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Monday 20 Nov 2017

स्मृतियों में संवाद करती कविताएं


डॉ. अजय अनुरागी
1, न्यू कॉलोनी, झोटवाड़ा, पंखा,
जयपुर-302012

जीवन के सहज प्रसंगों को सहज संवेदना के साथ कविता में व्यक्त करने वाले कवि गोविन्द माथुर का पांचवा कविता संग्रह है- 'नमक की तरहÓ।
इन कविताओं में कवि बचपन और युवा अवस्था के अभावों की स्मृतियों में बसा हुआ पुराने परिचितों, पुरानी चीजों और पुराने शहर को टटोलता प्रतीत होता है। जहां कविताएं स्मृतियों में संवाद करने लगती हैं। ये स्मृतियां ही कवि को सृजन की ऊष्मा प्रदान करती हैं और यह भी आभास कराती चलती हैं कि तब और अब के समय में बहुत कुछ बदल गया है। शहर, शहर की चीजें, शहर के लोग, लोगों का जीने का तरीका बिल्कुल बदल चुका है। कवि इस भौतिक परिवर्तन को तो स्वीकार करता है किन्तु भावनात्मक एवं आत्मिक स्तर पर जो छीजत हुई है उसे स्वीकार नहीं कर पाता है। वह अतीत के आर्थिक अभावों से उतना आहत नहीं हुआ था जितना आज की भाव शून्यता से हो रहा है।
कवि माथुर अपनी पहली ही कविता में अपने गिरने को आधार बनाकर अपने स्वभाव के साथ-साथ मानवीय कमजोरियों की ओर भी कटाक्ष करते हैं। अपने जन्म के समय से गिरते रहने का दावा करने वाला कवि अगर नहीं गिरा है तो वह है- 'मैं नहीं गिरा/दूध में मक्खी की तरह/दाल में कंकड़ की तरह/धूप में जलन की तरह / पानी में गलन की तरह / हवा में चुभन की तरह।Ó  कवि जीवन को गणितीय आधार पर जीना नहीं चाहता और न ही संबंधों में समीकरणों, उलझनों, जटिलताओं को ही उचित मानता है किन्तु आज स्थिति विपरीत है- 'संबंधों में गणित/मित्रों में गणित/साहित्य में गणित/कला में गणित/सम्मान में गणित/अपमान में गणित/पुरस्कार में गणित/तिरस्कार में गणित/...कुछ भी बनने के लिए/गणित अच्छा होना जरूरी है।Ó गिरोहबाजों, दगाबाजों से दूर उसके पास संवेदना का ऐसा संसार है जहां बुद्धि और तर्क का कोई स्थान नहीं। लोकप्रियता और सफलता के मानदंड कवि के अलग हैं। उसके द्वारा सच व खरी कहने, कटाक्ष कर देने, झूठी प्रशंसा न कर पाने के कारण मित्रों के दुश्मन बन जाने की संभावना भी उसे डराती है। यहां वह हमें बता देना चाहता है कि 'व्यावहारिक लोग कभी/किसी से असहमत नहीं होतेÓ तथा 'समझदार लोग/तटस्थ रहते हैं।Ó कवि की नजर में ऐसी व्यावहारिकता और समझदारी सिर्फ अवसरवादिता है। दूसरी ओर देखें तो तीव्र विकास व वैश्वीकरण की प्रक्रिया में हम 'विश्व नागरिकÓ तो बनते जा रहे हैं किन्तु सूचना तकनीक के दास बनकर स्मृतियों को भूलते चले जा रहे हैं। कवि को लगता है- 'कुछ दिनों बाद/स्मृतिविहीन हो जाएगा आदमी/भूल जाएगा/कल किसके बात की थी/भूल जाएगा किसने भेजा था/शुभकामना संदेश/.... एक दिन विश्व नागरिक/भूल जाएगा/वह विश्व के किस देश में/किस शहर में रहता है।Ó इससे ज्यादा संवेदनात्मक हृास क्या होगा? कवि इन स्मृतियों की पूंजी से मालामाल होकर बार-बार पीछे लौटता है, जहां बहन का बनाया नीली धारियों वाला स्वेटर स्मृतियों में आज भी गरमाहट दे रहा है। भाई की उतरी काली पेंट पहनने के बाद वह अपने आपको अलग समझने लगता है। साइकिल के बाद काली मोटर साइकिल खरीदकर चलाते हुए खुश हो रहा है। एक बार फिर कवि पुरानी चीजों के मोह को त्याग नहीं पाता है। ये चीजें आज भले ही अनुपयोगी हों किन्तु कभी जरूरी हुआ करती थीं। पुराने फाउण्टेन पेन, खराब लाइटर, भोथरे नेलकटर, जंग लगे ओपनर, की-रिंग्स आदि। कवि याद करता है उन दिनों को जब दूर रेलवे स्टेशन पर सुबह 4 बजे अहमदाबाद एक्सप्रेस आती थी तो लोगों की नींद खुल जाया करती थी। गर्मियों की रातों में छत पर सोना और आकाश को निहारना कितना भला लगता था। किशन बाबू जैसे चरित्र जो मोलभाव के बाद छांटकर सब्जी खरीदा करते थे और मालिनों से घर-परिवार की बातें भी धैर्य के साथ कर लिया करते थे। बाजारीकरण ने हमारे जीवन से धैर्य और आत्मीय संवादों को दूर कर दिया है। यह अभाव भी टीसता है। गोविन्द माथुर क्षुद्रताओं और दुष्टताओं से अलग भले आदमी के रूप में कविता की आत्मीय दुनिया में पूरी ऊर्जा के साथ बने हुए हैं, यह संग्रह इसी बात की पुष्टि करता है।