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Saturday 18 Nov 2017

सादगी और विनम्रता की प्रतिमूर्ति


श्याम कश्यप
बी-13, दैनिक जनयुग अपार्टमेंट
सी-1, वसुंधरा एनक्लेव, दिल्ली-110096
मो. 9891250940
भीष्म साहनी से मैं पहली बार '68 या 69Ó में मिला था। तब बी.ए. का छात्र था और खूब कविताएं लिखता था। मिला क्या, देखा-भर था। हौज खास में। बन्ने भाई (सज्क़ााद जहीर) के घर। परिचय के फौरन बाद वे चले भी गए। उन्होंने अभी बमुश्किल दरवा•ाा पार किया ही था कि मैंने पूछा : 'क्या ये जापानी हैं!Ó बन्ने भाई हैरान : 'क्या मतलब?Ó मैंने पहले जैसी मासूमियत से कहा : 'ये जापानियों की तरह बार-बार कमर से नब्बे डिग्री झुक जो रहे थे!Ó बन्ने भाई इतने  जोर से हंसे कि अंदर से रजिया आपा दौड़ी चली आईं। मेरा 'लतीफाÓ सुनकर दोनों 'जापानी हैंÓ दोहराते देर तक हंसते रहे। इतना कि आपा की आंखों में आंसू झलक आए। बहुत बाद में 'वांङ्चूÓ पढ़कर मेरी समझ में आया कि वे 'जापानीÓ नहीं 'चीनीÓ भी हैं! बल्कि केदारनाथ सिंह की कविता से चीना बाबा ही हैं!
दरअसल हमारे भीष्म जी थे ही इतने शालीन और सौम्य : अतिशय सादगी और अत्यंत विनम्रता की विलक्षण प्रतिमूर्ति! हर किसी पर मिलते ही उनका सबसे पहला 'इम्प्रेशन यही पड़ता था; और निस्संदेह, यह छवि ता-उम्र ऐसी बरकरार भी रही आती थी! दूसरी मुलाकात भी बन्ने भाई के सौजन्य से ही हुई थी। कई साल बाद। मेरे 1973 में, 'जनयुगÓ का सहायक संपादक बनकर स्थायी रूप से दिल्ली आ जाने के बाद। बन्ने भाई भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता के रूप में एफ्रो-एशियन राइटर्स आर्गेनाइ•ोशन के सम्मेलन में भाग लेने अल्मा-अता (सोवियत संघ) जा रहे थे। मैं दैनिक 'जनयुगÓ के फोटोग्राफर के साथ बन्ने भाई को विदा करने हवाई अड्डे गया था। यह भी, बस देखा-देखी ही थी। भीष्म जी को पिछली मुलाकात याद नहीं थी। हाथ मिलाते हुए शरारतन मैं इतना झुका था कि इतने वर्षों बाद भी 'जापानी हैंÓ की याद आ जाने से बन्ने भाई मुंह फिराकर हंसी रोकने की कड़ी मशक्कत करते दिखे! मैं अपनी आदत से मजबूर था। गंभीर और जिम्मेदार बनकर रहने की और हरेक से टकराने की भरसक बचने की 'बड़े मामाÓ (श्री हरिशंकर परसाई- जिन्हें मैं अपने अभिन्न मित्र राजकुमार दुबे की तरह 'बड़े मामाÓ ही कहता था) की सारी नसीहतें जबलपुर में ही, चलने से पहले, खूंटी पर टांगकर दिल्ली आया था!
यहां भी बुजुर्गों की दाढ़ी खींचने (जो क्लीन शेव थे, उनकी टांग खींचने) और छेड़छाड़ से मैं बाज नहीं आता था! बाद में खुद दाढ़ी रखने और अच्छा-भला 'गंभीरÓ दिखते रहने के बाव•ाूद! इसीलिए, भीष्म जी से मेरे संबंध अनजाने में ऐसे ही, लगभग 'कामदीयÓ (कॉमेडी वाले- हंसी-म•ााक के) बन गए थे; और सारी उमर ऐसे ही बने भी रहे। लेकिन अब इस विडंबना को आप क्या कहेंगे कि उनसे दोस्ती की शुरूआत बड़े ही दु:खद और त्रासदीय (ट्रैजिक) माहौल में हुई थी। दूसरी देखा-देखी के, बस चंद ही रोज बाद। मेरा अनुमान है कि इस दोस्ती की नींव जाते हुए बन्ने भाई और सुभाष दा (मशहूर बांग्ला कवि सुभाष मुखोपाध्याय; जिनसे मैं पहले से परिचित था और कलकत्ता में कई बार मिल चुका था) ने रखी होगी- भीष्म जी को इस 'शरारती बच्चेÓ के बारे में $खूब अच्छी-अच्छी बातें बताकर। कोई आश्चर्य नहीं कि बन्ने भाई ने अपने साथियों के साथ 'जापानी हैंÓ वाला लती$फा भी शायद सांझा किया हो!
