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Saturday 18 Nov 2017

भीष्म साहनी : नई कहानी के मुहावरे का अतिक्रमण


डॉ. वेदप्रकाश अमिताभ
डी-131, रमेश विहार
अलीगढ़-202001
मो. 09837004113
यह आकस्मिक और अस्वाभाविक नहीं है कि भीष्म साहनी को शुरू में प्रभावित करने वाले लेखकों में प्रेमचंद और सुदर्शन मुख्य हैं। स्पष्ट है कि भीष्म साहनी की मानसिकता प्रारंभ से ही समाजधर्मी और यथार्थपरक रही। वे निश्चय ही प्रेमचंद की परम्परा के कथाकार हैं। लेकिन वे प्रेमचंद को एकदम स्थूल रूप में स्वीकारने और आगे बढ़ाने के कायल नहीं। उन्हीं के शब्दों में ''मक्खी मारने से काम नहीं चलेगा। उनकी सुधार-दृष्टि आज हमारी मदद नहीं कर सकती। समस्याओं के जो समाधान उन्होंने दिए हैं, वे आज संगत नहीं रह गए हैं। आज प्रेमचंद की परम्परा को अधिक वैज्ञानिक और कलात्मक आधार देकर आगे बढ़ाने की जरूरत है।ÓÓ ऐसा नहीं है कि प्रेमचंद के विकासक्रम से भीष्म साहनी अवगत नहीं हैं उन्हें ज्ञात है कि आखिरी दौर में प्रेमचंद समाधानों के पक्षधर नहीं रह गए थे। जिन कहानीकारों ने प्रेमचंद को आत्मसात करते हुए उनकी जनधर्मी परंपरा को विकसित किया है, नयापन दिया, उनमें भीष्म साहनी अलग से इसलिए पहचाने जाते हैं कि उनकी कहानियों का मुहावरा प्रयोगधर्मी या चौंकाने वाला न होकर बहुत सहज और आत्मीय है। लगता ही नहीं कि ये कहानियां रची गई हैं, लगता है ये 'घटितÓ हुई हैं। 'कथ्यÓ, 'भाषाÓ, 'कथन-पद्धतिÓ कहीं भी किसी किस्म की अतिरंजना नहीं। किसी किस्म की बनावट नहीं। धनंजय वर्मा जैसे समीक्षकों का चकित होना स्वाभाविक है कि माहौल की हवा और वक्त के फैशन की जद में आए बगैर आज भी कोई ऐसी सीधी-सादी सहज कहानी कैसे लिख लेता है। दरअसल भीष्म साहनी चरित्र, विचार और अनुभव को 'कहानीÓ के फ्रेम में कुछ इस तरह मढ़ते हैं कि वह एक स्वतंत्र कलाकृति बन जाती है।
बकौल मधुरेश, सोद्देश्य रचना के विकास की जो सहज दिशाएं होती हैं, उन्हें भीष्म की कहानियों के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है। 'चीफ की दावतÓ से लेकर 'खुशबूÓ तक की कहानी-यात्रा में भीष्म साहनी ने मानवीय संबंधों की पहचान और परिवेश-बोध को आंकने में अपने रचनात्मक सामथ्र्य का पूरा-पूरा उपयोग किया है। एक ओर वे ऐतिहासिक परिदृश्य को अनदेखा नहीं करते, दूसरी ओर स्वातंत्र्योत्तर परिवेश में संबंधों और मूल्यों के बिखरने-जुडऩे की वास्तविकता को बहुत निकट से देखने की गवाही देते हैं। संबंधों और मूल्यों की पहचान की दृष्टि से 'चीफ की दावतÓ, 'पटरियांÓ, 'अमृतसर आ गया हैÓ, 'ललकÓ, 'रास्ताÓ, 'मालिक का बन्दाÓ, 'ढोलकÓ, 'ओ हरामजादेÓ आदि कहानियां उल्लेखनीय है। 'चीफ की दावतÓ की मां 'परम्पराÓ का द्योतक है, जिसे आधुनिकता के अति उत्साह में 'व्यर्थÓ और 'उपेक्षितÓ समझ लिया जाता है। यह कहानी जहां एक ओर मातृहृदय की वत्सलता को रेखांकित करती हैं, वहीं इसमें उन लोगों पर करारा व्यंग्य है, जो अपनी संस्कृति और परम्परा को विदेशियों की दृष्टि से देखते-परखते हैं। 