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Saturday 18 Nov 2017

क्या \'निराला\' हिन्दूवादी कवि थे?


राजकुमार कुम्भज
331, जवाहर मार्ग, इंदौर-452002
फोन- (0731) 2543380
यह अनायास नहीं है कि प्रखर छायावादी और मूलत: प्रगतिशील कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निरालाÓ को अब से 'हिन्दूवादी कविÓ माना जाएगा। अब से पहले तक तो हम सभी (वामपंथी और $गैर-वामपंथी) 'निरालाÓ को प्रगतिशील ही समझते, मानते और बताते आए हैं, वह इसलिए नहीं कि 'निरालाÓ किसी पार्टी फोरम के कवि नहीं थे। वह इसलिए कि 'निरालाÓ अपने कवि-स्वभाव और कवि-प्रकृति से ही प्रगतिशील थे; क्योंकि प्रगतिशीलता नि:संदेह कोई वाद नहीं है, वामपंथी और गैरवामपंथी दोनों ही विचार स्वीकार करते आए हैं कि प्रगतिशीलता कोई पंथ नहीं है। प्रगतिशीलता तो साहित्य का अपना मुख्य मापदंड है, किन्तु अब से 'निरालाÓ जैसे प्रगतिशील कवि को, हिन्दूवादी कवि बताने का जो सायास-प्रयास किया जा रहा है, वह जरा भी अनायास नहीं है। 'राष्ट्रवादी चेतनाÓ को 'हिन्दू राष्ट्रवादी चेतनाÓ में रूपांतरित कर दिया जाना न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि एक सांस्कृतिक-कुटिलता भी है।
साहित्य के अपने मुख्य मानदंडों को छोड़कर, अन्य किसी भी किस्म के मानदंडों को 'निरालाÓ ने जीवनभर अस्वीकृत ही किया है, उन्होंने किसी भी सांचे को, खांचे को और घाटपाट को, कभी भी मान्य नहीं किया, वे तो हर किसी खांचे को आजीवन $खारिज ही करते रहे हैं, किन्तु इधर मध्यप्रदेश भाजपा के मुखपत्र 'चरैवेतिÓ ने 'निरालाÓ को 'हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर कविÓ ठहरा दिया है। भाजपा के मुखपत्र 'चरैवेतिÓ ने इस संदर्भ में अपना जो तर्क दिया है, वह भी बड़ा मजेदार है। 'चरैवेतिÓ के संपादक जयराम शुक्ल ने अपने संपादकीय में 'निरालाÓ को 'राम की शक्ति पूजाÓ और 'महाराज शिवाजी का पत्रÓ जैसी लंबी कविताएं लिखने के आधार पर 'हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर कवि ठहराया है। फरवरी 2015 में प्रकाशित 'चरैवेतिÓ के संपादकीय का प्रारंभ ही कुछ इस तरह होता है कि पढऩे वाले का दिमाग एक ही झटके में सन्न रह जाता है। गौर कीजिए कि संपादकजी ने अपने संपादकीय का प्रारंभ किस 'निडरता और प्रखरताÓ से किया है? जयराम शुक्ल लिखते हैं कि महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निरालाÓ छायावादी दौर के सबसे ओजस्वी व तेजस्वी कवि थे (यहां 'हैÓ नहीं लिखा है) जिन्होंने अपनी रचनाओं में हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना का निडरता और प्रखरता के साथ उद्घोष किया। क्या जयराम शुक्ल की ये पंक्तियां हमारे आश्चर्य का विस्तार करने के लिए अपर्याप्त हैं? क्या 'निरालाÓ हिन्दूवादी कवि थे?
