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Saturday 18 Nov 2017

भीष्म साहनी की याद में


डॉ. सुधेश
314, सरल अपार्टमेंट्स
सेक्टर-10, द्वारका
नई दिल्ली-110075
12जुलाई 2003 की सबेरे आकाशवाणी पर सुना कि भीष्म साहनी का कल देहान्त हो गया। उन्हें कुछ दिनों पहले पक्षाघात हुआ था। अपोलो हस्पताल में दाखिल हुए, वहीं उनका देहांत हो गया।
भीष्म साहनी के संपर्क में मैं पी.डब्ल्यू.ए. के माध्यम से आया था। उनकी रचनाएं पत्रिकाओं में देखता, पढ़ता रहा था। जे.एन.यू. के एम.ए. के पाठ्यक्रम में उनका उपन्यास 'तमसÓ शामिल था। उस पर मैंने शोध प्रबंधन भी लिखवाया था।
पर भीष्मजी से मेरी घनिष्ठता बढी़ जयपुर में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन से। जिस हॉल में लेखकों को ठहराया गया था उसमें भीष्मजी के बिस्तर के निकट ही मेरा बिस्तर था। मेरा बेटा संजय भी मेरे साथ था। फर्श पर सबके बिस्तर लगे थे। वहां उठते-बैठते लेटे हुए भीष्मजी से बातें होती रहती थी।
छोटी उम्र के लेखक हों या बड़ी उम्र के, सब उन्हें भीष्मजी कहते थे, अनेक उन्हें भीष्म भाई कहते थे। उनका गोत्र साहनी पीछे छूट गया था। वे सबके लिए भीष्म थे। पी.डब्ल्यू.ए. में उर्दू, पंजाबी तथा अन्य भाषाओं के लेखक भी शामिल थे। उर्दू और पंजाबी लेखक उन्हें भीषम जी कहते थे। भीष्म एक भारी भरकम शब्द है, यह भीष्म साहनी के पतले दुबले शरीर और दरम्याने $कद पर सही नहीं बैठता था, पर उनके महान व्यक्तित्व और लेखकीय ऊंचाई के बिल्कुल अनुकूल था।
प्रगतिशील लेखक संघ के जयपुर सम्मेलन में उनकी आलोचना भी हुई पर वे सुनकर हंस देते थे और टाल जाते थे। उत्तर भी देते थे तो बड़ी संयत भाषा में। मैंने उन्हें कभी बिगड़ते नाराज होते नहीं सुना। लखनऊ के अखिल भारतीय अधिवेशन में उर्दू लेखकों ने उनकी सख्त आलोचना की और उन्हें महासचिव के पद से हटाने की कोशिश की। वहां उर्दू को दूसरी सरकारी भाषा बनाने का प्रश्न उर्दू लेखकों ने उठाया था। अली सरदार जा$फरी ने इस मांग का समर्थन किया था। भीष्मजी के आलोचकों में डॉ. कुमर रईस बड़े मुखर थे, क्योंकि वे स्वयं महासचिव बनना चाहते थे। उस अधिवेशन में आलोचनाओं के बीच भीष्म साहनी ने संतुलन नहीं खोया। उनके स्थान पर राजीव सक्सेना महासचिव चुने गए।
भीष्मजी एफ्रोएशियाई लेखक संघ में भी पदाधिकारी थे। एक बार उस लेखक संघ का दिल्ली में अधिवेशन हुआ, जिसके आयोजन का उत्तरदायित्व भीष्मजी पर आ गया। उन्होंने कुछ साथी लेखकों की एक बैठक पटेल नगर स्थित अपने घर में बुलाई। मुझे भी टेलीफोन पर उन्होंने बैठक में आने को कहा। आठ-दस लेखक उसमें गए। सबको कुछ न कुछ काम सौंपा गया। मुझसे कहा गया कि $िफरोजशाह रोड पर स्थित जे.एन.यू. का हॉल आरक्षित करा दूं। मैंने अपनी जेब से रुपए देकर आरक्षण करा दिया। बाद में भीष्मजी ने मेरे पास चैक भेज दिया। एफ्रो-एशियाई लेखकों के उस अधिवेशन में मैं भी शामिल हुआ था। उसमें अफ्रीका, एशिया के देशों के अनेक लेखक आए थे। उसमें पहली बार भीष्मजी को अंग्रेजी में भाषण देते सुना। जैसे धैर्य और संतुलन के साथ वे हिन्दी बोलते थे वैसे अंग्रेजी में बोले। कोई हड़बड़ी नहीं थी, कोई उच्च स्वर नहीं, आवेश नहीं, न उत्तेजना। यह उनका बोलने का ढंग था, पर उनका ठंडा स्वर भी श्रोताओं में विश्वास जगाता था। उस अधिवेशन से मुझे पता चला कि भीष्मजी की पहुंच और उनका प्रभाव केवल हिन्दी जगत तक सीमित नहीं था, बल्कि एशिया और अफ्रीका के देशों में और उनके बाहर भी था।
