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Saturday 18 Nov 2017

लाल सिंह दिल की दुनिया


कालूलाल कुलमी
10 गांधी नगर, जयपुर
   मो. 8285636868
पंजाबी कविता में लाल सिंह दिल का नाम एक कां्रतिकारी कवि के रूप में लिया जाता है। लाल का संबंध सत्तर के दशक के नक्सलबाड़ी आंदोलन से रहा है। यह याद रहे कि नक्सल आंदोलन से जुड़े रहे कई क्रांतिकारी गुमनामी का जीवन जीने को अभिशप्त रहे हैं। लाल सिंह भी उनमें से एक रहे हैं। पंजाब के एक दलित परिवार में पैदा हुए लाल सिंह दिल को कब इस आंदोलन से प्यार हो गया और कब वे इसमें कूद गए कि उनको स्वयं का कभी कोई ख्याल ही नहीं रहा। समाजवाद में विश्वास और समाज में परिवर्तन के आंदोलन के कारण लाल ने अपना जीवन इस आंदोलन के लिए कुर्बान कर दिया। गरीब परिवार में पैदा होने के कारण अभावों से उनका गहरा नाता रहा और फिर समाज बदलने के स्वप्न ने उनको दुखों के साथ जोड़ा और वे इस तरह एक के बाद एक दुखोंं के शिकार होते गए। उनकी कविताएं अपने दुखों की तो कथा कहती है, अपने लोगों के दुखों को गहरे से अभिव्यक्त करती हैं। पाश की तरह उनमें वह तीव्रता नहीं है लेकिन दुख की सघन अनुभूति उनके काव्य में स्पष्ट है। तड़प का नाम ही परिवर्तन है। लाल में यह तड़प है। वह धरती से प्रेम करता है, अपने लोगों से प्रेम करता है। उसे उस समाज की चिंता है जो श्रम करता है। जिसे अपनी धरती से प्रेम है जो जीवन में पानी की तरह निरंतर बहना चाहता है। जिसे उस बात की परवाह नहीं कि कल क्या होगा वह आज को जीना चाहता है।
प्यार का भी कोई कारण होता है?
महक की कोई जड़ होती है?
सच का हो न हो मकसद कोई
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता!

तुम्हारे नीले पहाड़ों के लिए नहीं
न नीले पानियों के लिए
यदि ये बूढ़ी मां के बालों की तरह
सफेद-रंग भी होते
तब भी मैं तुझे प्यार करता
न होते तब भी
मैं तुझे प्यार करता
ये दौलत के खजाने
मेरे लिए तो नहीं
चाहे नहीं
प्यार का कारण कोई नहीं होता
झूठ कभी बेमकसद नहीं होता
खजानों के सांप
तेरे गीत गाते हैं
सोने की चिडिय़ा कहते हैं।
लाल सिंह की कविता, यह सरल स्वभाव उनको समझने में सरलता प्रकट कर सकता है, और कई बार करता भी है। लाल की कविता मनुष्य के संघर्ष और मूल्यों के साथ जीने की प्रतिबद्धता की कविता है। जहां वे छोटी से छोटी बात को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना बड़ी से बड़ी घटना को। उनके लिए दुख के क्षण बड़े ही भटकानेवाले रहे हैं। वे जिस विचार के साथ चल पड़े वहां उनको वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे, ऐसे में एक संवेदनशील मनुष्य की तरह पीड़ा उनके रोम-रोम में प्रवेश करती है और वे अपने समाज के दुखों से तड़प उठते हैं। सत्ता के प्रकोप से बचने के लिए कहां-कहां नहीं भटके। उस विस्थापन और भटकन में कवि जीवन जीने के रास्ते और अपने विचार के बीच साम्य बिठाता रहा। बहुत ज्यादा पढ़ा-लिखा था नहीं, लेकिन क्रांति का विचार पता नहीं किस क्षण रुह में प्रवेश कर गया और इसका दीवाना बना दिया? इस दीवानगी ने उसको कहां-कहां भटकाया? लाल सिंह का दर्द एक सच्चे इंसान के दर्द की तरह कविता में अभिव्यक्त होता है। उनकी कविता खेत-खलिहान से गुुजरी है। उसने उस जीवन को जीया है। उसकी रगों में जीवन और मृत्यु एक