'मांÓ पहले छिपाने की चीज थी, वह साहब के मनोभाव व्यक्त होते ही गर्व का आलंबन बन गए। बाद की एक कहानी 'ढोलकÓ में यह व्यंग्य बहुत तीखा हो गया है। रामदेव विवाह संबंधी लोकाचारों को वाहियात मानता है, घोड़ी पर बैठने से मना कर देता है, लेकिन मिसेज स्मिथ के आग्रह करते ही उसके सारे निषेध ढह जाते हैं : ''उसे बड़े बूढ़ों की केसरी रंग की पगडिय़ां स्वयं सुन्दर लगने लगी थी। उसका मन चाहा, मेमो को बताए, औरतें माथे पर बिन्दी क्यों लगाती हैं और उसने कलाई पर रंगीन धागा क्यों बांध रखा है और बगल में तलवार क्यों लटका रखी है।ÓÓ
भीष्म साहनी की कहानियां उस अवधारणा का सशक्त प्रतिवाद करती हैं कि परम्परा और संस्कृति का आशय वायवीय अमूर्त से जुडऩा या कोरा आध्यात्मिक होना है। 'भगोड़ाÓ, 'मालिक का बन्दाÓ, 'अहं ब्रह्मास्मिÓ आदि कहानियां इस संदर्भ में पठनीय हैं। 'अहं ब्रह्मास्मिÓ का भाटिया अंगरेजों से अपमानित होकर शुतुरमुर्गी मुद्रा में अहंब्रहस्मि का जाप करता है। दूसरी ओर कांग्रेस का स्वयंसेवक राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में शरीक होकर मारा जाता है। वह अकेली कहानी साम्राज्यवादी शासन के दौरान भारतीय मन:स्थिति का स्पष्ट जायजा लेती है। उस समय एक ओर अपनी कथित गरिमा या श्रेष्ठता में मुंह छिपाने वाले मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी थे, दूसरी ओर शोषण का जुआ उतार फेंकने के लिए आतुर जनसमूह था। भीष्म जी की यह विशेषता है कि वे अपनी कहानियों में दो विरोधी 'मॉडलÓ आमने-सामने रख देते हैं। इनमें एक मॉडल के साथ उनकी स्पष्ट सहानुभूति और पक्षधरता होती है। दूसरे शब्दों में वे एक खिंची हुई रेखा को बगैर मिटाए छोटी करने के लिए उसके समानान्तर एक और रेखा खींच देते हैं। यह एक और रेखा उन लोगों की जीवन रेखा है, जो गरीबी की रेखा से नीचे या उसके आसपास जीवन बिता रहे हैं। 'भगोड़ाÓ का गजानन इसी वर्ग के पति-पत्नी के कुछ क्षणों को देखकर मोक्ष प्राप्ति का इरादा छोड़ देता है,... 'उनके पीछे-पीछे नगर की ओर जाने लगा, उस दिशा में जहां नर-नारी मोक्ष प्राप्ति के लिए नहीं, मात्र जीने के लिए, एक-दूसरे में अपना अवलम्ब खोजने के लिए जीते हैं। उसे लगा जैसे मनुष्य का सत्य, मनुष्य के हृदय में ही मिलेगा, उसके बाहर नहीं मिल सकता है।Ó
'राधा-अनुराधाÓ, 'पिकनिकÓ, 'त्रासÓ, 'सागमीटÓ आदि कहानियों में मध्यवर्गीय मानसिकता और निम्नवर्गीय जीवन के 'मॉडलÓ आमने-सामने हैं। 'राधा-अनुराधाÓ में भीष्म जी के उपन्यास बसन्ती का प्रारंभिक रूप है। इसमें निम्न वर्ग के साहस की तुलना में मध्यवर्गीय कायरता को रखा गया है। हालांकि 'सागमीटÓ में जग्गू की आत्महत्या उसके वर्ग के अन्याय सहते जाने की कायरता को व्यंजित करती है, लेकिन इसमें उच्च मध्यमवर्गीय परिवार का टुच्चापन और छद्म  पूरी तरह स्पष्ट है। 