Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

मुझको उलफत के लिए, कितना सताया जाएगा

गज़़ल
पूर्णेन्दु कुमार सिंह
एफसीआई गोदाम के पास
सिंहपुर रोड, नरसरहा, शहडोल (म.प्र.)
मो. 09168050070
1
मुझको उलफत के लिए, कितना सताया जाएगा
तेरी गजलों में मेरा, किस्सा सजाया जाएगा।
संग का मुझको निशाना, लो बना लो ओज पर,
शर्म पर आएगी सर, कैसे उठाया जाएगा।
आप मुझसे मांगते क्यों, बेगुनाही का सुबूत,
फैसला जब मौत का मुझको सुनाया जाएगा।
घर की अपने खैर क्यों मांगूं किसी तूफान से,
वह उजाड़ेगा तो घर, फिर से बसाया जाएगा।
मैं अंधेरे से लड़ूंगा, इक इसी कंदील से,
बुझ गई तो क्या हुआ, फिर-फिर जलाया जाएगा।
2
लौटी फिकाा ने गांव, को गुलकाार लिखा है,
फिर से जमीं ने आसमां, को प्यार लिखा है।
वह खत जो मिल नहीं सका, है तुझको अभी तक,
महबूब उसको मैंने, बार-बार लिखा है।
देखी है मैंने सलवटें, बिस्तर पर रात के,
आंचल पर उसके मीठा, इंतजार लिखा है।
जब से समझ में, इश्क का मानी है आ गया,
हर शय को छू के प्यार का, इकाहार लिखा है।
ले जाते हैं यह मेरे $कदम, घर से तेरे दूर,
दिल ने तुम्हारी राह से, इकरार लिखा है।
3
बाकी नहीं शराब बहुत, पीता रहा मैं,
तेरे ब$गैर किांदगी को जीता रहा मैं।
इस दिल के छिपाने से राज अब न छिपेंगे,
बोलेंगे दर्द इस जुबां को, सीता रहा मैं।
था इस नसीब में न, कोई आसमां लिखा,
कुछ बाजियां थीं जिनको कभी, जीता रहा मैं।
आशिक की भूख इश्क की, और प्यास हुस्न की,
किस शौक खुद खूने-जिगर, पीता रहा मैं।
मेरी आरजू को दरकिनार, मौत कर गई,
फटता ही रहा मेरा कफन, सीता रहा मैं।
4
रात लंबी है बहुत दूर सबेरा कितना,
आंखों से आप दूर हैं तो अंधेरा कितना।
कितनी मुश्किल से, बड़े प्यार से तिनके सिमटे,
और तनहाइयों ने घर, को बिखेरा कितना।
ले लिया सर पे मैंने, सारी खताएं अपने,
बोले कोई कुसूर है, यहां मेरा कितना।
नाम महबूब का, हर सांस पर जब लिख डाला,
अब न पूछो कि जिंदगी पर, हक मेरा कितना।