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Saturday 18 Nov 2017

मां

 

मां
कुशेश्वर
पी-166, ए, मुदियाली फस्र्ट लेन
कोलकाता-700024
मो. 9831894193
मांऽऽऽऽ
मां, आने में मुझे देर हुई
'अब रोने से क्या होगा
बोले थे छज्जू चाचाÓ
कैसे मैं समझाता उनको
पानी के अंदर रोती है कैसे मछली

बरखा रुक जाने के बाद
ऊपर से आधी सूखी धरती
अंदर से पूरी गीली रहती
ऐसी ही भीगी थी उस दिन तू चुपचाप
जब तुझे छोड़कर चला गया था
शर्त थी मेरी पत्नी की
किसी एक के साथ में रहना होगा
भीगे चूल्हे-सी बुझ गई थी तू
मैं धुआं-धुआं सा उठ रहा था
उस दिन लिखा था, आंधी ने
रिश्ते कैसे बालू संग उड़ जाते हैं

बड़की माई बोली थी-
'मरने से पहले छोटकी रो-रो के बोली थी
एक बार बुला दो बौआ को
ओकरा $खातिर दम अटका है
पर ऊ बेचारी नहीं अटकी
हां, बाबू तेरे होते
रोक भी लेते
वेद-पुराण में ऐसा बहुत सुना हैÓ

सुना था मैंने भी अपने बचपन में
आठ कोस के अंदर बेटा कहीं भी हो
मां को हवा में उसकी गंध मिल जाती है
पर मैं तो पचास किलोमीटर की
परिधि में भी
आ नहीं पाया था
गाड़ी चल रही थी दस घंटे लेट
एक $गरीब की मां ऐसे ही क्षण
बेटे के आने से पहले ही मर जाती है
मैं भी देख के तुमको किन्तु
मरा नहीं था
गिरा था कटे-पुराने छज्जे-सा*1
अगलू के समझाने में भी थोड़ी कड़वाहट-
'न चिट्ठी, न फून
बिन दवा और दारू के
जीती क्या बेचारी
अपना कोई पास नहीं था
छछक-छछक कर मरी दुखियारी
बड़ा गरब था उसको तुझ पर
पत्थर भले तू मारे
पर ममता को नहीं लजाएगा
दुनिया इधर-उधर हो जाए
तू निश्चय अंत समय में आएगाÓ

हां, याद है मुझको मां
सात साल का था मैं तब
मुझे भात नहीं देने पर
दे मारा था तेरे सिर पर
पत्थर का एक टुकड़ा
का$फी-$खून बहा था
यह मुझको कहां पता था
क्यों नहीं घर में भात बना था
आहत हुई थी तू
पर तेरी ममता नहीं मरी थी
तूने ही बतलाया था
जब मेरे दूध के दांत उगे थे
दो ऊपर, दो नीचे
तो सबसे पहले तेरी छाती पर
मैंने अपने दांत गड़ाए थे
कई-कई बार की बदमाशी पर भी
तोड़े नहीं थे तूने मेरे दांत
बस, एक चटकन दे देती थी
वह चपत नहीं थी मां
था एक स्पर्श ओस की बूंदों जैसा
जिसे घास उठाती माथे पर
पौधे-पेड़ के पत्ते लूटा करते हैं
होती नहीं है भाषा
न होती है बोली
स्पर्श बता देता है
है छुअन ये मां की
पशु-पक्षी क्या मानव
तेरी ममता का ही स्पर्श तो था
कि आंखें खुलने से पहले
मेरे हाथ ढूंढते तुझको
कान टोहते एक मीठी आवाज
और आंखें जब खुल जाती
देख के मेरी किलकारी और मुस्कान
मेरे गालों को चूम के कहती-
'अल्ले-ले... बौआ, हम्मर जाग गेलैÓ
तो लगता, झर रहे हैं फूल
स्वर्ण-रश्मि को साथ में लेकर
मैं रोता बहुत नहीं था
दर्द पेट में नहीं हुआ तो
कभी-कभार यूं ही रो देता
डर जाता था
कहीं खेत तो नहीं चली गई
नींद में मैं जब भी मुस्काता
दीदी खुशी से कहती थी-
'देखो... देखो, भाई भगवान से बातें करता हैÓ
जाने क्या देखा करता था
हंस देता था
दीदी बुद्धू बन जाती थी
मां को तब पास बुलाने को
रो देता था मैं
पेट से ही मिली थी कला ये हमको
तभी तो हम सोचा करते-
'मां केवल मां नहीं होतीÓ
आंचल होती है
आंख होती है
ऊंगली होती है
जुबान होती है
दुनिया जहान होती है