साथ दौड़ते हैं। उसकी कविता में लोक का संगीत जीवन संगीत के बहाने प्रवेश करता है। लाल पंजाबी की उस परम्परा को याद करता है जहां स्त्रियों का श्रम है, जहां लोक का रंग है। उत्सव है। जहां बच्चे और औरतें गीतों में रमती हैं और अपने दर्द को गीतमय बना देती हैं, दुख में इंसान अपनी स्मृतियों के सहारे जीता है। स्मृतियां उसके दुख को मांझती चलती है। जहां आका्रेश थमता है वहां इंसान भोथरा होता जाता है। लाल सिंह का आको्रश कविता में लय के साथ अभिव्यक्त होता है। विस्थापन के कारण उनके जीवन में स्मृतियां गहरी होती जाती हैं। वे अपना और अपनों का विस्थापन देखते हैं। उसको जीने को अभिशप्त होते हैं। कई बार उनका विश्वास टूटता है लेकिन उनके पास जैसे कोई विकल्प ही नहीं था? वे भटकते रहे, या भागते रहे, बिहार में जाकर मजदूरी की। कभी चाय का ढाबा चलाया।
लाल सिंह का जीवन गोरख पाण्डेय की याद दिलाता है। गोरख के जीवन में कौन-सा दर्द था जिसको वे जीते हुए मर गए। लाल सिंह के जीवन में भी कुछ ऐसा ही था, वे चाहते कुछ रहे और होता कुछ और ही रहा। गोरख के लिए जीवन और विचार में कहीं कोई फर्क कहां था? वही लाल सिंह के साथ था। यही वजह रही कि उनके जीवन में और उनकी कविता में ज्यादा फर्क नहीं है। पंजाब की माटी का यह लाल जिस तरह से अपने जीवन को जीता है उसके सामने बड़ी से बड़ी क्रांति की बात करनेवाले बौने लगते हैं।
हर तरफ
वृक्षों से घिरे गांव हैं
घास की गांठों तले
पहचाने नहीं जाते लिबास
मैला तहमद
बढ़ी दाढ़ी
पसीने की बौछार से काला हुआ कुर्ता
नंगी टांगें
फटे हुए पैर
क्या बंगाल
क्या केरल
पशुओं के पीछे भागे जाते पशुपालक
धूल में हर तरफ  पंजाबी लगते हैं
आदिवासिनें आती हैं
फल-फूल लेती हैं
बच्चे उनकी गोद में होते हैं
वे कहें:
महारानियां थीं
जंगल में नौकर ब्याहे
यह हंसिया
हमारे मर्दों के हाथ की हंसिया है।
ये कौन लोग हैं जिनके हालात बहुत ज्यादा अच्छे नहीं है। जिनके पास कितना कुछ है लेकिन जो चाहते हुए भी अपनी ताकत को एकत्र नहीं कर पाए। जिनके पास दरिद्रता के अलावा जैसे कुछ भी नहीं बचा है? यह समाज का कौन-सा वर्ग है। या फिर वण्र्य है? जिसे गरीबी विरासत में तो मिली ही है उसे वर्तमान भी ऐसे ही जीना है। जबकि वह श्रम करता है, जीवन की बेहतरी के सपने देखता है। जिसके पास एक से बढ़कर एक हुनर है फिर भी वह वैसा ही जैसा उसको नहीं होना चाहिए? यह हर एक गरीब की कहानी है। उसकी बिवाई फटी है। उसके पास लडऩे की ताकत है लेकिन उसका उपयोग दूसरे कर रहे हैं। त्रिलोचन की तरह वह धरती की बात करता है लेकिन वह धरती उसकी नहीं है। उस धरती का मालिक दूसरा ही है। वर्तमान में मूल्यों का धुंधलापन कुछ ज्यादा ही गहरा गया है। यहां इतिहास ने जिस पर भरोसा किया था वह तो उसके साथ छल करता रहा, वर्तमान भी वही कर रहा है। ऐसे में उसके पास राह है लेकिन वह राह जगने की राह है। यही कारण है कि लाल सिंह जनता की ताकत पर भरोसा करता है। जनता निर्णायक होती है। वह अपनी सहमति और असहमति को गहराई से अभिव्यक्त करती है। कवि की आंख उस सत्य की खोज करती चलती है। वह अभाव के चरम में भी अपनी राह पर चलता रहा। उसे कहां पता था कि उस मंजिल तक जाने के लिए क्या करना होता है? उसे तो यही पता था कि एक विचार है जो हमारे लोगों को जहालत से आजाद करा सकता है? इसी कारण वह चल दिया, लेकिन वह छला गया। उसमें दुनियादारी नहीं थी, उसकी सरलता ने उसको उम्रभर के लिए लाचार कर दिया। वह अपने लोगों को क्या कहता और कैसे कहता कि मैं ठगा गया? जिसने सूरज में अपना प्रकाश देखा हो, जिसने हंसी में जीवन देखा हो, जिसके लिए स्त्री की महक जीवन की तरह हो, वह अपने लोगों के बिना कैसे जी सकता है।
