Monthly Magzine
Wednesday 22 Nov 2017

यादें : मंचीय लोकप्रिय कविता की


विजय बहादुर सिंह
29, निराला नगर
भदभदा रोड, भोपाल
कविता और कवि के प्रति आकर्षण बचपन से ही था। इसका कोई कारण आज तक भी खोज नहीं पाया। किशोर उम्र में तो कवियों के मुंह से कविता सुनने की आदत भी बनने लगी। स्वतंत्र रूप से फिल्में देखने और उपन्यास पढऩे की मनाही, अघोषित तौर पर थी ही। पिताजी आर्यसमाजी थे और संगीत के नाम पर उन्हें सिर्फ उपदेशधर्मी या फिर उद्बोधनकारी भजन या कविताएं भाती थीं। फिर भी न जाने क्यों मेरा मन बार-बार कविता और नाटक की ओर भागता था। धीरे-धीरे अपने इसी आकर्षण के चलते मैं कोलकाता में आयोजित होने वाले कवि सम्मेलनों में जाने की कोशिश करने लगा पर उस वक्त उस महानगर में मैं एक अज्ञात किशोर के अलावा और क्या था। तब मुझे वहां जाने कौन देता। सो बाहर खड़ी धक्का-मुक्की खाती भीड़ का हिस्सा बने रहकर निराश और उदास होने के सिवाय चारा क्या था। पर इसकी भरपाई होने लगी। कॉलेज के दिनों में जब मैं हिन्दी साहित्य परिषद का उपसचिव बनकर अपने प्रिय हिन्दी प्रोफेसर रघुनंदन मिश्र के करीब आने का सुअवसर पा सका। वे ही दो-एक बार हम दो तीन साहित्य-प्रेमी छात्र-मित्रों को लेकर ससम्मान चौरंगी स्थिति भारतीय संस्कृति संसद पहुंचे थे। वहीं पहली बार हमने कवि शिवमंगल सिंह 'सुमनÓ को नायाब गद्य बोलते हुए प्रगतिशील रोमानी कविताएं पढ़ते रू-ब-रू सुना। सुमन जी की वेशभूषा भी काफी अभिजात थी। रॉ सिल्क की हाफ बुशर्ट और पैण्ट। चेहरे पर सुर्खी, आवाज में जादुई आकर्षण। भाषा में मनोहारी बनावट और व्यंजकता। इसके बाद जिस दूसरे कवि को थोड़ा करीब से देखने का मौका आया वो उभरते लोकप्रिय कवि नीरज थे। उन्हें तो हमने कॉलेज के वार्षिकोत्सव में ढाई सौ रुपए के मेहनताने में अलीगढ़ से बुलाया था। वहीं उसी पाठ में अन्य कई रुबाइयों और जनगीतों के अलावा उनके मुंह से 'कारवां गुजर गया गुबार देखते रहेÓ जैसा कालजयी गीत भी सुना। तब तक भी बच्चन की 'मधुशालाÓ का लोकप्रिय मादक प्रभाव कम नहीं हुआ था। कवि सम्मेलनों के निद्र्र्वन्द्व सम्राट तब तक भी वे ही थे। पर उनके बाद यह सत्ता नीरज के हाथ आने वाली है, यह भी जाहिर होने लगा था। नीरज भी इस दृष्टि से काफी सचेत थे। न तो उन्होंने कभी बच्चन का छंद पकड़ा न काव्य-भाषा। बच्चन के छंदों का आकार छोटा था। मधुशाला के छंद तो जैसे मध्यकालीन कवित्त के स्थानापन्न ही थे। बच्चन के कंठस्वर ने उन्हें अलग प्रकार की जीवंतता और लोकप्रियता दे दी थी। माधुर्य से भरे-पूरे तो वे थे ही। छायावादी कवियों की गहरी रोमांटिकता और दार्शनिकता का बोझ या गंभीरता एक तरफ करके उस वक्त के जवान-समूहों को मस्ती और बेफिक्री में डुबाने के साथ-साथ एक ऐसे जीवन संगीत से जोड़ रहे थे जिसमें व्यावहारिक आनंदवाद के साथ-साथ जाति और धर्म के संकरे सांप्रदायिक दायरों को दरकिनार कर एक ऐसे जीवन-पथ पर लाने की पहल थी जो ठेठ लौकिक और उदार मानवीयता से भरपूर हो। नि:संदेह बच्चन की मधुशाला में तुर्शी का तत्व नहीं था। था भी तो बस लड़वाते हैं मंदिर मस्जिद मेल कराती मधुशाला जैसी पंक्तियों तक। इसमें क्या शक कि मधुशाला मेलजोल की, मस्ती की, बेफिक्री की कविता थी।
