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Thursday 23 Nov 2017

विजयदेव नारायण साही : अर्थ का आलोक


परिचय दास
76, दिन अपार्टमेंट्स, सेक्टर-4, द्वारका, नई दिल्ली-110078
मो.09968269237
विजयदेव नारायण साही की सोच में सकारात्मक परिवर्तन रहा है। वे शब्दों को प्यार करते थे। वे शब्दों के उमड़ते सिलसिले, उनके बहाव को महत्व देते थे। वे महसूस करते थे कि वे सुरीली झनझनाहट के साथ खोले जा रहे हैं जैसे चलचित्र की रील खोली जाती है। वे मानते थे कि वे रजत पट पर फिंकते हुए चित्रों की तरह है, जिसमें चित्रों से अधिक महत्वपूर्ण है उनका खुलना, चिरंतन खुलना और इस खुलने का तरल संगीत।
वास्तव में साही अपनी रचना में तरल संगीत की तरह खुलते हैं। कविता में तरलता और संगीत  दोनों। साही खुलने या बंद हो जाने; बोलने या मौन में एक बारीक सी सुख की रेखा देखते हैं तथा दोनों में अंतर नहीं। उनकी आत्मा दोनों में विद्यमान हैं और वे दो हिस्सों में बंटे नहीं हैं।
साही अंत:मन से संघर्ष के बहाने व्यवस्था के भीतर उठते चीत्कार व अंतिम जन की नियति (जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता) को उभारते हैं-
ओ मेरे जिद्दी मन के निर्मम निर्माता
तुमने मुझको किस अजब नगर में छोड़ दिया?
चौराहों पर
जो शीश झुकाए हुए मुसाफिर चलते हैं
ये कहां जा रहे हैं इनकी क्या मंजिल है
कोई बतलाता नहीं मुझे
शायद इनमें बातें करने की रस्म नहीं
सारा का सारा नगर महज चुप है।
तुमने मुझको किस अजब नगर में छोड़ दिया
साही को चुप्पी खलती है। वे संवाद चाहते हैं। लोग हैं कि बात नहीं करते और शीश झुकाकर अज्ञात स्थल की ओर चले जा रहे हैं। ऐसे चौराहे साही को मार्मिक उलझन में डालते हैं। साही मानते हैं कि संवाद शब्दों और मुद्राओं दोनों से परे भी संभव है। वे सिर उठाते हैं और कहते हैं कि वे अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं तो व्यवस्था टूटती-सी दिखती है। वे जब कहते हैं कि वे सिर नहीं नवाते तो समुदाय आहत हुआ। उन्हें निराशा व आश्चर्यानुभूति होती है कि लोग मोम जैसे हो गए व राष्ट्र कच्चे कांच का गुबंद बन गया।
साही देख रहे हैं कि सभी सो रहे हैं। साही को नींद नहीं। वे बदलना चाहते हैं। उनके सामने कई दृश्य हैं : बीमार बूढ़ा है, ठीकठी पर लाश है, अंधा भिखारी है, समूची सृष्टि है। वे महसूस करते हैं कि इन सबका उनकी जिंदगी के फैलाव में हिस्सा है। कवि सोचता है कि अपने हिस्से काट-काटकर वह इन 'अधूरे देवताओंÓ के लिए दे देगा? क्या ही अच्छा होता वह समूचा ही इन्हें दे दिया जाता परन्तु सच है कि ये 'अधूरे देवताÓ 'अंधेरी दीवारोंÓ से ताक रहे हैं, सिर हिलाते हैं, उन्हें अपने हिस्से के अलावा नहीं चाहिए। समाज के असहायों पर कवि की गहरी संवेदनशील दृष्टि है। वह सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है, वह बेहतरी चाहता है।
विजयनारायण साही की कविता में संश्लिष्टता है। यह संश्लिष्टता जीवनानुभवों के परावर्तन हैं। नई दृष्टि के साथ उनमें प्राचीनता की स्मृतियां हैं। प्राचीनता पर उनका सचेतन अभिप्राय है। प्रकृति, ऋतुएं उनके यहां आती हैं तो मात्र पारंपरिकता को अभियुक्त करने नहीं। उनको कवि ने एक नया बोध व भंगिमा प्रदान की है। चूंकि उनका कंसर्न सामान्य आदमी है, इसलिए उसके पक्ष की लयात्मकता उनकी कविता का आधार है। साही की कविता-भाषा में एक ओर तो सहजता व साधारणता है, दूसरी ओर उसमें समयानुकूल नयापन है, लीक से हटकर कथ्य है। साही में समय और समय से आगे का अनुनाद है : एक अद्भुत वातावरण की अनुगूंज : संघर्षशील मनुष्य की सूक्ष्म व्यंजना, विचारणा निश्चय ही अपरिमेय है।