लोग कहें कि बैल के सींगों पर हैं धरती
मेरा इससे इंकार है
मेरा अटल विश्वास है
कि औरत ने है उठायी
अपने हाथों पर धरती
इसलिए तो धरती की महक बदन जैसी है
इसीलिए तो लहलहाएं फसलें आंचल की तरह।
स्त्री और स्त्री होने को कितना महत्व देता है कवि। स्त्री धरती की तरह ही होती है। उसका न होना धरती का न होना है। उसका आंचल धरती का आंचल है। स्त्री न हो तो मनुष्य सभ्यता का विकास कैसे होगा? मां का होना उसके आंचल का होना है। यह धरती भी हमें वैसे ही जीवन के अर्थ देती है। आज धरती की लूट जिस तरह से हो रही है उससे यही लगता है कि गरीब अब पूरी तरह से उजड़ जाने हैं। उनको अपनी ही धरती से विस्थापित करना और फिर विकास की बात करना कैसे हो सकता है? कैसे उसको संभव किया जा सकता है। यह कैसी सभ्यता है जो अपने ही लोगों को खत्म कर विकास की बात कर रही है? इसका हश्र क्या होना? यह इसको भी कहां पता है?
लाल सिंह की कविता में लोक जीवन के रंग बहुतेरे हैं। लोक के गीत, लोक के उत्सव, लोक के नृत्य उनकी कविता में रचे बसे हैं। वे लोक के रंगों में ही मनुष्य की नियति देखते हैं। वे वहां मनुष्य के संघर्ष की अदम्य दास्तान रचते हैं। उनकी कविता में लोक के अनंत बिंब हैं।
बाबुल तेरे खेतों में
कभी कभी मैं नाच उठती हूं
हवा के झोंके की तरह
यूं ही भूल जाती हूं
कि खेत तो हमारे नहीं रहे
कुछ दिन का टिकने का बहाना
मुकदमे हार बैठे
पैसे की कमी से
स्लीपर टूट चुके हैं
भखड़ा उग आया है
बाबुल तेरे खेत में
ट्रैक्टर दौड़ेंगे किसी दिन
बाबुल तेरे खेतों में।

तब हम बहुत छोटे थे
जब कभी गिद्धे की भीड़ में से
औरतों ने मार भगाया था
तब नाह्में की औरत
सब कपड़़े उतार नाची थी
वह मुंह से चारपाई उठाकर
या पानी का भरा घड़ा लेकर नाच लेती थी
फसलों के पकने पर
वह कच्ची उमर में लौट जाती है
भोर होते ही
वह चल पड़ती है
सब मजदूरिनों संग
रोटियों और दरातियो को लिए
नाह्में ने बहुत कुछ देखा है जीवन में
उसका बेटा दो थपेड़े न सह सका
बेरोजगारी में।
लाल सिंह की दुनिया दुखों की अनथक कथा है। जहां उस जन के पास उत्सव न हो तो वह जिंदा रहेगा भी इस पर संदेह होता है। लेकिन श्रम करनेवाले कभी जिंदगी से लाचार नहीं होते। लेकिन जब उनको ठगा जाता है तब वे हारते हैं। एक किसान के पास क्या है? वह जिस तरह से बर्बादी के कगार पर जा रहा है उससे क्या जाहिर होता है? कि यह सबका विकास हो रहा है या फिर इस व्यवस्था का शिकार वह आदमी हो रहा है जिसको आप अंतिम आदमी के रूप में जानते रहे हैं। जिसके नाम पर खाते रहे हैं और वह भूखा मरता रहा है। उनके बच्चे बेकारी की भेंट चढ़ गए और वह बर्बादी की। इस तरह उनका वत्र्तमान और भविष्य सब तबाह हो गया और वे वहीं के वहीं है। सच यह है कि जनता जिस पर भी भरोसा करती है वह सदैव ठगा गया है। वह अपनी ताकत को जानती है लेकिन उसे किसी का साथ चाहिए और उसके साथ ही वह जिस पर भरोसा करती है वह उसको ठगता है। वह उसकी राहों को कठिन बनाता है। वह उसके लिए बिसात बिछाता है।
