो मिनट का रास्ता है।
यात्री सन्तुष्ट दिखाई नहीं दिया। वह मामू को पैसे दे कर बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गया। उसने पीछे मुड़कर एक बार देखा। शायद बहस करना नहीं चाहता था, नहीं तो मामू को अड्डे जाना पड़ता। उसे दिक्कत भी कोई नहीं थी।
बेटा, मुझे उतारना, बुढिय़ा ने कहा।
अभी आया, अम्मा, मामू ने कहा।
ले बेटा, बुढिय़ा ने किराया देते हुए कहा।
अम्मा, कोई जरुरत नहीं। हाथ दो...।
बहुत चलती है यह सड़क, जी टी रोड है, मामू ने उसका हाथ पकड़कर सड़क पार कराते हुए कहा।
चल, जंगी, मामू ने लगाम हिलायी और घोड़ा सरपट दौडऩे लगा।
यही महीना था जब अब्बा अल्लाह को प्यारा हो गया था, मामू ने मन में कहा। अभी दिन नहीं ढला था। मैं भैंस का दूध निकाल रहा था। उसने धीमे से मुझे आवाज दी-मामू! अभी आया, बस दो मिनट। दूध की बाल्टी रसोई में रखकर जब उसके पास गया तो वह आँखें बन्द किये पड़ा था मानो थककर आँख लग गयी हो। मैंने उसे हिलाया लेकिन पंछी पिंजरे से उड़ गया था। मैंने ही देर कर दी थी। कितना सुकून था चेहरे पर! थोड़ी देर तक तो यकीन ही नहीं हुआ था।
 विचारों में खोये उसने घोड़े को देखा, वह अपनी चाल चल रहा था। लगाम ढीली थी। उसके बराबर से कभी कोई ट्रैक्टर निकल जाता तो कभी हार्न देती कार, या बस। मामू पर कोई असर नहीं पड़ता। जंगी खुद रास्ता छोड़ देता या हल्की-सी लगाम हिलाने पर वह समझ जाता था। उसने जेब में हाथ डाला यह देखने कि नुस्खे का परचा है भी या नहीं। यह महज कागज का टुकड़ा नहीं था अपितु किसी की जिन्दगी बचाने को साधन था।
सबसे पहले राधे की दुकान पर जाकर दवा लूँगा। दुकान का पता तो कोई भी बता देगा। फिर वहां से वैद्यनाथ की दुकान से अर्क की बोतल लेनी है। नहीं, इससे पहले फल की दुकान पड़ेगी। सोनवीर के लड़के के लिए सेब भी लेने हैं। सेब लेकर ही वैद्यनाथ की दुकान पर जाना ठीक होगा। फिर तो सीधी सड़क है, बस थोड़ी भीड़-भाड़ रहती है।
सेब! हां, वैद्य जी ने कहा था, मामू, रोज एक सेब अपने अब्बा को खिलाओ।
हां, वैद्य जी, कल ही लेकर आऊंगा।
अब्बा मेरी मजबूरी जानते थे। रोज की आमदनी व खर्च का हिसाब लगाया तो देखा सेब के लिए पैसे बचे ही नहीं। खर्च भी पूरा नहीं हुआ।
अरे मामू अपना घर चला। वैद्य जी को क्या पता...?
नहीं, अब्बा कल जरुर लेकर आऊंगा। लेकिन ला नहीं पाया था। रोज सुबह सोचता और शाम को खाली हाथ आ जाता। यह बात कई दिनों तक कचोटती रही थी।
 मामू! आज कुछ गुनगुना नहीं रहे हो?
नहीं, मुंशी जी।
लगता है घरवाली ने रोटी नहीं दी आज।
रोटी तो ये रहीं। ऐसी बात नहीं, पूरा ध्यान रखती है।
इस उम्र में भी!
हां, अभी तो पचास का आंकड़ा भी पार नहीं किया।
फिर क्या बात है?
अरे, जंगी देख के चल। अभी रिक्शा से टक्कर हो जाती, वह लगाम खींचते हुए बोला।
मामू, बात मत करो, एक लड़के ने कहा।
हां, ठीक कहते हो।
मामू ने अपनी संटी बम में मारी और खिलखिलाकर हंसा। इस पर सवारियों को आश्चर्य हुआ। घोड़ा तेज दौडऩे लगा मानो उस पर ही संटी पड़ी हो। सड़क के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़ खड़े थे। अधिकतर के बारे में वह जानता था। बिना पूछे ही वह सवारियों को इनकी जानकारी दे दिया करता था किन्तु आज उसने ऐसा कुछ नहीं किया।
वक्त के सामने किसी की नहीं चलती, मुंशी जी।
हूं, क्या याद आ गया?
कुछ नहीं। बस थोड़ा रास्ता और है।
अभी तो जड़ौदा आया है।
आधा घंटा और लगेगा।
मामू ने संटी घोड़े की गर्दन के ऊपर फटकारी तो उसकी चाल तेज हो गयी। फिर उसने संटी की डंडी पहिए के अरों में लगायी। यह फट-फट की आवाज उसका हार्न का काम भी करती थी और जंगी की चाल को भी ठीक रखती थी। मामू को यह आवाज अच्छी लगती थी। चुंगी पार कर नुमाइश कैम्प के पास उसे बच्चे स्कूल जाते दिखाई दिये। वह समझ गया अभी दस नहीं बजे। सभी बच्चे स्कूल यूनिफार्म पहने हुए थे। वह उन्हें देखता रहा जैसे किसी को इनमें तलाश कर रहा हो। सब बेफिक्र कंधों पर बस्ते लटकाये, हंसते, बतियाते, मजाक करते जा रहे थे। चेहरों पर चमक और आँखों में कल की उम्मीद लिए ये बच्चे चले जा रहे थे। मैं भी यामीन को स्कूल भेजूँगा, इन बच्चों की तरह। ड्रेस में तो वह अच्छा लगेगा। है भी तो लम्बा-चौड़ा। पढऩे में तो वह अव्वल रहेगा। मैं नहीं पढ़ा तो क्या हुआ? वह पढ़ेगा। फिर साधूराम मास्टर जी की तरह गिटर-पिटर किया करेगा। क्या मजा आयेगा! उसकी अम्मी तो देखती ही रह जाएगी। रिश्तेदारों की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। जो अब उसे नाकारा कहते हैं तब क्या कहेंगे? अपना-सा मुंह लेकर रह जाएंगे। आज ही साधूराम मास्टर जी से बात करुंगा दाखिले की। बड़े आदमी है करा ही देंगे। अली हसन ड्रेस सिल देगा, बढिय़ा दर्जी है, इसमें कहने वाली कोई बात है ही नहीं। जूते-चौधरी का लड़का उसकी उम्र का है, उससे मिल जाएंगे। रही किताबें, उनका भी इन्तजाम हो ही जायेगा।
  मामू को पता ही नहीं चला कि कब घोड़ा धीरे-धीरे चलने लगा। वह पेड़ के नीचे रुक गया। मामू ने देखा कि उससे पहले एक ही ताँगा आया था। उसने सवारियों पर एक नजर डाली और मन ही मन पैसे का हिसाब लगा लिया। संटी को बगल में दबाया और नीचे उतरते हुए बुदबुदाया।
लो! आ गया शहर।