साही को मालूम था कि आपातकाल का समर्थन करने वाले किस बारीकी से अन्याय के पक्ष में होकर भी व जनता में अपनी छवि चमकाए रखना चाहते हैं। अंधकार, बहुत घना अंधकार, साही के सामने है-
उसने अपनी आंखें
ऊपर चमकते तारों
और नदी कहीं शून्य में टिका दीं
अंधेरा जहां सबसे घना था।
और अंधकार में
अदृश्य पानी के बहने की आवाजें आती रहीं।
साही अंधकार में अदृश्य पानी के बहने की आवाजें सुन लेते हैं। यह समय को अतिक्रांत करने वाला कवि ही सुन सकता है। जो कान रहते हुए सुनते नहीं, जो आंखें रहते हुए देखते नहीं, वे ही अन्याय का, आपातकाल का समर्थन करते हैं। वे साहित्य में भी अपनी चलाते रहते हैं। वे ही अंधेरे के शिल्प को ग्लैमराइज करते हैं। वास्तव में वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंधेरे के पक्ष में खड़े होते हैं।
साही सपाट धुंधलेपन के लिए अघ्र्य देते हैं- जिन आकाशभाषितों ने/अंतरिक्ष में/स्तब्धता फाड़कर चकाचौंध पैदा की थी/उनकी थरथराहट खत्म हो गई है। हर गली में फहराती हुई/रंगीन प्रकाशन की पताकाएं/कहां विलीन हो गईं ?... नदी के ठिठुरते पानी में कमर तक प्रविष्ट/आखिरी मंत्र न जाने कब का पूरा हो गया/अंत में मैंने ऊबकर अघ्र्य गिरा दिया/सूरज के लिए नहीं/संदिग्ध से बादलों के लिए/ जो सपाट अंतरिक्ष में/फैले हुए थे/और जिनके भीतर से/न अंधकार न रोशनी/एक अपरिभाषित सा धुंधलापन/वातावरण पर छा गया था। /फिर मैं चुपचाप ऊपर चला आया। सुडौल पत्थरों के बीच/नदी बहती रही/धनुषाकार, वेगवान।
इसमें कोई दो राय नहीं कि साही के पास वाक्-सुषमा है। वे असंप्रेषणीय कवि नहीं। यहां संप्रेषणीयता को व्यापक अर्थ में लिया जा रहा है। ऐसा लगता है कि साही कविता के बहाने जन की कथा के साथ आत्मकथा भी लिख रहे हैं। इसलिए उनकी कविता की पंक्तियों के उजाले में अधिक अर्थपूर्ण, अधिक हृदयगाही, अधिक स्वच्छ, अधिक बेचैन सूत्र मिलते हैं जो नेपथ्य को भी समझने की सामथ्र्य देते हैं। भारत के सामने व भारत के नेपथ्य में। कवि के अंतर्लोक में अंतिम मनुष्य के पक्ष का राग है, एक तरह से आलोडन, जो जड़ता से मुक्ति दे। साही को मथने वाले अंतद्र्वंद्व उन्हें कवि बनाते हैं। जो अंतद्र्वंद्व उन्हें विचारणा का आधार देते हैं, वे ही शिल्प बिंबित भविष्य भी उन्हें देते हैं। साही उन लोगों में नहीं जो शब्द का रूपांतर विचार में करके कविता से इतिश्री कर लेते हैं। विचारों के जड़ व्याकरण को भी वे तोड़ते हैं। सतत गतिशील किन्तु आवश्यक विराम।
साही क्रांति का विस्फोट करते हैं। एक ऐसा रूपाकार, जो दुर्लंध्य है, हरा-हरा उठता है। वहीं से अर्थ का आलोक सृजित होता है-
एक जड़ता और
जिसे हमने तीव्र अपनी क्रांति के विस्फोट से
जीवित किया
एक क्षण को
हरहरा उठा वह दुर्लंध्य रूपाकार
कांपते रहे जिसमें करोड़ों परमाणु ज्वर-आक्रांत-
फिर यह लहर :
जो हमारे अर्थ को आलोक देकर बह गयी।
यह हमारी सृष्टि है, हम नहीं।
यह साही के लिए ही संभव है कि कला भाषा में रचते हुए कलावादी नहीं है, अंतिम मनुष्य पर लिखते हुए स्थूल जनतावादी नहीं हैं। शब्दों के साथ क्रीड़ा करते हैं, सरल-सहज कथन करते हैं, नए पथ बनाते हैं, नई दृष्टि देते हैं तथा संप्रेषणीय बने रहते हैं। परंपरा में जाकर भी अतीतगामी नहीं होते, अस्तित्व पर समझ करते हुए अस्तित्वादी नहीं होते। वे कविता के व्याकरण को बदल देते हैं, इस अर्थ में कि कविता को विरल बारीकी से साधते हैं, कविता के लिए अर्थ के मेरूदण्ड को मोड़कर तोड़ते हुए आगे बढ़ते हैं :
