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Thursday 23 Nov 2017

बीच की दीवार: मार्मिकता और व्यंग्य का अचूक चित्रण


सीमा कुमारी
ई-191, डॉ. अम्बेडकर नगर, सेक्टर-4,
नई दिल्ली-110062
मो.9718442143
अमरकांत का उपन्यास 'बीच की दीवारÓ मध्यवर्गीय युवा मानसिकता को आधार बनाकर लिखा गया है। 'बीच की दीवारÓ उपन्यास मुख्यत: नायिका प्रधान है। उपन्यास की नायिका दीप्ति अत्यंत सुन्दर है और सुन्दर होने का अहसास भी उसे है। दीप्ति अपनी माँ से उपेक्षित है किन्तु उसके पिता ने उसे बहुत लाड़ प्यार से पाला है। दीप्ति के मां पिता दोनों साधारण शक्ल सूरत के थे। उसका बड़ा बेटा मोहन काला दिखता है। इस कारण बेटा अपने पिता से उपेक्षित है। दीप्ति की मां उसे हमेशा डाँटते-फटकारते रहती थी किन्तु दीप्ति पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ता था। वह अपनी माँ की बातों को नजरअंदाज करके अपने सपनों की दुनिया में निर्मग्न हो जाती है। शराब, कबाब, शबाब के शौकीन मुंशी मुन्नीलाल खुद सुन्दर न थे किन्तु वे सौन्दर्य प्रेमी व्यक्ति थे। मुन्नीलाल की प्रबल इच्छा थी उनके बच्चे सुन्दर हों। लेकिन जब बेटा हुआ तो वह काला हुआ। उसका सारा दोष अपनी पत्नी के ऊपर मढ़ दिया। यहां तक अपनी पत्नी से बोल-चाल भी बंद कर दी। इस कारण वह बहुत दु:खी रहने लगी। उसे लगता जब पति ही ठीक से बात न करे तो दुनिया की सारी खुशियां बेकार हंै। जब दीप्ति हुई तो खूब सुन्दर और गोरी हुई। मुंशी जी अत्यन्त खुश रहने लगे और सारा प्यार मोह बेटी दीप्ति से हो गया। उसकी सारी फरमाइश पूरी शिद्दत साथ करते। जब वह बड़ी हुई तो दीप्ति तुनुकमिजाजी हो गई और बात-बात पर भड़क उठती थी, फैशन में सबसे आगे रहती किन्तु पढऩे-लिखने से कोई लेना न था। दीप्ति का घर का काम-काज करना भी मुंशी मुन्नीलाल को पसंद न था। इस कारण पत्नी से कहा-सुनी भी हो जाती थी। मुन्नीलाल का मानना था कि जब वह बड़ी हो जाएगी सब समझ जाएगी।
दीप्ति का भाई शंकर रेलवे के दफ्तर में एक क्लर्क है और शहर का सबसे अच्छा बांसुरी-वादक भी। इस कारण उसके दोस्तों की संख्या बहुत थी। घर पर भी कुछ दोस्त आ बैठते थे और गाना बजाना होता रहता था। दीप्ति भी शंकर के दोस्तों के बीच बहुत सज-संवर के आ बैठती। उसे लगता था शंकर के सभी मित्र उसी के आकर्षण से यहां आते है। इस बात में सच्चाई भी थी। शंकर के सभी दोस्त उसे अपनी तरफ आकर्षित करने की चेष्टा करते। कभी-कभी गाना बजाना शुरू होकर देश दुनिया की बहसें भी हो जाती। एक दिन उन चारों में 'स्त्री की आजादीÓ को लेकर बहस हो गई थी। उसमें सिर्फ अशोक ही था जो यह मानता था स्त्री को पूरी आजादी मिलनी चाहिए बाकी सबके लिए मांसलता महत्व रखती थी। सुन्दरता और बदसूरती में कोई खास फर्क नहीं करता था। अशोक अपने विचारों व बात से अपने अन्य दोस्तों को परास्त करता और इसका प्रभाव दीप्ति पर पड़ता था। जिसका परिणाम यह हुआ कि दीप्ति शंकर के और मित्रों की उपेक्षा करने लगी और अशोक को सबसे अधिक महत्व देने लगी थी। कभी-कभी जब बहस होती तो दीप्ति अशोक का ही पक्ष लेती कभी-कभी उत्तेजित भी हो जाती। यह बात उसके भाई शंकर को नापसंद थी पर वह कुछ नहीं कहता किन्तु कभी-कभी डांट भी देता था। इस पर अशोक दीप्ति का पक्ष लेता और शंकर को कहता- ''ठीक ही तो कह रही है। खास बात तो यह है कि  तुम डिक्टेटर किस्म के आदमी हो और उसको दबाकर रखना चाहते हो।