'पटरियांÓ कहानी में पटरियां समाज के दो वर्गों की प्रतीक हैं। एक वर्ग केशोराम जैसे अभावग्रस्त लोगों का है तो दूसरा सामाजिक हैसियत में उससे बेहतर ससुर का है। ''त्रासÓÓ में जिस तरह मोटरवाला, साइकिल सवार को धक्का देता है, वह उसकी वर्गीय क्रूरता का द्योतक है। कहानियों में दो कथा-सूत्र एक साथ चलते हैं, एक-दूसरे को छूते, काटते हुए लेकिन आखिर तक संश्लिष्ट बने हुए। इनमें कलात्मक संयम के साथ कहानीकार कब अपनी वैचारिकता का समावेश कर देता है, जल्दी पता नहीं चलता। वर्ग-संघर्ष की स्थितियां प्राय: इन कहानियों में बनती हैं। कहीं उसकी परिणति निम्न वर्ग की हताशा और समर्पण में है कहीं आक्रोश और विरोध में है। 'पिकनिकÓ में गौरी का कथन ''उठवा के देख लो, देखें हमें कौन उठवाता हैÓÓ उसमें वर्गीय चेतना के उभार का सबूत है।
राजनीतिक संदर्भों पर केन्द्रित 'गलमुच्छेÓ, 'नया मकानÓ, 'मौका परस्तÓ, 'अमृतसर आ गया हैÓ, 'वांगचूÓ आदि कहानियों को पढ़ते समय पहली बार में सामान्य पाठक को यह नहीं लगता कि ये माक्र्सवादी आस्था के कहानीकार की रचनाएं हैं। न तो इनकी सतह पर क्रांति की धमक है और न 'संघर्षÓ के स्थूल और खुले विवरण हैं। बल्कि कुछ कहानियों में जिस तरह छद्म क्रांतिकारिता और थोथी सैद्धांतिकता को छीला गया है, उससे कहीं-कहीं इनका तेवर गैर वामपंथी जान पड़ता है। लेकिन ऐसा है नहीं। इस तरह के संदर्भ वामपंथी कार्यकर्ताओं के भटकने और सुविधाजीवी हो जाने की विडम्बना को रेखांकित करने के इरादे से हैं। 'गलमुच्छेÓ का कार्यकर्ता सिद्धांत से पार्टी के साथ है, लेकिन अपने व्यवसाय में निरंतर डूबता हुआ पार्टी से व्यवहारत: बहुत दूर जा चुका है। यही नियति 'नया मकानÓ के गिरिजा की है। गिरिजा का क्रांतिकारी अतीत अब किस्से-कहानी की वस्तु रह गया है। बाद में क्रांति की याद सिर्फ शराब पीने के बाद आती है। 'मौकापरस्तÓ में उन राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर व्यंग्य है, जो किसी के शव को भी अपने स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने में नहीं हिचकते। रामदयाल जैसे सियासतदान कोई भी कार्य भावना के बहाव में आकर नहीं करते, हर योजना सुनियोजित होती है। 'वांगचूÓ भीष्म साहनी की लम्बी कहानी है और बौद्ध भिक्षु को केन्द्र में रखकर राजनीतिक अन्तर्विरोधों की पड़ताल करती है। 'गलमुच्छेÓ, 'नया मकानÓ के तथाकथित क्रांतिकारी इसलिए भूतपूर्व हो गए हैं कि वे अपनी जमीन से कटे हुए हैं, वास्तविक जीवन से कटे हुए हैं। 'वांगचू में इसको प्रत्यक्ष रूप में कहा गया ''सामाजिक शक्तियों को समझे बिना तुम बौद्ध धर्म को भी कैसे समझ पाओगे। ज्ञान का प्रत्येक क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़ा है, जीवन से जुड़ा है। कोई चीज जीवन से अलग नहीं है।ÓÓ 'वांगचूÓ जिस तरह चीन और भारत दोनों के अमलातंत्र द्वारा उपेक्षित प्रताडि़त होता है, उससे संकेत मिलता है कि घृणा और हिंसा के यज्ञ में निर्दोष की बलि पहले चढ़ती है।
