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Sunday 19 Nov 2017

कहानियों की भीड़ से अलग कहानियां

 

पंकज सुबीर
पी.सी. लैब, सम्राट काम्पलैक्स बैसमेंट
बस स्टैण्ड के सामने, सीहोर (म.प्र.) 466001
मो. 9977855399
डॉ.सुधा ओम ढींगरा की कहानियां अपने पक्ष में बहुत शोर शराबा नहीं करती हैं। ये कहानियां बहुत खामोशी के साथ गुजरती हैं। किन्तु इस खामोशी में वो आवश्यक हलचल जरूर है जो किसी भी कहानी के लिए जरूरी होती है। ये कहानियां विमर्श, वाद और उस प्रकार के सभी दूसरे टोटकों से परे अपनी ही एक दुनिया बनाती हैं। वो दुनिया जहां बहुत छोटी-छोटी, रोजमर्रा के जीवन से उठाई गई घटनाएं और अपने ही आस पास टहलते हुए पात्र होते हैं। ये दुनिया इसीलिए पाठक को बहुत अपनी सी लगती है। और इसी कारण वो इन कहानियों से कहीं न कहीं एक प्रकार का लगाव सा महसूस करने लगता है। इन कहानियों के पात्र जीवन से यथारूप उठाकर कहानी में रख दिए जाते हैं। या यूं कहें कि ये पात्र स्वयं ही टहलते हुए सुधा जी की कहानियों में चले आते हैं। पात्रों की सहजता इन कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता होती है। किन्तु इस सहजता के बावजूद कहानी, सरोकारों के प्रति सजग बनी रहती है। लेखिका की सजगता और पात्रों की सहजता के मेल से जो परिणाम सामने आता है वो पाठक को बांध लेता है।
समलैंगिकता पर कलम चलाने में पुरुष लेखक ही डरते रहे हैं ऐसे में कहानी आग में गर्मी कम क्यों है लिखना और वो भी पूरी जिम्मेदारी से लिखना। कहानी का शीर्षक पूरी की पूरी कहानी में प्रतिध्वनित होता रहता है। एक रहस्यमय अंधेरी दुनिया के कुछ परदों को उठाने का प्रयास लेखिका ने बहुत सफलता के साथ किया है। कहानी उन सारी समस्याओं की बात करती है जो समलैंगिकता से जुड़ी हैं। और इस समस्या का वैज्ञानिक पक्ष भी तलाशने की कोशिश करती है। रसायनों के खेल के माध्यम से समलैंगिकता और विषमलैंगिकता की अबूझ पहेली का हल तलाशने की कहानी है ये। लेखिका ने कहानी को पूरी तैयारी के साथ लिखा है। कहानी को इस विषय पर लिखी गई श्रेष्ठ कहानियों में रखा जा सकता है।
इन दिनों बड़े-बड़े विषयों पर बड़ी-बड़ी कहानियां, बड़े तामझाम के साथ लिखने का चलन सा हो गया है। जीवन की छोटी-छोटी घटनाएं कहानी का विषय नहीं बन पा रही हैं। जबकि पाठक इनको ही अधिक पसंद करता है। ऐसे में और बाड़ बन गई जैसी कहानियां पाठक को राहत प्रदान करती हैं। बहुत छोटी सी घटना, जिसमें नया पड़ोसी अपने घर के चारों तरफ बाड़ लगवा रहा है। उस बाड़ को प्रतीक बनाकर मानव मनोविज्ञान की खूब पड़ताल कर ली गई है। कहानी भले ही अमेरिका में चलती है किन्तु स्थापित यही होता है कि मनोविज्ञान कमोबेश वही है, देश भले ही कोई सा भी हो। ये कहानी अपनी पूरी सरलता के साथ अपने आपको पाठक से पढ़वा ले जाती है। पाठक बाड़ के बहाने चल रहे विमर्श का पूरा आनंद लेता है और कहानी से जुड़ा रहता है। बाड़ के एक छोटे से प्रतीक को लेखिका ने अद्भुत विस्तार दिया है। ये प्रतीक जाने कहां-कहां से गुजरता है अपने निशान छोड़ता हुआ।