ÓÓ धीरे-धीरे अशोक और दीप्ति में करीबी बढ़ती गई और अशोक दीप्ति को नारी उत्थान का लम्बा-चौड़ा भाषण देकर उस पर प्रभाव जमाता रहा। अशोक उसे समस्त पुरानी मान्यताओं तथा रूढिय़ों को तोडऩे को कहता। नारी के हक में जब वह दीप्ति से बोलता तब दीप्ति उससे और प्रभावित होती।  अशोक का मानना था कि स्त्री को पूरी आजादी मिलनी चाहिए तभी देश की तरक्की हो सकती है। इस बात का दीप्ति पर बहुत प्रभाव पड़ा और अशोक उसकी नजर में सबसे ऊपर हो गया। उसे लगने लगा अशोक ही है जो स्त्री की इतनी इज्जत करता है। इस बात का दीप्ति के मन में इतना प्रभाव पड़ा कि अशोक की चर्चा अपनी सहेलियों से भी करती हमेशा उसी की तारीफ  करती रहती। इस कारण कभी-कभी उसकी सहेलियां दीप्ति का मजाक भी उड़ा दिया करती। दीप्ति को लगता अशोक भी उसे चाहता है शायद इसी कारण वह बन-ठन कर आता है। दीप्ति हमेशा अशोक को लेकर सोचती रहती और उसी के सपने देखती रहती। अशोक भी खुद को नायक समझता था और महान, योग्य सुन्दर पुरुष समझता है। उसके जीवन में कई लड़कियां पहले भी आ चुकी है किन्तु उसकी नारी की भूख बढ़ती गई थी। किन्तु उसे इस बात का यकीन न था कि दीप्ति इतनी जल्दी उस पर आकर्षित हो जाएगी। इस कारण वह खुद पर गर्व भी करता। अशोक जानता था कि उसके साथी भी दीप्ति के प्यार के लिए लालायित रहते हैं किन्तु वह अपनी आकांक्षा छुपाए रखते हैं। अशोक बाहर से प्रगतिशील दिखाई  पड़ता किन्तु वह वास्तव में निरंकुश शासन का आकांक्षी था। अशोक दीप्ति को प्यार करने के लिए व्याकुल हो उठा था उसे एकांत नहीं मिल पाया था इसका कारण वह खुद ऐसी कल्पनाओं में खो जाता जिस पर ''बड़े-से-बड़े व्यभिचारी भी शर्म आ जाए।ÓÓ एक बार सभी मित्रों का पिकनिक जाने प्रोग्राम बन गया उसी दौरान अशोक की नजदीकी दीप्ति की सहेली कुन्ती से गई। इस पर दीप्ति को बहुत चिढ़ हो गई। उसे लगने लगा कि उसने जितनी बात अशोक के लिए सोची थी सब गलत था। अशोक भी कुन्ती को पाकर दीप्ति को लगभग भूल-सा गया था। दीप्ति ने सोचा था कि आज अशोक के साथ खूब घूमेगी, हंसेगी, लेकिन इस सब पर पानी फिर गया। अशोक पर दीप्ति को बहुत क्रोध आया और वह अकेले जाकर बैठ गई। अकेले बैठे दीप्ति को देख वहाँ मनफूल पहुंच गया। मनफूल पेशे से वकील था और पहले से ही दीप्ति को मन-ही-मन चाहता था। इस परिस्थिति का मनफूल पूरा लाभ उठा लेना चाहता था। मनफूल एक ही सांस में अशोक की सारी करतूतों का पर्दाफाश करके दीप्ति के मन में जगह बना लेना चाहता था। और इसमें वह काफी हद तक सफल