भीष्म जी अल्मा-अता से फैज अहमद $फैज और एक सोवियत लेखक (मुझे ठीक से याद नहीं; शायद कवि सुलेमानोव) के साथ बन्ने भाई का पार्थिक शरीर लेकर लौटे थे। वहीं सम्मेलन के दौरान, दो दिन पूर्व, 13 सितंबर को बन्ने भाई का, दिल का दौरा पडऩे से अचानक निधन हो गया था। हम लोगों को पता दूसरे दिन लगा था। एक और विडंबना देखिए कि 13 सितंबर को ही दैनिक जनयुग के पहले अंक का अजय भवन में एक भव्य समारोह में लोकार्पण किया गया था; जिसकी पिछले तकरीबन एक माह से हम 'डमीÓ निकालकर, पिछले 13 दिन से प्रचारित करते हुए, देश-भर में भेजकर 'फ्रीÓ वितरित करवा रहे थे। 'डमीÓ के ही पिछले एक रविवारीय संस्करण में 'अल्मा-अताÓ सम्मेलन के बारे में बन्ने भाई का लेख तथा एक नए 'फेडरलÓ रूप वाले संगठन के रूप में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के पुनर्गठन की जरूरत पर भीष्म जी का और मेरा, दो लेख भी छपे थे। बन्ने भाई (जो कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य तथा पार्टी के 'कल्चरल फ्रंटÓ के 'इंचार्जÓ थे) के नेतृत्व में ही पिछले लंबे अर्से से प्रलेस के पुनर्गठन की तैैयारियां चल रही थीं और जो इधर 2-3 माह से अंतिम सोपान पर थीं। मेरा अनुमान है कि इस पुनर्गठित भावी संगठन के महासचिव (जनरल सेक्रेटरी) के रूप में भीष्म साहनी का नाम पार्टी नेतृत्व और पार्टी की 'सीईसी की कल्चरल सब-कमेटीÓ द्वारा तय हो चुका था। और इस अत्यंत महत्वपूर्ण और बहुत बड़ी जिम्मेदारी के एहसास ने (जिसकी संभवत: बन्ने भाई की देखरेख में ट्रेनिंग चल रही थी) हमारे 'जापानीÓ को और भी ज्य़ादा विनम्र बना दिया था।
बहरहाल, बन्ने भाई का पार्थिव शरीर लाने के बाद, या शायद उन्हें 'सुपुर्दे-खाकÓ करने के बाद (मुझे ठीक याद नहीं) लौटते हुए रास्ते में मुझे पीपीएच (जहां 'जनयुगÓ का दफ़्तर था और जहां मैं ऊपर 'गेस्ट रूमÓ में तब रहता था) छोडऩे तक, पंजाबी में ढेर सारी गुंटरगूं बातें करते-करते मैं और भीष्मजी पक्के दोस्त बन चुके थे। हालांकि वे लगभग मेरे पिता (ज. 1912) की उम्र के थे (दिखते तो थे देवानंद की तरह युवा और फिल्मी हीरो की तरह ही! बाद में तो मैं उन्हें और राजीव सक्सेना को प्रलेस के देवानंद और अशोक कुमार कहने ही लगा था। पर भला हो नामवरजी का जो राजीव भाई को 'ययातिÓ कहते थे, और मुझसे 'यार-यारÓ  कर रहे थे! भीष्मजी की यह भी एक बड़ी $खूबी थी कि वे एकदम हमउम्र यारबाश दोस्तों की तरह घुलमिल जाते थे। बशर्ते कि वे आपसे खुल जाएं और आप उनके एकदम अंतरंग बन जाएं! अन्यथा, भीष्म जी अत्यंत विनम्र और सौम्य ही नहीं, बड़े संकोची, मितभाषी और बेहद शर्मीले इंसान थे। हरेक के आगे 'भई जनाब मैं किस काबिलÓ तथा 'मैं तो $खा$कसार, बंदापरवर, आप महान तथा दानिशमंदÓ वाला उनका व्यवहार कभी-कभी तो बड़ी कोफ़्त और हददर्जा  खीझ भी पैदा करता था। बाज मौकों पर (और ऐसे मौके कई बार आते भी थे) जब कोई सामने वाला अक्ल का मारा इन बातों को सच मानकर नाजायज $फायदा उठाने लगता और फूलकर कुप्पा हो रहा होता तो उस गुब्बारे में पिन चुभोने तथा फिर भी जरूरत पड़े तो ऐसे दानिशवरों की 'सर्जरी    करने का नेक काम मुझे भी अंजाम देना पड़ता था!
हिन्दी की (संस्कृत से आई) यह मशहूर कहावत कि 'फलदार वृक्ष झुकते हैंÓ हमारे जनरल सेक्रेटरी पर कुछ ज्य़ादा ही चरितार्थ होती थी! वस्तुत: ऐसे ही थे हमारे भीष्मजी! सारा हिन्दी-संसार ही नहीं समूचे भारतीय साहित्य-जगत, खासकर हमारे प्रगतिशील हलकों में भीष्म जी की सादगी, सहजता, शालीनता और अतिशय विनम्रता जगजाहिर थी। भले ही मुझे उनका ऐसा व्यवहार तब $खासा अटपटा-सा, बल्कि सच कहूं तो तब बड़ा हास्यास्पद भी लगता था। प्रगतिशील लेखक संगठन के पुनर्गठन के काम, फिर 'ड्राफ्ट मेनि$फेस्टोÓ (घोषणापत्र का प्रारूप) तैयार करने, उस पर देशभर के लेखकों के हस्ताक्षर लेने, आ$िखर गया सम्मेलन (6-9 मई, 1975) की तैयारियों के दौरान- इन तकरीबन डेढ़ दो साल प्राय:रोज ही मेरी भीष्मजी से, और अकसर तस़ी हैदर से भी, खूब मुलाकातें होती रहीं। कभी हौज खास व्यासजी के घर (जकी भी पास ही रहते थे), लेकिन ज्य़ादातर 'जनयुगÓ कार्यालय में ही। भीष्मजी तब सीधे कॉलेज से और तकी अक्सर बाराखंभा से (सोवियत सूचना केन्द्र, जहां वे मुलाजिम थे) 'जनयुगÓ आ जाया करते थे। व्यासजी और मैं तो वहां होते ही थे। जब कभी व्यासजी के घर बैठना होता था तो भीष्म जी शाम को घर से (ईस्ट पटेल नगर) आते हुए मुझे लेकर जाते और मेरे संकोचवश मना करने पर भी जबर्दस्ती मुझे रमेश नगर, ईएसआई हॉस्पिटल कॉलोनी (जहां गीताजी के आने के बाद मैं चित्रकार-मित्र सुरेन्द्र राजन (आज के बॉलीवुड चरित्र अभिनेता) और सबीहा हाशमी भाभीजान के पास रहता था) गेट पर छोड़कर जाते। प्राय: देर रात। कभी-कभी तो सर्दियों की सुनसान और कोहरे-डूबी रात के 11-12 भी बज जाते थे और रिंग रोड का वह सुनसान क्षेत्र तब बहुत खतरनाक माना जाता था। लेकिन भीष्मजी परवाह नहीं करते! इन डेढ़-दो वर्षों में रोज  साथ काम करने, बहस-मुबाहिसों और गप्प-शप के दौरान हम दोनों और भी निकटतर हुए; मुझे भीष्मजी के कई नए-से-नए और विलक्षण पहलुओं से परिचित होने का मौका मिला।
दरअसल, दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकारों में मेरी सर्वाधिक निकटता और गहन अंतरंगता शमशेरजी और भीष्मजी से ही पनपी। लगभग हमउम्र या खास दोस्तों की तरह। मजे  की बात यह कि दोनों ही निहायत संकोची, अत्यंत शालीन और बेहद विनम्र! मैं प्राय: दोनों से शरारतन छेड़छाड़ करता था। शमेशर जी से कुछ ज्यादा  (भई, दोनों कवि हुए न!) बख़्शता भीष्म जी को भी नहीं था। वे भी भरपूर मजा लेते; और कभी-कभी अपने 'विटÓ में खुद भी 'इक्काÓ उड़ा देते! उनमें हास्य-व्यंग्य की विलक्षण प्रतिभा थी। बड़ी मासूमियत के साथ कभी वे ऐसा महीन व्यंग्य करते कि सामने वाले को लाजवाब कर देते और $खुद चेहरा गंभीर और भोलाभाला बनाए रखते कि साहिबों, मैंने तो कुछ किया ही नहीं, कुछ कहा ही नहीं! उनके साथ प्रलेस के सम्मेलनों-सेमिनारों के संदर्भ में दूर-दूर की बड़ी यात्राएं कीं। वे अपने लिए कुछ भी नहीं करने देते थे, जबकि साथ जाने वाले की हर छोटी-बड़ी सुविधा का $ख्याल रखते थे. आप कुछ करना भी चाहें, तो तनकर खड़े हो जाते और सामने की लटें हाथ से पीछे फेंकते हुए कहते 'यार, मुझे बूढ़ा समझते हो!Ó फिर एकदम बड़ी अदा से तिरछे झुककर हफीज जालंधरी की पंक्ति दोहरा देते : अभी तो मैं जवान हूं अभी तो मैं जवान हूं...