याद करें तो मधुशाला का रचनाकाल उन्नीस सौ तीस के आसपास का है। यह समय भगतसिंह की शहादत और गांधी के व्यापक प्रभाव का था। मधुशाला निश्चय ही गांधी के अधिक करीब की कविता लगती थी क्योंकि उसमें प्रेम और भाई-चारे का संदेश था। हिंसा और आक्रामकता के लिए उसमें शायद ही कोई जगह रही हो। नीरज इससे सवर्था भिन्न दृष्टि और काव्य-पथ लेकर आ रहे थे। नीरज की अनुभूतियां गांधी के अवसान के बाद के प्रधानमंत्री नेहरू युग की संतानें थीं। अपने शुरूआती पहले पांच सालों में ही न जाने क्यों नेहरू कवियों और लेखकों को निराश और क्षुब्ध करने लगे थे। उन्हीं के शासनकाल में 'अंधायुगÓ लिखा गया। परसाई की व्यंग्य-वृत्ति पैदा और विकसित हुई। निराला की ढेर सारी कविताएं लिखी गई। नीरज के आगमन और उदय को अगर सन् पचास के आसपास मान लें तो कहना पड़ेगा कि वे नेहरू शासनकाल के शुरूआती बरसों में ही यह महसूस करने लग गए थे कि गांधी ने जिस आदर्श या काल्पनिक रामराज्य का सपना आम भारतीय के मन में रोप दिया था, नेहरू शासनकाल में दूर-दूर तक उसका कोई अता-पता नहीं था हां कुछ बड़े-बड़े बांध जरूर बांधे जा रहे थे। भारी कारखानों की नीवें डाली जा रही थीं, खेती-किसानी को पश्चिमी तर्ज पर आधुनिकतम बनाने की योजनाएं विकसित की जा रही थीं। पर दूसरी तरफ गांव-गांव तक फैलती जाती नौकरशाही का जनविरोधी, जनआतंककारी और जनशोषणकारी रूप पिछली जमींदारी और सामंती व्यवस्था की तुलना में कहीं अधिक कुटिल क्रूर और अमानवीय था। छोटा से छोटा सरकारी कारकुन बनकर भी अपने-अपने रुतबे के अनुसार स्थानीय नागरिक समाज को तंग कर अपना उल्लू सीधा करने की कोशिशें प्रबल हो उठी थीं। यह वह जन-असंतोष था जो नेहरू शासनकाल की ऐतिहासिक उपलब्धियों पर पानी फेरने को मजबूर था पर नीरज के गीतों में रुबाइयों में, मजबूरी की जगह क्षोभ, उद्विग्नता, किंचित आक्रामकता और भरपूर आलोचनात्मक थी। स्वभावत: यह मधुशाला का जमाना नहीं रह गया था। 'मधुशालाÓ तो आजादी से पहले की राष्ट्रीय और सामाजिक एकता, पारस्परिकता और भाईचारे की कविता थी। तब देश का मूड भी वैसा ही था पर गांधी की हत्या के बाद, नेहरू का गांधी के आदर्शों से विचलन के बाद कोई कवि या कथाकार उनके साथ हामी भरने को तैयार नहीं था। अगर थे भी तो लोक समाज उनके शब्दों पर भरोसा करने को तैयार नहीं था। नीरज के ऐतिहासिक आगमन की वजहें नेहरू शासनकाल के मोहभंग से जुड़ी थीं। इसी नाते नीरज की आवाज कविता की सच्ची आवाज लग रही थी और कविता की यह सनातन मजबूरी है कि वह सचमुच सच और सच के अलावा कुछ नहीं कहे।
एक और बात जो नीरज में थी वो यह कि उनके छंद न केवल बच्चन अपितु अन्य छायावादोत्तर गीतकारों की तुलना में प्रदीर्घ थे साथ ही मिलीजुली भाषा-हिन्दुस्तानी में रचे जा रहे थे। यह भाषा अरबी-फारसी के लोक प्रचलित शब्दों को भी तत्सम-तद्भव शब्दों के साथ रचकर एक ऐसी मिली-जुली विरासत की याद दिला रही थी जो यों भी तब तक भूली नहीं थी। खुद गांधी भी इसी तरह की मिली-जुली हिन्दुस्तानी के भविष्यदृष्टा और पक्षधर