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Thursday 20 Sep 2018

बात बोलेगी, हम नहीं


सर्वमित्रा सुरजन
शमशेर बहादुर सिंह कहते हैं- बात बोलेगी, हम नहीं।
भेद खोलेगी, बात ही।
सत्य का मुख, झूठ की आँखें
क्या-देखें !,
सत्य का रूख़, समय का रूख़ है:
अभय जनता को, सत्य ही सुख है
सत्य ही सुख।
इस वक्त जब केंद्र सरकार या कहें नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बने एक साल पूरे हुए हैं तो हर ओर एक साल, मोदी सरकार के ही चर्चे हैं। सत्ता पक्ष यह बताने में लगा है कि मोदी जी के नेतृत्व में देश  कितना आगे बढ़ा और विपक्ष यह साबित करने पर तुला है कि एक साल में देश कितना पीछे खिसक गया। हर कोई बढ़-चढ़कर अपनी बात सुनाने और सही साबित करने पर तुला हुआ है, तब लगता है कि शमशेर बहादुर सिंह की इस कविता के पुनर्पाठ की जरूरत है, जिसमें वे आगे कहते हैं- दैन्य दानव; काल, भीषण; क्रूर
स्थिति; कंगाल, बुद्धि; घर मजूर।
सत्य का, क्या रंग है?
- पूछो
एक संग।
एक-जनता का
दु:ख : एक।
हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक।
दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
कंगाल बुद्धि : मजूर घर भर।
एक जनता का - अमर वर :
एकता का स्वर।
-अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।
यह समय अनोखे ढब की राजनीति का ही नहीं, अजीबोगरीब बना दिए गए लोकतंत्र का भी है, जिसमें लोक की कोई सुन नहींरहा, न सुनना चाहता है। हर पांच वर्ष में होने वाले चुनावों के लिए जनता जिस राजनीतिक दल को सत्ता सौंपती है, उसे पांच सालों तक सरकार चलानी होती है। इसका तात्पर्य यह कि पांच साल तक उस सरकार को काम करना होता है और फिर चुनावों में जनता देखती है कि उस सरकार ने देशहित और जनहित के लिए कितने सार्थक कार्य किए, उस आधार पर सत्तारूढ़ राजनीतिक दल या दलों के गठबंधन का भविष्य वह तय करती है। लेकिन इधर कुछ वर्षों में एक अजीब चलन आ गया है रिपोर्ट कार्ड जारी करने का। विद्यालयों में होने वाली मासिक, त्रैमासिक, वार्षिक परीक्षाओं की तरह सौ दिन या एक साल पूरा होने पर सरकारों का रिपोर्ट कार्ड जारी होता है। रिपोर्ट कार्ड में कम अंक आने से विद्यार्थी को तो अगली कक्षा में जाने का अवसर नहींमिलता, लेकिन सत्तारूढ़ दल खुद को पूरे से भी अधिक अंक देते हैं, विपक्ष उन्हें कम अंक या शून्य भी दे तो भी वे अगले साल भी शासन करेंगे ही, सत्ता से अलग होने की हिम्मत नहींदिखाएंगे।
सरकारें अपनी उपलब्धियां गिनाने में लग जाती हैं और विपक्ष उसकी खिंचाई में। ऐसा लगता है मानो जनता ने सौ दिन या एक साल का ही जनादेश दिया है। जब पांच साल पूरे होने को आते हैं, तब नए सिरे से सत्ता संभालने के लिए बढ़-चढ़कर वादे किए जाते हैं। उस वक्त सौ दिन या एक साल पूरे होने पर क्या कहा था, इसे कौन याद रखता है। यह राजनीति का अजीब संयोग ही है कि हमेशा एक-दूसरे से टकराने वाले अरविंद केजरीवाल और नरेन्द्र मोदी अपनी-अपनी सरकारों के क्रमश: सौ दिन और एक साल का लेखा-जोखा लेकर जनता के सामने साथ ही पहुंचे। प्रधानमंत्री ने मथुरा में रैली करके और फिर जनता के नाम खुला पत्र लिखकर अपनी उपलब्धियां गिनाईं तो केजरीवाल ने कनाट प्लेस के सेंट्रलपार्क में विशाल जनसमूह के सामने केबिनेट लगाकर अपनी उपलब्धियां बताईं। जनता ने दोनों की बातें सुनीं, उसके पास और उपाय ही क्या है। उसके द्वारा दिए गए पूर्ण बहुमत से ही वे सत्ता पर काबिज हैं। इनकी बात खुद ही बोल रही है और आगे भेद भी वही खोलेगी।