शरारती तो मैं था ही, लोगों की 'पैरोडीÓ करने में भी माहिर रहा हूं। पार्टी नेताओं के अलावा बुजुर्ग साहित्यकारों में शमशेरजी, भीष्मजी और गुलगुलानंद विश्वनाथ त्रिपाठी पर इस मामले में तब कुछ ज्य़ादा ही मेहरबान रहता था। प्रलेस के साथी इसका $खूब आनंद उठाते थे। एक बार तो, शायद बिहार प्रलेस के राज्य सम्मेलन में डाल्टनगंज जाते हुए या वहां से दिल्ली लौटते हुए (ठीक याद नहीं), ट्रेन में ताबां साहिब की (मशहूर बुजुर्ग शायर गुलाम रब्बानी ताबां, जिन्हें यह नहीं मालूम था कि मैं उनकी 'पैरोडीÓ कैसे करता हूं) $खास फरमाइश पर भीष्मजी, की 'नकलÓ उतारी- शीलाजी (उनकी पत्नी) की डांट-फटकार पर भीष्मजी की मिमियाहट-भरी स$फाइयां! सारे साथियों और आसपास के सहयात्रियों के जोरदार ठहाकों के बीच भीष्मजी की शरमाने की अदा भी अविस्मरणीय ही थी। इस 'मिमिकरीÓ का सबसे ज्य़ादा आनंद भी भीष्मजी ने ही उठाया! तभी ट्रेन इलाहाबाद रुकी तो खुश होकर योगेश कुमार (मशहूर उपन्यासकार, जो ज्य़ादातर ऊपर की बर्थ पर लेटे रहते थे) ऊपर से कूदे और मुझे आइसक्रीम खिलाई। तभी भीष्मजी ने योगेश को दोबारा दौड़ा दिया: मेरी तर$फ से दो! कमर रईस और अजमल अजमली ने हांक लगाई : मेरी तरफ से भी, मेरी तरफ से भी! मेरी तो ईदें हो गईं! ताबां साहिब ने नहीं खिलाई, उल्टे भांजी मारने की नाकाम कोशिश की : 'अरे भई, क्यों नौजवान शाइर का गला $खराब करने पर तुले हुए हैं।Ó मैं और केवल गोस्वामी अक़्सर ताबाँ साहिब को 'ताँबा साहिबÓ कह बैठते थे (मेरी तो जुबान फिसल जाती थी, $कसम से; पर केवल के बारे में मुझे शक है!) बुजुर्ग शायर सचमुच बड़े खफा हो जाते थे और प्राइमरी के हैडमास्टर की तरह (गनीमत है कि 'मुर्गाÓ बनाकर नहीं) हमसे बार-बार 'कहिए, ताबाँ-ताबाँ-ताबाँÓ की मुहारनी कटवाते थे! केवल याद रखने के लिए 'ताबाँ, पढ़ किताबाँÓ- जैसी तुकबंदियाँ ईजाद करता रहता था।
एक बार लोगों की जोरदार $फरमाइश पर ठीक ऐसी ही 'मिमिकरीÓ की गुस्ताखी मुझसे शीलाजी के सामने भी हो गई! शायद से सुदर्शन सोबतीजी के 'इसकसÓ दफ़्तर में नियमित मासिक रचना-गोष्ठी खत्म होने के बाद गप्प-शप और चाय-पान के दौरान। मैंने भीष्मजी के 'कैरीकेचरÓ की ऐसी 'प्रामाणिकÓ प्रस्तुति पेश की कि शीलाजी ने पूरी संजीदगी से कहा: 'भीषम! इतनी विनम्रता भी किस काम की कि मजाक बन जाए!Ó भीष्मजी बगलें झांकने लगे। फिर तो लोग शीलाजी-भीष्मजी के संवादों की न$कल करने के पीछे ही पड़ गए। मुझे क्या फर्क पड़ता, मैं तो चिकना घड़ा था; बल्कि कुछ ज्य़ादा बल-खम और घुमावों वाली नक़्काशीदार 'सुराहीÓ- वह भी टेढ़े मुंह वाली! शनिवार की रचना गोष्ठियों के बाद हमारे इसरार पर कई बार भीष्मजी और शीलाजी मोहनसिंह प्लेस (कॉ$फी हाउस) भी साथ चल देते थे। पर उस दिन शीलाजी का मुंह इतना गंभीर और फूला हुआ था कि वे उन्हें सीधे कार में बिठाकर ईस्ट पटेल नगर (घर) ले गईं! मैं इतना ढीठ हूं कि घर पहुंचने पर घटित होने वाले संवादों और भीष्मजी की मिमियाहट की भी तीसरी प्रस्तुति पेश करने लग गया। हाय! योगेश होते तो इनाम में कम से कम तीन प्याले कॉफी जरूर पिलाते! वे उस दिन आए ही नहीं थे! अगर डॉ. रामविलास शर्मा की पत्नी भक्ति और 'अम्माँजीÓ का अत्यंत $ख्याल रखने को कीर्तिमान माना जा सकता है तो हमारे भीष्मजी भी उनसे इस मामले में कोई कम नहीं थे।
भीष्म जी सचमुच ऐसे ही थे! और यह तो सभी जानते हैं कि शीला जी की सार्वजनिक डांट-फटकार से बड़ा सहमे-सहमे भी रहते थे! कई बार दूतावासों या (राजकमल प्रकाशन की मालिक) शीला संधु की पार्टियों में नया गिलास उठाने पर शीलाजी (श्रीमती साहनी) के टोकते ही ('भीषम, बस्स करो हुण; तुसीं गड्डी बी चलाणी रे!Ó) झट गिलास मुझे थमाकर डिनर की प्लेट थाम लेते! 'गड्डी चलाणेÓ के प्रसंग में एक और $िकस्सा याद आया। एक बार बड़ा भीषण एक्सीडेंट हो गया था। जाहिर है, ड्राइव तो भीष्मजी ही कर रहे थे। हुआ कुछ ऐसा कि भीष्मजी तो लगभग बच गए पर शीलाजी गंभीर रूप से घायल हो गईं। शायद जबड़ा टूट गया था। ठीक होकर घर आने के बाद जब मैं और केवल मिजाजपुर्सी के लिए पहुंचे तो केवल ने अपनी आदत के अनुसार बैठते ही बोफोर्स का गोला दाग दिया : 'गड्डी कोण चला र्या सी?