थे। नेहरू तो अपना जन-संवाद इसी भाषा में करने के आदी थे। मधुशाला इस तुलना में हिन्दी के तद्भव शब्द समूहों का सौंदर्य लिए हुए था। पर नीरज के गीत हमें नजीर आदि शायरों की काव्य-भाषा की याद भी जब-तब दिला रहे थे। यों भी नीरज ने उर्दू की  शायरी से बहुत कुछ सीखा और लिया था। उनकी कई रुबाइयों से गुजरकर यह महसूस किया जा सकता है कि वे हिन्दी से कम और उर्दू  से कुछ ज्यादा ही वास्ता रखती है। सच तो यह कि नीरज मिलीजुली परंपरा की मिठास लेकर आ रहे थे। तब भी आधार-भाषा तो उनकी हिन्दी ही थी और अनुभवों का समूह राष्ट्रीय।
इस अवसर पर जिन दो और असाधारणों की याद आ रही है उनमें से थे प्रेमचंद तो दूसरे थे राममनोहर लोहिया। इनकी भाषा भी इसी हिन्दुस्तानियत का सौंदर्य लिए हुए थी। नीरज को लोकप्रिय बनाने में नि:संदेह इस काव्य-भाषा का बड़ा योगदान था।
किशोर-काल की चौहद्दियों को पार करता हुआ मैं स्वभावत: ऐसी शायरी और काव्य-भाषा का मुरीद होता जा रहा था जिसमें सहज सम्प्रेषणीयता हो। प्रभाव सामथ्र्य तो हो ही।
मंचों की इन कविताओं के साथ-साथ जो दो-तीन कवि मुझे लगभग बेखबर सा रखते हुए अपनी जगह बनाए चले जा रहे थे उनमें 'भिक्षुकÓ जैसी कविता के कवि निराला, 'कस्मै देवायÓ कविता के दिनकर और 'प्रलयगानÓ वाले नवीन थे। अब सोचता हूं तो ये कविताएं मेरे आसपास के उस सामाजिक भूगोल के बयान से जुड़़ी हुई थीं जिसमें मेरा बचपन और कैशोर्य बीता था। गांवों मे व्याप्त गरीबी और अंधकार, भिखमंगों की कतारें, मुझे परेशानी से भरने लगी थीं। यह तो नहीं सोच पाया था कि ऐसा क्यों है, पर यह जरूर लगने लगा था कि यह अच्छा तो नहीं है। एक बात जो तब भी जाने-अनजाने पता नहीं कैसे बैठी हुई थी कि केवल संघर्ष करके इनके पार जाया जा सकता है। राम के वनवास के दिन याद रहा करते थे कि किन-किन बेहद विपरीत और तकलीफदेह स्थितियों में वे सिर्फ संघर्ष करते और अपना पुरुषार्थ जताते रहे।
किशोर-काल पार कर आने पर वह समय भी आया जब मैं अपने उसी विद्यासागर-कॉलेज की साहित्य-परिषद का सचिव चुना गया और तुलसी जयंती के बहाने कवि दिनकर और नीरज को एक साथ बुलाने का मौका आया। प्रोफेसर रघुनंदन जी मिश्र ही संरक्षक थे। वे ही चिट्ठियां लिखते थे और वे ही राहें सुझाते थे। उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के एक गांव में जन्मे, पले-बढ़े और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में पं. केशवप्रसाद मिश्र की अध्यक्षता वाले दिनों में दीक्षित, उर्दू और हिन्दी की ढेर सारी कविताएं उन्हें याद थीं और कवियों की व्याख्या के दौरान वे इन्हें कक्षा में अपने व्याख्यान को और अधिक सरस बनाने के उद्देश्य से सुनाया भी करते थे। उनके सुनाने का अंदाज भी कोई कम मोहक नहीं था।
