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Wednesday 22 Nov 2017

\'अक्षर पर्वÓ बराबर पढ़ती हूं। जिनमें संपादकीय एवं आपका स्तंभ \'उपसंहारÓ मनोयोग से। वैचारिक स्फुरण का विस्तार होता है।

-मंजुला उपाध्याय 'मंजुल'
सम्राट चौक, पूर्णिया-854301 (बिहार)
मो. 09431865979

'अक्षर पर्वÓ बराबर पढ़ती हूं। जिनमें संपादकीय एवं आपका स्तंभ 'उपसंहारÓ मनोयोग से। वैचारिक स्फुरण का विस्तार होता है। उपसंहार में आपने लिखा है व्यक्ति मरते हैं, विचार नहीं। यह सच है कि व्यक्ति मरते हैं, विचार नहीं। लेकिन 'विचारÓ के 'घटकÓ और 'कारकÓ कुछ और भी होते हैं। मसलन होश संभालने के साथ ही शुरू हो जाता है, विचारों पर हमला। जब कोई बच्चा, अपने बालपन से ही बुद्धि, विवेक से, अपने ही माता-पिता के अनुचित बातों/विचारों को मानने से इंकार कर, अपनी सोच जाहिर करता है, तो उसे डांट-फटकार मिलती है कि 'तुम अभी बच्चे हो, तुम्हें क्या पता है कि अच्छा-बुरा क्या है। हम तुम्हारे मां-बाप हैं, हमारी सुनो। हमें सीख (विचार) देने की जरूरत नहीं है।Ó जबकि 'विचारÓ प्रस्तुत करने की उम्र नहीं होती है। वह कुदरती क्षमता है। दूसरा फलक, जब हम युवा होते हैं तो हमारे विचारों को इसलिए खारिज किया जाता है कि 'इनकी कच्ची उम्र की सोच-समझ और विचार हैं। ये अपरिपक्व हैं। इनकी क्या सुनना, विचारना...। पहले ये अपने अपरिपक्व विचारों को लगाम दें। अपनी सोचों को पकने दें, फिर कहें कुछ...।Ó
अब अगले चरण में, जब ये युवा या तरुण अपनी जिंदगी की नई शुरूआत करना चाहते हैं, मसलन पढ़ाई-लिखाई से लेकर, अपने कैरियर तक, तो इन्हें अपने मां-बाप के 'विचारोंÓ पर निर्भर होना होता है। इनके 'विचारÓ पीछे छूट जाते हैं। इनका अपना कोई वैचारिक वजूद नहीं होता है। विचार वहां भी कुंद पड़ जाते हैं, जब हम किसी के मातहत नौकरी कर रहे होते हैं। क्योंकि उनके व्यक्तित्व का अहम् मातहत काम करने वालों की सोच-विचार को निर्दयता से रौंद डालता है। या इनके 'विचारोंÓ की उपेक्षा की जाती है। अब लें, स्त्रियों के 'विचारोंÓ को। घर के अंदर इनके 'विचारोंÓ को हाशिए पर रखा जाता है। क्योंकि इनके 'विचारÓ 'औरतोंÓ के 'विचारÓ हैं। और इनके 'विचारोंÓ को खारिज कर दिया जाता है। अंतत: कहना चाहती हूं कि प्रत्येक जीव, जो जन्म लेते हैं, उनके विचारों को प्रश्रय और अहमियत देनी चाहिए। क्योंकि 'विचारोंÓ का कोई वर्ग नहीं होता। प्रत्येक लिंग के विचारों का अपना अस्तित्व है। हमें इन्हें बचाना है।
मई अंक में उपसंहार के तहत आपके धारदार और सटीक विचारों ने उद्वेलित किया। इस अंक की कहानियां अच्छी लगीं। खासकर संतोष झांझी की। नंदकिशोर आचार्य की कविताएं अंतस की छुअन एवं मुलायम अहसासों को जिंदा करती है। सूर्य प्रकाश मिश्र की कविता वीर बहुरियों के धैर्य, हिम्मत एवं जीवन से जुड़ी संवेदनाओं को रेखांकित करती है। अंजन कुमार की कविता भी अपना प्रभाववृत्त बनाए रखती है। जयनाथ मणि त्रिपाठी का आलेख अद्भुत लगा। छपरा, सीवान जिलों के लोकगीत और उनमें वर्णित देवी-देवताओं के जीवन चरित्र पढ़कर मन मुग्ध हो जाता है।