Ó दो दोस्तों में झगड़ा कराने में प्रलेस के हमारे 'नारदावतारÓ केवल गोस्वामी को $खासी महारत हासिल है और पति-पत्नी को भिड़ाने में विशेषता! वह ऐसे ही 'सींकÓ लगाकर बड़ी मासूमियत से शांतचित्त हाथ सेंकता रहता है। सुनते ही शीलाजी फट पड़ीं : 'गड्डी कोण चला र्यासी... भीषम, हौर कोण? देखो, आप तो साबुत सही-सलामत, मेरा जबड़ा तोड़ दिया।Ó उन्हें अभी भी बोलने तक में बड़ी तकली$फ हो रही थी। भीष्मजी बेचारे जैसे-तैसे स$फाई देने में लगे थे : 'शीला, मेरी गलती नईंसी। गड्डी चलाण वाले नूं कदी बी टोका-टोकी नीं करणी चाइदी। दायें से लो, बाएं से लो, इधर से काटो; सुन-सुनकर ड्राइव करने वाला कन्फ्यूज हो जाता है। जिसके हाथ में स्टीयरिंग, $फैसला उसी को करने देना चाहिए।Ó हम लोग सारा माजरा समझ गए। स्टीयरिंग भीष्मजी के हाथ में रहते हुए भी, आ$िखरकार दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन तो शीलाजी के ही चलते थे! यारो, उन दोनों की अद्भुत और बड़ी प्यारी-सी गृहस्थी की चार-चक्का-गाड़ी में भी! यह बात दीगर है कि वक्तन-$फवक्तन शीलाजी यहां स्टीयरिंग भी प्राय: छीन ही लेती थीं। इस सुखद और प्यारी गृहस्थी की सफलता का यही राज था।
साहिबो! मैंने अनेक दम्पति देखे हैं। लेकिन भीष्मजी और शीलाजी-जैसा प्यार, अपनापा और आपसी दोस्ती और कहीं नहीं देखी। एक-दूसरे के प्रति ऐसा विलक्षण समर्पण भी कहीं नहीं देखा। दोनों बिना कहे एक-दूसरे की इच्छा या मन की बात फौरन जान लेते थे और वैसा ही करते थे। दोनों एक-दूसरे को इतना और ऐसा $ख्याल रखते थे कि आज भी यह लगभग अकल्पनीय ही लगता है! उन दिनों मैं बड़े गुस्सैल स्वभाव का था (अब नहीं हूं! कसम से!!) भीष्मजी मुझसे कहा करते थे, 'यार, तूँ बड़ा गरम मिजाज हां, वोह्टी (पत्नी) नाल बड़ा लड़दा होएंगा!Ó फिर लती$फा सुनाते : दुनिया के आधे मर्द अपनी जनानियों (पत्नियों) के 'जोरू के गुलाम होते हैं... बाकी आधे झूठे!Ó मैं तो भई सच मान लेता हूं। सुखी दाम्पत्य का यही राज है। कुछ सीखो, यार, कुछ सीखो!Ó हम अपने जनरल सेक्रेटरी से और बहुत सारी बातों के अलावा यह भी सीख रहे थे। डॉ. रामविलास शर्मा की तरह भीष्मजी भी अपनी पत्नी की सेवा करने और उनका बेहद $ख्याल रखने के मामले में, मेरी दृष्टि में, एकदम 'मेजरिंग रॉडÓ (सर्वोच्च पैमाना) थे! इतने कि मैं उनके और शीलाजी के सामने ही उन्हें कई बार दुनिया का सबसे बड़ा 'पत्निभक्तÓ और 'पत्निव्रतीÓ (पतिव्रता का विलोम) तक कह दिया करता था। (जाहिर है कि रामविलासजी के आगे ऐसी गुस्ताखी की कल्पना तक से मेरी जुबान तालू से चिपक जाती थी, वह भी '$फेवीकोलÓ से)। ऐसी गुस्ता$िखयों पर भीष्मजी तो धीमे-धीमे शरमाते रहते पर शीलाजी बड़ी खुश हो जाती। मैं इस चीज का बड़ा फायदा भी उठाता! शुद्ध संगठन के हित में।
दरअसल, भीष्मजी ही नहीं, शीलाजी भी उनका बहुत ख्याल रखती थीं। वे न केवल उनकी सेहत, बल्कि उनके लेखन-कार्य का भी बेहद ख्य़ाल रखती थीं। उनकी हर सुख-सुविधा का। विशेष रूप से उनके लिखने के समय का कि उसमें किसी भी तरह का व्यवधान न आने पाए। भीष्मजी की शाम को लिखने की आदत थी। लेकिन गया सम्मेलन की तैयारियों के सिलसिले में उनकी शामें अक्सर 'सूनीÓ जातीं। भीष्मजी ने कभी कुछ नहीं कहा। मैं देर शाम भीष्मजी के साथ लौटता; और रोज उनके यहां, ईस्ट पटेल नगर, चाय-स्वल्पाहार के बाद ही ईएसआई कॉलोनी (रमेश नगर) जाता; जहां मैं गीताजी के आने के बाद किराये पर रहने लगा था। हर बार चाय भीष्मजी ही बनाते। शीलाजी कहती भी थीं, तो वे उन्हें उठने नहीं देते और मेरी मदद की त•ाबी•ा भी ठुकरा देते। उनके यहां पाश्चात्य और पंजाबी ढंग के, दोनों तरह के रेडीमेड स्वल्पाहार मौजूद रहते। कई बार की 'सूनी शामोंÓ के बाद एक बार शीलाजी ने कहा कि आप लोग तो रोज ही दोपहर से देर शाम तक 'जनयुगÓ में उलझे रहते हैं, भीषम कुछ लिख ही नहीं पाते। भीषम को तो शाम को ही लिखने की आदत है, और कोई टाइम इन्हें सूट नहीं करता। भीष्मजी ने कहा : ''श्यामजी इसमें क्या कर सकते हैं! ये तो सुबह से शाम तक 'जनयुगÓ में ही रहते हैं। दोपहर को मेरे कालिज से वहां पहुंचने के बाद व्यासजी के साथ मिलकर 'घोषणा पत्रÓ पर हस्ताक्षर लेने, लोगों की जिज्ञासाओं को शांत करने, उनके कई तरह के ऐतराज को दूर करने और उनके सुझावों पर प्रतिक्रिया देने, फिर सम्मेलन में उन्हें जरूर पहुंचने की बार-बार ताकीद करने, सम्मेलन से संबंधित ढेरों दीगर बातों और तैयारियों के सिलसिले में हमें हिन्दुस्तान भर के सभी भाषाओं के लेखकों से संपर्क रखना पड़ता है। रोज दर्जनों चिट्ठियां लिखनी पड़ती हैं, सैकड़ों चिट्ठियों के जवाब देने पड़ते हैं, टेलीफोन पर बातें करनी पड़ती हैं। सुबह मेरा कॉलिज है, श्यामजी का 'जनयुगÓ का काम है, फिर व्यासजी भी दोपहर को ही पहुंचते हैं।ÓÓ