गनीमत है कि 'निरालाÓ पर भाजपा की नजर जरा देर से पड़ी, निराला से पहले लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल और कविगुरु ठाकुर रवीन्द्रनाथ टैगोर की वसीयत पर भाजपा और आर.एस.एस. अपनी दावेदारी पहल ही ठोंक चुके हैं। यह एक स्वाभाविक सच है कि किसी भी कवि की अथवा उसकी किसी भी कविता की, कोई भी व्यक्ति, अपने स्वतंत्र दृष्टिकोण से स्वतंत्र जांच परख कर सकता है, उसके बारे में अपना स्वतंत्र मत व्यक्त करने की स्वतंत्रता का भी वह अधिकारी है, लेकिन मनमर्जी से की गई व्याख्या चौंकाती है। सामान्यत: उसी व्याख्या और उसी अर्थ की अपेक्षा की जाती है, जिसमें अधिकतम सर्वग्राही, अधिकतम सर्व-स्वीकार्य और अधिकतम सर्व समावेशी दृष्टिकोण का प्रतिपादन मिलता हो। नई नजर, नई दृष्टि अथवा नई आलोचना, समीक्षा का भावार्थ यह नहीं हो सकता कि 'नीरÓ को 'नीलÓ साबित करने की  जिद  पाल बैठें। आश्चर्य होता है कि जयराम शुक्ल ने 'राम की शक्तिपूजाÓ को तो निराला का अद्भुत काव्य करार दे दिया और 'महाराज शिवाजी का पत्रÓ नामक कविता को अपने मन-मतलब का औजार बना-बता दिया। वे लिखते हैं, बल्कि स्थापना देते हैं कि निराला की यह 'पत्र-गीतÓ रचना आज भी पाठकों को झंकृत करती है और कि जो कई मायनों में आज भी प्रासंगिक है, यही नहीं उन्होंने (शुक्ल जी ने) 'निरालाÓ की उस एक अतिख्यात रचना को भी अपने लपेटे में ले दिया है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में 'जागो-फिर एक बारÓ की हुंकार से देश के नौजवानों में देश के लिए मर-मिटने का जज्बा पैदा करती है। जयराम शुक्ल ने 'निरालाÓ की 'जागो एक बारÓ कविता को 'सनातनी सांस्कृतिक गौरवÓ की कविता कहा है। क्या 'निरालाÓ को सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद का ज्ञान और बोध, ठीक वैसा ही उतना ही था, जितना और जैसा कि यहां प्रतिपादित किया जा रहा है? 'निरालाÓ को 'हिन्दूवादी कविÓ घोषित करने का 'भ्रमÓ और 'कुचक्रÓ क्यों चलाया जा रहा है? जबकि खुद 'निरालाÓ ने और अन्य निरपेक्ष समालोचकों, काव्यकारों तक ने 'निरालाÓ के कविता-बोध को व्यापक माना है। यहां तक कि निराला की कविता को किसी वाद की कविता अथवा किसी $खास प्रवृत्ति की कविता मानने से पर्याप्त परहेज ही किया है। निराला की कविता में किसिम-किसम के बोध हैं, किसिम-किसिम की प्रवृत्तियां हैं और किसिम-किसिम की जातीय-चेतना के अहसास हैं। निराला राष्ट्रवादी चेतना के कवि तो हो सकते हैं, बल्कि स्वीकारे भी गए हैं, लेकिन उन्हें 'हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना के कविÓ साबित करना क्या एक अनर्थकारी उपक्रम नहीं है? 'राम की शक्तिपूजाÓ कोई कर्मकांडी हिन्दुत्ववादी पूजा-अर्चना नहीं है। वह तो शक्ति-अर्जन का मानवीय आख्यान है। वहां, मनुष्य की जातीय संवेदनाओं से सराबोर संकल्पों की साधना है। वह शक्ति-पूजा किसी व्यक्ति-विशेष, किसी वाद-विशेष या किसी पंथ-विशेष की पूजा न होकर मनुष्य मात्र के कल्याणार्थ मन-वचन-कर्म से किया गया अनुष्ठान है। अगर 'राम की शक्ति-पूजाÓ को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सीमित अवधारणा में रखकर देखा जाएगा, तो उसके वास्तविक अर्थ-तत्व को पाना कठिन हो जाएगा। निराला की समग्रता को समावेशी-समग्रता से ही देखा-परखा जाना उचित होगा। निराला संकीर्णता के नहीं, बल्कि समग्रता के कवि हैं, वे उपनिवेश के नहीं, बल्कि समावेशी के कवि हैं। वे व्यग्रता के साथ, पश्चिम की गुलाम मानसिकता के $िखलाफ जन-निष्ठा की राजनीतिक-चेतना के कवि थे। 'निरालाÓ किसी भी दृष्टिकोण से न तो 'हिन्दूवादी कवि थे और न ही हिन्दू राष्ट्रवादी चेतनाÓ के कवि होने का कोई संकेत देते हैं। वे कवि थे और शायद निरे कवि से पूछा जा सकता है कि सांस्कृतिक-चेतना की कल्पना क्या बिना किसी राजनीतिक-चेतना के संभव है? यह भी पूछा जा सकता है कि आधुनिक युग से पहले सांस्कृतिक चिंतन की कौन-सी धारा या श्रेणी उपलब्ध दिखाई देती है? भारतेंदु ने राजनीति को ही आधुनिक युग का तत्व-दर्शन कहा था। निराला के जमाने में पश्चिम की गुलाम मानसिकता से मुक्ति का माहौल था। सभी समकालीन रचनाकार अपनी-अपनी निष्ठा से, जन-निष्ठा की राजनैतिक-चेतना के लिए संघर्षरत रहते हैं। निराला और निराला के समकालीन भी इतिहास के उसी एजेंडे से संघर्ष कर रहे थे, जो उनके युग के इतिहास ने उन्हें दिया था। वैश्वीकरण, आर्थिक सुधारों, श्रम-सुधारों इत्यादि के इस युग में हम क्या कर रहे हैं? क्या यह गुलाम-मानसिकता की नई ऐतिहासिक परिभाषा नहीं है? क्या सांस्कृतिक चुनौतियों को राजनैतिक-चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में रखकर बेहतर नहीं समझा जा सकता है? यह प्रश्न भी सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक ही अधिक है कि कोई भी राष्ट्रवाद कैसे और किस प्रक्रिया के तहत आहिस्ता-आहिस्ता उग्र राष्ट्रवाद में तब्दील कर दिया जाता है?
