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Friday 24 Nov 2017

भर खेत बगुला

 

राजकिशोर राजन
59, एल.आई.सी. कॉलोनी, कंकड़बाग, पत्रकारनगर, पटना- 20
भर खेत बगुला
कट गया धान
जोता जा रहा खेत
खेत में छिप-छिप पानी

खेत में बगुले बैठे
उड़ा रहे दावत
पहले की तरह आज भी
अन्नदा धरती सबको देती
देना उसका धर्म
सभी उसकी संतान

कोई ले ले कीड़ा-मकोड़ा
कोई ले ले धान ।

हत्यारे

किसी की मौत
सिर्फ  मौत होती तो
यह सोच कर कि
चलो, इस दुनिया में
एक दिन सभी को मरना है
खुद को समझा लिया जाता

मगर एक आदमी की मौत
सैकड़ों सपने
सैकड़ों इच्छाओं का मरना है
जबकि इन्हीं सपनों, इच्छाओं से
बनी-ठनी है पृथ्वी

हत्यारे, सिर्फ  आदमी का कत्ल
नहीं करते
हत्यारे, आजतक नहीं समझ पाये ।

तरीका

सच होते ही सपने
हो जाते मृत
जब तक रहते अधूरे
तभी तक रहते जिन्दा

अच्छा है, मुस्कुराते तुमने कह दिया
अब, जब तक रहूँगा जिन्दा
उन्हें नहीं होने दूँगा मृत

मुझे मालूम नहीं
तुम्हारी मुस्कुराहट का राज!
मगर यही तरीका जँचा
मुझे जीने के लिए दोस्त ।

आगे का रास्ता

झूठ के शहर में
शोर से बहरे हुए

सच के गाँव में
गये थे सभी
शहर की ओर

मुझे अब
पगडंडियों का ही भरोसा है
जहाँ तक ले जायें ।

शवदाह

धूप तेज थी बहुत
और पसीने को भी
जैसे आ रहा था पसीना

और ऐसे में एक बूढ़ा
जिन्दगी भर जमा की गई किताबों को
बोरे में भर
गिरा रहा था पुल से नदी में

उसे जल्दी थी
सूरज डूबने से पहले
यह काम हो जाये

वह उन्हें डूबता देख
इतमीनान से
घर लौट जाये ।

सुस्ताने के समय में

दोपहर में झोंपड़ी के ऊपर
लौकी के पसरे लत्तर को
देख रही है औरत

दो लौकी जवान है
तीन अभी बतिया

औरत अब जायेगी
भिंडी के खेत में
उसी खेत के कोने में
आठ-दस थान है बैंगन का
वहीं खड़े महुआ के
झबरदार पेड़ को देखेगी
और खोजेगी हवा में
उसकी गमक

वहाँ से लौट, दालान में
अलगायेगी मकई से दाने

सुबह से रात तक हलकान
बेपहर की जिन्दगी में
औरत इसी तरह
सुस्ताती है दोपहर में ।

इसी शहर में

इसी शहर में बेटा पाँचवीं से पहुँचा एम.ए. तक
बेटी पहली से हुई मैट्रिक पास
यहीं पके दाढ़ी-बाल
यहीं प्यार-मुहब्बत की तमाम बातें
लगने लगीं किस्सा-कोताह

यहाँ मिला बहुत कुछ, गया बहुत कुछ
इसी शहर ने सिखाया कि
दुनिया में एक ढेला भी
मुफ्त में नहीं मिलता
हरेक चीज वसूल लेती
ठोक-बजा कर अपनी कीमत

इसी शहर ने बताया
कि बाँचते रहो अखबार
देखते रहो टी.वी.
करते रहो बहस
झोंकते रहो एक-दूसरे की आँखों में धूल
और जैसे नाद पर भरपेटा खाने के बाद
बथान में पगुराते हैं गाय-बैल
तुम भी पगुराते रहो
क्योंकि, यहाँ जो जितना पगुराता
उसे माना जाता
उतना ही बड़ा रईस और सभ्य

इसी शहर में मैंने जाना
हमारे शहर में सभ्यता
कुटिलता, निर्लज्जता और असभ्यता की
अद्भुत पटकथा है

इसी शहर ने समझाया
इन दिनों बिकने और बेचने के अलावा
कुछ बचता ही नहीं
और जो यहाँ पालतू नहीं
वे हमारे समय के फालतू लोग हैं ।

प्रार्थना

प्राथमिक विद्यालय में
प्रार्थना कर रहे हैं बच्चे

उनके सामने
दो लंबे बच्चे
प्रार्थना कराने का जिम्मा सँभाले
प्रार्थना कर रहे हैं

उन्हें देख कर लगता
जैसे एक-दूसरे के लिए ही
वे कर रहे हों प्रार्थना

मास्टर साहब,
नहीं आये हैं आज भी ।


सेल्फी समय में कविता

पीछे भी हम
सामने भी हम
जहाँ तक देखें
हम ही हम

आत्ममुग्ध इस सेल्फी समय के खिलाफ
कुछ लोग खड़े थे तन कर
पूँजी की माया में
मायामृग बने लोगों को
भेज रहे थे धिक्कार

कविता चकित थी
उनकी सेल्फी देख कर ।

दिनकर चौराहा

चौराहे के बीचोंबीच
राष्ट्रकवि दिनकर की मूत्र्ति
पश्चिम की ओर
पीपल छतनार

पीपल की लालसा, साफ
एक दिन वह ढँक लेगा
कवि के ऊपर का आकाश
और तेज धूप, बारिश से
रक्षा करेगा कवि की
और फिर
सुबह, रश्मिरथी
फिर, परशुराम की प्रतीक्षा
दोपहर को कुरूक्षेत्र
सांझ को ऊर्वशी
देर रात, हारे को हरिनाम सुनेगा

मैं अवाक् था
उस पेड़ पर क्या
कवियों की आत्माएं
करती हैं निवास?

पीछे से कोई फुसफुसाया
राष्ट्रकवि को एक कवि के रूप में सुनना हो
तो कभी देर रात आना युवा कवि!