मैंने बताया कि सुबह का निकला, जब मैं घर जाऊंगा, कुछ देर बाद खाना खाकर और देर रात कुछ खाने के लिए लेकर फिर रात के दो-ढाई बजे तक के लिए चला जाऊंगा। ठीक आठ बजे रात 'जनयुगÓ की स्टा$फ कार लेने पहुंच जाती है। शीलाजी बहुत नाराज हुईं : 'हद है, भीषम, आप व्यासजी से कुछ कहते क्यों नहीं। आप या श्यामजी नहीं कह सकते तो मैं कहूंगी। ऐसे तो मुंडा बेचारा (लड़का) बीमार पड़ जाएगा। फिर मुझसे : 'तेरी वोह्टी कुंज नईं कैंदी, ऐहांई रेहा तां तैनूं छड्ड के माप्पेयां (अपने मां-बाप) कौल तुर जाऊ।Ó भीष्मजी हंसने लगे : 'शीला, गीताजी भी कम्युनिस्ट हैं।Ó शीलाजी को जब लाड़-प्यार आता तो वे मुझे तुसीं (आप) या श्यामजी कहने से 'तैनूंÓ (तुझे) या 'बेचारा मुंडाÓ पर उतर आतीं। मुझे भी बड़ा सुखद और अच्छा लगता। ऐसे ही एक बार उन्होंने सेहत के लिए देसी घी की पिन्नियों का डब्बा दिया जो शायद कोई उन लोगों के लिए लाया था। शीलाजी इस बात को सहन नहीं कर पाती थीं कि कोई भीष्मजी के अपने लिखने के टाइम में व्यवधान डाले। इस मामले में वे न किसी का लिहाज रखती थीं और न ही किसी की भी ऐसी गुस्ता$खी को कभी क्षमा करती थीं। गया सम्मेलन के बाद, यह रोज-रोज की  भारी गहमागहमी और थका डालने वाली मशक्कत तो बंद हो गई, पर फिर भी पुनर्गठित प्रलेस के नए-नए बने संगठन और उसके मुख्यालय को चलाने की जिम्मेदारी और उसके काम तथा व्यस्तताएं तो थी हीं। भीष्मजी की शामें तो उन्हें लिखने के लिए (हमेशा नहीं, पर प्राय:) मिलने लगी थीं। लेकिन फिर भी, धीरे-धीरे प्रलेस के विस्तार और मुख्यालय के कामों में लगातार होती बढ़ोतरी तथा संगठन के काम से अक्सर बाहर आने-जाने से भीष्मजी का शामों का नियमित लेखन तो अनियमित हो ही गया था। शीलाजी इससे क्षुब्ध रहती थीं। ऐसे कितने सौभाग्यशाली लेखक होंगे जिनकी 'शरीक-ए-हयातÓ उनके लेखन-कार्य को लेकर शीलाजी की तरह अत्यंत गंभीर और संवेदनशील होंगी! भीष्म जी थे।
भीष्मजी उस उम्र में भी (वे साठ पार कर चुके थे और सत्तर के करीब पहुंच रहे थे) हम नौजवानों से कहीं ज्य़ादा परिश्रम करते थे। कॉलिज से रिटायर होने के बाद तो वे चौबीसों घंटे प्रलेस के लिए खटते थे। अपना लिखना-पढऩा और खाना-पीना भूलकर अपनी सेहत की कीमत पर भी। उन्हें देशभर के लेखकों से नियमित पत्र-व्यवहार करना पड़ता था, उनकी विभिन्न संगठनात्मक समस्याओं को सुलझाना पड़ता था। संगठन के विस्तार के साथ-साथ देश-भर में जगह-जगह राज्य सम्मेलन, क्षेत्रीय सम्मेलन, सेमीनारों, समारोहों का तांता लगा रहता। हर कोई चाहता था कि उसमें भीष्मजी अवश्य आएं। ज्यादातर जगह मैं उनके साथ जाता। सबसे ज्य़ादा उत्तरी भारत, खासकर हिन्दी भाषी राज्य में।
इन असुविधाजनक यात्राओं से कई बार भीष्मजी की तबीयत भी बड़ी बिगड़ जाती; जिससे शीलाजी बड़ी क्षुब्ध होतीं और उनकी यात्राओं पर अंकुश लगाने के प्रयास करतीं। वे अक्सर कहतीं कि 'भीषम चौबीसों घंटे गधे की तरह खटते रहते हैं।Ó एक बार मैंने सुधारा : 'खच्चर की तरह।Ó भीष्मजी मेरा इशारा समझकर शरारत से हंसने लगे। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि ''आठवीं जमात में जिले में चौथे नंबर पर आया, जिसके लिए मुझे मैडल मिला। हमारे नगर में साल में एक बार घोड़ों की मंडी लगती थी जिसमें फौज के लिए बढिय़ा घोड़े खरीदे जाते थे। अच्छे पले हुए घोड़ों को इनाम दिए जाते। हुजूर डिप्टी कमिश्नर इनाम देते थे। ऐसे ही एक समारोह में मुझे मैडल से विभूषित किया गया। अंग्रेज साहिब बहादुर ने एक बढिय़ा खच्चर के गले में मैडल डाला फिर मेरे गले में।ÓÓ (भीष्म साहनी : व्यक्ति और रचना, पृष्ठ 34) यात्राओं के दौरान भी भीष्मजी अपने इसी महीन व्यंग्य के तार में पिरोकर अपनी विलक्षण किस्सागोई के साथ अपने जीवन के बारे में, बलराज जी के साथ बचपन के दिनों के बारे में, विभाजन से पहले के पेशावर और लाहौर तथा विभाजन के बाद के श्रीनगर और तत्कालीन दिल्ली के माहौल के बारे में अनेक मजेदार और दिलचस्प $िकस्से सुनाते। लेकिन यह तभी संभव हो पाता जब हमारे सहयात्री त्रिलोचन न रहे हों!
