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Tuesday 21 Nov 2017

अक्षरपर्व अप्रैल का मुखपृष्ठ चित्ताकर्षक तो है ही, ललितजी की प्रस्तावना पत्रिका में चार चांद लगा रही है। ऐसी बौद्धिक और वैचारिक प्रस्तावना, समाज को एक सही दिशा-निर्देश में सक्षम है।

डा.सुवंश ठाकुर अकेला, सिपाही टोला, चूनापुर रोड. पूर्णिया, बिहार
अक्षरपर्व अप्रैल का मुखपृष्ठ चित्ताकर्षक तो है ही, ललितजी की प्रस्तावना पत्रिका में चार चांद लगा रही है। ऐसी बौद्धिक और वैचारिक प्रस्तावना, समाज को एक सही दिशा-निर्देश में सक्षम है। सचमुच यदि भावावेश में आकर एथेंसवासियों ने प्लेटो के विचारों और वकालत पर अमल किया होता तो होमर के महाकाव्य इलियड और ओडेसी को जानने-समझने का बहुत बड़ा मौका चूक जाते। एक अच्छी निधि खो देते। अच्छी प्रस्तावना के लिए ललितजी को हार्दिक बधाई और साधुवाद। कमल चोपड़ा की कहानी आड़ बहुत अच्छी लगी। सचमुच शामनाथ चौधरी जैसे समाज के कलंक कुत्सित मानसिकता वाले लोग किसी भी जाति, समुदाय अथवा धर्म का भला नहींकर सकते। यह कहानी समाज में अनर्थक उन्माद खड़ा करने वालों के मुंह पर जोरदार थप्पड़ है। वर्तमान समय छद्म नकाब और मुखौटे का है जो संवेदनहीनता और अमानवीयता को ढकने जैसा है- सुवरन कलश सुरा भरा। रमेश कुमार सोनी की कहानी मुखौटा ऐसे चरित्रवालों के पर्दाफाश की कहानी है। ऐसे तो पत्रिका की सभी कविताएं अच्छी लगीं, किंतु प्रदीप मिश्र दिव्यांश की हस्तक्षेप सहित चारों कविताएं विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। संपादक सर्वमित्रा का उपसंहार तो लाजवाब है। आज छल-प्रपंच से कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं, चाहे वह रोजगार, व्यापार, राजनीति, शिक्षा और धर्म ही क्यों न हो। हार्दिक बधाई।