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Tuesday 21 Nov 2017

आलोचना के चश्मे को बदलना जरुरी है।


 राधेश्याम तिवारी
12/156 मालवीय नगर  जयपुर  302017
मो. 9314486575
वैज्ञानिकों के  शोध परिणामों के अनुसार यदि माने तो कविता भावनाओं का ऐसा दर्पण है जिसमें विकृतियां भी खूबसूरत दिखलाई देने लगती हैं। उन वैज्ञानिकों के अनुसार जो कविता के सत्य को जानने की कोशिश में लगे हंै, उनके लिए साहित्य मस्तिष्क के लिए भोजन है तो कविताएं उसके लिए गुलदस्ता है। किन्तु कविताओं को समझने के लिए किसी उपन्यास की तुलना में मस्तिष्क को ज्यादा परिश्रम करना पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि कविता की कुछ पंक्तियां भी किसी को अच्छी लग जाती हैं तो उसके मर्म तक पहुंचने के लिए उसे कई बार पढऩा पड़ता है या उन पंक्तियों को याद करने की जरुरत महसूस होने लगती है, जबकि उपन्यास के साथ ऐसा नहीं होता। ''ब्रेन इमेजिंग तक्नोलाजिÓÓ द्वारा प्रारंभिक स्तर अध्ययन करने के बाद यह पता चला है कि जब कोई व्यक्ति जोर से पढ़ी जानेवाली कविता सुनता है तो उसके प्रमस्तिष्कीय स्तर पर गतिविधियां शुरु हो जाती हैं। बचपन में कविताओं की लय और लयात्मकता कई प्रसुप्त भावनाओं को उत्तेजित करती हैं किन्तु उम्र बीतने के साथ जैसे-जैसे लयात्मकता खत्म होने लगती है कविताओं के प्रति विकर्षण शुरु हो जाता हैे और विश्वविद्यालय स्तर तक पहुंचते-पहुंचते कवि और कविताएं हास्यास्पद हो जाती हंै। वैज्ञानिकों को इसी कारण की तलाश है कि ऐसा क्यों हो जाता है ?
वैज्ञानिकों के इस शोध से एक बात तो साफ हो जाती है कि उन कवियों की सोच जिसमें लयात्मकता या लय नहीं है उसे कविता मानने में कठिनाई हो सकती है। उदाहरण के लिए तुलसीदास की चौपाइयों का समाज में शिक्षितों या अशिक्षितों द्वारा याद करके स्थितियों के अनुसार इस्तेमाल किया जाना या लोकोक्तियों और उर्दू के शेरों को स्थितियों के अनुसार याद किया जाना साबित करता है कि अपनी लयात्मकता और अर्थवत्ता के कारण पाठकों और श्रोताओं को कविताएं किस प्रकार प्रभावित करती हैं? जबकि गद्यांशों को याद रखना आसान नहीं होता। दुष्यंत कुमार की गज़़लों की पंक्तियों को शायद इसी कारण ज्यादा लोकप्रियता मिली है। गोपालदास नीरज की लोकप्रियता इसी में है कि उनकी कविताओं के अर्थ और उनकी गेयता वैज्ञानिक व्याख्याओं से मिलती जुलती है। यहां दिलचस्प यह है कि हिन्दी गीतों को कुछ आलोचकों ने एक सिरे से खारिज कर दिया है। वे लयात्मकता को एक तरह से पुरातनवादी कविता की श्रेणी में रख कर भूल चुके हंै।  जबकि प्राचीन कविताएं वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक तर्क संगत है। उदाहरण के लिए चारों वेदों की ऋचाओं में एक लयात्मकता है जिसे एक विशिष्ट संगीतमय शैली में उच्चारित किया जाता है।   
एक तरह से देखें तो बचपन से ही पाठ्यक्रमों में छन्दों का बड़ा महत्व रहा है। यह शैली वेदों के मंत्रोच्चारण से सामाजिक जीवन में आई है क्योंकि छन्दों के माध्यम से कविताओं को याद रखना मानव प्रकृति के काफी अनुकूल है। इसलिए प्राचीन काल में सम्पूर्ण वेदों को कंठस्थ करने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती थी। लेकिन जैसे-जैसे कविता से छन्दों का संबंध टूटने लगा और गद्य का विकास होने लगा उसका प्रभाव कविताओं पर भी देखा जाने लगा।  कविता के क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों और तेजी से बदलती जीवन शैली ने कविता को समाज की मुख्यधारा से अलग कर दिया और आज स्थिति यह है कि कविता अब स्कूलों और विश्वविद्यालयों की संपत्ति बन कर रह गई। कविता के छन्दों की नैसर्गिकता में गिरावट आने से उसका सौन्दर्य भी प्रभावित हुआ है। कविताएं आज भी लिखी जाती हैं और महान कविताएं लिखी जाती हैं लेकिन कविता का सौंदर्य बोध कहीं पीछे रह गया है। पाठकों की संख्या में कमी आ गई है।