उनकी मातृभाषा पंजाबी थी। उन्हें अपनी पत्नी से पंजाबी में बोलते मैंने कई बार सुना। उस दिन भी पटेल नगर में उनके घर में आयोजित बैठक में सुना। पर जब वे हिन्दी बोलते थे तो उस पर पंजाबी उच्चारण या लहजे का कोई प्रभाव नहीं होता था, जबकि पंजाबी भाषियों की हिन्दी अलग से पहचानी जाती है। इसका कारण था उनका हिन्दीमय होना। वे मिलीजुली हिन्दी बोलते-लिखते थे, और शुद्धतावादियों की हिन्दी के समर्थक नहीं लगते थे।
एक बार मावलंकर हाल में कोई सभा हुई। सभा के बाद भीष्मजी के साथ कुछ लेखक मित्रों की टोली एक दुकान पर पहुंची। भीष्मजी ने सिगरेट खरीदी। कोई बोल पड़ा- ''भीष्म भाई, आप सिगरेट पीजिए, हम तो चाय पियेंगे।ÓÓ भीष्मजी ने चाय का आर्डर दे दिया। चाय आ गई। भीष्म जी एक हाथ में सिगरेट, दूसरे हाथ में चाय का प्याला थामे दोनों का बारीबारी आनंद लेने लगे। शायद जीवन में भी वे इसी प्रकार संतुलन स्थापित करते थे।
मैंने पूछा- ''भीष्मजी, अब 75 वर्ष के हो गए। आपके काले बालों का क्या रहस्य है?ÓÓ
उनका उत्तर था- ''यह पैतृक विशेषता है।ÓÓ
कोई मित्र बोला- ''यह पंजाब के पानी का प्रभाव है।ÓÓ
उनकी टिप्पणी थी- ''पंजाब का पानी तो कब का छूट गया।ÓÓ
वे अपनी उम्र से कम के लगते थे। राजीव सक्सेना और अमृत राय बाल रंग कर जवान बने रहते थे, पर भीष्म साहनी बाल रंगे बिना अपनी उम्र से कम प्रतीत होते थे। इसका कारण उनका अच्छा स्वास्थ्य भी था।
मैंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कई बार शोध प्रबंधन के परीक्षक के रूप में उन्हें बुलाया था। एक-दो बार वे शोधार्थी की मौखिक परीक्षा लेने आए, पर ऐसे ही एक अवसर पर वे टेलीफोन पर बोले- ''नहीं आ पाऊंगा, क्योंकि मेरा बेटा विदेश से आया हुआ है।ÓÓ उन्होंने बताया था कि वे पूरा शोध प्रबंध पढ़कर उस पर अपनी रिपोर्ट भेजते थे। इसीलिए शोध प्रबंधन-परीक्षण में उन्हें अधिक समय लगता था, जिससे उनका लेखनकार्य बाधित होता था। उन्होंने इसलिए टेलीफोन पर मुझसे कहा था- ''अब थीसिस मत भिजवाइये, मुझे पढऩे में अधिक समय लगता है।ÓÓ वे जो काम करते थे मन से करते थे, चाहे किसी शोधार्थी को जांचने का काम ही क्यों न हो।
कई गोष्ठियों, बैठकों, सभाओं में भीष्मजी से भेंट हो जाती थी। उनमें उनका व्यवहार बड़ा शालीन हुआ करता था। वे नपातुला बोलते थे। फालतू नहीं बोलते थे। प्रगतिशील लेखक संघ की दिल्ली शाखा के सचिव जब राजीव सक्सेना थे तब भीष्मजी अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव थे। वे दिल्ली शाखा की बैठकों और गोष्ठियों में प्राय: आया करते थे, जबकि उससे जुड़े कुछ लेखक विशेष अवसरों पर ही दिखाई देते थे। इस प्रकार कह सकता हूं कि वे एक प्रतिबद्ध लेखक थे, रचनाकर्म में और लेखकों के संगठन दोनों में। ऐसे समर्पित लेखक का न रहना हिन्दी जगत के लिए एक बड़ी क्षति है। मैं भीष्म साहनी की पुण्यात्मा को अपनी श्रद्धांजलि देता हूं।