कुछ आलोचकों के विचार में भीष्म साहनी की कहानियों में घरेलू नौकर, दाइयां, रसोइये आदि बराबर आए हैं लेकिन वे मध्यवर्ग के चरित्र को उभारकर सामने लाने के लिए आते हैं। सर्वत्र ऐसा नहीं है। 'रास्ताÓ, 'अभी तो मैं जवान हूंÓ आदि कहानियों में निम्न वर्ग की यातना तकलीफ और अन्तर्विरोध को प्रमुखता मिलती है। 'रास्ताÓ में मालकिन चरित्र जितना मुखर उससे अधिक विस्तार से गोविन्द मां की त्रासदी वर्णित है। कुछ कहानियों में दलित वर्ग की मानसिकता का एक विशिष्ट पक्ष उभरा है। निम्न वर्ग और निम्न मध्य वर्ग के व्यक्ति 'हीनता-ग्रंथिÓ के दबाववश अस्वाभाविक लगने वाला आचरण कर बैठते हैं, 'ललकÓ, 'अमृतसर आ गया हैÓ, 'अभी तो मैं जवान हूंÓ आदि में दिखाया गया है कि इनके केन्द्रीय चरित्रों का गुस्सा किसी समर्थ व्यक्ति, वर्ग या व्यवस्था के प्रति है, लेकिन उन पर सीधा प्रहार करने की हिम्मत या स्थिति नहीं बन जाती। गुस्से की अभिव्यक्ति कहीं तो होती ही है। अत: क्रोध अपने से किसी दुर्बल या निरीह पर प्रहार के रूप में फट पड़ता है। 'ललकÓ का मैं, हरदेव या मंगत का कुछ नहीं बिगाड़ पाता, उसका क्रोध बूढ़े सालगराम पर अकारण प्रहार में बदल जाता है। किसी को पीडि़त कर सम्पन्न और सशक्त वर्ग का व्यक्ति जिस मानसिक उल्लास का अनुभव करता है, बूढ़े को पीटकर, उसकी झोपड़ी जलाकर एक क्षण का वैसा ही अनुभव 'मैंÓ को होता है। लेकिन उत्तेजना का ज्वार उतरने पर वास्तविकता खुल जाती है। 'अमृतसर आ गया हैÓ में बाबू पठानों का कुछ बिगाड़ नहीं पाता। इसकी प्रतिक्रिया में वह एक आम आदमी को मार गिराता है। लेकिन लोहे की छड़ को फेंक देना और उसकी मुस्कान का वीभत्स हो जाना इस बात का प्रमाण है कि किसी निरीह पर प्रहार करना उसका अस्थायी भाव है। 'अभी तो मैं जवान हूंÓ में बुढिय़ा पर चमेली का आक्रोश भी परिस्थितियों की उपज है। निम्न और निम्न मध्यवर्ग की इस मानसिकता का विश्लेषण करते हुए भीष्म, दो संकेत देते हैं। एक तो यह कि इस वर्ग में ऊपरी तौर पर टुच्चापन, बेहूदगी और कर्कशता मिलती है, यह स्वभाव नहीं है, प्रभाव है... समूची व्यवस्था की अव्यवस्था का प्रभाव। दूसरी बात यह है कि सही समझ के अभाव और उत्तेजना के अतिरेक में निम्न वर्ग का क्रोध आत्मघाती हो जाता है हालांकि वह सदैव इस स्थिति में नहीं रहता। निम्न वर्ग की वर्गीय मानसिकता के इस विशिष्ट पक्ष के समानान्तर उच्च मध्य वर्ग की 'श्रेष्ठता ग्रन्थिÓ और शोषक मानसिकता को रखने से जहां कहानियों में द्वन्द्वात्मकता निर्मित हुई है, वहीं ये कहानियां संवेदना के स्तर पर 'इकहरीÓ होने से बच गई हैं।
'नई कहानीÓ के दौरान उभरे जिन कुछ कहानीकारों ने 'नई कहानीÓ के केन्द्रीय कथ्य-काम संबंधों का अनुशीलन और एक खास दायरे में मूल्यों के विघटन की पड़ताल से खुद को अलगाते हुए पूंजीवादी व्यवस्था में मध्यवर्ग और निम्न वर्ग के द्वन्द्वाकुल तथा संघर्ष जीवन को ईमानदारी से व्यक्त किया है, उनमें भीष्म साहनी अग्रगण्य हैं। उनकी कहानियों में जनधर्मिता निरंतर बढ़ती गई है और वैचारिकता को कहानी में आत्मसात् करने की कला का निरन्तर विकास हुआ है। अत: उनकी बहुत सी कहानियां 'कालांकितÓ होते हुए भी स्थायी महत्व की हैं।