कारण साफ है कि जिन आचार्यों ने काव्य की आलोचना के सिद्धान्त गढ़े आमतौर पर वे कविता लिखने से बचते रहे। प्लेटो या अरस्तू ,दांडी, भामह से लेकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से आज तक जाने कितने विद्वानों ने कविता की श्रेष्ठता के सांचे तो तैयार कर दिए, महान समीक्षक आइ ए रिचड्र्स ने साहित्य की समीक्षा के लिए कितने ही मानदंड स्थापित कर दिए लेकिन उनकी आदर्श काव्य कृतियां पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं है। विचार तो फिर भी स्थिर हो सकते हैं लेकिन मन की भावनाएं सबसे ज्यादा गतिशील हैं। मन की भावनाएं किसी लुढ़कते हुए पत्थर की तरह हैं जो गतिशील है और उसमें लयात्मकता है किन्तु विचार उस स्थिर पत्थर की तरह है जिसमें न गति है और न संगीत है, इसलिए वह कविता नहीं किसी विचार की तरह लग सकता है। और उस लुढ़कते पत्थर का सौन्दर्य किसी स्थिर पत्थर की तुलना में ज्यादा आकर्षक लगता है।
गति ही शाश्वतता का प्रतीक है जो कभी न तो रूकता है, न थमता है, निरंतर गतिमान रहता है। यदि ऐसा नहीं होता तो कई कालजयी कृतियां कालजयी नहीं कहलातीं। उन कृतियों की भावनाएं कहीं विचार बन कर गद्य हो जातीं। लेकिन ऐसा नहीं है। इसलिए इस वैज्ञानिक युग में जब संचार माध्यमों में क्रांतिकारी परिवर्तन हो रहे हों और भूमंडलीकरण का व्यापक प्रभाव पूरे विश्व की जीवन शैली और सोच को प्रभावित कर रहा हो और ईराक के नेताओं की व्यक्तिगत गतिविधियों की एक-एक हरकत को अमेरिका में बैठ कर देखा जा रहा हो ऐसे परिवर्तन के दौर में जरूरी है कि कविताओं की समीक्षा समय के नए आयामों के संदर्भों और वैज्ञानिक उपलब्धियों से आए समाज में बदलाव के परिप्रेक्ष्य में की जाए।
इस संदर्भ में विचार करें तो लयात्मकता ही काव्य सौंदर्य को बढ़ाती है। तुलसीदास की एक चौपाई '' जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखहिं तिन तैसीÓ।ÓÓ काव्य सौन्दर्य के फलक को अनन्त विस्तार दे देती है जिसमें यथार्थवादी और आदर्शवादी, कला से संबंधित दोनों परिभाषाएं समाहित हो जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सौन्दर्य की इतनी उदार व्याख्या बहुत ही कम पढऩे को मिलती है। कला का सौन्दर्य देखनेवालों की आंखों और देखते समय उस के मन में उठ रही भावनाओं में होता है। अग्नि पुराण में भी इसी प्रकार कहा गया है कि -''यथास्मे रोचते विश्वं तथेदं परिवर्तते।। अग्नि पुराण।। इसका आशय यह है कि देखनेवाला विश्व को अपनी रुचि के अनुसार बना लेता है। कला की शाश्वत कसौटी को लेकर डा. गुलाबराय जैसे समीक्षक मानते थे कि 'सत्यं शिवं सुन्दरंÓ यूनानी दार्शनिक अफलातूं का ''द ट्रू, द गुड और द ब्यूटीफुलÓÓ का अक्षरश: अनुवाद है। इसलिए सुविधा के लिए इसका उपयोग तो किया जा सकता है लेकिन इसे भारतीय मानने में कठिनाई हो सकती है। इसका हिन्दी अनुवाद कला की भारतीय परिभाषा से काफी घुलमिल गया है। लगता है कि वेदों से निकाल कर साहित्य में सीधे रख दिया गया है। दिलचस्प यह है कि आज तक विद्वान भारतीय आलोचकों द्वारा इसे दोबारा परिभाषित करने की कोशिश नहीं की गई।