किन्तु वो ममतालु
दौड़ आया हूं यहां तक
आत्मविस्मृत, तप: पूत, विभोर
अपने खुलेपन से ही प्रताडि़त, बिद्ध,
चारों ओर उच्छल नीलिमा से घिरी
मेरी डूब जाने की अलौकिक प्यास,
मुख से विकल
स्वर्गिक, मुग्ध और असमर्थ बाहों की विरलता बीच
बिछती जा रही है
सुनो,
ओ सलिला,
तुम्हारे हृदय की तल-वासिनी यह रेत
मुट्ठी में उठा
तप्त मस्तक से लगाकर
मांगता हूं।
साही शब्दों को उसका अर्थ लौटाते हैं, व्याकरण को लौटाते हैं और तार्किकता लाते हैं। साही के शब्द अपनी गतिमयता, लयधर्मिता और लक्ष्यमयता की शक्ति से गतिमान हो जाते हैं। साही शब्द को लक्ष्यमय बनाते हैं।
साही शब्द की धमनियों में नए अर्थों का संचार करते हैं। वे शब्द को सहज सौहाद्र्र के रूप में उपयोग में लाते हैं। साही जानते हैं कि शब्द-शक्ति समष्टिगत शक्ति है, सामाजिक शक्ति है। वे भाषा के चरित्र व रूपायन को नई क्रांति देते हैं। उनकी वाक्य रचना की शैली, उनका अव्ययों का प्रयोगकारक विभक्तियों का प्रयोग, पद का प्रयोग कविता के व्याकरण से भिन्न है। उनमें जरूरी अस्वीकार है। वे चुनौतियों को स्वीकारते हैं।
प्रथम बार जब तुमने झूठा ईश्वर देखा
मानव के घायल मस्तक की साक्षी देकर
मैंने अस्वीकार किया था,
जीवित करता हूं मैं वे अभियान पुराने-
भय: तुमको था अंधकार का।
लोभ : तुम्हें था सार्थकता का।
मोह : तुम्हें था आलंबन का।

अंधकार के सूनेपन से हार मानकर
वैभववाले इंद्रजाल से छाया की भीख मांगना
कायरता है।
अपने पौरुष की जिजीविषा से भय खाकर
इतिहासों के नागपाश में
इष्ट नियति के बादल रचना
कायरता है।

हां मैं वही पुराना द्रोही
आज तुम्हारी व्यथित अनास्था की साक्षी दे
निरवलंब मानवता को आमंत्रित करता।
तुम्हें चुनौती फिर देता हूं
पितृहीन होना ही केवल
यदि ईश्वरत्व का लक्षण है
तो हम सबके सब ईश्वर हैं।
अनेक बार साही भाषा में विघ्न पैदा करते हैं परन्तु तब वे रूपकों का सहारा नहीं लेते। वास्तव में उनकी समूची वाक भंगिमा एक धनसंबद्ध रूपक है। यह सब करते हुए वे अतियथार्थवादी (सुपर्रियालिस्टिक) नहीं होते। व्याकरण व यतिचिह्नों को भी पूरा उलट-पुलट कर वांछित परिणाम प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं।
साही में कमजोर का आत्र्तस्वर है। वे इतिहास के संधिलग्न में खड़े होकर भविष्य की ओर दृष्टिपात करते हैं, अपने समय से मुठभेड़ करते हुए। 'इलाहाबाद : आधी रातÓ कविता में वे रात के विकरालतम की प्रवंचना देख लेते हैं, क्योंकि 'रोशनी का भंवर वह बेचैन। जो तिमिर के अतल जबड़ों में समाता जा रहा है।Ó साही की कविता का वृहत् अर्थ है : संसर्ग, तादात्म्य, अखण्डता। वे रचनाकार व पाठक की दूरी कम करते हैं। इसका अर्थ है, कविता के व्यक्तित्व को सर्वजन ग्राह्य बनाना। यह साहित्य की मूल प्रकृति के पक्ष में है। यह अंतिम मनुष्य के पक्ष में है। यह बेचैन मनुष्य के पक्ष में है। वे साहित्य और भाषा के शुद्धतम उत्स की तलाश करते हैं। वे तर्कों पर विश्लेषण मात्र नहीं करते, आवेश का संश्लेषण करते हैं, जहां कविता में बंधी-बधाई अभ्यस्त संज्ञा से शब्द को मुक्ति मिल जाती है। इसीलिए साही का एक प्रयास प्रवहमान समय के खिलाफ एक विद्रोह है।