हम म.प्र प्रलेस के दूसरे राज्य सम्मेलन में शहडोल जा रहे थे, भीष्मजी, त्रिलोचन शास्त्री और मैं। शाम को निजामुद्दीन से कुतुब से चलकर सुबह 7-8 बजे हमें सतना उतरना था; फिर दिनभर की बस-यात्रा से शाम को शहडोल। हम सभी यात्राओं में स्लीपर क्लास में ही जाते थे। कई बार रिजर्वेशन कन्$फर्म न हो पाने पर जमीन में बिस्तर लगाकर भी। ट्रेन में बैठने के साथ ही शास्त्रीजी जो शुरू हुए तो पूरी रात 'नान-स्टॉपÓ अनवरत बोलते रहे। रात के खाने के बाद भीष्मजी ने बीच वाली बर्थ खोलकर सोने का इंतजाम करने की भरसक कोशिशें कीं, पर व्यर्थ। रात बारह-साढ़े बारह तक भीष्मजी की हालत पतली होने लगी। मैं तो शास्त्रीजी की तरह निशाचर था, पर भीष्मजी रात को जल्दी सोने के आदी थे, पूरी रात नीचे की बर्थ पर बैठे-बैठे, उबासियां लेते, रतजगे से वे बेहाल हो गए! भोर में जब एक बार शास्त्री भगवान टॉयलेट गए तो बड़ी रूआंसी आवाज में पूछा : 'श्यामजी, शास्त्रीजी क्या रातभर लगातर बोलते थकते नहीं! क्या रात को भी सोते नहीं!Ó मैंने कहा 'जी, न सोते हैं न सोने देते हैं! और कोढ़ में खाज यह कि अपने $िकस्से-कहानियों में हुंकारा भी भरवाते हैं!Ó भीष्मजी बीच-बीच में जब भी ऊंघकर लुढऩे लगते तो त्रिलोचन उनकी जांघ पर जोरदार थपकी देकर उन्हें फिर शामिल कर लेते!
सतना में बस में चढ़ते ही भीष्मजी ने शास्त्रीजी को खिड़की के साथ बिठाकर बड़ी फुर्ती से मुझे उनके बगल में बिठाकर 'बफर स्टेटÓ बनाई और फिर इत्मिनान से बैठकर ऊंघने लगे। शायद वे सोच रहे थे कि शास्त्रीजी कवि हैं, अत: रास्ते के प्राकृतिक दृश्यों का मगन होकर आनंद उठाते हुए, या तो कम से कम अब मौन रहेंगे अथवा कुछ कहेंगे भी तो बगल में दूसरा कवि (आपका यह $खादिम) वार्तालाप को सुलभ होगा; वे बचे रहेंगे तथा रात की नींद पूरी कर सकेंगे! लेकिन व्यर्थ! भीष्मजी की सारी 'रणनीतिÓ बुरी तरह फेल हो गई। बस स्टार्ट होकर अब थोड़ी दूर ही चली होगी कि ऊंघते हुए भीष्मजी एक बड़ा मोड़ काटते ही गिरते-गिरते बचे। शास्त्रीजी ने तत्काल मुझे उठाकर उन्हें बीच में बिठाया और शहर से बाहर होते ही बदस्तूर चालू हो गए। उन्हें भला विषयों का कभी टोटा हो सकता है! एक से दूसरे फिर तीसरे, इस तरह विषयों की अनंत पर्वत-श्रृंखलाएं और नदी-नाले फलांगते हम देर शाम शहडोल पहुंचे! और तो और, रीवा में साथियों के आतिथ्य का भी उनींदे भीष्मजी आनंद नहीं ले पाए। सतना के साथियों के भारी-भरकम नाश्ते, फिर रीवा के लंच तथा ट्रेन के रतजगे की थकान ने ऐसा जोर मारा कि रीवा से शहडोल तक भीष्मजी हम दोनों के बीच फंसे सप्तम स्वर में खर्राटे भरते गहरी नींद में डूबे रहे।
लेकिन इस बात का तब न तो भीष्मजी को कोई अंदाजा  था और न ही मैं तब सोच पाया था कि राज्य सम्मेलन के दौरान दो रातों में उन पर क्या बीतेगी। हमारे जनरल सेक्रेटरी अतिथियों के लिए अलग से किसी भी तरह के 'वीआईपी ट्रीटमेंटÓ के खिलाफ थे और होटल आदि की सुविधाएं न करने की सख़्त ताकीद करते थे। वे सभी डेलीगेट साथियों के साथ ही जमीन पर गद्दों के ऊपर सामूहिक शयन में विश्वास करते थे। मार्गव्यय भी केवल स्लीपर क्लास का ही देने पर जोर देते थे। वे व्यर्थ की टीमटाम और $िफजूलखर्ची के सख़्त खिलाफ थे। लेकिन मास्टर साहब ने (राज्य सम्मेलन के संयोजक श्री मोहन श्रीवास्तव) हम तीनों के लिए शहर के सबसे अच्छे होटल में दो कमरे रिजर्व कराए हुए थे और ट्रेड यूनियन के साथियों की मदद से ओपी मिल्स के गेस्ट हाउस में कमलेश्वर, ज्ञानरंजन और कमला प्रसाद के लिए भी उपलब्ध दो कमरे; क्योंकि रसरंजन भी वहीं हो सकता था, होटल में नहीं, वैसे भी भीष्मजी सम्मेलनों आदि के अवसरों पर इसे बेहद नापसंद करते थे। उनके फि•ाूलखर्ची पर भाषण देने और मेरे मास्टर साहब के पास उनके घर रुकने का कहने के साथ ही, किस्मत के मारे बेचारे हमारे महासचिव ने बिना कुछ सोचे-समझे एक कमरा वापस करा दिया! रात हो रही थी और भलेमानुष को आसन्न $खतरे की कोई चिंता तक नहीं थी!