भी हो गया था। पिकनिक में अशोक की हरकतों को देखकर दीप्ति को बहुत दु:ख हुआ। वह सारे दिन गुमसुम रही। इसी बीच मनफूल वहां पहुंच जाता है और अशोक के कारनामे के समस्त काले चि_े दीप्ति के आगे खोलकर रख देता है। दीप्ति उससे पहले ही जलीभुनी रहती है और मनफूल की ये बातें आग में घी का काम कर जाती हंै। इसकी परवाह अशोक को बिलकुल न थी। वह कुन्ती के गदराए जिस्म की खुशबू में मदहोश हो गया था। उसकी सारी दिलचस्पी कुन्ती की ओर केन्द्रित हो गयी थी। कुन्ती गोरी न थी किन्तु गदराया जिस्म अशोक को आकर्षित करने लगा था। अशोक को यह अहसास हो चुका था कि किसी विशेष परिस्थिति के दबाव में वह दीप्ति से हाथ धो बैठे किन्तु वह कुन्ती को खोना नहीं चाहता था।
यद्यपि मनफूल शादीशुदा था किन्तु सुन्दर स्त्री देखकर उसका जी मचल उठता था। दूसरे दिन ही वह दीप्ति से स्कूल के बाहर मिला और उसे तबला बजाने सीखने लिए प्रेरित करने लगा। इस पर दीप्ति हंस पड़ी उसे लगा कि औरतें कहां तबला बजाती हैं किन्तु मनफूल उसे समझाता है कि जमाना बहुत बदल गया है। अब ऐसा कौन-सा काम है जो स्त्री नहीं करती है। उसे वह रोज कसरत करने की भी सलाह देता है। मनफूल दीप्ति से कहता है कि यदि उसके बताए गए रास्ते पर चली तो वह दुनियाभर में नाम कमा सकती है। मनफूल का मानना था कि अगर तन्दुरुस्ती अच्छी है तो वह प्रत्येक काम में सफलता प्राप्त सकती है यहां तक अपने क्लास में टॉप भी कर सकती है। वह अपनी बातों से दीप्ति को पूरी तरह प्रभावित करने की कोशिश में लगा हुआ था। हालांकि मनफूल पढ़ाई-लिखाई से कोसों दूर  था किन्तु उपदेश देने में माहिर था। इसी उपदेश के सहारे दीप्ति पर प्रभाव जमाने की फिराक में था। लड़कियां फांसने में मनफूल कच्चा खिलाड़ी है किन्तु उसे पूरा यकीन था कि उसके सुन्दर स्वस्थ शरीर पर लड़कियां जरूर आकर्षित हो जाएंगी।
अब दीप्ति अपने पिता से कहती है वह तबला सीखेगी इस पर उसके पिता उसको समझाते हैं किन्तु वह अपनी जिद पर अड़ी रहती है और अन्तत: अपने पिता को राजी कर लेती है। हालांकि इस निर्णय से उसकी मां बसन्ती बहुत क्षुब्ध होती है। उसे लगा है दीप्ति को इतना सर चढ़ा लिया गया कि सारा घर चौपट हो जाएगा। वह अधिक दु:खी होती और रोने लगती है। किन्तु दीप्ति को बहुत प्रसन्नता होती है। दीप्ति के तबला सीखने के कारण ही मुन्नीलाल और बसन्ती में काफी कहा-सुनी होती हैै। यहां तक कि मुन्नीलाल बसंती को मारने लिए उठते हैं। किन्तु शंकर के बीच बचाव के कारण स्थिति सामान्य हो गई थी। किन्तु दीप्ति पर इसका असर बुरा पड़ा था। उसने अपनी मां से बातचीत तक करना बंद दिया। जैसे-जैसे वक्त गुजरा वैसे-वैसे दीप्ति के मन में मनफूल का प्रभाव बढ़ता गया। मनफूल भी संगीत विद्यालय में अपना नाम लिखवा लेता है और दीप्ति को रोज छोडऩे ले जाता है। मनफूल तुच्छता और धूर्तता के किसी भी स्तर को छू सकता था किन्तु इस वक्त वह कोई मौका गंवाना नहीं चाहता था। किसी तरह अपनी पत्नी को