एक राजनीतिक प्रक्रिया के तहत ही पहले राष्ट्रीय प्रतीकों और प्रतीक-पुरुषों को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा जाता है। जातीय-चेतना को जगाकर भड़काया जाता है। जातीय-चेतना को ही सांस्कृतिक-चेतना बताया जाता है। इसी प्रक्रिया के तहत फिर सांस्कृतिक-चेतना और राष्ट्रीय-चेतना को बेहद चतुराईपूर्ण तरीकों से जोड़ दिया जाता है, तत्पश्चात खड़ा किया जाता है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का छूमंतर, कुछ-कुछ इसी बीच, इसी तरह सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी चेतना का जन्म हो जाता है। फिर धीरे-धीरे, किन्तु जोर-शोर से हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना का शोर सुनाई देने लगता है। अपने उस शोर के लिए कभी भगतसिंह, तो कभी सरदार वल्लभभाई पटेल, तो कभी रवीन्द्रनाथ ठाकुर को चुन लिया है। इसी क्रम में अब सूर्यकांत त्रिपाठी 'निरालाÓ का चयन कर लिया गया है। किसी भी मध्यवर्ग की जड़ें अपनी परंपराओं में ही अंतर्निहित होती हैं, कथित मध्यवर्गीय राजनीतिक चेतना उन्हीं परंपराओं का अपहरण करके अपनी जड़ें जमाती हैं, तब ही राष्ट्रवाद की जगह उग्र राष्ट्रवाद ले लेता है और देखते ही देखते समूचे लोकतांत्रिक-समाज पर एकनिष्ठता के मूल्य अपना कब्जा जमा लेते हैं। याद कीजिए कि क्या इटली, जर्मनी और रूस आदि देशों में ऐसा ही नहीं हुआ था? यह एकनिष्ठता, एक सायास राजनीतिक-प्रक्रिया है, जिसकी कोख से एकाधिकारवादी शक्तियों का जन्म होता है। आश्चर्य नहीं कि हमारे देश में भी यह प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है और इस प्रक्रिया ने इस बार 'निरालाÓ को चुन लिया है, 'बांधों न नाव इस ठांव बंधु / पूछेगा सारा गांव बंधुÓ पूछो, पूछो, जरा जल्दी पूछो।
माना कि 'निरालाÓ पर किसी का कॉपीराइट नहीं है, किन्तु उनका तो बिलकुल ही नहीं है, जो आधुनिककाल को मध्यकाल से जोड़ते हैं। आधुनिककाल समग्रता का काल है, जबकि मध्यकाल संकीर्णताओं का। अब से त़करीबन 85 बरस पूर्व जब 'निरालाÓ ने यह घोषणा की थी कि मनुष्यों की मुक्ति कर्मों के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है तो 'निरालाÓ की यह घोषणा सिर्फ एक सांस्कृतिक-साहित्यिक घोषणा मात्र नहीं थी। 'निरालाÓ तब 'कविता की मुक्तिÓ के साथ ही साथ 'मनुष्यों की मुक्तिÓ की भी घोषणा कर रहे थे। 'निरालाÓ की इस घोषणा को संपूर्णता में देखने की जरूरत है; क्योंकि 'निरालाÓ की इस घोषणा में 'गुलाम मानसिकता से मुक्तिÓ की भी घोषणा ध्वनित हो रही है। इस तरह हम देखते और पाते हैं कि 'निरालाÓ द्वारा की गई 'कविता की मुक्तिÓ की घोषणा, एक राजनीतिक घोषणा है। छंदों के शासन से कविता की मुक्ति का मामला सौ बरस से अधिक पुराना नहीं है। छंदों के शासन से मुक्ति के बाद ही कविता में अभिव्यक्ति की अभूतपूर्व स्वतंत्रता आई है और कविता में रोजमर्रा की जिंदगी के विषयों का विस्तार हुआ है। 'बसंत के अग्रदूतÓ महाकवि 'निरालाÓ ने जब यह कहा कि 'कविता को चौखटों में मत कसो, कविता की राह में रोड़े न बिछाओÓ तो उनकी इस हिदायत ने आधुनिक हिन्दी कविता का कायाकल्प ही कर दिया। क्या 'निरालाÓ से पहले कोई 'कुकुरमुत्ताÓ को विषय बनाकर कविता लिख सका था? 'वह तोड़ती पत्थरÓ और 'बांधो न नाव इस ठांव बंधु / पूछेगा सारा गांव बंधुÓ जैसी कालजयी रचनाओं के रचनाकार को 'हिन्दू राष्ट्रवादी कविÓ कहना, न तो न्याय संगत है, न व्यावहारिक और न ही अर्थविस्तार देने वाला कोई व्यापक सूक्ष्म दृष्टिकोण ही। यह 'सबका साथ सबका विकासÓ नहीं है, यह तो 'सबके साथ सबका उपहासÓ का आगाज है, आज 'निरालाÓ कल 'अज्ञेयÓ और फिर पता नहीं, किस-किस की बारी है, क्या 'दीप-दीप पंक्ति को दे देने की तैयारी है?