सम्मेलन की तैयारियों, कार्यक्रम की रूपरेखा और आ चुके या  आने वाले प्रतिनिधियों आदि के बारे में मोहनजी और कमला प्रसाद से रिपोर्ट (बताया गया था कि ज्ञानजी भोपाल से कमलेश्वर को लेकर देर रात पहुंचेंगे) तथा तमाम साथियों से मिलने-जुलने की खुशी और उत्साह में 'आसन्न संकटÓ का ख्याल हम दोनों में से किसी के भी जेहन में क्षणमात्र के लिए नहीं आया। डिनर के बाद जब शास्त्रीजी और भीष्मजी को होटल छोडऩे की बात आई, तभी यह वज्रपात हुआ! अगर आज की तरह वहां सीसीटीवी कैमरे होते तो मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे चेहरे का गहन पछतावा और भीष्मजी की आंखों में वधस्थल की ओर ले जाए जाते 'बलि के बकरेÓ का त्रास (यह मुहावरा है भई, 'बकराÓ ही कहा जाता है; और बकरे में नहीं, पर आदमी में तो अपने भावी 'आसन्न संकटÓ की सोच-समझ होती ही है!) देखकर सभी संवेदनशील कवि-लेखकों की जमात जरूर जार-जार रो पड़ती! आलोचकों के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता! वैसे भी बर्र के छत्तों से छेड़छाड़ से बचना ही श्रेयस्कर होता है। बहरहाल, त्रिलोचन को मास्टर साहब के साथ मंगनी की कार में ढकेल कर भीष्मजी जिद़ पकड़ गए कि शास्त्री बेआरामी से बेहद थके हुए हैं। इन्हें वहीं आराम करने दें। मैं सभी के साथ फर्श पर 'गद्दानशीनÓ ही होऊंगा। आप लोग नहीं मानेंगे और एक अदद तख़्त का इंतजाम कर देंगे तो मजबूरी में 'तख्तनशीन' भी हो जाऊंगा! $िफजूलखर्ची संबंधी भाषण के बाद जबरन एक कमरा वापस करवाकर अब किस मुंह से दूसरा कमरा लेने की बात करते!
ऐसे 'जनवादीÓ और 'समतामूलकÓ माहौल में शास्त्रीजी में भी तो 'शहादतÓ का भाव उमडऩा ही था। वे भी भीष्मजी की तरह 'तख्तनशीनÓ होने की जिद में कार से उतरने की जद्दोजहद में पिल पड़े थे। शास्त्री भगवान यह नियम या परंपरा, जो भी कहें, नजरअंदाज कर गए कि 'तख़्तÓ पर एक और केवल एक ही 'बाश्शाÓ, नियम या परंपरा, जो भी कहें 'नशीनÓ हो सकता है! (बाश्शाओ, भीष्मजी जानते थे और मानते भी थे! अंत में, किसी की नहीं सुनी गई और भीष्मजी के अतिप्रिय तकियाकलाम को दोहराते हुए कि 'हाथी के पांव में सबका पांवÓ (हालांकि मास्टर साहब दुबले-पतले ही थे- पर 'हाथीÓ दुबले होने पर भी 'गधाÓ तो नहीं हो जाएगा न!) अंतत: मोहनजी की राय से तत्काल दोनों बुजुर्गवार को हम कार में ठूंस-ठांस पठाते भए। मास्टर साहब के घर पहुंचकर मैंने जो हाल-फिलहाल का यात्रा-संस्मरण सुनाया तो श्रोताओं के हंसते-हंसते पेट में बल पड़ गए। कमला प्रसाद दोहरे हो-होकर इतना हंसे कि उनके आंसू निकल पड़े। हमने उन्हें बड़ी मुश्किल से चुप कराकर जिम्मेदारी का एहसास कराया कि जाइए, आपको अभी कमलेश्वर और ज्ञानजी की अगवानी तथा जरूरी $खातिरदारी भी करनी है। कमला प्रसाद की मैं नहीं कह सकता; और उन्होंने कमलेश्वर और ज्ञानजी के आगे भी अपना 'टेपरिकार्डरÓ बजा दिया तो (मैं उन्हें 'टेपरिकार्डरÓ ही कहा करता था, क्योंकि सभी जानते हैं कि उनका हाजमा बड़ा खराब था और उनके कमजोर पेट में कुछ नहीं पचता था) उन दोनों के बारे में भी मैं भला क्या और क्योंकर कुछ कहूं; लेकिन भीष्मजी से सारी सहानुभूति के बावजूद सोने तक मैं और मास्टर साहब बारंबार धड़धड़ाते रहे- जैसे किसी $खराब ट्रक को बार-बार स्टार्ट करने के विफल प्रयासों के दौरान होता है। टॉपिक कोई भी शुरू होता पर बात घूम-फिरकर वहीं पहुंच जाती और भीष्मजी की सूरत बरबस आंखों के आगे झूल जाती! हमारी 'सीरतÓ बुरी नहीं। अतएव यहां इसमें संवेदनहीनता या क्रूरता की बात सोचना तक घोर अन्याय होगा।