भी समझा-बुझा लेता है कि वह तबला सीख गया तो उसकी वकालत चल निकलेगी। मनफूल के अनुसार इस बार जो मजिस्ट्रेट आए हैं वह भी गाने-बजाने के शौकीन हंै। और उसे बहुत पसंद भी करते हैं तथा घंटों उससे बातें भी करते हैं। इससे उसके साथी उससे जलते हैं। अपनी पत्नी के प्रति उसका ख्याल भी कुछ इस तरह था- ''अगर इस चुडै़ल को मालूम हो जाएगा तो यह छाती पर बैठकर उसका खून पी जाएगी। ऐसी जालिम औरत है यह।ÓÓ वह किसी तरह अपनी पत्नी को समझा-बुझाकर संगीत विद्यालय में अपना नाम लिखवा लेता है। एक  दिन अंधेरे का लाभ उठाकर वह दीप्ति को आलिंगनबद्ध करने की चेष्टा करता है। ऐसी घटना दीप्ति के जीवन पहली बार घटी थी। किन्तु वह इसका कोई प्रतिवाद नहीं कर पाती है और उत्तेजना और डर के मारे हांफने लगती है। वह दीप्ति को अपने बारे में समझाता है कि वह बहुत साफ दिल का व्यक्ति है किन्तु उसकी पत्नी एक बहुत कमीनी स्त्री है। वह उसकी बिल्कुल परवाह नहीं करती है। बात-बात में उसे गालियां देती है और लड़ती-झगड़ती है किन्तु दीप्ति को कुछ समझ में नहीं आता और वह रोने लगती है। घर पहुँचाने की जिद करती है। मनफूल उसे घर पहुंचा आता है हालांकि मनफूल भी काफी डर गया था उसे लगा कि मामला कहीं बिगड़ न जाए। वह दीप्ति को समझाने की कोशिश करता है अगर वह उससे नाराज हुई तो वह आत्महत्या कर लेगा और वह दीप्ति का पैर स्पर्श कर लेता है। वह अपनी पत्नी का पैर पकड़कर कई बार माफी भी माँग चुका है। दीप्ति बहुत डर गई थी किन्तु उसकी इस चतुराई से दीप्ति के मन में बहुत करुणा और दया आ गयी थी। उसे लगा कि कहीं मनफूल आत्महत्या न कर ले। दीप्ति ने यह तय किया कि वह मनफूल को समझाएगी और उसे ऐसा करने से रोकेगी। अब मनफूल रोज दीप्ति को घर से ले जाता और घर छोड़ आता। किन्तु कुछ ही समय बाद दीप्ति की सहेली कुन्ती मनफूल की पत्नी को सारी रामकहानी सुना देती है। और उसकी पत्नी मनफूल को रंगेहाथ पकड़ लेती है। दीप्ति को मारती-पिटती है। इस मारने-पीटने से दीप्ति बेहोश होकर गिर जाती है। मनफूल की पत्नी उस पर बिल्कुल भरोसा नहीं करती थी। अपना भांडा फूटता देख मनफूल अपनी पत्नी से कहता है इसी लड़की ने  मुझे फंसाया है। इस बगीचे में आकर मुझसे लिपट गई। अच्छा हुआ कि तुम आ गई। मेरा इसमें दोष नहीं है। बेहोशी जब टूटी तो दीप्ति ने देखा दो आकृतियाँ आपस में बात रहे हैं। उसे समझ में आ गया कि वह मनफूल और उसकी पत्नी है। मनफूल अपनी पत्नी से पैर छूकर माफी मांगता है और उसे बताता है कि यही लड़की उसे धोखे से यहां ले आई थी। वह सुनकर दीप्ति व्याकुल हो जाती है। उसे  शर्म महसूस होती है खुद को अपमानित महसूस करती है। उसका मन कर रहा था कि वह आत्महत्या कर ले। अत्यंत विक्षिप्त हालात में वह घर पहुँचती है उसे देखकर सभी परेशान हो उठते हैं। मनफूल के बारे में वह कुछ नहीं बताती है। उसके दुख के कारण उसकी माँ के हृदय में करुणा उभर आती है। उधर दीप्ति का भी अपनी मां के प्रति व्यवहार बदल जाता है। अब वह मां से अच्छा व्यवहार करने लगती है।
