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Sunday 20 May 2018

गांवों की लड़कियां

प्रभा दीक्षित
128/222, वाई-1 ब्लॅाक,
किदवई नगर,
कानपुर- 208011
गांवों की लड़कियां

शहरों में
कस्बों में पढ़ती हैं
गांवों की लड़कियां!

साइकिल चलाती हैं
पैदल भी चलती हैं
लौटती दुपहरी में
बस में भी जलती है।

भीड़ भरी सडक़ों की
आवारा लडक़ों की
आंखों में गड़ती है
गांवों की लड़कियां।

संस्कार जीती हैं
पली हैं अभाव में
हाथों में हथकडिय़ां
बेड़ी है पांवों में

खेत की कमाई से
बाप की समाई तक
स्वयं को जकड़ती हैं
गांवों की लड़कियां।

घर के सब कामकाका
कपड़े भी धोती हैं
अधरों की मुस्कानें
कई बार रोती हैं।

कोर्स यहां पूरा है
स्वप्न भी अधूरा है
खुद से ही लड़ती हैं
गांवों की लड़कियां।

अधूरी शिक्षा पाकर
मौन रह कराहेंगी
इम्तिहान के पहले
जब ब्याही जाएंगी।
भइया प्रतिरोधी है
पति भी विरोधी है
कहो कब झगड़ती हैं
गांवों की लड़कियां।

औरत की जात

सदियों का रुतबा है
धर्मों का फतवा है
मर्दों से नीची है
औरत की जात।

समय की सिलेटों पर
ऐसी परिभाषाएं
लिखता है कौन?
शाही दरबारों में
शहर के बाजारों में
बिकता है कौन?

समय भी बदलता है
सूरज भी ढलता है
औरत भी पलट रही है
मर्द की बिसात!

निजीकरण की भाषा
तुतलाई है थोड़ा
बोलती रमणियां हैं।
पहले संघर्षों में
टूट गई है बेड़ी
फिर भी हथकडिय़ां हैं।

एक समय आएगा
लोहा गल जाएगा
कौन लूट पाएगा
किसी की बारात?