सच मां!
तेरे चेहरे में दिखता था सूरज लाल
आंचल में तेरे कभी सांझ नहीं थी
तेरी आंखों में दिखती थी दीपक की ज्योति
जाड़े की धूप-सी अच्छी लगती थी तू
$गर्मी की चिनगारी तेरी पीठ छिपा लेती थी
वो तो बाबू जी लगते थे महिषासुर के जाया
डर जाता था मैं
'मायगेÓ कहकर छिप जाता था
चिल्लाती थी तू
गरियाती थी
लेकिन छुप के बाबू जी से
मुझको भरपेट खिला देती थी
घड़ी की दोनों सुईयां रोज
दो बार मिला करती थीं
लेकिन तू कब मिलती थी अपने से
चरैवति... चरैवति... चरैवति...
बस, मेहनत और मनौती से तेरा नाता था
जब भी मिल जाती तेरी गोद
स्वर्ग उतर आता था मेरे कंधों पर
तू गाने लगती गीत
दीदी भी जुट जाती थी
तब मैं भी करने लगता था शब्दों से खिलवाड़-
'मां तू गुड़ की ढेली मीठी-मीठी
खट्टी तू इमली की जैसी
स्वाद तेरा महुआ का लट्ठा*2
मन तेरा आम की गाछी
झिड़की तेरी भिंडी की डंडी
सुबह में दिखती फूल-सी
शाम को फल बन जाती हो
तितली-सी उड़ती रहती हो
पर मधु भी ले आती हो
कुल तुम, कुल वधू भी हो
प्रेम-नगर की नींव डाल के
प्रेम-डगर पर चलती हो
मां होती है बच्चों का लक्ष्मण-झूला
मंजिल तक खिंची हुई एक डोर
रंग-रूप, रस-गंध, नहीं तू केवल
सृष्टा और सृष्टि के बीच का अनुबंध है तूÓ
तू हंस के कह देती-
'बुड़बक नै तऽऽ
हम निपढ़ कि समझौं तोहर भाखा*3
एतने हमरा आवय
-ओना मासी-धंग, पंडित जी चितंग-
न पढ़ लौ कभी रमायन
न सुन लौं कखनो गीताÓ
ना मां ना,
अब समझ में आया है
भाषा में बोली होकर भी
भाषा से ऊपर होती है मां
सब कुछ तुझे पता था
झेलती रहती थी पूरे घर का शोषण
फिर भी हमको देती रहती थी पोषण

धरती से आकाश
गर्मी, जाड़ा और बरसात
बाबू से लेकर गोतनी, ननद और सास
अपने-अपने ढंग से तुझपे बरस रहे थे।
लेकिन हर पतझड़ के बाद
पेड़ों पर उगते कोमल पत्तों-सा
हो जाता तेरा चेहरा
हो कोई तीज-त्योहार
कितना करती थी तू
झरने में भी वैसी कलकल न होगी
जो झनकार खुशी की
तेरे हाथों की चूड़ी और पैरों के पाजेब में थी
बस, छोटी-सी थी चाहत तेरी
किन्तु एक धाम के बाद ही
जाने क्यों पिता चले गए
तेरा $गुस्सा चला गया
चुपचाप सी हरदम रहती थी
छ: माह के जाते-जाते
वह चुप्पी चली गई
बेटी तो हुई पराई
बेटा भी पास नहीं था
मां, मगर तू सुन ले
कहता है इतिहास
भूगोल भी ऐसा कहता है
तू प्रकृति थी
मां प्रकृति होती है
प्रकृति होती है ईश्वर
ईश्वर ने जिस दिन $खुद को तोड़ा था
उस दिन हुई संसार की रचना
तूने भी तो $खुद को तोड़ा था
इस छोटे संसार की $खातिर
घर के झगड़े में जब तू
सीना पीट के रोती थी
लगता था, कंचनजंघा की चोटी
$खुद को तोड़ रही हो
ऐ रोती मेरी मां
ऐ सोती मेरी मां
आज मुझे विश्वास हुआ है
कि धरती के अंतिम छोर तक
जब तक एक भी मां
अपने को तोड़-तोड़कर
संसार जोड़ती रहेगी
यह धरती बची रहेगी।
-* 1. ताड़ के पेड़ की सूखी डाल पत्ता सहित
-* 2. मकई का लावा और हल्के भुने हुए महुए को ओखल में कूटकर बनाया हुआ स्वादिष्ट एक खाद्य
-* 3. भाषा