दीप्ति भी उधेड़बुन में खो जाती है। उसे समझ में नहीं आता कि वह अशोक से प्रेम करती थी या मनफूल से। अगर अशोक से तो वह मनफूल की तरफ कैसे प्रभावित हो गई। क्या प्यार इसी तरह बदलता है। क्या उसे कपड़े की तरह बदला जाता है। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि दरअसल वह न अशोक से प्यार करती थी न ही मनफूल से। वह सिर्फ खुद से प्यार करती थी और अपनी अहं की तुष्टि के लिए बारी-बारी से दोनों के करीब आती गई। वह एक समय खुद को नायिका समझती थी और अब खुद के अन्दर ढेरों बुराई देखने लगी। वह खुद को कोसने लगी। उसे लगा कि उसके पास सिर्फ अहंकार है और इस अहंकार के अलावा और उसके पास रह ही क्या सकता है। उसे खुद से घृणा होने लगी थी। उसे लगा कि झूठे, आलसी और अहंकारी को सच्चा प्यार कौन करेगा। उसके पास तो उसी के तरह आदमी इकट्ठे होंगे। वह स्वयं झूठी थी इस कारण उसके इर्द-गिर्द भी झूठे इकट्ठे होंगे। यह बात सोचकर खुद की न•ारों में घृणित हो उठी थी। उसे इतनी आत्मग्लानि महसूस हो रही थी कि उसे लग रहा था कि उससे गिरी हुई लड़की और कोई नहीं हो सकती। इस कारण उसकी जीने की इच्छा भी समाप्त हो गई थी। वह जीना भी नहीं चाहती थी। शंकर जब मनफूल के घर में उससे मिलकर पूछताछ करना चाहता है तो मनफूल की पत्नी लीला उसे बहुत बुरा-भला सुनाती है और सही घटना से अवगत करती है। शंकर पीड़ा से भर उठता है। उसे लगता उसने कैसे मनफूल पर भरोसा कर लिया। उसे लगता है दीप्ति की इस हालात के लिए वह भी जिम्मेदार है।
इस बीच दीप्ति में अद्भुत परिवर्तन होने लगा था। उसने तड़क-भड़क से रहना छोड़ दिया। फिल्में, सैर-सपाटा आदि भी छोड़ दिया था। यहां तक कि यदि शंकर का कोई मित्र मिलने आता तो वह वहां से उठकर दूसरी ओर चली जाती थी। उसके स्वभाव में गम्भीरता आ गई थी। एक खास बात यह थी कि मां-बेटी के संबंध मधुर हो गए थे। मां बसंती अपनी बेटी दीप्ति की तारीफ करते थकती नहीं थी।
अमरकान्त ने अपने प्राय: सभी उपन्यासों में निम्न मध्यवर्गीय चरित्रों के चित्रण में खूब सफलता पाई है  'सूखा पत्ताÓ, 'ग्राम सेविकाÓ, 'आकाश पक्षीÓ, 'कंटीली राह के फूलÓ,  'काले उजले दिनÓ उपन्यासों में निम्न मध्यवर्गीय पात्र जहां कहीं आए हैं वहां बेहद वास्तविक रूप से आए हैं। उनके आशा-आकांक्षा के साथ-साथ अंतद्र्वंद्व भी स्पष्टता से प्रतिबिंबित हुए हंै।  अमरकान्त के उपन्यासों में निम्नवर्गीय पात्रों के द्वारा अमरकान्त ने समाज की उन विसंगतियों एवं विद्रूपताओं पर करारा प्रहार किया है। जिनके द्वारा आदमी पशु का जीवन बिताने को मजबूर हुआ है। इनके निम्नवर्गीय पात्र आदर्श का लबादा नहीं ओढ़े हैं, वे यथार्थ के धरातल पर खड़े हैं। इस उपन्यास में भी अमरकान्त ने बड़ी ईमानदारी से निम्न मध्यवर्गीय पात्रों का चित्रण किया है। अमरकान्त की सम्मोहित करने वाली भाषा इस उपन्यास के पाठकों को अन्त तक बांधे रखने में सक्षम है ।