कला के संबंध में भारतीय चिन्तन ज्यादा लौकिक और उदार है। जबकि आयातित 'सत्यं शिवं सुंदरं में एक दोष है कि सत्य हमेशा ही सुंदर हो इसकी कोई गारंटी नहीं है। सत्य यदि है तो उसका एक पक्ष असुंदर भी है। और यदि वह असुंदर है तो क्या उसे साहित्य की सीमा में नहीं रखा जायगा? राजनीति में तो इस प्रकार के नियम बनाए गए हैं कि विदेशी नागरिक किसी दूसरे देश में सर्वोच्च पद का अधिकारी नहीं हो सकता, लेकिन कला के क्षेत्र में ऐसी कोई सीमा नहीं है। क्योंकि कला के लिए काल या भौगोलिक या राजनीतिक प्रतिबंध का कोई मतलब  नहीं है। यही कारण है कि 'सत्यं शिवं सुंदरं को पा लेने के बाद किसी और कसौटी की जरुरत नहीं हुई होगी। जबकि कई विद्वान मानते है कि अफलातूं की परिभाषा से मिलते जुलते विचार श्रीमद्भागवत गीता में विद्यमान हंै जिसकी ओर भारतीय आलोचकों का ज्यादा ध्यान नहीं गया है। गीता के 17वें अध्याय के 15 वें श्लोक में कहा गया है-''अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं हितं च यत।। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वांड:मयं तप उच्चते।।
यदि गीता की कसौटी से कला के सौन्दर्य की व्याख्या करें तो कहा जा सकता है कि वह वाक्य जो सत्य हो, प्रिय हो, हितकारक हो और जो उद्वेग पैदा न करे तथा जो स्वाध्याय एवं अभ्यास पर आधारित हो उस साहित्य को तपस्या के रुप में माना जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो साहित्य एक तरह से तपस्या की एक अनुभूति है जो जीवन तत्वों के गहन अध्ययन और अभ्यास के बाद सत्य, प्रिय और सुंदर होकर प्रस्फुटित होती है। 'ंअनुद्वेगकरंÓ के जुडऩे से सत्यं, शिवं, सुन्दरं की भावना को पूरे वैराग्य के साथ ग्रहण किया जाना चाहिए। यह वैराग्य चीन के एकमात्र नावेल विजेता जाओ झिंग्जियान के लिए साहित्य की वह रसानुभूति है जो पाठक को एक ऐसी मन:स्थिति में ले जाती है जो वैराग्य कहलाती है और इसी वैराग्य से मुक्ति का मार्ग मिलता है। इसके बाद जीने का अर्थ मिलता है। जबकि वैज्ञानिक मरने के बाद की किसी स्थिति को स्वीकार नहीं करते। मनुष्य का शरीर अपने आप में जैविक प्रक्रिया का एक अंग है इसलिए उस शरीर से चाहे कला का जो भी रुप हो वैज्ञानिक प्रभाव तो रहता ही है। उदाहरण के लिए हम जिस कल्पनाशीलता की बात करते हंै वह किसी न किसी शरीर के मन मस्तिष्क से जुड़ा होता है इसीलिए उन कल्पनाओं की वैज्ञानिक दृष्टि से सटीक व्याख्या की जा सकती है भले ही उसे मनोविज्ञान ही क्यों न कह दें?
जैसे-जैसे विज्ञान का प्रभाव आधुनिक जीवन पर बढ़ता गया है उससे मनुष्य का मन-मस्तिष्क भी प्रभावित होता रहा है, खास कर इलेक्ट्रानिक माध्यमों ने लोगों को साहित्य से दूर कर दिया है, पाठकों की रुचि बदल कर रख दी है। आज गंभीर साहित्य पढऩे के बजाए उस प्रकार के साहित्य को पढऩे में अधिक रुचि हो गई है जो बाजार या उपयोगितावाद की दृष्टि से लिखे गए हैं। प्रथम तो टीवी और फिल्म के कारण लोगों को साहित्य पढऩे का अवसर नहीं मिलता और दूसरा यह कि इसकी वजह से लोग साहित्यिक पुस्तकों के बजाए ऐसी किताबें पढऩा चााहते हैं जो हमें सूचना देता हो या अनुदेष देता हो जैसे स्वादिष्ट खाना कैसे बनाना चाहिए या अपनी बचत का कैसे सदुपयोग करना चाहिए या छुट्टियों में किस देश की यात्रा करनी चाहिए। आज साहित्य पढऩे का समय इन विषयों ने ले लिया हैं। जो साहित्य वास्तविक घटनाओं पर लिखा जाता है उससे पाठक जुड़ नहीं पाता है क्योंकि उस साहित्य की वास्तविकता की जानकारी उसे नहींहोती है। इसलिए बदलते संदर्भ में आलोचना के घटते चश्मों के नम्बर में ही बदलाव लाना जरुरी है।