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Tuesday 21 Nov 2017

नागार्जुन का कविकर्म- चर्चा में योगदान

 

 अजित कुमार
166 वैशाली, पीतमपुरा, दिल्ली-110034
मो. 9811225605
आभारी हूं कि अक्षरपर्व के मई 15 अंक में आपने मेरे लेख नागार्जुन का कविकर्म ; मार्च 15 पर श्री विजय बहादुर सिंह की टिप्पणी छाप मुझे उस कविता की ओर फिर से लौटने का अवसर  दिया। इससे पहले एक महाशय का फोन आया था कि लेख में गद्यान्वय मात्र देना कविता के प्रति अन्याय करना है जबकि कुछ फोन सराहनात्मक भी मिले थे। कुल मिलाकर प्रतिक्रियाएं इतनी मिली-जुली रहीं कि पाठकों के निर्णय हेतु 1966 में लिखित नागार्जुन की वह पूरी कविता दर्ज करना ज़रूरी मालूम होता है-
शासन की बंदूक (मूल पाठ)
खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूंक, नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक, जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक, धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक, जहां-तहां दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक, बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक ।
सबसे पहले उस अंतिम दोहे को ही लें जिसके कुपाठ का गुनहगार विजयबहादुर जी ने मुझे ठहराया है। मैं मानता हूं कि बहुत पहले दूरदर्शन पत्रिका के अपने एक प्रसारण में पहली बार नामवर सिंह जी से यह दोहा सुन मैं भी झूम उठा था पर उसकी इस विसंगति की ओर ध्यान बाद में गया कि कोयल तो हरे-भरे कुंजों में छिपकर ही कूकती है। वह भी पूरे साल नहीं। केवल कुछ समय के लिए वसंतागमन पर और तब भी बहुधा अदृश्य रहकर वह सबको उमंग से भरती है। जबकि जली ठूंठ या जले ठूंठ पर, आमतौर से संहार और विनाश के प्रतीक समझे गए गिद्ध-चील-कव्वे ही मँडराते या डेरा बनाते हैं।
नाटकीय प्रभाव डालने के वास्ते कवि ने कोकिला को यदि जले ठूंठ पर बिठा ही दिया तो विजयबहादुर जी वाली अर्थव्यंजना के हेतु वहां नैरंतर्यसूचक रही क्रिया होनी चाहिए थी, न कि  उड़ान-सूचक गई क्रिया।  निष्कर्षत: इस कविता पर सबसे ज्य़ादा तालियों का हक़दार अंतिम दोहा इसकी सबसे कमज़ोर कड़ी प्रतीत हो, इसके समूचे विन्यास को खंडित कर देता है। कविता के आरंभिक चार दोहे भी सुगठित और सुचिन्तित नहीं जान पड़ते। उनके बीच गुंथा यह विचार कि बंदूक ने सबको गूंगा-बहरा-काना-अन्धा बना दिया, ठीक से प्रतिपादित नहीं हो सका। हिटलरी गुमान पर थूकनेवाली पंक्ति तो अनमेल है ही, बन्दूक का काना होना भी अप्रासंगिक है।
मुझ जैसे न कुछ की क्या मजाल कि नागार्जुन जैसे समर्थ कवि को कोई सलाह दूं लेकिन इस कविता में यह संभावना ज़रूर दिखती है कि वह समस्त दीन-दुखी-पीडि़त-वंचित जन की आवाज बन उसी तरह उभर सके जिस तरह पुष्प की अभिलाषा, मिले सुर मेरा-तुम्हारा, हम होंगे कामयाब आदि समूहगान उभरे हैं। इसी भावना से इसके मूल पाठ में कुछ आरंभिक फेरबदल सुझाते हुए मैं आशा करूँगा कि काव्यरसिकों और संगीतज्ञों के समवेत प्रयास द्वारा इसका एक मानक पाठ स्थिर हो जन-जन की वाणी बन सकेगा। जो दोहा यहां छोड़ दिया गया है, उसे भी सुधार कर कोई पाठक थूक जैसे उत्तम तुक का समावेश कर सके और अंतिम दोहे में सुझाया गया- हरित आवरण अर्थात कैमाफ्लाज की मदद ले बंदूक से भिडऩेवाला सुझाव सार्थक समझा जाय तो यह चर्चा विध्वंसात्मक नहीं, सर्जनात्मक सिद्ध होगी।। मेरे विचार से कविता के मूल पाठ में यह न्यूनतम बदलाव ज़रूरी है-
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक, जहां-तहां दगने लगी शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दस गुनी, बने विनोबा मूक, सबको अन्धा कर रही, शासन की बंदूक
खड़ी हो गई चांपकर कंकालों की हूंक, नभ में विपुल विराट सी शासन की बंदूक
घने कुंज की ओट ले रही कोकिला कूक, बाल न बांका कर सकी शासन की बंदूक ।
श्री विजय बहादुर सिंह के प्रति मेरे मन में सम्मान का भाव है। वे हिन्दी आलोचना के शीर्षस्थों में है। आशा करनी चाहिए कि वे अरक्षणीय की रक्षा का दुराग्रह न पालेंगे और कविता के किंचित संक्षिप्त, वैकल्पिक पाठ को समर्थन देंगे या इसे अन्य पाठकों के सहयोग से बेहतर बनाने में साझीदार होंगे।