कमरा नंबर 103 बिल्कुल अलग प्रकार की कहानी है। टैरी और एमी के अलावा जो तीसरा मूक पात्र मिसेज वर्मा कहानी में उपस्थित है, उसकी खामोशी के संवाद लेखिका ने बहुत सुंदर तरीके से लिखे हैं। ये भी अपने ही प्रकार की एक कहानी है जिसमें एक पात्र भले ही कोमा में है किन्तु संवाद बराबर कर रहा है। उसके संवाद एकालाप की तरह होते हैं। दूसरी तरफ नर्स टैरी और एमी के संवादों के माध्यम से समस्या के मूल तक जाने के प्रयास में कहानी लगी रहती है। ये जो दो समानांतर रूप से चल रही घटनाएं है ये कहानी को रोचक बनाए रखती हैं। मिसेज वर्मा कोमा में हैं और उस कोमा के पीछे के सच को जानने की कोशिश में लगी हैं टैरी और एमी। कहानी के अंत में मिसेज वर्मा भी इस कोशिश में शामिल होती हैं, मगर अपने ही तरीके से। कहानी मन को छू जाती है।
टारनेडो लेखिका की एक सफल और चर्चित कहानी है। ये कहानी भारत से अमेरिका के बीच में पेंडुलम की तरह डोलती है और इस डोलने के बीच कई बिन्दुओं को छूती है। यह कहानी भारतीय परंपराओं की स्थापना की कहानी है। लेखिका ने पाश्चात्य जीवन शैली और भारतीयता को एक साथ कसौटी पर कसा है। उन्मुक्तता और मर्यादा के हानि लाभों को खोला गया है इस कहानी में। मिसेज शंकर एबनार्मल हैं, ये वाक्य भारतीयता के बारे में मानो पूरे पश्चिम द्वारा बोला गया वाक्य है। बरसों बरस से भारतीयों को एबनार्मल बताकर उन्हें संस्कारित करने का प्रयास पश्चिम द्वारा होता रहा है। ये कहानी उन सारे प्रयासों का एक सुदृढ़ तथा सटीक उत्तर है। उत्तर जो उसी भाषा में दिया गया है जिस भाषा में प्रश्न होता है। लेखिका ने अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों का तुलनात्मक पाठ कहानी में प्रस्तुत किया है।
'वह कोई और थीÓ कहानी एक बहुत बहुत आम समस्या को अलग तरह से प्रस्तुत करती है। विवाह के माध्यम  से अमेरिका की नागरिकता लेना तथा उसके लिए अपने साथी की हर बात को सहन करना। ये कहानी का एक पक्ष है, किन्तु दूसरा पक्ष ये भी है कि यदि ये विवाह नागरिकता लेने के लिए न होकर प्रेम के चलते किया गया हो तो...? ग्रीन कार्ड, अस्थायी नागरिकता जैसे तकनीकी शब्दों के अर्थ कहानी में आम पाठक के लिए सरलता से आते हैं। ये कहानी एक प्रकार से पुरुष विमर्श की कहानी है। पुरुष विमर्श, जिस पर चर्चा करने से हर कोई कतराता है। समलैंगिकता के बाद पुरुष विमर्श पर कहानी लिखकर लेखिका ने मानो निर्धारित दायरों को तोडऩे की चुनौती स्वीकार की है। हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श के नाम पर जो एकपक्षीय लेखन पिछले कई दिनों से चल रहा है उसका प्रतिकार है ये कहानी। डॉ. सुधा ओम ढींगरा की कहानियां अपने अनोखे विषायें के लिए चर्चित रहती हैं और इस संग्रह की कहानियों में भी वो विविधता, वो अनोखापन है। नये और अछूते विषयों को अपनी कहानियों के लिए चुनने की लेखिका की जिद उनकी कहानियों को भीड़ से अलग बनाती है। और इस संग्रह की कहानियों में भी वो जिद लगभग हर कहानी में नजर आती है।