लाल सिंह दिल की कविता उस जनता के दर्द का सैलाब है जिसने समाज को बदलनेवालों पर यकीन किया। लेकिन वे ठगे गए। उनकी जिंदगी का हर पन्ना स्याह होता गया और वे दिन-दिन मौत की राह तकते रहे। जिस तरह से लाल सिंह के जीवन के अंतिम दिन बीते वे इस देश की जनता का सच है। एक पुराने खेत पर बने घर में, जिसे घर कहा जाए कि न कहा जाए, उसमें एक कवि अपनी मौत का इंतजार कर रहा है। अपने देखे हुए सपने तबाह होते देखना उसके लिए संभव नहीं है। वह अपनी मौत का इंतजार कर रहा है। जहां उसको कोई पानी देनेवाला भी नहीं है। उसकी आंखें जो ख्वाब देखती आयी है उनको वह कैसे पूरा करेगा, यह उसके लिए सपना ही रहा और वह अपनी मौत का इंतजार कर रहा है? क्या कवि हमेशा ऐसे ही मरते हैं? उनकी नियति ऐसी ही है कि वे चाहते क्या है और होता क्या है? वे जिस तरह से जिंदगी का अर्थ करते हैं वह उनके लिए पर्याप्त नहीं है क्या? लाल सिंह की जिंदगी ऐसे बहुत से सवाल खड़े करती है। जिनसे समाजवाद की बात करने वाले बच नहीं सकते। ये सवाल हमारे हैं? हमारे आसपास के हैं। जिनको नकारा नहीं जा सकता, न जिनसे बचा ही जा सकता? यह सभ्यता का सवाल है। हम विकास के नाम पर जिस तरह का समाज रच रहे हैं वह समाज किसके लिए है? वहां कौन जी रहा है और कौन मर रहा है उसकी किसी को परवाह है या नहीं? अपने पड़ोस में क्या हो रहा यह किसी को खबर तक नहीं है।
पाश को गोली से मारा गया और लाल सिंह बेमौत मारा गया। वे तमाम लोग जो इस देश के कोने-कोने में मारे जा रहे हैं उनकी नियति क्या है? उनका कसूर क्या है? वे अपने हकोंं के लिए लड़ रहे हैं लेकिन वे मारे जा रहे हैं। इस तरह कभी सत्ता और कभी भ्रष्ट व्यवस्था और ये जड़तावादी समाज उनको तरह-तरह से मार रहा है। लाल सिंह की कविता उसी के खिलाफ  बगावत है। जब तक ऐसे ही निरपराध लोग मारे जाते रहेंगे तब तक सभ्यता का विकास एक छल होगा? मूल्यों की बात करना जन के विश्वासों के साथ धोखा होगा। विचार अपने में गलत नहीं होता, उसको जीनेवाला गलत होता है। दुनिया के हर महान कवि ने उन सवालों को सबसे पहले उठाया जो मौजूं थे। वह बड़ी से बड़ी सत्ता से टकराया। कभी पलायन नहीं किया। वह जनता के पक्ष में खड़ा हुआ और जनता की जिंदगी जीता रहा। उसके लिए समाज सबसे अहम था। चाहे गदर हो, या जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में फकीरी का जीवन जी रहे विद्रोही कवि हो। अगर कवि पागल होता है तो होता है। वह किसी की परवाह नहीं करता। खुद की भी परवाह नहीं करता। वे कवि चिंतक जो सफेदपोश हैं, विचारों की चाशनी के साथ समाज की बात करते हैं वे कब गुमनानी में चले जाते यह उनको भी पता नहीं रहता। लेकिन जो जिंदगी को जीते हैं वे ही कवि होते हैं। वे ही पागल कवि होते हैं। उनके पास अपने लिए नहीं जनता के लिए जीने का पागलपन होता है। सत्ता के पक्ष में खड़ा होना कवि के लिए अपने खिलाफ  जाना है। उसके लिए सत्य सत्य ही होता है। वह जिंदगी के नये अर्थ पैदा करता है उसके लिए हर पल जलते रहना होता है। वह जलते हुए ही प्रकाश देता है। वही प्रकाश एक दिन मनुष्य का प्रकाश बन जाता है। लाल सिंह ऐसे ही कवि हैं जिनके लिए जिंदगी और विचार दोनोंं एक थे। पागल की तरह जीया और पागल की तरह मरा, ताकि लोग जिंदगी के अर्थ समझे और आगे के लिए बेहतरी के लिए लड़े।