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Tuesday 21 Nov 2017

बनारस

 

तबस्सुम फातिमा
डी-304, ताज एन्क्लेव, गीता कॉलोनी
दिल्ली-1100031,
मो. 9958583881
बनारस

सत्ता की चुनौतियों के बाजार में
कलाविहीन संस्कृतियों के निर्माण में उलझे
पवित्र घाटों पर धर्म की शतरंज बिछाये/एक
डमरू तुम थे
मदारी तुम थे
बंदर तुम थे
समस्या तुम थे
निदान तुम थे
सब कुछ मगर- बिना रस
बनारस...

वाराणसी

घाटों का पानी लाल है
स्वच्छता के बावजूद
एक बू
शहर से होती हुई विश्वविद्यालय
और गांधी मार्ग से गंगा किनारे तक
सूंघी जा सकती है आसानी से
आगे नर कंकाल पड़े हैं
मानूस-गंध है
शमशान है
राजनीति के पन्नों पर
धर्म-युद्ध का ऐलान है
क्योंकि जनता अंजान है।

कब्रगाहों की वीरान सल्तनत

मैं नहीं जानती
मुझे यह जगह क्यों पसंद है
यहां छोटी-बड़ी खुली हुई कब्रों की एक कतार है
लेकिन यहां भी
गरीब और सामंतवादी बुर्जुवाओं की जंग एक जैसी है
पक्की और शानदार कब्रों के दरमियान
कच्ची कब्रें भी हैं
बारिश के पानी में बह जाने वाली कब्रें

ऐसी भी हैं, जहां संगमरमर लगे हैं/
नामों के कुतबे लगे हैं/
और ऐसी धंसी हुई कब्रें भी
जिनकी यादें एक भी बरसात नहीं झेल पायीं
पता नहीं
अब इनके अकाीका
शहरे-खमोशा में इनसे मिलने आते भी हैं या नहीं

पेड़ों के पत्तों से
$कतार में बनी कब्रों तक
फैला हुआ गहरा सन्नाटा है
मैं इस सन्नाटे में चुनती हूं यादों के फूल
मैं इस खामोशी में तलाश करती हूं पांव के शूल
हवा में पाती हूं गर्द और धूल
शायद यही है जीवन का मूल

कब्रगाहों की ये वीरान सल्तनत
मुझे पसंद है
यहां दामिनियों के हत्यारे भी नहीं बोलते
इस सन्नाटे में
इंसानी खाल के भेडिय़े भी नहीं होते
यहां वे लुटेरे भी नहीं होते
जो देह से आगे का गणित नहीं जानते

इस सल्तनत में कहीं
मेरी एक छोटी सी बिटिया भी है
आराम करती हुई
जिसे जीवन के दो साल और कुछ महीने मिले
शायद मुझसे ज्यादा
उसने/ इस सल्तनत से बाहर की
दुनिया को देख लिया था
आज वह होती
तो नाजुक जिस्म पर
चुभने वाली आंखें लिए बड़ी होती
और मैं हर पल आतंकित रहती
घुटती रहती अपनी दुनिया में
लरकाती रहती उसे घर से बाहर भेजते हुए
उस समय तक सहमी रहती
जब तक
वो लौट कर नहीं आ जाती अपने घर
लडक़ी देह और आतंक के रिश्ते में
कहीं गिरवी पड़ी होती
मेरी आजादी की परिभाषा
या वो आजादी
जिसे फिरंगियों से छीनते हुए
संग्राम सेनानियों ने कब सोचा था
दामिनियों के इन लुटेरों के बारे में
या उस राजनीति के बारे में
जो सरेआम अपनी इज्क़ात गंवाती गई
और
भयानक होती गई/पहले से कहीं ज्यादा

कब्रगाहों की इस वीरान सल्तनत में
कई और भी हैं/जिन्हें मैं जानती थी
जिनके हाथों पर खेली थी
जिनके पांव पर चलती हुई बड़ी हुई थी
यहां वे सब है
जो इस सल्तनत से बाहर की दुनिया से
घबरा गये थे
फिर हमेशा के लिए आंखें मूंद कर
इस सल्तनत के होकर रह गये

यहां अच्छा लगता है मुझे
भटकती हुई आत्माओं की तलाश
हवा से हिलते हुए पेड़
खिजां से गिरते हुए सूखे पत्ते
और रहस्यमयी, गहरी खामोशी
मैं इस खामोशी में छिटक गई हूं
इन्हीं रास्तों में कहीं भटक गई हूं
मेरे चारों ओर
एक न समाप्त होने वाली धुंध है
विश्वास नहीं होता
मैं इस कोहरे में ही कहीं
अटक गई हूं