बहरहाल, भीष्मजी और त्रिलोचन दो रात होटल के उसी कमरे में रहे। भीष्मजी दोनों रात कब सो पाए, सो भी पाए या नहीं, मुझे नहीं पता। हां, यह जरूर था कि दोनों दिन की सारी गोष्ठियों में भीष्मजी मंच पर बराबर ऊंघते रहे। जब भी कोई जोशीला वक्ता जोर से चिल्लाता या कमलेश्वर स्पीकर के आगे पोडियम पर जोर से हाथ पटकते, अथवा •ाोरदार करतल ध्वनि होती, जो भीष्मजी चौंककर जाग जाते और मरे-मरे अंदाज में ताली बजाते-बजाते ऊंघकर फिर सो जाते। पूरे समय उनकी बगल में बैठे-बैठे मेरा ध्यान वक्ताओं और उनकी बातों पर कम, भीष्मजी पर ज्य़ादा केन्द्रित रहा कि ऊंघते-सोते या हड़बड़ाकर जागते कहीं कुर्सी समेत लुढ़क ही न जाएं! कहीं कोई फ्रैक्चर वगैरह हो गया तो मैं शीलाजी को क्या जवाब दूंगा! एक बार कलकत्ता और असम (गुवहाटी) की यात्रा में समतल पर ही संतुलन बिगड़ जाने से उनके दाहिने हाथ में टिश्यूज डैमेज होने से वे महीनों लिख नहीं पाए थे और मैं शीलाजी से नजरें नहीं मिला पाता था। ऐसी भयानक यात्राओं और दिल्ली में भी भारी भाग-दौड़ के बाद कई बार भीष्मजी बीमार पड़ जाते थे। दुर्भाग्य से, इस बार भी शहडोल-यात्रा के बाद वे बीमार पड़ गए। उन्होंने कहा नहीं, पर मुझे लगता है कि उन्हें लौटते हुए रास्ते में ही तेज बुखार हो गया था। उन्होंने कुछ खाया भी नहीं। न रात को, न दूसरे दिन सुबह या दोपहर को। चाय छोड़कर, बाकी निराहार।
दरअसल, लौटते समय उत्कल में हमारी तीनों बर्थें कन्$फर्म नहीं हुई थीं। तब हम किसी तरह ठंस-ठुंस कर बैठ-भर गए थे। हमें तब पता नहीं था कि हमारे जैसे कई और भी सूरमा डिब्बे में मौजूद थे और जो हम लोगों से अधिक चतुर भी थे। रात पड़ते ही बर्थों के बीच की और रास्ते की गैलरी की सभी जगहें भर गईं। हमने भी थककर एकमात्र बची जगह पर- संडास के आगे भीष्मजी का बैडिंग खोला (वे हमेशा बिस्तरबंद लेकर चलते थे, मेरा पक्का ख्याल है कि शीलाजी के निर्देशानुसार) और दीवार से पीठ टिका तीनों टांगे सिकोड़ धराशायी हो गए (शयन का तो सवाल ही नहीं था)। शास्त्रीजी पहले भी चालू थे, फिर शुरू हो गए! आधी रात के बाद शास्त्रीजी लघुशंका के लिए गए, तो भीष्मजी ने धीरे से आंख मारकर कहा, 'अभी यह इंटरवल है!Ó मैंने कहा, 'आगे-आगे देखिए होता है क्या!Ó इस तरह हम लोग पूरी रात संडास के आगे जागते तथा आते-जाते, चढ़ते-उतरते लोगों से लगातार लतियाए जाते दिल्ली पहुंचे। ऐसी एक भोपाल-यात्रा हमने शमशेरजी के साथ भी की थी। पर तब साथ त्रिलोचन नहीं थे। इसलिए, संडास के आगे दोनों भले बुजुर्गों को आड़े-टेढ़े सुलाकर, मैं रात-भर लातों-जूतों से बचाता, खड्गहस्त पहरेदारी करता आया था। उसके बाद से भीष्मजी ने नियम बना लिया था कि दोनों तरफ के कन्फर्म टिकट पर ही यात्रा करेंगे तथा आमंत्रित करने वाले साथियों के इस आश्वासन पर कोई भरोसा नहीं करेंगे कि वे बर्थें कन्$फर्म करा देंगे।
दोस्तो, पुराना 'प्रगतिवादीÓ दौर मैंने देखा नहीं, लेकिन मई, 1975 में प्रलेस के पुनर्गठन के बाद से आज तक मैंने ऐसा कोई जनरल सेक्रेटरी (महासचिव) नहीं देखा जो भीष्म साहनी की तरह अपने लेखन-कार्य और सेहत को दांव पर लगाकर, चौबीसों घंटे प्रलेस (और बाद में एफ्रो-एशियन राइटर्स ऑर्गेनाइजेशन भी- जिसके वे सेक्रेटरी -जनरल चुने गए थे) के हर किस्म के कामों में जुटा रहता हो! हमारे भीष्मजी ऐसे ही थे। रोज सैकड़ों नहीं भी तो दर्जनों पत्रों के उत्तर देते। खुद भी देश-भर के सभी भाषाओं के प्रमुख लेखकों, प्रलेस के राज्य संगठनों के नेताओं, सक्रिय कार्यकर्ताओं के नियमित संपर्क में रहते। वे प्रलेस के विभिन्न कार्यक्रमों और विविध समस्याओं को लेकर भी सभी को बराबर पत्र लिखते रहते थे। उनके इन अथक प्रयासों की वजह से ही प्रलेस का विस्तार और फैलाव देशभर में बड़ी तेजी  से हो रहा था। इसकी शानदार झलक गया सम्मेलन (मई, 1975) के पांच-साढ़े पांच साल बाद हुए जबलपुर सम्मेलन (अक्टूबर, 1980) में देखने