दिनकर तब तक 'संस्कृति के चार अध्यायÓ लिख चुके थे। राज्यसभा के सदस्य और नेहरूजी के प्रियजनों में थे। भारतीय ज्ञानपीठ के साहू शान्तिप्रसाद जैन और रमा जैन उनके स्नेहियों में थे। ठहरा भी वे वहीं करते थे। नीरज को हमने एक अलग होटल में ठहराया था। उन दिनों दिनकर में सत्ता के निकट होने की ठसक तो थी ही 'संस्कृति के चार अध्यायÓ लिखने का आत्मतोष और बौद्धिक गौरवाभिमान भी था। ये ही दिन थे जब वे पश्चिम के नये कलान्दोलनों के बारे में गहरी जानकारी अर्जित करते हुए 'शुद्ध कविता की खोजÓ जैसी किताबों के रचने की पूर्व भूमिका में डूबे हुए थे। मंच पर दोनों ही कवि लगभग अजनबी की तरह उपस्थित हुए और बैठे। यहीं पहली बार मुझे कविता और कवि श्रेणियों का फर्क भी समझ में आने लगा। यों दिनकर भी कोई गूढ़ रहस्यवादी-छायावादी कवि तो कतई नहीं थे पर उनकी कविता में राष्ट्रीय स्वाभिमान गरिमा का तेज और ताप अलग किस्म की धधक और प्रभाव लिए हुए था। भाषा तो उनकी भी बेहद साफ-सुथरी, धुली-निखरी थी। पर उसका प्रभाव वीरोचित और विचारोत्तेजकता लिए हुए था। उस शाम तो खैर वे काव्य-पाठ की जगह कवि तुलसीदास पर अपना दृष्टिकोण रखने के लिए आए थे, इसलिए कविता सुनाने का तो प्रश्न ही नहीं। तब भी न जाने कैसे वे बोलते-बोलते अचानक प्रोफेसर मिश्र की तरह मुड़कर कहने लगे- मिश्र जी। कुछ लोग केशर के खेत में लहसुन बोना चाहते हैं। उनका यह कहकर नीरज की तरफ देखना यह भी संकेत कर रहा था कि लहसुन और कोई नहीं नीरज ही हैं। दिनकर तो केशर ही हैं। आज सोचता हूं कि कहीं उनके दाएं-बाएं अगर कभी निराला होते तो वे अपनी उपमा किससे देते? तब भी एक बात तो समझ में आई ही कि कवियों के बीच भी ऊंच-नीच छुआछूत होता है। नीरज तो खैर उसके बाद बुझ से गए थे। उनका काव्य-पाठ जमा ही नहीं। और दिनकर तमाम विनम्र आग्रहों के अपना भाषण देकर बस एक छोटी-सी आत्मपरक कविता सुनाकर चले गए-
भागने जब से लगा हूं
कीर्ति के कोलाहलों से
मैं समझता हूं अरे! मैं तो प्रवासी था
आज कितने दिन बाद
अपने देश वापस जा रहा हूं।
कोलकाता के महाजाति सदन का वह खचाखच भरा हाल नीरज की दयनीय उपस्थिति पर सहानुभूति से भर उठा था पर निराश भी कोई कम नहीं हुआ। दिनकर जैसे उनकी सारी आभा छीनकर चले गए थे।
उसी दिन से यह भी समझ में आया कि लोकप्रिय मानी जाने वाली कविता कई हिन्दी कवियों द्वारा नीची निगाह से देखी जाने लगी है। लोकप्रिय कविता को किंचित अधिक गंभीर होने की जरूरत है। पर यह गंभीरता कैसे आती है, भाषा को अधिक वक्रता सौंपकर या फिर अनुभवों की भंगिमाओं को अधिक सघन, सूक्ष्म और सांकेतिक रूप देकर, यह कौन सोचेगा? सतह से नीचे के अर्थों को, परम्परा की अनुगूंजों से समृद्ध कर जब उसे समकालीन काव्य-मुहावरों में व्यक्त किया जाता है तब केवल कविता की पहुंच अखबारी नहीं रह जाती। कविता सुनने और पढऩे के बाद कविता में फिर भी पढऩे और सुनने को बहुत कुछ बचा रहता है। वह जीवनबोध जो हमें चतुर्दिक घेरे हुए हैं, वह दृष्टि जो हमें चाहे-अनचाहे कहीं ले जाना चाहती है, वे सच्चाइयां जो तमाम तरह के संस्थानिक दबावों में गूंगेपन से गुजर रही हैं, ऐसी कविता में मुखरता पा लेती हैं। कविता में यही तो सनातनता है और कवि का काम है इसी को पहचानना और खोजना। ऐसा भी नहीं कि नीरज यह एकदम से नहीं ही कर पा रहे थे।  सच तो यह कि उनकी काव्य-चिंता व्यापक समाज में धीरे-धीरे पनपतीं उन बेचैनियों को लेकर थी जिनका वास्ता उस मूल्य-क्षरण से था जो सत्ता-राजनीति का चरित्र बनता जा रहा था।